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भारत में होमो-सेक्‍सुअलिटी पर क़ानूनी मुहर

2 July 2009 No Comment

एक समानांतर दुनिया के लोग

♦ गीताश्री

नैतिकता के ठेकेदारों की दुनिया में फिर से खलबली मची है। अचानक उन्हें नैतिकता खतरे में दिखाई दे रही है। उनके हिसाब से परदे के पीछे जो नरक करना हो करो… सामने आए तो मारे जाओगे। क्योंकि इससे समाज का ढांचा गड़बड़ा जाएगा। परिवार नामक संस्था कमजोर पड़ जाएगी। भारतीय समाज यूरोपीय समाज में बदल जाएगा।

समलौंगिको को सामाजिक मान्यता दिलाने के लिए सरकार ने कानून बदलने की अभी सोच ही रही है कि ठेकेदार सामने आ गए है और छाती पीट रहे हैं। उस वक्त ये ठेकेदार सो जाते हैं जब किसी लड़की का सामूहिक बलात्कार होता है या किसी दलित लड़की को सरेआम नंगा करके घुमाया जाता है। सरकार को भी इन्हीं से भय है। पता नहीं क्या हंगामा कर बैठे। समलैंगिकता को इतना बड़ा मुद्दा ना बना दे कि संसद का अगला सत्र हंगामेदार हो जाए।

सोच जब गहरी हो जाती है तब इरादे कमजोर पड़ जाते हैं। सरकार इस पर सोच विचार करने की बात करके फिलहाल हंगामे को टालने मूड में दिखाई दे रही है। समलैंगिक संबंधों को गैरकानूनी ठहराने वाले आईपीसी के सेक्शन 377 को बदलने के लिए जैसे ही सरकार ने इसकी पुर्नविवेचना की आवश्यकता पर जोर दिया वैसे ही किसी का दुनिया आबाद हो उठी तो समाज के ठेकेदारों के पेशानी पर बल पड़ गए। सरकार ने कहा ही है कि वह समाज के सभी तबको से बात करने वाली है और इनमें धार्मिक संस्थाएं भी शामिल होंगी। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली बयान सुने-कैबिनेट को इस मुद्दे पर विचार करने कहा गया है लेकिन जल्दीबाजी में कोई फैसला नहीं लिया जाएगा। पता नहीं सरकार किस मूड में है। अगर धार्मिक संगठनो को शामिल करेगी तो भारत में समलैंगिक समाज को मान्यता मिलना असंभव है। विरोधी दल अपना विरोध जता रहे हैं कि भारत को यूरोप नहीं बनने देंगे। भारत में अप्राकृतिक (कानून की नजर में 10 साल की सजा का प्रवधान) यौन संबंधों के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन यूरोपीय देशों में इसे व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा संवैधानिक अधिकार मानते हैं। क्या भारत में नहीं होना चाहिए ऐसा… क्या यहां के लोगो को व्यक्तिगत पसंद चुनने का हक नहीं होना चाहिए। माना कि यहां वहां के समाजो में काफी अंतर है, मगर यहां मसला व्यक्तिगत आजादी का है जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज की पहली पहचान, पहली शर्त्त होती है। सरकार के कुछ मंत्री भी डर रहे है कि इस तरह के संबंध को छूट देने से देश की कानून व्यवस्था बिगड़ेगी। कोई तर्क दे रहा है कि इस कानून को मान्यता देने से, समाज में अराजकता फैल जाएगी, कोई इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ मान रहा है तो कोई इसे भयानक बीमारियों से जोड़ कर देख रहा है। हमें समझ में नहीं आता कि आखिर दो व्यक्तियो के बीच प्रेम अपराध कैसे हो सकता है। अपनी लैंगिकता का उत्सव मनाने में जुटे लोगो की बातें तो इक बार सुनो। हमें तो डर है कि यह मसला भी राजनीति का शिकार होकर ना रह जाए। दिल्ली समेत कई शहरो में समानांतर दुनिया के लोगो ने खुशियां तो मना ली। सरेआम खुल कर बयान भी दिए। टीवी चैनलों पर चीख चीख कर कहा कि हमने नहीं चुना ये रास्ता… इसको समझो। हमें ईश्वर ने बनाया ऐसा तो हम क्या करें…। हालांकि ये पूरा सच नहीं है। कई बार कुछ लोग खुद चुनते हैं इस रास्ते को। खासकर औरतें। जब वे शासक पुरुषों के चंगुल से मुक्ति चाहती हैं तब। मर्द क्यों होते हैं समलैगिक, ये तो वही जानें… शायद प्रकृति उन्हें बना कर भेजती है। लेकिन औरतें इस मामले में कई बार अपना रास्ता खुद चुन लेती है। कुछ प्राकृतिक रूप से समलैगिंक होती भी हैं। दोनो ही मामले में एक स्त्री या इनसान को अपनी देह पर इतना अधिकार तो है ना कि वो अपनी मर्जी से सेक्स जीवन का चुनाव करे। न जाने कितनी लड़कियों और पुरुषों को जबरन शादी के बंधन में बांध कर उनका जीवन बरबाद कर दिया गया है। मेरे जानने वाले एक मेकअपमैन की व्यथा सुनें, जिनकी शादी हाल ही में कर दी गयी। घरवाले उसकी बात सुनने तक को तैयार नहीं थे। अंत क्या हुआ। बीवी दो दिन में यह कहते हुए छोड़ गयी कि तुम्हें पुरुष की जरुरत है, मेरी नहीं। आज वो अपने भविष्य के इस अंधेरे से अकेले जूझ रहा है।

क्या उसे हक नहीं कि जिसके साथ वह कंफर्टेबल है उसके साथ जीवन शुरु कर सके। समाज में रह सके। लोग उसे हीन नजर से ना देखें। क्या घरवालों को उसकी समस्या को समझना नहीं चाहिए। इसी साल एक चर्चित फिल्म दोस्ताना आयी थी। बहुत चली और सराही गई। इसमें एक बात गौर करने लायक है कि एक दकियानूसी मां आखिर अपने बेटे के समलैंगिक होने को स्वीकार लेती है। ये अलग बात है कि बेटा समलैगिंक नहीं है। मगर फिल्म इसी उद्ददेश्य से बनाई गई है कि समाज अपना रवैया बदले। ऐसे रिश्तों से लोगों को परिवार का ढांचा बखरता क्यों दिखाई दे रहा है। जबकि एसे कई सफल जोड़ों ने बच्चे तक गोद लिए हैं, परिवार बनाया है। कहां हैं समस्या। ऐसा भी नहीं कि कानून बनते ही सारे लोग इसी रास्ते पर चल पड़ेंगे। जो जैसा है वै वैसा ही जीवन चुनेगा। बस एक समानांतर दुनिया जरूर बन जाएगी जो आपसे ज्यादा खुली और आजाद होगी। कुंठा रहित।

homoनई दिल्ली/लखनऊ, 2 जुलाई। होमोसेक्‍सुअलिटी अब सामाजिक और कानूनी रूप से जायज़ हो सकेगी और इसके लिए अब किसी भी जोड़े को शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ेगी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फैसले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी)की धारा 377 को अवैध ठहराते हुए समलैंगिक संबंधों को वैध करार दिया है। उधर न्यायालय के इस फैसले पर धर्मगुरुओं ने ऐतराज जताते हुए समलैंगिकता को समाज के लिए विघटनकारी बताया है।

न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई के बाद सुनाए फैसले में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उस वक्तव्य का हवाला दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि संविधान समलैंगिकों को भी अन्य नागरिकों की भांति समान अधिकार देता है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अजीत प्रकाश शाह और न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर की खंडपीठ ने गुरुवार को कहा कि अगर आईपीसी की धारा 377 में संशोधन नहीं हुआ तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा, जो सभी नागरिकों को समान अवसर देने और कानून के समक्ष सभी के समान होने की बात कहता है।

न्यायालय ने पूर्व नेहरू के वक्तव्य का हवाला देते हुए कहा, “समानता और मत भिन्नता संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार हैं।”

यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने कहा कि धारा 377 में संशोधन किया जाना चाहिए और वयस्कों में सहमति से बनने वाले यौन संबंधों को वैध माना जाना चाहिए।

सीधे शब्दों में कहा जाए तो इस फैसले के बाद पुलिस अब सहमति से बने समलैंगिक संबंधों के आरोप में किसी भी वयस्क को गिरफ्तार नहीं कर सकेगी।

इस मामले में याचिका दायर करने वाली नाज फाउंडेशन की वकील तृप्ति ने कहा, “अब यह स्पष्ट हो गया है कि वयस्कों के बीच सहमति से बना यौन संबंध अपराध नहीं होगा।”

न्यायलय के इस फैसले की राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) ने प्रसन्नता जाहिर की। नाको की महानिदेशक और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव सुजाता राव ने आईएएनएस से कहा, “यह एक सकारात्मक निर्णय है। हमें उन लोगों तक पहुंचने में आसानी होगी जो लोग समलैंगिक संबंधों में लिप्त हैं। इससे हमारे जन स्वास्थ्य तंत्र को सहायता मिलेगी।”

उधर, धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों ने न्यायालय के इस फैसले पर ऐतराज जताया है। ‘केरल कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस’ (केसीबीसी) ने कहा है कि वह देश में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दिए जाने का विरोध करेगी।

केसीबीसी के प्रवक्ता फादर स्टेफन अलाथारा ने गुरुवार को कहा, “समलैंगिकता भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। हम इसे कानूनी तौर पर मान्यता दिए जाने का विरोध करेंगे।”

मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी समलैंगिक संबंधों को वैध ठहराने के फैसले पर ऐतराज जताते हुए समलैंगिकता को भारतीय संस्कृति के खिलाफ करार दिया है।

सुन्नी धर्मगुरु मौलाना खालिद रशीद फिरंग महली ने गुरुवार को आईएएनएस से कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देना अनुचित है। यह समाज के लिए बहुत घातक और नुकसानदेह है।

उन्होंने कहा, “कोई भी धर्म समलैंगिकता को स्वीकार नहीं करता। इसे मान्यता देने से पूरी युवा पीढ़ी गर्त में चली जाएगी।”

शिया धर्मगुरु कल्बे जव्वाद ने कहा, “समलैंगिकता हमारे देश की संस्कृति के खिलाफ है। इसके लिए हमारे समाज में कोई गुंजाइश नहीं है। समलैंगिकता एक मानसिक विकृति है और इसे वैधानिक करने का मतलब है कि इस विकृति को आगे बढ़ाना है।”

दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले पर हिंदू संगठनों ने भी आपत्ति जताई है। उल्लेखनीय है कि धारा 377 के तहत देश में समलैंगिकता और अप्राकृतिक यौन संबंध को अपराध माना जाता है। यह कानून भारत में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बनाया गया था।

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