[30 Jul 2010 | 10 Comments | ]
धमकी की खबर के पीछे क्‍या कोई प्रोपैगैंडा है?

मुखौटों के बिना मोहब्बत वाला मोहल्ला

[30 Jul 2010 | Read Comments | ]

निधि सक्‍सेना ♦ ऐसे होता था न! अपने स्कूल, कॉलेज में? साथ या प्रेम के अधूरे, अपरिपक्व अंश ऐसे ही चारों ओर बिखराये और संभाले जाते थे… जैसे ब्लू फिल्म की सीडीज दिखायी और छिपायी जाती हैं, जैसे – अश्लील एसएमएस रहस्यमयी तरीकों से पढ़ाये जाते हैं।

Read the full story »

उदय रंजन ♦ तीनों पत्रकारों ने धमकियों के आगे झुकने से इनकार कर दिया तो फिर षड्यंत्र के तहत ये आरोप लगाया गया कि मीडिया खबर के संपादक को ये लोग जान से मारने की धमकी दे रहे हैं।
Read the full story »

मीडिया मंडी, मोहल्ला दिल्ली »

[30 Jul 2010 | No Comment | ]
“खबरों की खबर : क्यों और कितना जरूरी” पर बहस आज

विनीत कुमार ♦ मीडिया और चैनलों की बाढ़ के बीच जहां छोटी से छोटी खबर के ब्रेकिंग न्यूज बनने की लगातार संभावना बनी रहती है, देश की हर लड़की, हर स्त्री एक पैकेज है की गुंजाइश में देखी-समझी जाती है, वहीं देश के सबसे तेज कहे जानेवाले चैनल की एक मीडियाकर्मी की देर रात काम की शिफ्ट से लौटने के दौरान हत्या कर दी जाती है और चैनल पर बारह घंटे तक कोई खबर नहीं आती। देश में हजारों ऐसे मीडियाकर्मी हैं, जो एक मजदूर से भी ज्यादा बदतर जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं। उन बदतर स्थिति में जीनेवाले मजदूरों पर रवीश कुमार फिर भी कभी आधे घंटे की स्टोरी बना देते हैं लेकिन इन मीडियाकर्मियों की सुध लेनेवाला कोई नहीं है।

मीडिया मंडी »

[30 Jul 2010 | No Comment | ]
पत्रकारों को पीएफ की जगह गोली मारने की धमकी

डेस्‍क ♦ हमार एवं फॊकस टीवी के पूर्व कर्मचारियों को चैनल के प्रबंधन ने गोली मारने की धमकी दी है। ये पत्रकार चैनल के मालिक से अपना पीएफ मांगने गये थे। करीब पचास की स‌ंख्या में पुरुष एवं महिला पत्रकार अपने हक की मांग के लिए इकट्ठे हुए थे। इन पत्रकारों के मुताबिक जब उन्होंने चैनल के मालिक मतंग सिंह और हेड उदय चंद्रा के स‌मक्ष अपने बकाये पीएफ के भुगतान की मांग की तो उन्हें गोली मार देने की धमकी दी गयी। इन पत्रकारों ने चैनल मालिक मतंग सिंह और हेड उदय चंद्रा के खिलाफ नोएडा के सेक्टर 20 थाने में गोली मार देने की धमकी का एफआईआर दर्ज कराया। गौरतलब है कि हमार एवं फॊकस टीवी के कर्मचारियों को तीन महीने से सैलरी नहीं मिली है।

uncategorized »

[30 Jul 2010 | Comments Off | ]

नज़रिया, विश्‍वविद्यालय »

[29 Jul 2010 | 2 Comments | ]
नौकरी मिली, दलितों की चिंता का दिखावा खत्‍म हुआ!

अनाम ♦ संदीप अवसरवादी सपकाले जी, दो बातों के लिए आप बधाई के पात्र हैं। पहला यह कि अपने जीवन में पहली बार आप किसी ऐसे व्यक्ति का समर्थन करते हुए दिख रहे हैं, जो सत्तासीन नहीं है। दूसरा इसलिए कि प्रकाशन विभाग से विभूति द्वारा दिखाये गये सुरक्षित बेदखली के रास्ते से निकलने की पीड़ा से मुक्त होने के बाद कुछ सार्वजनिक बात बयानी किया। अब तक बिना “अवसर” के आप बोलते कहां हैं जनाब? और जब बोलते थे तो गोपीनाथन पर यह दबाव बनाने के लिए कि “विदर्भ की आबादी में दलित अधिसंख्य हैं और इसलिए हिंदी विश्वविद्यालय में दलितों को नौकरी चाहिए” और ऐसा कहते हुए पूरे विदर्भ के दलितों को खुद में समाहित मान लिया करते थे।

नज़रिया »

[28 Jul 2010 | No Comment | ]

एक सज्‍जन ने इस टीप के साथ मोहल्‍ला लाइव को यह वीडियो भेजा है कि कुछ लोग अपने आपको प्रभाष जोशी का बहुत करीबी साबित कर रहे हैं। उनको इसे सुन लेना फायदा पहुंचाएगा : मॉडरेटर

नज़रिया, स्‍मृति »

[28 Jul 2010 | 5 Comments | ]
चीनी कम्युनिस्‍ट पार्टी के छद्म ने चारू बाबू की हत्‍या की

विश्‍वजीत सेन ♦ चीनी कम्युनिस्‍ट पार्टी की छद्मक्रांतिकारिता के शिकार हुए चारू बाबू। उनमें ईमानदारी की कमी नहीं थी, लेकिन धीरज की कमी अवश्य थी। ‘पार्टी’ बनाने में उन्होंने जरूरत से ज्यादा जल्दबाजी की, इस बात को उनके प्रशंसकों ने भी स्वीकारा। पश्चिम बंगाल के एक छोटे से कस्बे से उठकर भारत जैसे देश की कम्युनिस्ट पार्टी का सर्वमान्य नेता बनने के लिए जितनी सलाहियत की आवश्यकता होती है, वह उनमें नहीं थी। देखते ही देखते उनकी कम्युनिस्ट पार्टी असंख्य गुटों में तब्दील गयी, जो एक दूसरे के खून के प्यासे थे। हर गुट, दूसरे को ‘वर्ग दुश्मन’ समझने लगा और खुद को क्रांतिकारी। आज भारत में कितने नक्सलपंथी गुट हैं, इसकी गिनती करना भी मुश्किल है।

शब्‍द संगत, स्‍मृति »

[28 Jul 2010 | No Comment | ]
आते दृश्‍य जाते दृश्‍य

ओम थानवी ♦ जब थोड़े सफर, थोड़े नाश्ते और कुछ गंभीर बातों से लोग सुस्त-से दीखने लगे, वात्स्यायनजी ने ताली बजाकर सबका ध्यान खींचा। फिर सबसे आगे, दरवाजे तक चले गये। मुड़े तो एक बाजीगर की-सी चंचलता और फुर्ती उनके चेहरे पर चढ़ चुकी थी। बोले, हमारे दौर के अनेक कवियों को सुनने का आपको मौका न पड़ा होगा। आपको उनकी कुछ झलक दिखलाये देते हैं। और वे दरवाजे के साथ दीवार से निकले मेज-नुमा फट्टे पर चढ़ बैठे। ये मेजें कुर्सीयान में सबसे आगे की पंक्ति के मुसाफिरों की सुविधा के लिए बनी होती हैं। एक-एक कर उन्होंने कुछ कवियों के पाठ की ‘सस्वर’ नकल उतारी। सबसे मजेदार, सही शब्दों में हंसा-हंसा कर लोटपोट कर देने वाली नकल भगवतीचरण वर्मा के गीत की थी।

असहमति, नज़रिया, मोहल्ला दिल्ली, शब्‍द संगत »

[28 Jul 2010 | 22 Comments | ]
यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है!

राजेंद्र यादव ♦ बुद्धिजीवियों का यह कौन सा आचरण है कि वे दूसरे पक्ष की बात सुनेंगे ही नहीं। यह विचारों का लोकतंत्र नहीं, बौद्धिक तानाशाही है। “मैं तुम्‍हारे विचारों को एक सिरे से खारिज करता हूं, मगर मरते दम तक तुम्‍हारे ऐसा कहने के अधिकार का समर्थन करूंगा।” यह कहा-बताया जाता है लोकतंत्र के पुरोधा वॉल्‍टेयर का। दूसरे को बोलने ही न दो, यह कैसा फासीवाद है? क्‍या हमारे तर्क इतने कमजोर हैं कि “दुश्‍मन” के सामने ठहर ही नहीं पाएंगे? इस वैचारिक तानाशाही का एक कुत्सित रूप कुतर्कों का पिंजड़ा खड़ा करना भी है। आप किसी भी विषय पर बात कीजिए, वे तर्क देंगे कि जब किसान हजारों की संख्‍या में आत्‍महत्‍याएं कर रहे हों, तब आप एसी कमरों में बैठकर एक फालतू मुद्दे पर मगजपच्‍ची कर रहे हैं – यह भयानक देशद्रोह है।