मजबूर आदमी जूझता नहीं, भागता है

रेशमा किन्नर से अजय प्रकाश की बातचीत

dsc00773» आपको किन्नर कब उठा ले गये थे?

मां बताती है, तब मैं छः साल की थी। याद नहीं कि कब, कैसे, किस हालत में वे लोग मुझे ले गये। जानने का होश हुआ, तो मेरे पैरों में घुंघरू बंध चुके थे और ढोलक की थाप पर बधाई मांगना पेशा। इसे तो अल्लाताला की मर्जी कहिए कि पानीपत में मजार पर जाते वक्त मेरी मुलाकात एक रिश्तेदार से हो गयी। उस रिश्तेदार की मैं शुक्रगुजार हूं कि मां-बांप, घर-परिवार से मिल सकी।

» मां-बाप से आपने पूछा, क्यों बेच दिया था आपको?

जबतक मैं घर नहीं आयी थी तबतक मेरे ख्याल में बस दो ही बातें थीं। घर वालों से मिलने की खुशी और यह सवाल कि क्यों बेच दिया था मुझे? गुरु के अड्डे पर रहते हुए कई बार जब मुझे किन्नर लाइफ से चिढ़ होती, तो गुस्से में बार-बार एक सवाल मन में चकरघिन्नी की तरह घूमता – ‘क्या छह इंच का औजार ही इंसान की निशानी है। नहीं तो बाकी तो सबकुछ था ही मेरे पास।’

मैं पूछने लगी, अम्मी आपने मुझे क्यों बेच दिया था। अम्मी बोली, बेटे बहुत गरीबी थी। हरियाणे में मज़दूरी, दिहाड़ी करके मैं और तुम्हारे अब्बा किसी तरह तुम भाई-बहनों का पेट पाल रहे थे। तुम्हारी छह बहनें थीं और तीन छोटे-छोटे भाई। हालत ऐसी नहीं थी कि उस कमाई में तुम सभी जी पाते। हमने तुम्हें बेचा नहीं था, वो उठा ले गये। गुनाह इतना है कि हम रोक न सके थे।

» लेकिन मां-बाप के बताये बिना किन्नरों को कैसे पता चला कि आप किन्नर हैं?

यह कोई बताने वाली बात है! यह जानकारी किन्नरों को आसपास से पता चल जाती है। मेरा जननांग बाकियों की तरह नहीं है, यह बात सिवाय मेरे पूरे गांव को उस समय पता थी।

» अम्मी-अब्बा से मिलने का मन तो करता होगा?

हां, बहुत करता था। जब भी मैं कहती कि मुझे घर जाना है, अम्मी से मिलना है, तो मुझे मनाने के लिए मतलूब गुरु घंटों नाचता, बाग-बगीचों में घुमाता, टॉफी देता। लेकिन मेरी आंखों में बार-बार अपना घर नाचता, जहां से एक दिन यह मुझे उठाकर लाया था। मेरा दिल यह सोचकर बैठ जाता था कि जब मतलूब खींचकर मुझे बाहर ले जा रहा था, तो मेरी अम्मी रोते हुए कमरे में क्यों भागी, उन्होंने मुझे छुड़ाया क्यों नहीं। आज दुनिया को देखकर लगता है मजबूर आदमी जूझता नहीं, भागता है।

» किन्नर लड़का भी होता है और लड़की भी, आप क्या हैं?

मेरी बहनें मुझे बहन मानतीं हैं और मेरे भाई, मुझे भाई। मां बाप के लिए मैं औलाद हूं और समाज के लिए हिजड़ा।

» नाच की ट्रेनिंग कैसे हुई?

शाम को सभी इकट्ठे होते तो नाचना-गाना होता। यही मेरा ट्रेनिंग टाइम भी था। मतलूब की आवाज़ ग़ज़ब की थी। उसकी आवाज़ के दीवाने दूर गांवों से आते तो मजमा लग जाता था।

» मतलूब ने जब आपको घुघ्घी गुरु को बेच दिया, उस वक्त की कुछ यादें?

उस टाइम में मैं चौदह-पन्द्रह साल की रही होऊंगी। जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गयी, वे मेरे साथ बदसलूकी करते गये। सुबह उठते ही घोड़ी के लिए पानी-सानी में लग जाना होता। उससे फुर्सत मिलती तो फिर रोटी बनाने, गुरु की सेवा-टहल शुरू हो जाती। इन सबके बाद पानी भरके रखना होता था, उसमें तो मेरा जैसे दम ही निकल जाता। दोपहर बाद मैं खाली रहती थी। गुरु और दूसरे बड़े किन्नर इलाके में गये होते थे। इस बीच मैं बच्चों के साथ खेलती रहती थी।

» किन बच्चों के साथ खेलती थीं?

पड़ोस के बच्चों के साथ गोटी, गोली खेला करती।

» वो जानते थे आप किन्नर हैं?

हां, बच्चे कहा करते थे इसको उठा के लाया गया है। वो मुझे चिढ़ाया करते थे कि तुम तो वैसे हो, हम तुम्हें नहीं खेलायेंगे।

» वैसे ही कहते थे, हिजड़ा नहीं कहा?

एकाध आपस में कहा कहते। सरेआम कहने पर बच्चों के मम्मी-पापा डांटते थे।

» मतलूब के साथ जहां आप रहती थीं, वह किसका घर था?

हम जहां रहते हैं, उसे घर नहीं डेरा कहते हैं और वह मतलूब का डेरा था। मतलूब ने मरने से पहले उसे बेच दिया। निशानी के तौर पर उस डेरे में मतलूब की क़ब्र बनायी गयी है।

» किन्नर आपको पानीपत से उठाकर किस अड्डे पर ले गये?

सबसे पहले बिजनौर जिले के दारानगर गांव के मतलूब गुरु ने मुझे उठाया था। नौ-दस साल रखने के बाद मतलूब ने गन्नोर वालों के यहां मुझे बेच डाला।

dsc00776» कितने में बेचा?

नहीं मालूम कि गन्नौर वालों को मतलूब ने मुझे कितने में बेचा। वैसे भी जब गुरु चेलों को बेचता-ख़रीदता है, तो सौदा अकेले में होता है और कोई भी गुरु चेलों को पास फटकने नहीं देता। हमारे समाज का गुरु हिटलर का बाप होता है। जैसे मैं अगर अपने चेलों को कहीं से बुलाऊंगी या भेजूंगी तो जाने-आने का कारण बताना मेरी मर्जी पर है।

» गुरु की बात मानने से चेला इनकार भी तो कर सकता है?

नहीं कर सकता है। किन्नर समाज में अड्डे का बड़ा मतलब है। अड्डे के बगैर किन्नर बेसहारा हैं। अड्डे की कमान गुरु के हाथ में होती है, वह जिसे चाहे रखे या भगा दे। रही बात नये अड्डे पर जाने की तो पुराने की मर्जी के बिना वहां भी जगह नहीं मिलती। इसलिए हर हालत में गुरु की बात माननी पड़ती है।

» किन्नर समाज में भी हिन्दू-मुसलमान का फर्क है?

मानने वाले तो हर जगह होते हैं। लेकिन आपके समाज में मुसलमान कमजोर हैं, जबकि किन्नरों में मजबूत होने के लिए मुसलमान होना ज़रूरी है। कारण कि किन्नर गद्दी मुसलमानी है। जो भी किन्नर पावरफुल होना चाहता है, उसे मुसलमान बनना ही है। मैं जिन अड्डों को जानती हूं, उनमें से घुघ्घी गुरु के अलावा जो भी हिन्दू किन्नर थे, वह मुसलमान बन गये। गन्नौर के घुघ्घी के यहां मुझे मतलूब गुरु ने बेच दिया था। घुघ्घी हिन्दुओं की वाल्मीकि जाति से थे, लेकिन उन्होंने अपना धर्म नहीं बदला।

» आप क्या मन्दिर भी जाती हैं?

हां, मैं वैष्णो देवी गयी हूं, शिरडी वाले साईं बाबा के यहां जाती रहती हूं। अभी मैंने मन्नत बोल रखी है कि जो जवाल (झंझट) मेरे ऊपर आया है, अगर उसे साईं बाबा हल कर देते हैं तो मैं चढ़ावा चढ़ाऊंगी।

» आपकी सबसे पसंदीदा मस्जिद?

दिल्ली की जामा मस्जिद। हर रमजान में नमाज़ पढ़ने मैं वहीं जाती हूं।

» अच्छा ये बताइए, डेरा बेचने से जो पैसा मिला, उसका मतलूब गुरु ने क्या किया?

मतलूब के बाद जो गुरु बना होगा उसके हाथ लगा होगा। वैसे भी किन्नर पैसे को भोगने में माहिर होता है, बचाने में दिलचस्पी नहीं रखता।

» बिजनौर में आपका बचपन गुजरा, जवान होने के बाद कभी वहां जाना हुआ?

एक दफा गयी थी। वे सभी बच्चे जो मेरे साथ गोटी-गोली खेला करते थे बाल-बच्चों वाले हो गये हैं। शहर में बहुत कुछ बदल गया है, वह मुहल्ला भी नया-नया लगा, जहां मैंने पाजेब बांधनी सीखी। गर कुछ नहीं बदला है तो वह है – मैं वैसा हूं यानी किन्नर हूं, के बारे में होने वाली बातें और इसको लेकर बच्चों की कानाफूसी। लोग कहते हैं समय बदलेगा, निगाहें बदलेंगी। लेकिन कहां कुछ बदलता है!

» क्यों यह बदलाव नहीं कि अब राजनीति में किन्नरों की भागीदारी होने लगी है?

यह ठीक है। लेकिन हमें तो समाज से मान्यता मिले, उससे मतलब है। मगर इसकी उम्मीद नहीं दिखती। मैं दिल से कहती हूं, मुझे काम मिल जाये तो यजमानी करने का धंधा छोड़ दूं। कई दफा प्रयास कर चुकी हूं। परिचित लोगों से काम के लिए कहने पर हंसकर टाल जाते हैं।

» यजमानी में कबसे जाने लगीं?

घर से ले जाने के एकाध साल बाद ही वे मुझे फंक्शनों में ले जाने लगे। कई सालों तक उनका मुझे नचाने पर जोर नहीं था। जो लोग किन्नरों के मनमाफिक बधाई देने में हीलाहवाली करते, वहां किन्नर मेरी चड्डी उतार कहते, देखो हम ऐसे बच्चों को पालते हैं। इन लोगों ने मेरी इतनी दफा चड्डी उतारी कि मैं बता नहीं सकती। मुझे सिर्फ इतना याद है कि चड्डी उतारने के बाद मैं उतनी देर तक रोती रहती, जब तक मैं सो न जाती। बारह-चौदह की हुई तो खुद ही समझ गयी कि कैसे बधाई लेनी है।

» तब तो यहां से भागने का मन करता होगा?

लेकिन जाते कैसे। मतलूब का बस वाले तक पर कंट्रोल था। मतलूब ने बस वाले को बोल दिया था कि बस पर बैठेगी, तो डेरे पर पहुंचा देना। इसी तरह धोबी, मोची, हलवाई सभी को खबर थी कि इसे यहां से नहीं जाने देना है। बड़ी हुई तो खुद ही लगा अड्डा घर है और गुरु गार्जियन।

» किन्नरों की भर्ती और पहचान कैसे होती है?

पहचान तो मर्दों-औरतों के गुप्तांगों को देख कर ही हमलोग करते हैं। अगर जननांगों का विकास औरों की तरह नहीं है, तो वह किन्नर है। इसके अलावा बाल-बच्चे वाले किन्नरों की भी एक संख्या है, जो जवानी के दिनों में किन्नर समाज में शामिल होते हैं।

बाल-बच्चे वाले किन्नर?

ऐसे चार किन्नरों को तो मैं भी जानती हूं, जिनके गांव में बच्चे और पत्नियां हैं। इस तरह के किन्नरों में कुछ तो वे मर्द शामिल हैं, जो गुंडा किन्नरों के झमेले में फंस जाते हैं और उन मर्दों के गुप्तांग गैंग के डॉक्टरों द्वारा काट लिये जाते हैं।

दूसरे वे लोग भी किन्नर बनते हैं, जिनको आजकल गे (पुरुषों की तरफ झुकाव) कहा जाता है। शहरों में तो आजकल ऐसे लोग शादियां करने लगे हैं, लेकिन देहातों में तो आज भी उनके लिए कोई जगह नहीं होने से वे किन्नर बनना ही पसंद करते हैं।

गांव जाने पर वहां आप घूमती हैं?

इच्छा तो बहुत होती है, पर नहीं जा सकती। गांव वाले अब्बा से कहते हैं कि इस किन्नर का गांव में आना बंद कराओ। जबसे मैं गांव आने लगी हूं, लोग मेरे घर वालों को गमी या खुशी किसी भी फंक्शन में नहीं बुलाते और न ही हमारे यहां आते हैं। गांव में जाने की क्या कहें, मुझे ये भी नहीं पता कि दरवाजे के बाहर लगा नल दाहिनी तरफ है या बायीं ओर। मैं देर रात में गाड़ी से आती हूं और जाने के लिए भी रात गहराने का इंतजार करती हूं।

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