हिंदुस्तान की कहानी, ख़ूब सारी शॉर्ट पिच गेंदों की ज़ुबानी
- मिहिर पंड्या
फ्लैशबैक
वर्तमान“There u go… its India vs. Pakistan World Cup final! Really it’s Dream come true for all cricket fanatics like us
and Dhoni is looking so confident, in last after match presentation he said to ravi shastri that I red your article yesterday in crickinfo and u wrote in that…”
Wow! Here is a captain who reads also. Damm good stuff. I like that. I love that…”
“Now they do whatever they want in the final. I don’t care. With Yuvraj’s divine incarnation v got what v want. The mighty aussies are dumped! That’s all. And now I can say that:- V found our Dada again in MS. play the game ‘Dil se..’ It’s called no fear cricket. He shows the steal he got in it. All the best guys. Enjoy!”
24/7/2007. ‘आई.सी.सी विश्व T20-2007′ के फाइनल वाले दिन की सुबह एक दोस्त की ऑरकुट स्कैपबुक में लिखे गए दो स्क्रैप।
और आज दुनिया ने अपना एक चक्कर पूरा किया।
हो सकता है आपको मेरा यह कहना थोड़ा अजीब लगे लेकिन मुझे लगता है कि इस विश्व कप की हार ने भी हमें वही सिखाया है, जो पिछले विश्व कप में हम जीत कर सीखे थे। और वो छोटी सी लेकिन मूल बात है कि आख़िर ये खेल दरअसल एक खेल ही है और इस नाते इस खेल को ’खेल’ की तरह खेलने वाला ही जीतता है। जो खेलने में तनाव न महसूस करे, उसका आनंद उठाये। कुछ यूं खेले, जैसे बस इसके आगे दुनिया होनी ही नहीं है। निष्कपट, निष्कलंक, बेदाग़, शफ़्फ़ाक खेल। ऐसा खेल जो झरने सा बहे, मोती सा चमके, उजाला भर दे। ऐसा खेल, जिसमें डर नहीं, कुछ कर गुज़रने का जज़्बा हो। जिसमें कुछ खो देने का डर न हो, कुछ पा लेने की अथक चाह हो। जिस खेल को देखकर बस दिल खुश हो जाए। और ’आइरॉनी ऑफ़ दि सिचुएशन’ ये है कि इस तरह की क्रिकेट का सबसे अच्छा उदहरण इसी हिन्दुस्तानी टीम की दो साल पुरानी तसवीर है।
हम इसलिए हारे क्योंकि इसबार हम वहां कप जीतने नहीं, ’कप बचाने’ गये थे। अपने ही लिखे को एक बार फिर से पढ़ते हुए मुझे याद आया कि आज जिस टीम को अपने सबसे योग्य बल्लेबाज़ को बचाकर, कहीं छुपाकर रख लेने की इच्छा हो रही थी (युवराज के पास ही इस मैच की चाबी थी, और वो दसवें ओवर तक ’डग आउट’ में बैठा रन रेट का पारा चढ़ते देख रहा था।) उसे ही मैंने और दुनिया ने दो साल पहले ’no fear cricket’ खेलने वाली टीम का ओहदा दिया था। भारत इस विश्व कप को शार्ट पिच गेंदों को खेलने में अपनी नाकामयाबी की वजह से नहीं हारा है (आप जानते हैं, भारत कभी भी उसमें अच्छा नहीं था) बल्कि यह उस अति-सावधानी की हार है जो आपसे आपका स्वाभाविक खेल छीन लेती है। इस बार भारत की टीम को शुरू से ही ऐसा लगता रहा कि उसे अपने संसाधन बाद के मुश्किल समय के लिए बचाकर रखने हैं। एक ऐसा ’बाद’ जो दरअसल कभी नहीं आया। यह ’सांप निकल गया और निशान पीटते रहे’ वाली कहावत चरितार्थ होने जैसा है।
यूं सीधे बल्लेबाज़ के सीने की ओर आती शॉर्ट पिच गेंदों के सामने भारत पहले भी पिटा है। बीस ओवर – पचास ओवर – पांच दिन, हर जगह, कई बार। और यह भी सच है कि ऐसी गेंदों को खेलने की तकनीक एक दिन में सीखी भी नहीं जा सकती। लेकिन इच्छाशक्ति अगर हो तो हर बाधा का तोड़ निकल आता है। सचिन तो इस बार वहां मौजूद थे। उनका ही 03-04 ऑस्ट्रेलिया दौरे का सिडनी वाला दोहरा शतक इस इच्छाशक्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। बार-बार ऑफ़ साइड में आउट होने के बाद सचिन ने अपनी स्ट्रोक बुक में से ऑफ़ साइड ड्राइव को ही निकाल दिया। बिना ऑफ़ ड्राइव के भी सचिन ने उस पारी में 241 रन बनाये और भारत ने सम्मान के साथ सीरीज़ ड्रा की। सचिन उसे आज भी अपनी सर्वश्रेष्ठ पारी मानते हैं। स्टीव वॉ जैसे बल्लेबाज़ ने शॉर्ट पिच गेंदों के सामने अपनी जगज़ाहिर कमज़ोरी के बावजूद टेस्ट में दस हज़ार से ज़्यादा रन बनाये। जाहिर है समस्या तकनीक में कमी की नहीं, सही इच्छाशक्ति की थी।
इस बार तो भारत यह भी नहीं कह सकता कि उसे 2007 विश्व कप की तरह पूरा मौका मिले बिना ही बाहर होना पड़ा। आख़िर वो एक दिन कुल 153 रन बचाने में असफल रहा और ठीक दो दिन बाद यही 153 रन बनाने में। और वो भी दो ऐसी टीमों के सामने जिन्हें इस विश्व कप का दावेदार भी नहीं माना जा रहा है। वेस्ट इंडीज़ ने संकट की घड़ी में अपने सबसे आकर्षक बल्लेबाज़ ब्रावो ’बचाने’ के बजाए ’खर्च’ किया और बदले में जीत का इनाम पाया। भारत अपने सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ों को उस वक़्त तक खर्च होने से बचाता रहा जब तक उनकी कीमत कौड़ियों की हो चुकी थी। क्या हम युवराज नामक चमत्कार का सही तरह से प्रयोग कर पाये? खुद धोनी दोनों ही मैचों में कठिन समय आने पर भी एक भी छक्का नहीं लगा पाये। आज तो उनकी यह असहायता सीधे भारत की हार की वजह बनी। खेल के इस संस्करण में ’छक्का’ जीत के लिए सबसे ज़रूरी आइटम है। पिछले विश्व कप में भारत की जीत की एक बड़ी वजह उसके बल्लेबाज़ों की बड़े छ्क्के लगाने की यही खूबी बनी थी। जिसे कहते हैं ना ’क्लीन स्ट्राइक’, वो। और यही खेल के इस संस्करण में भारत के ऑस्ट्रेलिया पर प्रभुत्व की एक बड़ी वजह है। याद कीजिए, खुद ऑस्ट्रेलिया के भी सिर्फ़ यही ’इम्पैक्ट प्लेयर’ आईपीएल में सफ़ल हैं। मैंने यह पहले भी कहा है कि खेल के इस बीसमबीस संस्करण में ’शुद्ध खेल’ की बड़ी वकत है। खेल के इस संस्करण की गति इतनी तेज़ है कि यहां एक इम्पैक्ट प्लेयर सिर्फ़ बीस मिनट में या चार ओवर में पूरे मैच पर अविस्मरणीय प्रभाव छोड़ सकता है। युवराज सिंह और उमर गुल इसके स्थापित उदाहरण हैं। भारत शायद इसी डर से घिरा रहा कि अगर युवराज के आउट होने का झटका भारत को शुरुआती दौर में ही लग गया तो ऐसे में उसका उबरना कैसे संभव होगा?
भारत को यह गलती नहीं करनी चाहिए थी। आख़िर टीम में शामिल न होने की बावजूद आज उनके पॉवेलियन में बैठा एक व्यक्ति इस ’मितव्ययिता’ के दुष्प्रभावों से सबसे अच्छी तरह परिचित रहा है। हिन्दुस्तान ने एकदिवसीय क्रिकेट में इसी डर के मारे सचिन तेन्दुलकर को बार-बार मध्य-क्रम में खिलाने की कोशिश की है। एक बार तो भारत यह अद्भुत प्रयोग ठेठ विश्व कप के मंच पर भी कर चुका है जिसे बाद में 1999 विश्व कप का सबसे बड़ा रणनीतिक घोटाला कहा गया। उस वक़्त भी यह पूछा गया था कि आख़िर यह महान विचार किसके दिमाग़ की उपज थी कि सचिन जैसे बल्लेबाज़ को पारी के शुरू में ही बल्लेबाज़ी के लिए नहीं उतारा जा सकता और उसे भी ’बचाव’ की ज़रूरत है? मैं आज पूछना चाहता हूं कि आख़िर यह युवराज को आख़िरी ओवरों के लिए बचाकर रखने का विचार किसके दिमाग़ की उपज था? आपके सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ और मौजूदा हालात में एकमात्र ’इंपैक्ट प्लेयर’ का बीस ओवर के मैच में दस ओवर के बाद बल्लेबाज़ी के लिए जाना एकदिवसीय में तीस ओवर पर बल्लेबाज़ी के लिए जाने के बराबर है। आखिर में युवराज-धोनी-यूसुफ़ के लिए रन रेट इतनी ज़्यादा थी कि विकेट बचे होने के बावजूद भारत मनचाहा नहीं पा सका। यह सिर्फ़ प्लानिंग की कमी या मिसकैलकुलैशन भर नहीं, यह आपके डर की आपके ऊपर जीत है। यह डर है ’हारने का डर’। और जब तक आप हारने के डर से मुक्त होकर नहीं खेलेंगे, आप जीत नहीं सकते।
चिंता नहीं, आपने वो जॉन अब्राहम वाला एड देखा है ना ईएसपीएन/स्टार स्पोर्ट्स का! अब इस खेल में सारा कुछ इतना जल्दी-जल्दी होता है कि एक हार से अब दुनिया ख़त्म नहीं होती। सच बात तो ये है कि अब भी भारत के पास इस खेल का कुछ सबसे उम्दा कच्चा माल है। हमारी टीम अब भी युवा टीमों में गिनी जाती है। और ये युवता का ज़खीरा अभी रहने वाला है। बस ज़रूरत है उन्हें सही समय पर ’खर्चने’ की!
अपना तो क्या कहूं। घर आया था क्रिकेट के साथ थोड़ा पुराना रोमांस ताज़ा करने। तीस हज़ार लगाकर नया एलसीडी टीवी लेकर आया था कि अब चैन से रातों को जाग-जागकर मैच देखा जाएगा। चलिए ठीक है, अब भारत नहीं तो न सही। अब हम वेस्ट इंडीज़ के जानदार लड़कों का हौसला बढ़ाएंगें। और अगर वो जीते तो इसकी वजह हम अगली पोस्ट में बताएंगें।
मिहिर की इससे पहले की पोस्टें
नए सितारे का सूरज में बदलना पुराने सूरज के बुझने की कहानी है
मैदान में फिरकी खाती गेंदें और मैदान से बाहर परम्परावादियों की नकलचेपी










बहुत सुंदर।
badhiya.. sahi vishleshan.. kal rat match dekhne ke bad jo man me aaya aaj use yahan padh raha hun..
well d words r true and appreciable.. but i guess stress could be one another factor for india and the internal conflicts which are going on must have been a reason for dhoni’s performance which unfortunately wasnt great at this t20 world cup. may be india came with the intention of saving the world cup but does that intention really makes so much of difference?? isnt it actually one and same thing??
besides this is a game.. india lost unfortunately to those who werent d contenders for the cup also but isnt it just the history?? its the same expression the world has when india out of the blue sometimes play so amazingly!!! in the end… its just another game and india learns from its mistake…!!!
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