अलार्म बजा रहे हैं जंगल में गुम हो गए स्पर

कुसहा (नेपाल) से नागेंद्र

kosi5भीमनगर के भंटाबारी बाजर से गुजरकर कुसहा तक पहुंचना आज काफी उत्साहवर्धक लगता है लेकिन थोड़ा आगे बढ़ने पर कई सवाल जेहन में कौंधने लगते हैं। पूर्वी एफलक्स बांध के बाईं ओर ‘ठहरी हुई’ कोसी बह रही है। उसे देखकर नहीं लगता कि इसने कभी इतना रौद्र रूप भी लिया होगा। आर्मी टावर से आगे जोगसर और चतरा की ओर बढ़ने पर कोसी निगाह से ओङाल होने लगती है। निगाह और कोसी के बीच अचानक घने जंगल आ जते हैं। दरअसल पिछली बाढ़ के बाद जब कुसहा में काम शुरू हुआ था तब पूरे प्रभावित इलाके में जंगल काटे गए थे। लेकिन यह सब एक सीमित क्षेत्र से ही हुआ था।

कुसहा में जो पहला स्पर बार-बार अलार्म देने के बावजूद अंतत: टूटा था वह इन्हीं जंगलों में कहीं खोया होने के कारण भी शायद सबको देर से दिखाई दिया हो या कि जंगल के अपने शोर में कोसी के थपेड़ों से उपजी उसकी चीत्कार भी तब गुम हो गई होगी। आर्मी टावर से चतरा के रास्ते में कम से कम सात स्पर तो ऐसे और हैं ही जो इसी जंगल में अब भी खोए हुए हैं। नए स्पर बन रहे हैं, टूटे हुओं की मरम्मत भी हो गई लेकिन सबक हमने फिर भी नहीं लिया। कोसी की प्रकृति बताती है कि वह जब शांत दिखती है तब भी अंदर से अशांत रहती है। ऐसे वक्त में वह अंदर ही अंदर अपनी नई राह का तानाबाना बुनती है या कहें कि अपने बांधों पर धीरे-धीरे घात करती रहती है।

जंगल में गुम गए इन स्परों पर ऐसे कितने घात हुए होंगे और उफनाने के बाद कोसी कितने नए घात करेगी यह देखने का हमारे पास कोई जरिया शायद नहीं है। ऐसे में यह बहुत बड़ा काम था कि इन सुरक्षित दिख रहे स्परों के आसपास का जंगल काटकर इनकी भी मरम्मत होती और कम से कम भविष्य में तो ये मानिट¨रग की सीधी जद में आ पाते।

दरअसल पिछली तबाही मानिटरिंग की खामी या अनदेखी का ही नतीजा थी। हमने उससे सबक नहीं लिया है। निर्माण एजेंसी को अगले एक साल तक उस निर्माण की मानिटरिंग का काम दिया गया है, जो वह कर रही है लेकिन एक साल बाद क्या होगा, इसकी योजना हमारे सामने नहीं है। पुराने स्परों की निगरानी कौन करेगा,क्योंकि जंगल में घुसकर कोसी जब अपना काम करेगी हमें खुली आंखों से भी दिखाई नहीं देगा।

पूर्वी एफलक्स बांध पर हुए निर्माण से सरकार ही नहीं हम भी आश्वस्त हैं कि कोसी इस बार इस राह तो प्रलय नहीं ही लाएगी लेकिन आश्वासन का यह भाव कहीं शाहरूख खान के उस चर्चित विज्ञापन जैसा तो नहीं जिसमें वह कहते हैं ‘हम संतुष्ट बहुत जल्दी हो जते हैं…’ हमारे जलप्रलय से बचाने वाले मंत्री और विभाग भी पिछली बार बहुत आश्वस्त थे। वे इस बार भी आश्वस्त हैं। काश उनका इस बार का आश्वस्ति भाव कोसी के इस और उस पार रहने वालों को भी आश्वस्त कर पाए।

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *