आइए, खांडेकर के बिहार विरोध का विरोध करें

दैनिक भास्‍कर के मध्‍यप्रदेश स्‍टेट हेड अभिलाष खांडेकर नस्‍लवाद से पीड़‍ित शख्‍स हैं। रंगभेदी हैं। क्षेत्रवादी हैं। उनके आचरण से यह हमेशा से ज़ाहिर होता रहा है, लेकिन आज जो उन्‍होंने किया है, वह हिंदी पत्रकारिता के लिए एक बड़ी शर्म है। मुंबई की लड़की से भोपाल में गैंगरेप होता है और अपने शहर की व्‍यवस्‍था से नाराज़ खांडेकर संपादकीय लिखते हैं, भोपाल को बिहार होने से बचाइए। बिहार के खिलाफ़ शिवसेना और एमएनएस मार्का मराठियों की गोलबंदी को खांडेकर जैसे लोग वैचारिक नेतृत्‍व प्रदान करते हैं। आइए, हम खांडेकर जैसों की मानसिकता का विरोध करें।

khandekar-marathi1आज दैनिक भास्‍कर के भोपाल संस्‍करण में फ्रंट पेज पर एक ख़बर है। ख़बर में रिपोर्टरद्वय सुनील सक्‍सेना और विहंग सालगट ने निष्क्रिय पुलिस प्रशासन को आड़े हाथों लेते हुए महिलाओं से अपील की है कि वे पुलिस पर भरोसा न करें, अपनी हिफ़ाज़त ख़ुद करें। इस हताश अपील में भास्‍कर के एमपी स्‍टेट हेड अभिलाष खांडेकर ने एक बॉक्‍स संपादकीय लिखा है, जिसमें उन्‍होंने पता नहीं किससे गुज़ारिश की है कि भोपाल को बिहार होने से बचाएं। पूरे संपादकीय में बिहार में अपराध से जुड़े तथ्‍यों का कोई हवाला नहीं है और जाहिर तौर पर बिहार विरोधी मानसिकता को संपादकीय का आधार बनाया गया है। भोपाल गवाह है कि पिछले साल भर के डीबीस्‍टार ने शहर की भ्रष्‍ट आबोहवा की परतें उधेड़ दीं और बताया कि अपराध और भ्रष्‍टाचार के मामले में तालाबों का यह शहर कितना अपडेट है। ये अलग बात है कि स्‍टेट का मुखपत्र बना भोपाल दैनिक भास्‍कर शहर की सच्‍ची तस्‍वीर दिखाने से हमेशा बचता रहा। यह पहली बार है, जब भास्‍कर ने एक प्रशासन के खिलाफ़ कलम चलायी है – लेकिन उस कलम को अपने संकीर्ण और लिजलिजे शब्‍दों से खांडेकर ने अपवित्र कर दिया है।

अभिलाष खांडेकर

अभिलाष खांडेकर

होना तो यह चाहिए कि खांडेकर के संपादकीय के विरोध में बिहार के पत्रकारों को वहां एकजुट होकर प्रबंधन से बात करनी चाहिए और अगर प्रबंधन सुनने से इनक़ार करता है तो सामूहिक इस्‍तीफ़े की पेशकश करनी चाहिए। क्‍योंकि यह सिर्फ़ एक क्षेत्र की अस्मिता और उस पर टिप्‍पणी का मामला नहीं है – अगर होता तो एक संपादक की मूढ़मति समझ कर उसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता था – दरअसल यह पत्रकारिता के मूल्‍यों पर हमला है।

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