बड़ी चुनौती कोसी से सिल्ट निकालने की है

कुसहा (नेपाल) से लौटकर नागेंद्र

India Monsoon Floodingकुसहा के बाएं तटबंध पर खड़े होकर हिमालय की ओर नजर डालें तो 16वें स्पर पर बीच कोसी में किनारे से ढाई से तीन किलोमीटर दूर एक टापू दिखता है। यह टापू पानी की सतह से कम से कम 5 से 7 फुट ऊपर तो होगा ही। जनकार बताते हैं कि इस टापू का क्षेत्रफल कम से कम 600 से 700 वर्गमीटर है। जितना यह पानी की वर्तमान सतह के ऊपर दिखता है उससे अनुमान लगाना सहज है कि पानी के नीचे यह कम से कम 30 से 35 फिट गहरा तो होगा ही। यह टापू रातों-रात नहीं बना। यह कोसी के सिल्ट जमने का नतीज है और सिल्टेशन की जो वज्ञानिक गति मानी गई है उसके अनुसार यह कम से कम 40 से 50 वर्षों का परिणाम है। जो एक्सपर्ट इस टापू तक पहुंचेहैं उनके अनुसार इसकी ऊपरी डेढ़ फिट तक की सतह दलदली है, और नीचे सॉलिड चट्टान। यही वह चट्टान या टापू है जिससे टकराकर कोसी ने 18 अगस्त 2008 को राह बदली थी और कुसहा को तोड़कर तबाही मचायी थी। हमने कुसहा तो बांध लिया, लेकिन टापू आज भी पूरी तरह मौजूद है। यह टापू फिर वैसा ही खतरा नहीं बनेगा इसका कोई तर्क हमारे पास नहीं है। इस टापू के बहाने यहां लम्बे समय से चली आ रही एक मांग या बहस को फिर से चर्चा में लाने की जरूरत है। यह कोसी के गर्भ में ठहरे सिल्ट को निकालने का मामला है। यह बहुत बड़ा मुद्दा है, शायद कोसी को बांध लेने, कुसहा को जीतकर अपनी पीठ थपथपा लेने से भी बड़ा मुद्दा। दरअसल कोसी के बार-बार तांडव के बाद त्वरित कार्रवाई में ही इतनी ऊर्जा जाती रही कि डी-सिल्टेशन का यह मुद्दा कभी मुद्दा बन ही नहीं पाया।

कोसी पर शोध करने वालों ने 90 के आसपास बताया था कि कोसी किस तरह अपने साथ करोड़ों टन सिल्ट लाती है और तब तक (1953 से 1959 तक कोसी के बंधने का काल है) यह जितना सिल्ट लायी थी उससे यह अपनी सतह से 13 फिट ऊपर आ चुकी थी। कोसी हर साल पांच इंच और चढ़ती है। इस हिसाब से 2009 तक यानी आज कोसी अपनी सतह (पेंदी) से कम से कम 25-30 फिट ऊपर बह रही है। यह बहुत खतरनाक संकेत है। सिल्ट जमने की यही गति रही तो अगले 25 वर्षो में कोसी कम से कम 12 फिट और ऊपर चढ़ कर बह रही होगी (ठीक उसी तरह जसे हमारे शहरों में सड़क के ऊपर सड़क बनती रही और आज अनेक शहरों के मकानों का लेवल सड़क के नीचे ज चुका है)। ऐसे में ये विशाल एफलक्स बांध भी कब तक इसका वेग थाम पाएंगे। क्योंकि कोसी का वेग तो थमने वाला नहीं, जब यह ऊपर चढ़ेगी तो और तनकर बहेगी। तो क्या हम मान लें कि अपनी ही सिल्ट जमाते-जमाते एक दिन यह बांध के ऊपर से भी बहेगी। ऐसे में सहज जवाब यही हो सकता है कि इसके तटबंधों की ऊंचाई बढ़ाई जाए, लेकिन यह समस्या को नया मोड़ देने जैसा है। दरअसल ऊंचे बांध इसका समाधान हो ही नहीं सकते। बांध ऊंचे हुए तो खतरा और बढ़ेगा। आप भले ऊंचे बांध देख आश्वस्त दिखें लेकिन जब ये ऊंचे बांध टूटेंगे तब बड़ी तबाही लेकर आएंगे। तब कोसी किसी के रोके नहीं रुकेगी। कोई काफर डैम बांधने का वक्त भी नहीं देगी। ऐसे में जरूरत इसी बात की है कि कोसी का काउंट डाउन पूरा होने से पहले हम कम से कम एक नई डी-सिल्टेशन की रणनीति पर विचार तो शुरू ही कर दें। विकास की दिशा में सकारात्मक सोच के साथ काम कर रही नीतीश सरकार और दिल्ली की नई सरकार से यह बड़ी उम्मीद है।

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