डेस्क ♦ कांस फिल्म फेस्टिवल में हमारे सितारे जैसी हरकतें कर रहे हैं, उससे पता चलता है कि वे सच और सिनेमा का मिक्सचर हो चले हैं। टिप्पणीकार उन्हें एक बच्चे के जन्मदिन पार्टी में शामिल उत्साही मेहमान की संज्ञा दे रही हैं।
आज मंच ज़्यादा हैं और बोलने वाले कम हैं। यहां हम उन्हें सुनते हैं, जो हमें समाज की सच्चाइयों से परिचय कराते हैं।
अपने समय पर असर डालने वाले उन तमाम लोगों से हमारी गुफ्तगू यहां होती है, जिनसे और मीडिया समूह भी बात करते रहते हैं।
आवाजाही की खबरों से अलग मीडिया को बीच बहस में लाने की एक कोशिश। कॉरपोरेट मीडिया के बरक्स कॉपरेटिव और सोशल मीडिया की वकालत।
अश्विनी कुमार पंकज ♦ पांच साल पहले आंदोलन वाले अखबार ने एक निर्दोष संस्कृतिकर्मी जीतन मरांडी की फोटो फ्रंट पेज पर छापकर उसे फांसी के फंदे तक पहुंचा दिया था। झारखंड हाईकोर्ट ने उसे निर्दोष मानते हुए पिछले दिनों रिहा कर दिया। अब झारखंड के डीजीपी राजीव कुमार ने इस मामले की जांच का आदेश दिया है। जांच आईजी संपत मीणा करेंगी जिन्होंने सीआइडी के एसपी अमरनाथ मिश्रा के नेतृत्व में जांच टीम गठित कर दी है। यह टीम गलत अनुसंधान करने और एक निर्दोष को नक्सली साबित करनेवाले पुलिस अफसरों को चिन्हित करेगी। इस बीच झारखंड विशेष शाखा के एडीजीपी रेजी डुंगडुंग ने भी अपनी रिपोर्ट डीजीपी और गृह सचिव को दे दी है।
कामायनी ♦ आज कल मैं लगातार गुस्से से भरी रहती हूं। बहुत साल पहले जब यह गुस्सा मुझ पर हावी हुआ था, तब मेरी मनोविज्ञान की एक मददगार शिक्षिका ने मुझे एक किताब पढ़ने के लिए दी थी, “The Dance of Anger”। किताब ने मेरे दिमाग पर गहरा असर किया था और मैंने एक मूल बात कुछ इस प्रकार ग्रहण की, “गुस्सा आना समस्या नहीं, उसकी वजह को समझें, गुस्से को कैसे व्यक्त (act out) करते हैं, यह समस्या हो सकती है!” खैर बात यहां मेरे गुस्से की नहीं, एक सामूहिक गुस्से के एहसास की है। मुझे ही नहीं ‘हमें’ गुस्सा आता है और हम इस गुस्से को कैसे व्यक्त करेंगे? How will we act out our anger? मैं आपके सामने कुछ उदाहरण रखती हूं कि हमें गुस्सा क्यों आता है और हम क्या करते हैं!
हिमांशु कुमार ♦ अदालत से वापिस जेल लौटते ही सोनी अवाक रह गयी। सोनी सोरी को पुलिस जेल से अस्पताल में अपने पति को देखने के लिए लेकर गयी। वहां सोनी का पति अनिल पूरी तरह बेबस हालत में पड़ा हुआ था। उसका पति अपने शरीर के सभी अंगों पर अपना काबू गंवा चुका था। वह लगभग जिंदा लाश बन चुका था। वह बोल भी नहीं पा रहा था। जेल अधिकारियों ने कहा कि हमने इसे रिहा कर दिया है। आज से इस पर कोई मुकदमा नहीं है। इसके बाद पुलिस सोनी सोरी को फिर से जेल ले गयी। सोनी सोरी के पति की कोर्ट से रिहाई अब किसी काम की नहीं थी। वह अब अपने बच्चों को पहचान भी नहीं सकता। इस तरह पुलिस ने इस परिवार को बरबाद करने के अपने वादे की पहली किस्त पूरी कर दी है।
प्रेस विज्ञप्ति ♦ साल 2012 के स्पंदन कृति सम्मान के लिए कथाकार ओमा शर्मा का चयन किया गया है। ललित कलाओं के लिए समर्पित भोपाल की स्पंदन संस्थान हर साल ये सम्मान देती है। ओमा शर्मा को उनके कथा संग्रह शुभारंभ और अन्य कहानियां के लिए यह सम्मान दिया जाएगा। उन्हें नंदकिशोर आचार्य, अर्चना वर्मा, शशांक, मधु कांकरिया और हरीश पाठक के निर्णायक मंडल ने इस सम्मान के लिए चुना है। सम्मान स्वरूप ओमा शर्मा को ग्यारह हजार रुपये की राशि और स्मृति चिन्ह दिसंबर में आयोजित स्पंदन के सम्मान समारोह कार्यक्रम में दिया जाएगा। उर्मिला शिरीष ने यह जानकारी एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिये मोहल्ला लाइव को दी है। ओमा शर्मा यूपी के बुलंदशहर जिले के दीघी गांव के रहने वाले हैं।
अरविंद दास ♦ किसान और मजदूरों से जुड़ी खबरों की तरह न ही वर्ष 1986 में और न ही वर्ष 2005 में विश्लेषण अवधि के दौरान दलितों और आदिवासियों से जुड़ी कोई खबर नवभारत टाइम्स की सुर्खी बनी। वर्ष 1986 में जहां दलित और आदिवासी से जुड़े पांच मुद्दे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुए, जिसमें ‘आदिवासी गदर-केंद्र के लिए आजादी का अर्थ’ शीर्षक से एक संपादकीय अग्रलेख भी शामिल है, वहीं वर्ष 2005 में भी दलित और आदिवासी से जुड़े पांच मुद्दे प्रकाशित हुए, इसमें भी एक दिन ‘उनके दलित और हमारे’ शीर्षक से संपादकीय अग्रलेख शामिल है। वर्ष 1986 में ‘बांग्लादेश चकमा आदिवासी वापस लेगा’ शीर्षक से एक खबर दो कॉलम में पहले पन्ने पर प्रकाशित हुई।
ओमैर अनस ♦ ‘वंदे मातरम’ एक विवादित पुस्तक और विवादित व्यक्ति के दिमाग से निकली है, जो मुस्लिम नफरत पर आधारित है। इसलिए इस गीत को बढ़ावा देना दरअसल उस नफरत को बढ़ावा देना है। ये आप भली भांति जानते हैं कि इतिहास कभी पीछा नहीं छोड़ता। ‘वंदे मातरम’ एक नफरत की कोख से जन्मा गीत है। इस बात से किसी तरह से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता… जब कोई वंदे मातरम जोर से गाता है, मुस्लिम मन डरने लगता है। जैसे फिर कुछ होने वाला है। जय श्री राम और वंदे मातरम पर उग्रवादी हिंदू राष्ट्रवाद ने कब्जा कर लिया है, जिससे इस बात का मौका ख़त्म हो गया है कि वंदे मातरम को आनंद मठ से अलग कर के देखा जाए।
देवाशीष प्रसून ♦ वंदे मातरम का संबंध आनंद मठ से उतना ही है, जितना भारतीय मुसलमानों का मध्यकालीन इस्लामिक साम्राज्यवाद से है। मतलब दोनों का ऐतिहासिक महत्व तो है, लेकिन मौजूदा हालात में दूर-दूर तक इनका एक-दूसरे से कोई नाता नहीं है। जब आप वंदे मातरम को आनंद मठ से जोड़कर इसे सांप्रदायिकता से रिलेट कर रहे होते हैं, तो पिछले साठ-सत्तर साल के हिंदुस्तानी इतिहास पर पानी फेर रहे होते हैं। आनंद मठ वाले गीत से दो पैरा अलग किया गया, उससे सारे सांप्रदायिक तत्व निकालकर उसे जनता के बीच स्वतंत्र रूप से प्रचारित किया गया और फिर बना आज का वंदे मातरम्। संदर्भ अहम होता है और आज का वंदे मातरम आजादी के बाद जन्मे लोगों के लिए देशप्रेम की अभिव्यक्ति है।
अरविंद दास ♦ 80 के दशक में राजेंद्र माथुर, सुरेंद्र प्रताप सिंह और वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों ने हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसी भाषा का प्रयोग शुरू किया था, जिसकी पहुंच बहुसंख्यक हिंदी पाठकों तक थी। बकौल प्रभाष जोशी, “हमारी इंटरवेंशन से हिंदी अखबारों की भाषा अनौपचारिक, सीधी, लोगों के सरोकार और भावनाओं को ढूंढने वाली भाषा बनी। हमने इसके लिए बोलियों, लोक साहित्य का इस्तेमाल किया।” लेकिन यही बात वर्तमान में सुर्खियों की भाषा के प्रसंग में नहीं कही जा सकती है। आज सुर्खियों की भाषा भले ही अनौपचारिक हो उसमें हिंदी की बोलियों के शब्दों की जगह तेजी से अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग बढ़ रहा है। मसलन, ओके, नो मोर, पेटेंट, अजेंडा, फोटोग्राफ, टेंशन, फ्री, बैन आदि।
संजय कृष्ण ♦ घटक आदिवासी समाज को सत्यजीत रॉय की तरह नहीं देखते थे। उन्होंने ‘आदिवासी जीवन के स्रोत’ एवं ‘उरांव’ बनायी, तो आदिवासी समाज को, उनकी संस्कृति को निकट से देखने की कोशिश की। फिल्मकार मेघनाथ के शब्दों में, “वे आई-लेवल से देख रहे थे।” यानी, यह दृष्टि समानता की थी, संवेदना की थी। दोनों डाक्यूमेंट्री की शूटिंग रांची और आस-पास और नेतरहाट क्षेत्र में की गयी थी। ‘आदिवासी जीवन के स्रोत’ की जब शूटिंग कर रहे थे, तो बीच में अपनी व्यस्त दिनचर्या से थोड़ा समय निकालकर अपनी पत्नी को पत्र लिखते। एक पत्र 22 फरवरी 1955 का है। लिखा है, “उरांव-मुंडा के साथ सारा दिन बीत रहा है। इनके साथ रहकर मिट्टी की गंध मिल रही है। इनका अपूर्व गान हमें मदहोश कर दे रहा है।”