इस जिंदगी का कोई निर्देशक नहीं होता!

उमेश पंत ♦ उस प्ले के किरदारों की विडंबना भी यही थी कि ये किसी को भी नहीं पता कि उस प्ले का निर्देशक कौन है? ठीक वैसा जैसा जिंदगी में होता More »

आओ सखि, कहें और कह कर मुकर जाएं!

पीयूष द्विवेदी भारत ♦ कह-मुकरी का अस्तित्व भारतेंदु युग की समाप्ति और द्विवेदी युग के आरंभ के साथ लगभग लुप्तप्राय हो गया। इस विधा पर अमीर खुसरो ने सर्वाधिक काम किया। भारतेंदु More »

भीड़भाड़ में एकांत की एक कथा-यात्रा

उमेश पंत ♦ लंबी यात्रा के बाद आप जब मुंबई लौटते हैं तो मुंबई को नये नजरिये से देखने की ललक होती है। मुंबई भले ही अफरातफरी से भरा शहर हो पर More »

जय हो, जय हो, हिटलर की नानी की जय हो!

कमल मिश्र ♦ दिल्ली में अपने पड़ोस के सरकारी स्कूल के बच्चों को गणतंत्र दिवस के रंग में रंगा देख कर सरकारी विधालय में गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में बंटने वाले लड्डुओं More »

अपनी बल-बुद्धि का इस्‍तेमाल करो ओ लड़कियो!

विभा रानी ♦ तुम भी अपने जुल्‍म के खिलाफ लड़ो, खूब लड़ो। लेकिन साथ-साथ अपने झूठ-सच की कुंजी अपने पास रखो, उससे किसी और का ताला न खोलो, न अपने ताले को More »

बच्‍चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे…

प्रकाश के रे ♦ आज से सौ साल पहले वह कलकत्ता से पानी के जहाज में बैठ कर एक अनजान सफर पर निकली थी। उस सफर में उसके साथ कोई अपना न More »

 

इस जिंदगी का कोई निर्देशक नहीं होता!

Qtiyapa

उमेश पंत ♦ उस प्ले के किरदारों की विडंबना भी यही थी कि ये किसी को भी नहीं पता कि उस प्ले का निर्देशक कौन है? ठीक वैसा जैसा जिंदगी में होता है। हर मोड़ पे कोई नया किरदार आता है और जिंदगी को एक दिशा देने लगता है, तब पता चलता कि दरअसल अब तक जो घटनाएं हो रही थीं वो घटनाएं इसी निर्देशन के लिए हो रही थीं। पर कुछ ही देर में पता चलता है कि ये एक भ्रम था और आगे जो घटनाएं होगी उनको निर्देशित करने वाला कोई और होगा, पर कौन, ये कोई पता नहीं लगा सकता।

आओ सखि, कहें और कह कर मुकर जाएं!

Amir Khusro

पीयूष द्विवेदी भारत ♦ कह-मुकरी का अस्तित्व भारतेंदु युग की समाप्ति और द्विवेदी युग के आरंभ के साथ लगभग लुप्तप्राय हो गया। इस विधा पर अमीर खुसरो ने सर्वाधिक काम किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कह-मुकरियों की काफी रचना की। लेकिन भारतेंदु युग के बाद जब द्विवेदी युग आया तो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के शास्त्रीयता के प्रति झुकाव के कारण तत्कालीन दौर के तकरीबन सभी रचनाकारों ने शास्त्रीय छंदों की राह पकड़ ली। और इस तरह खुसरों की बेटी और भारतेंदु की प्रेमिका कहलाने वाली ‘कह-मुकरी’ जैसी रसपूर्ण और मनोरंजक काव्य-विधा गुम होती गयी।

भीड़भाड़ में एकांत की एक कथा-यात्रा

Andheri

उमेश पंत ♦ लंबी यात्रा के बाद आप जब मुंबई लौटते हैं तो मुंबई को नये नजरिये से देखने की ललक होती है। मुंबई भले ही अफरातफरी से भरा शहर हो पर मुंबई के आसपास इस अफरातफरी से उपजे मानसिक तनाव को बहा आने के तटीय प्रबंध भी मौजूद हैं। पर आपको खुद के लिए और इन तटों तक पहुंचने के लिए वक्त निकालना होगा। और निस्‍संदेह ये वक्त मुंबई में लंबे अरसे तक टिके रहने की प्रेरणा और सामर्थ्य दोनों ही आपके हिस्से में डाल देगा। एकांत से घिरे एक शोर जैसा शहर है मुंबई जो दोनों में से किसी एक को बारी बारी से चुन पाने का मौका भी मुहैय्या करता है।

जय हो, जय हो, हिटलर की नानी की जय हो!

Crime against Women

कमल मिश्र ♦ दिल्ली में अपने पड़ोस के सरकारी स्कूल के बच्चों को गणतंत्र दिवस के रंग में रंगा देख कर सरकारी विधालय में गणतंत्र दिवस के उपलक्ष में बंटने वाले लड्डुओं की मिठास मुझ पर भी ताजा हो गई। और फिर याद आया वो स्कूली परिवेश जहाँ के सहज-उन्मुक्त माहौल में, बी. एच. यू., जामिया मिल्लिया इस्लामिया तथा दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रख्यात शिक्षा केन्द्रों में प्रवेश के पहले, संपन्न हुयी मेरी और मेरे जैसे अविकसित इलाकों से ताल्लुक रखने वाले दूसरे अनेकों भारतीय नागरिकों की अनुकूल शिक्षा-दीक्षा। लेकिन राष्ट्रपति महोदय के अभिभाषण के अतिरिक्त भी प्रायः शिक्षा और समाज निर्माण के मुद्दों पर विशेषज्ञों को सुनते हुए मैं खुद को बड़ा निराश महसूस करता हूं।

अपनी बल-बुद्धि का इस्‍तेमाल करो ओ लड़कियो!

Durga

विभा रानी ♦ तुम भी अपने जुल्‍म के खिलाफ लड़ो, खूब लड़ो। लेकिन साथ-साथ अपने झूठ-सच की कुंजी अपने पास रखो, उससे किसी और का ताला न खोलो, न अपने ताले को खोलने की इजाजत दो, वरना कल को सचमुच में गरीब, मायूस, मजबूर, हालात की सतायी लड़कियों पर से लोगों का विश्‍वास उठ जाएगा और इसका सारा दोष भी तुम्‍हारे ही मत्‍थे आएगा। वैसे ही, जैसे बड़ी चालाकी से यह आरोपित कर दिया गया है कि ‘औरतें ही औरतों की दुश्‍मन हैं’ या ‘चूड़ि‍यां कायरता की निशानी है।’ इसलिए, अपना इस्‍तेमाल होने देने से पहले अपनी बल-बुद्धि का इस्‍तेमाल करो ओ लड़कियो!

बच्‍चे एक दिन यमलोक पर धावा बोलेंगे…

Coolie Woman

प्रकाश के रे ♦ आज से सौ साल पहले वह कलकत्ता से पानी के जहाज में बैठ कर एक अनजान सफर पर निकली थी। उस सफर में उसके साथ कोई अपना न था। वह अकेली थी। वह गर्भवती थी। ‘द क्लाइड’ नाम के उस जहाज पर जो उसके हमसफर थे, उन्हें भी मंजिल का पता न था। साथ में कुछ बहुत जरूरी चीजों के गट्ठर थे और एक उम्मीद थी कि जहां जा रहे हैं, वहां भला-सा कोई रोजगार होगा और कुछ समय बाद कुछ कमा कर वापस लौट आएंगे। ऐसे जहाजों की रवानगी का सिलसिला 1834 से शुरू हुआ था और 1920 तक चलता रहा था। जो गये वे लौटे नहीं। जहां-जहां गये, वहीं के होकर रह गये। जिन गांवों और रिश्तों को पीछे छोड़ गये थे, वे भी उनको भूलते गये। लेकिन उनकी और उनकी संतानों की यादों में, व्यवहार में, संस्कार में अपना ‘देस’, अपनी ‘माटी’, अपनी ‘नदियां’, अपने ‘तीरथ’ और अपने ‘देवता-पितर’ बने रहे, बचे रहे।

कौन लिख जाता है दीवारों पर अपनी असहमति

J Swaminathan

उदय प्रकाश ♦ मैंने वैशाली के अपने फ्लैट के स्टोर रूम में बहुत सी पुरानी किताबें, ग्रंथ और पांडुलिपियां भर रखी हैं। बीच में, पिछले साल लंबे अर्से के लिए बाहर की यात्राओं में निकल गया था। पत्नी भी अपने मायके और ससुराल में थीं। तो स्टोर रूम में दीमकों का आक्रमण हो गया। कुछ दस्तावेज धूल और कागजी बुरादे में बदल गये। बाद में, लौटने पर पेस्ट कंट्रोलर्स को बुलाया तो समस्या निपटी। आज फिर वहां, फुर्सत मिली तो आप दोस्तों के लिए घुसूंगा और वह प्रपत्र निकालूंगा जिसमें मैंने इस किंवदंती के नोट्स लिये थे। तब तक प्रतीक्षा कर लें। (यदि यह संभव न हो सका, तो कुशीनगर, लुंबिनी से लेकर दांतेवाड़ा, अचानकमार, भैरूंसांग, चंद्रपुर के राजमार्गों के पेड़ों की छाल पर उत्कीर्णित अभिलेखों, आपत-वचनों के जरिये आचार्य वृहन्नर अपकीर्त्ति गौतम के अज्ञात गुप्त स्थल का पता लगा कर, उनसे मिल कर आगे की कथा जानने का प्रयत्न करूंगा!

मेरे भीतर एक कायर है, उसे मार देना चाहिए

Bijapur Killing

अनुराग अनंत ♦ आम आदमी की सीमाएं वहां मुझसे जीत गयीं और मैं हार गया। मेरी आंखों में मेरा घर परिवार नाचने लगा था, मेरी जिम्मेदारियां कोई मेरे कानों में आवाज मार-मार कर मुझे याद दिलाने लगा। मैंने पाया मैं कैद हूं… और मैं डर गया। मैंने महसूस किया कि संविधान से ले कर लोकतंत्र तक की सारी समझ किताबी है और जमीन पर जिंदगी घर-परिवार और जिम्मेदारियों का दूसरा का नाम है। मैंने वहां जाना कि एक आम आदमी के लिए हवालात भी एक ऐसा शब्द हो सकता है, जिसे सुन कर आत्मा तक कांप उठे। उस वक्त मैंने पाया, मेरा कुछ हिस्सा वहीं हवलदार मुंह से निकले हवालात शब्द में कैद हो गया है। मेरा वो हिस्सा मुझे आज भी आवाज दे रहा है और कह रहा है कि मेरे भीतर एक कायर रहता है। मुझे उसे मार देना चाहिए। जब-जब वो आवाजें आती हैं, मेरे वजूद का हर एक हिस्सा परेशान हो उठता है। उस वक्त मुझे ये आजादी झूठी लगती है और मैं एक कैदी सा महसूस करने लगता हूं।

आकाश पे एक खुदा है कहीं, आज सीढ़ी लगाके ढूंढें उसे!

global village

उमेश पंत ♦ एक गाने का जि़क्र करते हुए गुलजार कहते हैं कि अब गुल्लक जैसे शब्द आम ज़िंदगी में प्रयोग से बाहर होने लगे हैं। बीड़ी जलइले गाने में कचेहरी जैसा शब्द इस्तेमाल किया है, पर कचेहरी अब कौन समझता है। ये एक अकेला शब्द पूरी जमींदाराना तहजीब को बयां कर देता है। गुलजार आगे बढ़ते हुए कहते हैं कि मैं अपने दौर की तहजीब इकट्ठा कर लूं, तो मैं समझ लूंगा कि मैंने एक गुल्लक बना लिया है, ताकि लोगों को जब भी जरूरत पड़े वो उस गुल्लक को तोड़ कर उस तहजीब की नकदी का इस्तेमाल कर लें। गुलजार अपनी कविताओं के शब्दों का जि़क्र करते हुए कहते हैं कि मैं जहां से इनको उंगली पकड़ के लाया, ये मुझे वहां उंगली पकड़ ले चलते हैं।

यथार्थ के पेट्रोल से नहीं चलती तिग्‍मांशु की बुलेट राजा

patna-explosion

उत्‍पल पाठक ♦ ऐसा माना जाता है कि जब कोई स्थापित और गंभीर निर्देशक किसी फिल्म का निर्देशन करते हैं, तो उस फिल्म के पीछे उनकी अपनी दूरगामी सोच, जज्बा और उस विषय का लगाव उभर कर सामने आता है। तिग्मांशु जी की पिछली फिल्मों (हासिल, चरस, शागिर्द और पान सिंह तोमर) में ये लगाव नजर आता है। जिसे हम रीयलिस्टिक डायरेक्शन (सजीव निर्देशन) कहते हैं, उसकी सच्ची तस्वीर उनकी पिछली फिल्मों में कूट-कूट कर भरी थी। लेकिन सफलता के सफर में आपको कुछ ऐसे ऑफर, अनुरोध और निवेदन प्राप्त होते हैं, जहां आपको अपनी पहचान से इतर उनके “हिसाब” से एडजस्ट करके निर्देशन करना होता है। शायद यही परिस्थितियां रही होंगी, जिसने अप्रत्याशित रूप से बुलेट राजा जैसी फिल्म पर अपने दुष्प्रभाव छोड़ गयीं।