अच्छा खेलो, अच्छा दिखो, तब बनोगे स्टार प्लेयर
♦ शाश्वती
क्रिकेट भारत में धर्म के समान है। टीम अगर कोई टूर्नामेंट हार जाए, तो उसके बाद खिलाड़ियों के पुतले जलाना, उनके घर पर पथराव करना या उनके टूर्नामेंट जीतने पर देश में दिवाली जैसा माहौल बनना और पूरे शहर का उनके स्वागत के लिए उमड़ कर सड़क पर आ जाना कोई नयी बात नहीं है। भारतीय टीम टी-20 वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में अपनी जगह नहीं बना पायी, सुपर 8 का एक भी मैच जीत नहीं पायी। टीम की इस हार का असर तुरंत नज़र आने लगा। क्रिकेट के जानकार भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की उन्हीं निर्णयों में खामियां निकालने लगे, जिनके बल पर कुछ समय पहले तक उन्हें थिंकिंग कैप्टन और कैप्टन कूल सरीखी उपाधियां देते थे। रांची पुलिस को उनके घर के बाहर सुरक्षा के अतिरिक्त इंतजाम करने पड़े। सुपर 8 के अंतिम मैच में दक्षिण अफ्रीका से मैच हारने के बाद प्राइज डिस्ट्रीब्यूशन समारोह में जब धोनी के बोलने की बारी आई तो दर्शक हूटिंग करने लगे।
चलो! मान लिया जाए कि जो दर्शक इन खिलाड़ियों को सिर आंखों पर बिठाकर रखते हैं, उन्हें इनसे नाराज होने का भी अधिकार है।
पर, आम लोगों का क्रिकेट के प्रति यही जुनून महिला क्रिकेट टीम और उनके प्रदर्शन को लेकर क्यों नहीं है? बहुत कम लोगों को मालूम है कि इंग्लैंड में अभी महिला टी-20 वर्ल्ड कप भी हो रहा है और भारतीय महिला टीम सेमीफाइनल में भी पहुंची। टीम जब अपना पहला मैच पाकिस्तान से पांच विकेट से हार गयी थी, तो यह हर जगह खबर बनी मानो महिला टीम का मजाक उड़ाया जा रहा हो। आज जब वही टीम सेमीफाइनल में पहुंची, तो लग रहा था कि यह बात ख़बर मात्र इसलिए बनी क्योंकि खबर देना मात्र था या फिर धोनी और उनकी टीम टी-20 वर्ल्डकप से बाहर आ गयी, तो पत्रकारों को महसूस हुआ कि चलो इंग्लैंड आए हैं, तो अब महिला टी-20 वर्ल्ड कप की कवरेज भी कर लें। गूगल पर अगर आप टी-20 वर्ल्ड कप 2009 टाइप करें तो कुल 78 लाख 70 हजार हिट्स मिलेंगे और वहीं वुमेन टी-20 वर्ल्ड कप 2009 टाइप करने पर आपको मात्र 27 लाख 40 हजार हिट्स मिलेंगे। कुछ समय पहले जब महिला क्रिकेट टीम को बीसीसीआई ने अपने अधीन लिया तो क्रिकेट पंडितों ने ये आशा व्यक्त की थी कि टीम की स्थिति में सुधार होगा। यहां सुधार से तात्पर्य टीम को मिलने वाले मीडिया कवरेज और प्रायोजकों से है। मालूम नहीं टीम की आर्थिक हालत में कितना सुधार हुआ है, पर लोगों में महिला क्रिकेट टीम के बारे में जानकारी जस-की-तस बनी हुई है।
पिछले साल महिला विश्व कप का आयोजन हुआ था और उसमें टीम इंडिया तीसरे स्थान पर रही थी, पर कम लोगों को ही इस बारे में पता चल पाया। भारत में तो क्रिकेट को धर्म माना जाता है और क्रिकेटरों को भगवान की तरह पूजा जाता है, फिर क्रिकेट की इस दीवानगी के बीच मेल प्लेयर और फीमेल प्लेयर होना इतना ज्यादा मायने क्यों रखता है? अगर हम क्रिकेट को पसंद करते हैं, तो फिर हमारे देश में ही महिला क्रिकेटर और महिला क्रिकेट इतनी ज्यादा उपेक्षित क्यों है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी भी खेल की लोकप्रियता का पैमाना खिलाड़ियों का प्रदर्शन न होकर, उनका ग्लैमरस होना या न होना है? मंदिरा बेदी एक बार महिला क्रिकेट को बढ़ावा देने का दावा मीडिया के सामने करती हैं, तो कई दिनों तक सुर्खियों में छायी रहती हैं। वहीं टीम की कप्तान झूलन गोस्वामी का इंटरव्यू कहीं पढ़ने या देखने के लिए भी नहीं मिलता। सानिया मिर्जा ने पिछले साल अपनी जिंदगी का पहला ग्रैंडस्लैम जीता, पर वो सालों से टेनिस सेन्सेशन बनी रहीं। उनकी झोली में लगातार विज्ञापन आते रहे, इसका कारण उनका अच्छा टेनिस प्लेयर होना मात्र नहीं बल्कि ग्लैमरस होना भी है। भारत में ढेरों महिला ग्रैंडमास्टर हुई हैं, पर हाल के दिनों में तान्या सचदेव को जितना मीडिया कवरेज मिली, शायद किसी और महिला ग्रैंडमास्टर को नहीं। सिर्फ महिला खिलाड़ी ही क्यों, ढेरों पुरुष खिलाड़ियों के कैरियर पर भी ग्लैमर की कमी का असर देखा जा सकता है। अगर, ऐसा नहीं है तो ओलंपिक विजेता सुशील सिंह को विजेंद्र सिंह की तुलना में कम मीडिया कवरेज क्यों मिला? या फिर नेशनल टेलीविजन के रियलिटी शो में कहीं भी वो क्यों नहीं नजर आए, जबकि विजेंद्र का मीडिया पर जादू अब तक कायम है। तभी तो सलमान खान ने भी अपने शो दस का दम में उन्हें मल्लिका शेरावत के साथ आमंत्रित किया है।
किसी भी खेल का उदाहरण हम क्यों न ले लें, हर जगह मामला कुछ ऐसा ही दिखता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि खेल के मैदान में अच्छे प्रदर्शन के बाद भी लोकप्रिय होने के लिए इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की तरह ग्लैमरस होना जरूरी है?









बहुत कम शब्दों मे शाश्वती ने भारत मे क्रिकेट को लेकर जो स्थिति बन गई
है, उस ओर ध्यान दिलाया है. लेखिका की यह चिंता स्वाभाविक है कि यह विशेष दर्ज़ा सिर्फ क्रिकेट को ही
क्यों है ? महिला क्रिकेट को उसका स्थान क्यों नहीं मिलता? साकेतानन्द.
बहुत अच्छे, भारत में क्रिकेट को भगवान की तरह माना तो जाता हैं मगर सिर्फ और सिर्फ पुरूष क्रिकेट को…ये भारत की ही सोच हो सकती जहां औरतो को पुरूषों के बराबर माना जाता हैं मगर…?शाश्वती तुमने क्रिकेट का सहारा लेकर भारत के लोगों की सोच को बता दिया…बहुत खुब…
Hmmm….you are right and your thoughts, movies like Chak De, Bend it like Beckham, and all these discussions of women empowerment strike some deep chord of the feminist in me.
I know even after allthese talks of equality, women still remain at the receiveing end……but there is something that makes me happy too….the very slow, and almost negligible, but yet existing “change in view” of society….people accepting and realising the efforts of women….and I am sure if women continue to fight and achieve with this spirit and fellow women continue to make that extraaaaaa effort to get their contribution in limelight..there would be a day when media would find an audience for them…and then there would be no turning back…..!
bilkul sahi likha hai.Aur,ye problem keval cricket ki hi nahi, har field ki hai. jo chamakta hai, usme dam hai, ye mana jata hai. kyonki revenue lane ke liye uska istemal instant parinam deta hai. ek vigyapan ata hai ki tanis khiladi ko uska coach kharab pradarshan ke baad salah deta hai apani grooming ki aur vah ladki face aur body ko ek jaisa rang dene vali cream lagana shuru karti hai. agali performance me vah excell karti hai.
ye kya hai? dukhad….khel ya career kabse kale aur gore aur uske baad patches vale complexion ya flawless complexion me bantne laga hai. kaun ise badha raha hai?
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