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बीजेपी का अंत

26 May 2009 2 Comments

bjpजनता द्वारा लगातार दो बार ठुकरा दी गई भाजपा अब किस राह पर जाएगी? क्या वह अंत की ओर बढ़ रही है या उसमें फिर से नई जान आ पाएगी? क्या भाजपा एक संकीर्ण, सवर्णवादी, महिला विरोधी, दलित विरोधी, सांप्रदायिक, पुरातनपंथी की अपनी छवि को दूरकर एक उदारवादी, सर्वजनवादी और आधुनिक विचारों वाली पार्टी बन पाएगी? सच तो यह है कि जनसंघ अपने स्थापना काल से ही दुविधा का शिकार रही… और भाजपा भी पिछले 29 साल के अपने इतिहास में लगातार दुविधाग्रस्त रही है। भाजपा के लिए सबसे बड़ी दुविधा यही है कि उसकी जड़ ही गलत है। भाजपा का गठन आरएसएस की राजनीतिक शाखा के रूप में किया गया है। आरएसएस का लक्ष्य है, देश में हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना। संघ की प्रार्थना में दोहराया जाता है- प्रभो शक्ति मन हिंदु राष्ट्रंग भूता

तो इस प्रकार भाजपा का भी उद्देश्य राजनीतिक क्षेत्र में काम कर हिंदू राष्ट्र के निर्माण में सहयोग करना है। जरा सोचिए, आईटी-बीपीओ की पीढ़ी वाला भारत, दुनिया में अमेरिका की जगह लेने की ओर अग्रसर भारत क्या भाजपा को इसलिए जिताएगा कि वह देश में हिंदू राष्ट्र बनाए? विडंबना यह है कि भाजपा के रणनीतिकारों ने अपने प्रचार का सबसे प्रमुख लक्ष्य आईटी पसंद करने वाली युवा पीढ़ी को ही बनाया। इन कर्णधारों को जाने कैसे यह भरोसा हो गया कि यह पीढ़ी भाजपा की संकीर्ण नीतियों को पसंद करेगी।

इस चुनाव में भाजपा ने मीडिया मैनेजमेंट तो कर लिया, लेकिन वह पब्लिक मैनेजमेंट नहीं कर पाई। ऐसा कोई वेबसाइट नहीं था, जिसे खोलने पर आडवाणी को पीएम बनाने का आहवान न दिखता रहा हो, लेकिन भाजपा के कर्णधार फिर फेल हो गए। वे प्रमोद महाजन के युग भी फेल हुए थे और अब अरुण जेटली के युग में भी फेल हुए। भाजपा को उम्मीद थी कि इंटरनेट तक पहुंच बनाने वाले दस फीसदी शहरी अभिजात वर्ग तक पहुंच बना कर वह सत्ता हासिल कर लेगी। देश की करीब 70 फीसदी ग्रामीण आबादी के लिए भाजपा के पास कोई कारगर योजना नहीं थी। ग्रामीण बेरोजगार युवकों को लुभाने का कोई प्रयास नहीं था। गरीबों को सस्ते चावल देने का वायदा करने वाली भाजपा को यह आभास नहीं था कि ग्रामीण आबादी का बहुसंख्य वर्ग खेती-किसानी से जुड़ा है और उसके लिए चावल-गेहूं कोई लक्जरी नहीं है। ऐसे गरीब लोगों को दूसरे तरह की बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पातीं। उसे खेती के अलावा आय का कोई और जरिया चाहिए। उसे अपने बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा चाहिए, औरतों के लिए अस्पताल चाहिए, कर्जे से मुक्ति चाहिए।

तो अब भाजपा का क्या होगा? क्या भाजपा खत्म हो जाएगी? अगर ऐसा हो तो कोई अचरज की बात नहीं होगी, लेकिन भाजपा के पीछे खड़ी आरएसएस जैसी ताकत उसे खत्म नहीं होने देगी। हां, यह जरूर हो सकता है कि भाजपा फिर से जनसंघ वाले दौर में पहुंच जाए।

आरएसएस के मुंह में भी सत्ता का स्वाद लग चुका है, इसलिए वह इस बात के लिए जी-जान लगाना चाहेगी कि भाजपा फिर से सत्ता में आ जाए। हांलाकि, संघ भी मृतप्राय हो चुका है और उसकी शाखाएं सिर्फ कागजों में दिखती हैं।

भाजपा को सबसे पहले उन रणनीतिकारों को बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए जो सत्ता का लाभ लेने के लिए पार्टी से जुड़े थे। हालांकि, यह भी सच है कि पार्टी यदि लंबे समय तक सत्ता से दूर रही तो ऐसे दलाल अपने आप पार्टी से बाहर चले जाएंगे। अब गोविंदाचार्य जैसे विचारकों को फिर से पार्टी में लाने की जरूरत है और इनके साथ ही कल्याण सिंह जैसे जनाधार वाले पुराने कार्यकर्ताओं को भी मनाने की जरूरत है। गोविंदाचार्य के नेतृत्व में पूरे देश के कार्यकर्ताओं को सेवा और विकास कार्यों में तो लगाया ही जा सकेगा, उनके सहयोग से ऐसे युवा नेतृत्व को भी उभारा जा सकेगा जो कांग्रेस की युवा टीम का मुकाबला कर सकें। इसकी वजह यह है कि गोविंदाचार्य विद्यार्थी परिषद से आए हैं और परिषद कार्यकर्ताओं में उनकी अच्छी छवि है।

मजे की बात यह है कि जो मीडिया मोदी को कट्टरपंथी और सांप्रदायिक बताकर उनकी आलोचना करती रही है, वही अब यह कयास लगा रही है कि अगला चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी का होगा। क्या भाजपा फिर से उस अंधी सुरंग में जाना चाहेगी, जिसमें से वह मुश्किल से निकल पाई है? जो लोग नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष बताते नहीं थकते, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी मोदी ने गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाया था। भाजपा के इस हिंदुत्व का प्रयोग सफल हुआ कि पहले किसी राज्य के हजारों अल्पसंख्यकों का कत्ल करो, फिर धार्मिक जहर के द्वारा ध्रुवीकरण कर सत्ता हासिल करो और इसके बाद राज्य का विकास करो। क्या किसी राज्य का विकास करने के लिए पहले वहां के हजारों अल्पसंख्यकों का कत्लेआम जरूरी है? फिर गुजरात के विकास के शोरशराबे में यह सचाई कितनी सामने आई है कि गुजरात नरेंद्र मोदी की वजह से विकास कर रहा है, गुजरातियों की उद्यमशीलता की वजह से या वहां की भौगोलिक विशेषताओं की वजह से। ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि भाजपा जब सत्ता में आई थी तो उसकी वजह सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं था। वास्तव में अब तक लाख प्रयास करने पर भी भाजपा कभी भी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई है। इसका मतलब यह है कि इस देश का बहुमत संकीर्णता और सांप्रदायिकता को नकारने वाला ही रहा। भाजपा के सत्ता में आने की सबसे प्रमुख वजह उसके उदार चेहरा अटल बिहारी वाजपेई थे। अटल बिहारी के उदार चेहरे की वजह से ही भाजपा सेकुलर कहलाने वाले दलों को भी अपने साथ जोड़ सकी और पार्टी ने सत्ता का स्वाद चखा। कुछ लोगों की राय पर यदि भाजपा को नरेंद्र मोदी के हाथ में सौंप दिया गया तो वास्तव में जड़ खोदने जैसा ही होगा। भाजपा के हिंदूवादी सांप्रदायिक कट्टरपंथी स्वरूप को देश का करीब दस फीसदी सवर्णों का एक खास तबका ही पसंद करता है। किसी खास वजह से ध्रुवीकरण करने के अलावा आम दिनों में देश का 80-90 फीसदी दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक वर्ग कभी भी भाजपा की कट्टरवादी नीतियों को पसंद नहीं करता। तो क्या मोदी के नेतृत्व में भाजपा कभी सत्ता में आ सकती है? मोदी के राह की सबसे बड़ी अड़चन यही है कि अगर उनके नेतृत्व में 100-150 सीटें आ भी गईं तो भी उसे सहयोगी दल ढूंढे नहीं मिलेंगे। भला कौन-सा दल मोदी जैसे सांप्रदायिक छवि वाले नेता के साथ जाना चाहेगा?
सच तो यह है कि भाजपा का उभार तभी हो सकता है, जब वह वाजपेई जैसा कोई उदारवादी नेतृत्व सामने लाए। भाजपा को मोदी के हार्डलाइन हिंदुत्व की जरूरत नहीं, बल्कि सॉफ्ट हिंदुत्व की जरूरत है। अगर किसी तरह के हिंदुत्व पर चलना भाजपा के लिए मजबूरी है तो वह एक टोकन हिंदुत्व का रास्ता अपना सकती है जिसमें हिंदुत्व का मतलब पूरे हिंदुस्तान का उभार हो और भगवा हिंदू राष्ट्र की जगह, पूरी दुनिया में तिरंगा फहराने की बात हो। भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने के नारे के साथ भाजपा ने यदि इस सॉफ्ट हिंदुत्व को अपनाया और वाजपेई जैसा कोई नेता तैयार कर पाई तो वह दुबारा सत्ता में आ सकती है।

दिनेश अग्रहरि

2 Comments »

  • yudhisthir said:

    लख-लख बधाइयां… लेकिन प्लीज रायता मत फैलाइएगा… प्लीज…

  • pramod pandey said:

    Likhate me jaldi ka natiza hota hai ki hum bolate nahi balki chilane lagate hain! BJP Ka ant jaise udghosana bhi ise ka natiza hai.

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