कोसी: असली समय शुरु होता है अब

♦ नागेन्‍द्र

पिछले साल कोसी कई गांवों को लील गयी थी। पुराने हो चले बांध टूटे और सिस्‍टम का कॉलर पकड़ कर चीख़ पड़े – भ्रष्‍टाचारी! उन दिनों जाने-माने पत्रकार नागेंद्र ने डूबे हुए गांवों के ऊपर से नाव पर चल कर रपटें जमा कीं और किस्‍तों में हिंदुस्‍तान में लिखा। वे दैनिक हिंदुस्‍तान, भागलपुर के स्‍थानीय संपादक हैं। इस बार फिर कोसी के मुहाने पर बसे गांव डूबने को तैयार हैं। लोकसभा में दुदुंभी बजा कर जीती राज्‍य सरकार उन्‍हें उबारने को तैयार नहीं। क्‍या है साज़‍िश, क्‍या है पेंच – अपने अख़बार में लगातार लिख रहे हैं नागेंद्र। उनके रिपोर्ताजों से मालूम पड़ता है कि लाखों लोगों को इस बार भी सरकार मरने के लिए छोड़ देगी। बांध की मरम्‍मत में इस बार भी रिश्‍वत और कमीशनखोरी की करतूत चली है और इस बार भी लोग बेआस हैं। दैनिक हिंदुस्‍तान, लखनऊ के वरिष्‍ठ संपादकीय सहयोगी नासिरुद्दीन के सौजन्‍य से वे सारी लाइव रपट अब मोहल्‍ला लाइव के पाठकों के लिए…

IND2529Bकुसहा (नेपाल)। कोसी तटबंध के मरम्मत की तीसरी तय समय सीमा भी खत्म हो गई, लेकिन काम फिर भी खत्म नहीं हुआ। पहले 31 मार्च, फिर अप्रैल और अब 31 मई भी बीत चुकी है। पूर्वी कोसी तटबंध (एफलक्स बांध) पर काम अब भी चालू है। 31 मई की शाम पांच बजे यहां कुसहा प्वाइंट पर मिट्टी डाली ज रही थी। कुसहा से राजबांस के रास्ते में आर्मी टावर के बाद दो स्पर अभी बनने शुरू ही हुए हैं। एक की तो टीथ (नींव) ही पड़नी शुरू हुई है। यह रेणु की भयावह कोसी की विनाशलीला के नौ माह बाद का सच है। जिस तरह मानसून जल्दी आने का संकेत दे रहा है उसमें यह काम प्रभावित होना तय है। हालांकि सुखद यही है कि एफलक्स बांध का ज्यादातर वह काम पूरा हो चुका है जो तय किया गया था। निर्माणकार्य से जुड़े कुछ लोग हालांकि हमारी कुछ आशंकाओं पर सहमति जताते हैं लेकिन प्रभारी मुख्य अभियंता प्रकाश दास का कहना है कि काम पूरा हो चुका है और हम किसी भी स्थिति का सामना करने को तैयार हैं।

उनकी मानें तो यह महज फिनिशिंग का दौर है लेकिन किसी के पास इस बात का सटीक जवाब नहीं है कि एक भी कायदे की बारिश हो गई तो क्या ये बाकी बचे स्पर बन पाएंगे या तटबंध पर आनेवाली मिट्टी कैसे आएगी। क्योंकि रविवार को हुई हल्की बारिश में ही जिसतरह बांध पर कीचड़ दलदल के रूप में तब्दील होता दिखाई दिया उसमें बड़ी गाड़ियों के पहिए भी फंसने लगे थे। यहां एक बड़ा सवाल ‘रेनकट’ के तकनीकी नाम से जने जनेवाले उस संकट का भी है जो तेज बारिश में तटबंध पर ऊपरी कटाव पैदा करता है। ऐसे ‘रेनकट’ ताज बने या निमार्णधीन स्परों और तटबंध के लिए खासे खतरनाक साबित हो सकते हैं। ये कटाव या दरार नहीं हैं लेकिन धीरे-धीरे असर करते हैं और दूरगामी दुष्परिणाम सामने लाते हैं। कुसहा तटबंध (पूर्वी एफलक्स) और इसके स्परों पर तेज बारिश से दर्ज हुई गहरी लकीरें इस आशंका को सच साबित करती है।

दरअसल कोसी तटबंध पर सारी चेतावनियों, तैयारियों और बिहार की चिंताओं के बाद काम में जो सुस्ती दिखाई दी, वह बिहार के विकास की सदिंयों से चली आ रही रफ्तार का एक पैमाना है। जून आ चुका है। कोसी अभी ठहरी हुई है। शायद आगे की दिशा तय कर रही है। उसकी यह शांति और मानसून के सर पर आ पहुंचने का संकेत चिंता में डाल रहा है लेकिन बिहार अब भी नहीं चेत रहा। इस बात से आश्वस्त होने के कई कारण हैं कि कोसी इस बार कम से कम उस विन्दु से तो तांडव नहीं मचाएगी जहां से पिछली बार उसका गुस्सा फूटा था लेकिन इस बात से आश्वस्त होने का कोई कारण या तर्क हमारे सामने नहीं दिखाई देता कि कोसी इस बार इसी इलाके में कोई नई राह नहीं खोज लेगी। कोसी के तांडव के बाद अब दिल्ली में बनी नई सरकार में इकलौती मंत्री मीरा कुमार के रूप में बिहार एक बड़ी उम्मीद देख रहा था जो बजरिए जल संसाधन मंत्रालय इस संकट का कोई स्थायी हल दे पातीं लेकिन उनके लोकसभा स्पीकर बनने की नई खुली राह ने इस संभावना पर भी फिलहाल विराम लगा दिया है।

दैनिक हिंदुस्‍तान से साभार

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *