अधूरी रह गयी हबीब तनवीर की जिंदगी की कहानी

संदीप पौराणिक

habib-tanvir-2भोपाल। जाने माने रंगकर्मी हबीब तनवीर काम के धुनी थे। उन्होंने जो ठान लिया उसे पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। बात चाहे व्यवस्था और रूढ़ियों से लड़ने की हो या गांव के छोरो को रंगमंच पर नई पहचान दिलाने की।

खुली आंखों से सपने देखने वाले इस रंगकर्मी ने हर अभियान को मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश की और वह सफल भी रहे। मगर वह अपनी जिंदगी की कहानी को पूरा नहीं कर पाए।

अविभाजित मध्य प्रदेश के रायपुर की गलियों से निकल कर अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर छा कर छत्तीसगढ़ी नाटक और भारतीय रंगमंच को नई पहचान दिलाने वाले हबीब तनवीर अपनी जिंदगी के अनछुए पहलुओं को शब्दों का रूप देना चाहते थे। इसी लिए उन्होंने सफरनामा लिखने का फैसला किया। अपनी आत्मकथा को अपनी ही भाषा में लिखने की कोशिश में लगे तनवीर उसे पूरा नहीं कर पाए।

हबीब तनवीर की सफरनामा को तीन खंडों में लिखने की योजना थी। पहला खंड पूरा हो चुका था, जिसमें उनके शुरुआती संघर्ष से लेकर रंगमंच को नया रूप देने के लिए की गई कोशिशों का ब्योरा दर्ज है। दूसरे खंड में वह अपनी प्रेम कहानी से लेकर अनछुए पहलुओं को समेटना चाहते थे और तीसरे खंड में उन चित्रों का संग्रह होता जो हबीब तनवीर के होने का अर्थ बताते।

पहला खंड तो वह पूरा कर चुके थे और दूसरे खंड में अपनी प्रेमिका से पत्नी बनी मोनिका मिश्रा से जुड़ी यादों को गूथने में लगे थे। तभी उन पर बीमारी का हमला हुआ और उनकी जिंदगी की कहानी यहीं पर आकर ठहर गई।

हबीब तनवीर की बेटी नगीन तनवीर को भी इस बात का अफसोस है कि उनके पिता अपने सफरनामे को अधूरा ही छोड़ गए। वह कहती हैं कि अब उसे पूरा कर पाना आसान नहीं होगा, क्योंकि हबीब तनवीर की भाषा और आशय को कोई दूसरा व्यक्त नहीं कर सकता।

पिछले दो दशक से तनवीर के साथ रहकर काम करने वाले अनूप रंजन कहते हैं कि हबीब साहब को इस बात का अहसास था कि उनके पास वक्त कम है, इसीलिए वह सफरनामा को जल्दी पूरा करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने प्रयास भी किया। लगता है कि मां जी (मोनिका मिश्रा) से जुड़ी यादों को जब वह लिपिबद्घ कर रहे थे, तभी उन पर भावनाएं हावी हो गईं और बीमारियों ने उन्हें जकड़ लिया।

अनूप रंजन के मुताबिक हबीब तनवीर अभी और जीना चाहते थे। जब वह नेशनल हॉस्पिटल में इलाज करा रहे थे, तब उन्होंने एक बार कागज पर लिखा भी था कि मैं अभी मरना नहीं चाहता। वह अपनी आगामी कई योजनाओं को पूरा करने के लिए जीना चाहते थे। उनमें सबसे प्रमुख उनका सफरनामा था।

उनकी इच्छा थी कि उन्होंने 1959 में जिस नया थिएटर की नींव रखी थी वह उसकी स्वर्ण जयंती मनाएं। अनूप कहते हैं कि हबीब तनवीर के खतों और डायरी में दर्ज शब्दों के सहारे सफरनामा को पूरा करने की कोशिश होगी भी तो वह उनकी आत्मकथा नहीं रहेगी।

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