सपना आपके लिए मर गया होगा नामवर जी…

पिछले साल यह लेख राजेंद्र यादव जी की हंस पत्रिका के लिए भेजा गया था, परंतु उन्‍होंने फोन पर बताया था कि वे छाप नहीं पाएंगे, क्‍योंकि लेख बहुत बड़ा है, जबकि वे नामवर सिंह के खिलाफ़ मिथ्‍या और दुष्‍प्रचार संबंधी सामग्री बड़े चाव से और रस लेकर छापते रहे हैं। परंतु इस लेख में चूंकि ऐसी कोई रस-सामग्री न थी, बल्कि उन सैद्धांतिक बातों का ज़‍िक्र था, जो न सिर्फ नामवर सिंह बल्कि हिंदी के आपाद अंतर्विरोधग्रस्‍त मार्क्‍सवादी कहलाने वाले रचनात्‍मक लेखकों और साहित्‍यालोचकों के द्वैत चरित्र के मूल को इंगित कर रही थीं। अब यह बात उजागर हो चुकी है कि हिंदी के बहुत से लेखकों ने मार्क्‍सवादी चेतना और अंतर्दृष्टि के लिए कोई अंतर्संघर्ष किये बिना खुद को मार्क्‍सवादी के रूप में मात्र इसलिए प्रस्‍तुत किया, ताकि वे मुख्‍यधारा साहित्‍य की नेटवर्किंग के हिस्‍से बन सकें और यह मुख्‍यधारा मार्क्‍सवाद के तले ही अपनी वैधता पाती थी। यहां याद रहे कि इस लेख का मक़सद मार्क्‍सवाद की या मार्क्‍सवादी लेखकों की आलोचना नहीं है, बल्कि यह है कि मुक्तिबोध जैसे मार्क्‍सवादी लेखक सिर्फ़ मार्क्‍सवादी होने के कारण नौकरियों तक के लिए तोड़ देने वाला संघर्ष जीते रहे, वहीं बाद में पूरा एक ऐसा सत्तातंत्र बन गया, जो मार्क्‍सवाद के नाम पर नेटवर्किंग कर निहित स्‍वार्थ पूर्ति का माध्‍यम बना। नामवर सिंह इस सत्ता संरचना के शीर्ष रहे। यहां उनकी आलोचना एकमात्र इस कारण से की जा रही है, न कि उनके मार्क्‍सवादी होने के कारण। राजेंद्र यादव भी अब एक भिन्‍न तरह की सत्ता-संरचना के शीर्ष हैं – हिंदी की छपास धारा के। अत: दोनों में एक मूल सहमति अब जा कर बन ही गयी है: आलोक श्रीवास्‍तव

namwar-rajendra

संदर्भ : तदभव के 18वें अंक में राजेंद्र यादव और नामवर सिंह की लंबी बातचीत में नामवर सिंह का समाजवादी कैंप के ख़त्‍म हो जाने को हिंदी साहित्‍य से जोड़ कर संतप्‍त होना।

इतिहास के द्वंद्व अभी सलामत हैं, नामवर जी…

आलोक श्रीवास्‍तव

‘‘जीवन में सपना नहीं रहा, क्‍योंकि सोवियत संघ नहीं रहा…’’ नामवर जी, यह पुरानी बात हो गयी। ‘‘समाजवादी कैंप नहीं रहा, एक ही महाशक्ति का वर्चस्‍व है…’’

ये और इस तरह की तमाम बातें अनैतिहासिक हैं और अप्रमाणिक मन से जन्‍मी हैं। क्‍या जब नाज़ी कैंपों में, बंगाल के अकाल में और साम्राज्‍यवादी विश्‍व युद्ध में पांच करोड़ से ज़्यादा लोग जिबह कर दिये गये थे, सपना ख़त्‍म हो गया था? जब मध्‍ययुगीन बर्बरों ने दुनिया को अपने अश्‍वों की टापों से रौंद दिया था – तब दुनिया के संज्ञान और मानव-नियति से साक्षात के उपक्रम ख़त्‍म हो गये थे?

नामवर जी, वे सपने कमज़ोर थे, जो समाजवादी कैंप पर टिके थे। क्‍या इतिहास में बारंबार ऐसे दौर नहीं आये, जब सिर्फ पराजय क्षितिज तक दिखती हो, सिर्फ धूसर हो गये स्‍वप्‍न दूर तक नज़र आते हों?

माना कि यह युग कड़ा बहुत है – पर इतिहास के द्वंद्व सलामत हैं और उपजाऊ हैं। सपनों की ज़मीन अभी भी ज़रखेज है। वैयक्तिक निराशा को इस प्रकार प्रचारित तो न करें। हिंदी की दुनिया वैसे भी अनुचरों की दुनिया है।

आज अधिक बड़े सपनों की और ज़्यादा गहरे कर्मों की दरकार है। आप अपनी उम्र और अपने सपने जी चुके। नयी पीढ़ी को यह सिखाएं कि उधार के सपने मत देखना – हमारी तरह। अपनी जागृति मेंअपने स्‍वप्‍न गढ़ो और उन्‍हें मशाल की तरह आने वालों को सौंपो। इस विश्‍व और जीवन को जानने और बदलने का संज्ञान अभी भी मौजूद है, समाजवादी कैंपों के टूटने से सपने नहीं मरे हैं, बल्कि यह बात रेखांकित हुई है कि सपनों के लिए जीना भी पड़ता है। वे सड़ी-गली व्‍यवस्‍थाएं ख़त्‍म हुई थीं, जिन्‍हें समाजवाद के नाम पर सत्ता पर कब्‍जा किये निहित स्‍वार्थों वाले शासक और शासक वर्ग दुह रहे थे। समाजवाद या मार्क्‍सवाद नहीं ख़त्‍म हुआ था। तथाकथित समाजवादी कैंपों के धराशायी होने से यह बात रेखांकित हुई थी कि क्रांति की भावना, विचार और तंत्र किन्‍हीं देशों में गुमराह हो चुके थे।

सोवियत संघ के विघटन से न इतिहास ख़त्‍म हुआ न वर्ग युद्ध – बल्कि वह और पैना, और उजागर हुआ है। उसने अब ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी है कि पूंजीवादी वैश्विक तंत्र के खिलाफ़ मानव-भविष्‍य की वैकल्पिक विचारधारा, चेतना और कर्म को स्‍थापित करने के लिए ज़्यादा यथार्थवादी और वैज्ञानिक ढंग से काम किया जाए। ‘‘सोवियत संघ का विघटन पूंजीवादी षड्यंत्र था, सीआईए की सा‍ज़‍िश थी…’’ इन कुतर्कों से इतिहास बहुत आगे निकल आया है। इस बात की संपूर्ण वैचारिकी अब मौजूद है कि सोवियत संघ क्‍या बन गया था? सोवियत संघ और चीन की बीसवीं सदी के उत्तरार्ध की राजनीति और इतिहास विश्‍व सर्वहारा से विश्‍वासघात का इतिहास है। उस इतिहास को कलपने वाले शायद इतिहास को ठीक से जानने की ज़रूरत नहीं समझते। और यह ज़रूरत न समझना उनकी कमज़हनी से नहीं निहित स्‍वार्थों से जुड़ी बात है। साम्राज्‍यवाद बेशक आज बहुत मज़बूत स्थिति में है, पर उसको मज़बूती दी किसने? चीन विश्‍व राजनीति में तमाम प्रतिक्रियावादी देशों को अपना दुमछल्‍ला बना कर विश्‍व-सर्वहारा के साथ गद्दारी करता रहा और सोवियत संघ भारत सहित अनेक देशों के प्रतिक्रियावादी शासक वर्ग के साथ तीसरी दुनिया के सर्वहारा संघर्षों को पीछे घसीटता रहा। जिस समाजवादी कैंप की बात आप कह रहे हैं, उसके ठीक स्‍वरूप को समझने की ज़रूरत है, न कि उसका रोना रोने की। 1960 से 1990 तक के तथाकथित समाजवादी कैंप की राजनीति और विश्‍व सर्वहारा संघर्ष पर उसके प्रभाव का ठीक-ठीक आकलन ही भारत जैसे देशें में और उसमें हिंदी पट्टी और हिंदी पट्टी के साहित्‍य को वास्‍तव में जन का साहित्‍य बनाने की राह पर ले जाएगा। अन्‍यथा जनवाद और प्रगतिशीलता का जो अकादमिक अभिनय आप, आपकी पीढ़ी और आपके चेले करते रहे और इसी पतनशील व्‍यवस्‍था में जम कर मलाई खाते रहे, वह कई और पी‍ढ़‍ियों तक जारी रह सकता है।

दुनिया इतने पराभव इतनी असहायता की स्थिति में नहीं पहुंची है। साम्राज्‍यवाद आज अपनी सैन्‍य-शक्ति में, पूंजी के फैलाव में, अपने सांस्‍कृतिक प्रभुत्‍व में बेशक अतीत के किन्‍हीं भी युगों से बहुत मज़बूत है, पर याद रखें कि एक जगह वह बेहद कमज़ोर हुआ है, और आने वाले दशकों में और भी कमज़ोर होगा – वह है पूंजी के रह रह कर दोहराने वाले संकट की रिपेयरिंग में – अब ये संकट ग्‍लोबल होंगे, ज़्यादा मारक होंगे, और समाजों में उथल-पुथल ला देंगे। दो-तीन दशक बाद यह पूंजीवाद के वश का नहीं रह जाएगा कि वह किन्‍हीं कीन्‍स और किन्‍हीं अन्‍य अर्थशास्त्रियों के सिद्धांतों के बलबूते इन संकटों से निपट सके। दूसरी बात यह होने जा रही है कि अब ये संकट ज़्यादा आवर्त्तिता के साथ होंगे। आने वाली पूरी सदी में मार्क्‍स – जहां तक आर्थिक विश्‍लेषण की बात है क्‍लासिक ढंग से और कह लें कि पैगंबरी ढंग से सच प्रमाणित होने जा रहे हैं। लेकिन साम्राज्‍यवाद इन संकटों के आगे घुटने टेक देगा, इस खुशफहमी में न रहें, इन संकटों के निदान निरंतर युद्धों और विश्‍व-प्रभुत्‍व में ढूंढ़े जाएंगे। सभ्‍यता का संकट ठीक यहीं पर है। वह संकट यह है कि मार्क्‍स जहां इतिहास की हर करवट के साथ आर्थिक रूप से एक भविष्‍यवक्‍ता की तरह डेढ़ सौ साल बाद भी सही सिद्ध होते जाएंगे, वहीं इसके निदान की जो रूपरेखा उन्‍होंने प्रस्‍तुत की थी, वहां आप कह सकते हैं, वे ग़लत सिद्ध होंगे, और हुए हैं। यह स्‍वाभाविक भी है, क्‍योंकि निदान की जो रूपरेखा थी, वह उनके अपने युग के लिए थी। मार्क्‍स के समय में पूंजीवाद ने मानव-आबादी की चेतना और संस्‍कृति में इतनी फेरबदल नहीं की थी, पर आज इक्‍कीसवीं सदी में यह फेरबदल बहुत बड़े पैमाने पर हो चुकी है। श्रमिक वर्ग की पूरी संरचना में भी बड़े पैमाने पर फेरबदल कर दी गयी है। तो वास्‍तविक चुनौती इस युग के लिए जनता के पक्ष में प्रतिरोध के निर्णायक स्‍वरूपों का निर्माण है। इस कार्य की पहली मंज़‍िल संस्‍कृति और चेतना का प्रबोधन ही है, उस संस्‍कृति और चेतना का जिसे पूंजीवाद और साम्राज्‍यवाद ने पिछले दो-तीन दशकों में तो बहुत तेज़ी से भ्रष्‍ट और स्‍वप्‍नहीन बनाया है।

नामवर जी हम हिंदी के किसी साहित्यिक अखाड़े की भाषा में नहीं, इतिहास को जानने की इसी जन-नैतिकता के तकाज़े से आपको यह बताना चाहते हैं कि आपके इस तरह के विचार इस स्‍वप्‍नहीनता के पक्ष में जाते हैं – बजाय उसका प्रतिरोध बनने के। और आप पिछले डेढ़ दशक से निरंतर, ठीक यही काम कर रहे हैं – अपने तमाम व्‍याख्‍यानों आदि के जरिये। सोवियत संघ के टूटने के बाद भी हिंदी जगत का यह जीवंत सत्‍य है कि दिल्‍ली से लेकर आरा-पटना तक और राजेंद्र यादव से लेकर नवजात कविगण तक लोग आपकी कितनी भी भर्त्‍सना निजी या साहित्यिक कारणों या हताशाओं के चलते करते रहे हों, फिर भी आपके उवाच आज भी हिंदी की दुनिया में व्‍यापक रूप से प्रसारित होते हैं और उनका असर भी पड़ता है।

ठीक यही वजह है कि आपको यह बताना ज़रूरी लग रहा है कि सोवियत संघ के परजीवी समाजवाद और सपनों का ज़माना ख़त्‍म हुए युग बीत चुका है। उस तथाकथित समाजवाद और उस समाजवादी सपने की कमाई खाने वाली और उससे अपनी दुकानें चलाने वाली प्रतिभाओं के कुचक्रों ने हिंदी में वास्‍तविक मार्क्‍सवादी चेतना और स्‍वप्‍न को उठान ही नहीं लेने दी। यह राज्‍य समर्थित प्रतिरोध का बोदा साहित्‍य और विचारधारा थी, जो हिंदी में मठाधीशों द्वारा प्रत्‍यारोप‍ित की गयी थी। सोवियत संघ के तथाकथित समाजवादी कैंप द्वारा समर्थित भारत के मार्क्‍सवादी राजनीतिक दलों और भारत के बुर्जुआ राजसत्ता से उनके गठबंधन ने हिंदी साहित्‍य को क्षरित किया है। विभाजित व्‍यक्तित्‍व और विभाजित मूल्‍यों वाले समाजचेता रचनाकर्मियों ने हिंदी साहित्‍य का जो हाल किया, वह किस प्रमाण का मोहताज नहीं है। इसलिए हिंदी का बीसवीं सदी के उत्तरार्ध का साहित्‍य किसी बड़ी प्रतिभा को जन्‍म नहीं दे पाया। मार्क्‍सवादी सौंदर्यशास्‍त्र को अपनी चेतना का अंग बना पाने का संघर्ष इसीलिए मुक्तिबोध का अकेले का संघर्ष बन कर रह गया, न कि इसलिए कि मुक्तिबोध कोई बिरली प्रतिभा थे, जो अपने अवसान के साथ हिंदी साहित्‍य के मार्क्‍सवादी सौंदर्यशास्त्र की समस्‍त संभावनाएं और उसका समस्‍त भावी आत्‍मसंघर्ष भी लेते गये। स्‍वतंत्रता के बाद का और उसके आगे 1960 के बाद का तो अधिकांश हिंदी साहित्‍य व्‍यवस्‍था से पोषित लेखकों-आलोचकों का साहित्‍य रहा, न कि संघर्ष का साहित्‍य। यहां संघर्ष का स्‍थूल अर्थ न लें, वरना हिंदी लेखकों के पास मध्‍यवर्गीय जीवन और उसके लिए नौकरी के जुगाड़ वाले ‘गर्दिश के दिनों’ की एक से एक कहानियां चिनी हुई होंगी। यहां संघर्ष से आशय मार्क्‍सवादी सौंदर्यशास्‍त्र के लिये किये गये आत्‍मसंघर्ष और उसके जरिये व्‍यक्तित्‍व के रूपांतरण के लिए किये गये संघर्ष से है। नामवरजी जिस चीज़ का स्‍यापा कर रहे हैं, वह कुछ लोगों के लिए सुविधाजनक ज़रूर थी, पर वह किन्‍हीं मूल्‍यों, संघर्षों और वैचारिकता को सत्ता का गुलाम बनाने वाली थी। क्‍या आज सन 2008 में इस बात के दस्‍तावेजी और परिस्थितिजन्‍य प्रमाणों की आवश्‍यकता है कि समाजवादी कैंप ने हिंदी साहित्‍य को किस तरह बधिया और अवसरवादी बना दिया? ऐसे मिथ्‍या स्‍वप्‍नों के लिए बिसूरने वालों के लिए नागार्जुन की यह पंक्ति ही अलम है – ‘भूल जाओ पुराने सपने!’

आलोक श्रीवास्‍तव
ए – 4, ईडन रोज, वृंदावन कॉम्‍प्‍लेक्‍स
एवरशाइन सिटी
वसई रोड (पूर्व), ज़‍िला ठाणे
पिन 401208 (वाया – मुंबई)
फोन – 09320016684, 0250-2462469

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *