[27 Jan 2012 | 7 Comments | ]
उस टेलर की तलाश अब भी है जिसने कांचा के कपड़े सिले थे
किरदारों ने असर पैदा कर दिया! अदभुत है अग्निपथ!

[27 Jan 2012 | Read Comments | ]

संदीप नाइक ♦ यह फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं, एक विचित्र समय में मानक, उपमाओं, बिंबों को बाइस्कोप के जरिये देखने का मौका है। ऋषि कपूर अपने जीवन के श्रेष्ठ रोल में है। इस वर्ष खलनायको के सारे पुरस्कार संजय दत्त ले जाएंगे।

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रवीश कुमार ♦ बच्चन की जुबान पर जब मांडवा उच्चरित होता था, तो लगता था कि भारत छोड़ो, मांडवा में ही बसो। अपने गांव के बाद मांडवा का ही नाम लेने में मजा आता था।
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संघर्ष »

[24 Jan 2012 | One Comment | ]

विमलेंदु द्विवेदी ♦ दरअसल हमारे लेखक-कलाकार भी इतने खेमों में बटे हैं कि हम असीम को बहुत भरोसे के साथ आश्वस्त भी नहीं कर सकते। हमने इस देश के बौद्धिकों को कोई बड़ी लड़ाई लड़ते कभी देखा ही नहीं है। पर इस बिनाह पर हम उम्मीद नहीं छोड़ सकते। यह सवाल हमारी पहचान और सुरक्षा का भी है।

नज़रिया, व्याख्यान »

[23 Jan 2012 | 15 Comments | ]

बंकर रॉय ♦ मैं अपनी बात ये कहके खत्‍म करना चाहूंगा कि कि समाधार आपके अंदर ही होता है। समस्‍या का हल अपने अंदर ढूंढिए। और उन लोगों की बात सुनिए, जो आपसे पहले समाधान कर चुके हैं। सारी दुनिया में ऐसे लोग मौजूद हैं। चिंता ही मत करिए। विश्‍व बैंक की बात सुनने से बेहतर है, आप जमीनी लोगों की बातें सुनें। उनके पास दुनिया भर के हल हैं।

मोहल्ला पटना »

[23 Jan 2012 | 4 Comments | ]

पप्‍पू यादव ♦ अभी नीतीश का बयान आया है कि अब बिचौलियों की बारी है, जैसे बाकी सब ठीक हो चुका है। बिचौलिया सिर्फ पंचायत या मुहल्ले के स्तर पर नहीं हैं। असली बिचौलिये तो नीतीश की सरकार के मंत्रियों के साथ हैं। सैकड़ों मामले हैं, लेकिन नीतीश कुमार को शिकायत करने के बावजूद कुछ नहीं होता है।

फेसबुक से, मीडिया मंडी »

[23 Jan 2012 | 17 Comments | ]

विनीत कुमार ♦ बिहार में बहुजन ब्रेन बैंक के लीडर मुसाफिर बैठा का फेसबुक अकाउंट बहुत पवित्र हो गया है। बिहार सरकार क्‍या, किसी के भी खिलाफ कुछ भी नहीं है। मुझे अपने आपसे घृणा हो रही है कि मैंने क्यों ऐसे लोगों का भावनात्मक होकर साथ दिया। ऐसे लोग भरोसा तोड़ते हैं और हमें हतोत्साहित करते हैं कि आप कभी किसी का साथ न दो।

नज़रिया, शब्‍द संगत, संघर्ष »

[21 Jan 2012 | 3 Comments | ]

अपील विज्ञप्ति ♦ हम जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होने का विचार रखने वाले लेखकों, कवियों और कलाकारों से आग्रह करते हैं कि वे कॉरपोरेट अपराध, जनमत बनाने के षड्यंत्रों और मानवता के खिलाफ राज्य की हरकतों का विरोध करें तथा ऐसे दागी प्रायोजकों वाले आयोजन में हिस्सा न लें।

शब्‍द संगत »

[21 Jan 2012 | 2 Comments | ]

संदीप पांडेय ♦ ओम भाई यानी हमारे जीवन के पहले नायक। मंच पर अपने शानदार अभिनय से मंत्रमुग्ध करते ओम भाई, सिरमौर चौराहे पर चाय के किसी ठेले पर उम्र न जाए बीत फकीरे / अब दुनिया को जीत फकीरे … जैसे अपने गीतों से हम भटके हुए बेरोजगारों को हौसला देते ओम भाई, अपनी कलम से शहर के तथाकथित दिग्गजों की खबर लेते ओम भाई…