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दैनिक भास्‍कर ने ब्‍लैक में मांगे थे पांच लाख रुपये

5 July 2009 3 Comments

♦ हरमोहन धवन

harmohan dhawanअपने तीस साल के राजनीतिक जीवन में मैंने मीडिया का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था। मीडिया के प्रतिनिधि लोकसभा चुनावों के दौरान खुलकर प्रत्याशियों से पैसे मांग रहे थे। राजनीतिक दल मजबूर होकर पैसे देते रहे। दलों की छोड़िये निर्दलीय प्रत्याशी भी इनके शिकार हुए। पैसे मांगने के लिए उन्होंने बहुत ही संभ्रांत शब्द का इस्तेमाल किया- पैकेज।

प्रिंट मीडिया की इस पैकेज रणनीति का शिकार मैं खुद हुआ। मैं चंडीगढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहा था। इस क्षेत्र में चुनाव अंतिम चरण में यानी 13 मई को निर्धारित किया गया था। चुनाव तिथि की घोषणा और मतदान के बीच दो महीने से ज्यादा का फासला था। ऐसे में हर प्रत्याशी के सामने दो तरह की चुनौतियां आयी। एक यह कि इतने लंबे समय तक वे अपने प्रचार को कैसे बनाकर रखें और इस लंबी अवधि के कारण चुनावी खर्च बढ़ रहा था। यह सीधे सीधे उन प्रत्याशियों पर बोझ होता है जिनकी उम्मीदवारी चुनाव तिथि घोषित होने से पहले ही घोषित हो चुकी होती है।

अब तक मैं कई चुनाव लड़ चुका हूं लेकिन इससे पहले मीडिया घरानों की ओर से कभी पैसे की मांग नहीं की गयी। 1974 में जब मैंने पहला चुनाव लड़ा था तो उस समय शहर में सिर्फ दो अखबार इंडियन एक्सप्रेस और द ट्रिब्यून ही आते थे। 1989, 1991, 1996, 1997 और 2004 का चुनाव भी लड़ा लेकिन कभी मुझे पैकेज खरीदने जैसे आफर नहीं आये। ऐसा भी नहीं है कि मीडिया ने मेरे प्रचार को कभी कवरेज न दिया हो। 74 से 2004 तक मीडिया ने मेरे प्रचार को कवरेज दिया और मुझे कभी कोई शिकायत नहीं हुई। यह पहली बार था कि प्रिंट मीडिया के प्रतिनिधियों ने खुद आकर प्रस्ताव रखा और कहा कि मैं जितना पैसा उन्हें दूंगा उसी के हिसाब से वे हमारे प्रचार का कवरेज करेंगे। अगर पैकेज खरींदेगे तो एडिटोरियल लिखकर आपकी जीत पक्की की जाएगी। बाकी पैसे से रूटीन कवरेज करवाने का आश्वासन भी दिया गया।

लेकिन इस बार आमचुनाव में जो मीडिया घराने पैकेज का आफर कर रहे थे वे सब 2000 के आसपास चंडीगढ़ में आये हैं। ये अखबार हिन्दीभाषी क्षेत्रों से आये हैं। इधर आठ नौ सालों में इन अखबारों ने तेजी से चंडीगढ़ में अपना विस्तार किया है। उनके इस विस्तार के कारण पुराने अखबारों का एकाधिकार भी टूटा है। इन नये अखबारों में मुख्य रूप से हिन्दी के तीन अखबार शामिल हैं- दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और अमर उजाला। इन तीनों ने तो पैकेज की पत्रकारिता की ही, पंजाब केशरी भी पीछे नहीं रहा। लेकिन दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण इस बार आमचुनाव में पैकेज के नाम पर जिस तरह का गंध फैलाया उसने पत्रकारिता के इतिहास में एक बदनुमा दाग छोड़ दिया है।

मतदान में 20 दिन बचे थे। मैं अपने घर पर ही था। दैनिक जागरण के प्रतिनिधि मेरे पास आये। उन्होंने साफ तौर पर मुझसे कहा कि अगर चुनाव में कवरेज लेना है तो पैकेज लेना होगा। उनके पैकेज की रकम लाखों रूपये की थी। इसके बाद दैनिक भास्कर के प्रतिनिधि भी मेरे घर आये। उन्होंने भी लाखों रूपये के पैकेज आफर किया। मैंने उन्हें भी मना कर दिया। लेकिन इसके बाद मैंने अनुभव किया कि सामान्य प्रचार अभियान का कवरेज छोड़ भी दें तो बड़ी बड़ी रैलियों की भी कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही है। जिन दलों ने पैकेज खरीदे थे उन्हें जोरदार कवरेज मिल रहा था। जिनका पैकेज था उनके एक एक दिन में तीन-तीन चार-चाऱ फोटो भी छापे गये और खबरें भी लगाई गयी। मैंने उसी समय तय किया कि मैं इसके खिलाफ बोलूंगा।

28 अप्रैल 2009 को मायावती की रैली में मैंने चंडीगढ़ में सबके सामने इसका खुलासा किया। मैंने जनता के सामने कहा कि कुछ मीडिया हाउस मुझे ब्लैकमेल करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि इस दौरान मैंने अखबारों के नाम का खुलासा नहीं किया था पर मैंने यह जरूर कहा था कि समय आने पर मैं अखबारों के नाम का खुलासा जरूर करूंगा। लेकिन दिलचस्प यह है कि इस खुलासे के बाद भी मीडिया हाउसों को होश नहीं आया। इसके दो दिन बाद दैनिक भास्कर के जनरल मैनेजर मेरे घर आये। उन्होंने सफाई दी कि वे चाहते तो हैं कि बसपा को खूब चुनावी कवरेज मिले लेकिन वे प्रबंधन के आदेशों से बंधे हुए हैं। उन्होने फिर कहा कि जो दिन बचे हैं उसके लिए मैं उनसे पांच लाख का पैकेज खरीद लूं। ये सारे पैसे ब्लैक में लिये जा रहे थे। इसमें भी प्रत्याशियों की सुविधा का ध्यान रखा गया था। वे कहते थे कि ऐसा करने से प्रत्याशियों को यह पैसा अपने चुनावी खर्च में नहीं दिखाना पड़ेगा।

अखबारों के इस कमाऊ खेल के शिकार मैं अकेला नहीं बल्कि कई सारे उम्मीदवार हुए लेकिन यह भी दुर्भाग्य है कि कोई राजनीतिक दल खुलकर इस अनीति के खिलाफ कुछ बोल नहीं रहा है। अगर सभी उम्मीदवार एक साथ मिलकर अखबारों के इस पैकेज नीति के विरोध में स्टैण्ड लेते तो अच्छा रहता। (साभार: विस्‍फोट डॉट काम)

(हरमोहन धवन पूर्व केन्द्रीय मंत्री और बसपा नेता हैं)

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3 Comments »

  • suresh pandey said:

    यदि सांसद और विधायक विकास निधि का खेल खेलना बंद कर दें तो फिर पैकेज का खेल बंद करने का नैतिक दवाब बन सकता है. माना की अभी मीडिया में सब एक से नहीं हैं लेकिन सब की सोच एक जैसी है और वह है -की सभी नेता करप्ट हैं. जिन अखबारों का जिक्र किया गया है, उनमे एक ने हो सकता है की इस चुनाव में खुद को साधू साबित करने के लिए पैकेज का खेल नहीं खेला हो पर उत्तर प्रदेश में दो साल पहले हुए विधान्सह्भा चुनाव में लाखों का पैकेज उसका भी था. कहने का मतलब इतना ही है की यहाँ किसी की कमीज पूरी तरह साफ़ नहीं है. आप (श्री धवन) खुद ही देख रहे हो की एक लालजी टंडन के अलावा किसने और आवाज़ उठाई? दो चार नाम ही और होंगे. हाँ पत्रकारों में इस मुद्दे पर खूब तलवार भंज रही है. आपकी पार्टी की सरकार है, अपनी नेता से कहिये, इस मुद्दे पर देशब्यापी बहस शुरू कराने की पहल करें.

  • बाबू मोशाय said:

    भाईसाहब धवनजी,
    बिलकुल सही कहा, मीडिया दलाल हो रहा है। लेकिन एक सवाल मेरे दिमाग में भी है-
    आपकी जात के लोग लोकसभा में सवाल उठाने के पैसे लें, वोट देने के पैसे लें, पेट्रोल पंप दिलाने के पैसे लें, एडमिशन कराने के पैसे लें, सड़क बनवाने के पैसे में से कमीशन लें, लोगों की जान बख्शने के पैसे ले और जान लेने के पैसे लें।
    …..सूप बोले तो बोले, चलनी क्या बोले जिसमें बहत्तर छेद….

  • बाबू मोशाय said:

    आपकी बसपा, आपकी बहनजी, सुना है टिकट देने के दो करोड़ लेती हैं….ये लोकतंत्र है बहुजन हिताय

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