क्या है अभिलाष खांडेकर की ‘हेटलाइन’ का हिडेन एजेंडा
♦ सुशांत झा
इस बार बिहार को किसी राज ठाकरे ने नहीं बल्कि एक बुद्धिजीवी ने गाली दी है। जी हां, मैं यहां गाली शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहा हूं कि अभिलाष खांडेकर का जो लेख मैंने भास्कर के इंटरनेट एडीशन (19 जून 2009) पर पढ़ा है, उसमें कम से कम तीन जगह बिहार के खिलाफ लिखा गया है। यूं खांडेकर ने बड़ी चतुराई से इसे बिहार की कानून व्यवस्था और बदहाली से जोड़ने की कोशिश की है, लेकिन उनके शब्द, कोमा और फुलस्टॉप उनके मन में चल रहे विचारों की चुगली करते हैं।
सबसे पहले खांडेकर ने शीर्षक ही ऐसा लगाया है, जो हेडलाईन कम ‘हेटलाईन’ ज्यादा लगता है। दूसरी बात उन्होंने लिखी है कि भोपाल के हालात में गिरावट के लिए जिम्मेवार वो लोग हैं, जो दूसरे प्रदेशों से आकर यहां के हालात को दूषित कर रहे हैं। जाहिर है, यहां भी खांडेकर के मन में रस्टिक किस्म के बिहारी ही आतंक मचा रहे हैं जिसे उन्होंन खुल कर जाहिर नहीं किया है। खांडेकर इतने व्यथित हैं कि वे भोपाल की तुलना पटना या बिहार के किसी घटिया, जाहिल, अराजक और पिछड़े शहर से करने की हद तक चले जाते हैं।
लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सोच मध्यप्रदेश या भोपाल के आम लोगों की भी है? जो अखबार मध्यप्रदेश का प्रतिनिधि अखबार होने का दावा करता है, वहां की आवाज़ होने का दावा करता है, क्या उस प्रदेश के लोग भी वाकई ऐसा सोचते हैं, जिसे इस अख़बार के एक शीर्षपुरुष ने ज़माने की आवाज़ मानकर सार्वजनिक किया है? या ये वाकई एक कुंठित, संकुचित, नस्लीय और संकीर्ण मानसिकता के इंसान की आवाज़ है, जिसने येनकेन प्रकारेण अपने करियर में तरक्की पाकर संपादक का पद हथिया लिया है?
भोपाल प्रवास का मेरा संक्षिप्त अनुभव सुखद अनुभूतियों से भरा है – मध्यप्रदेश के लोग उदार हृदय, शांत और मेहनती होते हैं। इस सूबे ने अपनी शांतिप्रियता और सौहार्द के बल पर तरक्की की है और हिंदी पट्टी के बीमारु प्रदेशों की लिस्ट से अपना नाम हटाया है। यह प्रदेश सही मायने में हिंन्दुस्तान का हृदय प्रदेश है जिसने खुले दिल से पूरे देश के लोगों का स्वागत किया है। लेकिन खांडेकर का यह लेख इसकी उलटी तस्वीर पेश करने की घृणित साजिश लगता है – जब खांडेकर कहते हैं कि बाहरी प्रदेशों से आने वाले लोगों ने भोपाल के हालात को खराब किया है। शायद खांडेकर भूल गये कि उनका उपनाम भी कुछ इसी तरह की चुगली कर रहा है कि उनका ताल्लुक हिंदुस्तान के किस सूबे से है। और क्या ये महज संयोग है कि ठाकरे के बाद एक खांडेकर ने घटिया शब्दों में बिहार की आलोचना की है या फिर ये कोई सोची समझी साजिश का हिस्सा है?
ख़ैर, अगर बिहार घटिया सूबा भी है, तो भी एक प्रतिष्ठित अखबार के संपादक जैसे गरिमामय पद को संभालने वाले अभिलाष खांडेकर से मानवीय विचार रखने की उम्मीद तो की ही जा सकती है। कई बार संदेह होता है कि संपादकीय विभाग में षडयंत्र के तहत किसी ने खांडेकर फंसाने के लिए तो नहीं इस तरह के सामान्यीकृत और सड़क छाप लेख लिख दिये हैं।
बिहारियों पर अक्सर ये आरोप लगता है कि वे जल्दी आंदोलित हो जाते हैं और बात अपने सूबे की हो, तो कुछ ज्यादा ही। लेकिन क्या खांडेकर को बिहार में एक भी अच्छाइयां नज़र नहीं आयीं…? क्या उन्हें एक गरीब सूबे मे पनप रही तरक्की की छोटी-छोटी पौध नज़र नहीं आयी…? अगर गरीबी और पिछड़ापन वाकई किसी को हास्यास्पद बनाती है तो फिर भीड़ की मानसिकता और संपादक खांडेकर की मानसिकता में क्या फर्क रह जाता है?
शायद अब हम ऑस्ट्रेलिया में हुए भारतीयों छात्रों पर हुए हमलों की आलोचना नहीं कर पाएंगे। हम ये भी नहीं कह पाएंगे कि श्रीलंका में तमिलों को उनका वाजिब हक मिलना चाहिए। खांडेकर की बात मानें तो शायद विभाजन के बाद आये करोड़ों पंजाबियों और सिंधियों को हिंदुस्तान में गले लगाना गांधी और नेहरु का सबसे बड़ा गुनाह था।
यह भी पढ़ें : आइए, खांडेकर की बिहार विरोधी मुहिम का विरोध करें









खांडेकर साहेब क्या हो गया आपको। क्यों राह से भटक गए आप। इस लेख की शुरुआत में तो आपको बुद्धिजीवी कहा गया है, लेकिन यह शब्द क्या आपके लिए उपयुक्त है.क्या.जरा सोचिएगा।
आपका अखबार दावा करता है कि वह प्रदेश की प्रतिनिध अखबार है, लेकिन ऐसी बातें कहकर आप क्या कहना चाहते हैं।
अरे भाई, हमारे बिहार में एक कहावत है – निमला की बीबी सब की भौजाई। यानि बिहार अभी पिछड़ा है विकास के सोपान पर तो क्या कोई भी कुछ कहकर निकल जायेगा? सांख्यिकी पर बिना गौर किये बिहार को अराजकता और अव्यवस्था से ही सदैव जोड़कर देखना एक ओए आशीष साहब के कच्चे ज्ञान की ओर ईशारा करता है तो दूसरी ओर उनको अपनी पद – प्रतिष्ठा का भी ख्याल नहीं।घटिया लोकप्रियता के किये जो-सो लिख जाते हैं ताकि जातीय और क्षेत्रीय उन्माद में दिनानुदिन इज़ाफा हो। क्या एक संपादक का यही दायित्व है? पत्रकार को एलिट क्लास का और बुद्धिजीवी वर्ग का समझा जाता है पर खांडेकर ने ऐसा लिखकर अपनी कौम यानि पत्रकारिता से जुड़े लोगों की मार्यादा ही गिरा दी। छि: छि:
अभिलाष खांडेकर ने जो लिखा है, क्या उन्हें यह मालूम है कि उनकी इस प्रवृति से देश-दुनिया के किन-किन हिस्सों को बचाया जाना चाहिए? क्या अभिलाष खांडेकर ने पत्रकारिता के न्यूनतम मानदंडों और नैतिकताओं के बारे में कुछ जानने-समझने की कोशिश की है? क्या केवल पद ऐसी ताकत दे देता है कि आप अगर कुछ नहीं मिले तो अपने घर के बाथरूम में अपना सिर टकराने लगें? क्या यह अपने बॉस को खुश करने की कोशिश में अपनी सबसे बदतरीन बदनीयति प्रदर्शित करने की भूख है, जो करने के बाद आदमी या तो अपनी हीनता पर खुद ही हंसता है या फिर किसी भी रास्ते प्रसिद्ध होने की जुगत में अपना ही मुंह देखने लायक नहीं रह जाता है? मैं किसी जगह की खासियत नहीं गिनाऊंगा, लेकिन जिसके मन में इस तरह के आग्रह बने हुए हैं, उनसे एक गुजारिश है। आसपास किसी गहरे नाले में कूद जाएं। और कोई रास्ता नहीं है…
वैसे अपने गिरेबां में झांकना एक बेहतर रास्ता हो सकता है…
http://khabar.josh18.com/news/14724/3
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बाथरूम में कर्मचारी के साथ पकड़ा गया अर्धनग्न IAS!
आईबीएन-7
TimeFri, Jun 19, 2009 at 17:23 , Updated at Fri, Jun 19, 2009 सिटी खबरें सेक्शन
Tagsटैग: “Bhopal”, Ias, Sexual Herasment | 0 कमेंट्स
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बिना पैंट के खड़े पाटिल ने जैसे ही कैमरा देखा उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई
बिना पैंट के खड़े पाटिल ने जैसे ही कैमरा देखा उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई
“भोपाल।” “भोपाल” जिला पंचायत के सीईओ आईएएस अफसर ज्ञानेश्वर पाटिल पर एक लड़के ने यौन शोषण का सनसनीखेज आरोप लगाया है। वहीं आईएएस अफसर का कहना है कि उन्हें फंसाया जा रहा है। पुलिस ने दोनों पक्षों की शिकायत ले ली है और तफ्तीश में जुटी हुई है। उधर मुख्यमंत्री ने सीईओ को सस्पेंड कर दिया है।
ये घटना गुरुवार की रात 10 बजे की है। भोपाल जिला पंचायत के सीईओ के दफ्तर में मीडिया पहुंचा तो आईएएस साहब अर्धनग्न मिले। उनके साथ लड़का भी था जिसके कपड़े उतरे हुए थे। बिना पैंट के खड़े पाटिल ने जैसे ही कैमरा देखा उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। लड़के ने आरोप लगाया कि आईएएस साहब पिछले कुछ दिनों से उसका यौन शोषण करने की कोशिश कर रहे थे।
लड़के की मानें तो वो एक ग्राम पंचायत से ताल्लुक रखता है। रात के दस बजे इसे आईएएस साहब ने इसलिए बुलाया था ताकि वो इसका यौन शोषण कर सकें लेकिन उसने मीडिया को जानकारी दे दी। लड़के ने कहा कि उसके पास पूरे कॉल रिकॉर्ड हैं जिसमें पता चलता है कि अफसर ने उसे कितनी बार और कब-कब फोन किए।
आईबीएन-7 का आईना…
गर्व से कहो कि खांडेकरी भोपाली हैं…
जय अभिलाष खांडेकर। अभिलाष खांडेकर जी को ज्ञानेश्वर पाटिल का नमस्कार।
जहां तक मेरी जानकारी है-
1- अभिलाष खांडेकर- मराठी.
2- ज्ञानेश्वर पाटिल- मराठी.
जय महाराष्ट्र…
और ये ससुरे बिहार को गरियाएंगे…
खांडेकर जी को बिहार का दौरा ज़रुर करना चाहिये। कम से कम वहाँ के लोगों से मिलकर उनकी धारणा ज़रूर बदल जायेगी। भगवान उनको सदबुदि्ध दे।
खांडेकर को बिहार का “आपराधिक चहरे” के साथ उसके संघर्षशील और जुझारू इतिहास को भी देखना होगा. लोगों का आंदोलित होना उनके पिछडेपन का नहीं बल्कि उनकी जागरूकता का परिचायक है. खांडेकर जैसे लोगों का विरोध होना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि यह मीडिया के माद्यम से आम लोगों के दिमाग में नकारात्मक छवि का बिज बोते हैं, जैसे की संघियों ने मुसलिमों को लेकर बो रखी है.
abc
Ramesh Gee Bhaskar Ko Khandharon se Bacheya,
Abhilesh Khandekar ke na Apne Lekha Se Sabit Keya hai ke wa Maujuda Patrkarita Ke sabse bada bodhik Khandher hain. unki marahta kuntaya ek Prtisthet Akhbar Ka panne pa nela ya Sansthan Ke sath Desh-samaj ke lea Achaa nahi hai. Ham patrkaro ko wyaktigat Kunthawna ke lea Sarwaganik manch nahi hai. bihar Wa Bhumi hai go Madhu lemya, Sarad yadav, Gorge Sahab gaise Logow ko Sena se Laga Kar Anarastriya Khyati Dee. Gandhi ne Bhi Bharat ma sabse Pahala wahi ke mati ko ser se lagaya tha aur kranti ke.Samay hai Sarwaganik Rup Se nahi to Hirday se hi Sahi Sarmandgi Gahir kegya.
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