कपिल सिब्बल की बेज़ा बात, क़ुर्बान अली का करारा जवाब
♦ विनीत कुमार
शनिवार की शाम, पत्रकार स्व उदयन शर्मा की याद में हुए कार्यक्रम में कपिल सिब्बल की ओर से दिये गये बयान के बाद से पत्रकारों के बीच जबरदस्त बौखलाहट और मलाल है। क़ुर्बान अली के शब्दों में – आज हमारी हालत ये हो गयी है कपिल सिब्बल आता है और हमारे मुंह पर तमाचा मारते हुए ये कह कर निकल जाता है कि आप कुछ भी छापते रहिए हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, हम शर्मिंदा होने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते।
संगोष्ठी में केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और IBN7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष के वक्तव्यों के बाद जिस तरह का बवाल मचा, उसे देखते-पढ़ते हुए आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आज मीडिया को लेकर लोगों के बीच किस हद तक झल्लाहट है। आशुतोष को अपनी बात अधूरी छोड़ कर ही वापस बैठ जाना पड़ा। ये हालात तब सामने थे, जब दर्शक दीर्घा में तक़रीबन तमाम लोग मीडिया के ही थे। बहरहाल, सच्चाई ये है कि समाज के बीच तेजी से एक ऐसा वर्ग पनप रहा है जो मीडिया से जुड़े लोगों से हिसाब मांगने के मूड में है, आमने-सामने टकराने की तैयारी में है।
पिछले साल जब हमने तीन दिनों का एक मीडिया वर्कशॉप कराया और सबसे तेज़ कहे जानेवाले चैनल के पत्रकार को बुलाया, तो दिल्ली के अलग-अलग संस्थानों से आये बच्चों ने उनकी बात सुनने के बजाय एक-एक करके इतने सवाल दाग दिये कि वो सिर्फ सुनिए, सुनिए मेरी बात भी तो सुनिए ही कहते रहे। इसे एक हद तक की बदतमीजी भी कह सकते हैं और बच्चे जो कुछ भी पूछ रहे थे, उसे सवाल न कहकर आप भड़ास निकालना कह सकते हैं। अंत में बीच-बचाव करते हुए मुझे कहना पड़ा कि आपलोगों को इनके साथ इस तरह की बदतमीजी करने का अधिकार नहीं है, ये तो बस चैनल के लिए काम करते हैं, अगर आपको वाकई इन सवालों के जवाब चाहिए तो आप चैनल हेड से समय लीजिए और उनके सामने अपनी बात रखिए। लेकिन इन सब बातों के बावजूद पल्ला झाड़ते हुए खम ठोंक कर मीडिया को गरियाने के साथ ही आउटपुट के स्तर पर क्या निकलकर आता है?
वर्कशॉप ख़त्म होने के बाद कुछ टीचरों ने कहा भी कि इन बच्चों के सामने क्या टिकेंगे टीवीवाले? आज सही धोया इनको बच्चों ने। सच मानिए इस सीन को देखते हुए मेरे मन में बार-बार एक ही सवाल आया – तो फिर क्यों साल दो साल बाद ये बच्चे अपने मीडिया गुरुओं के बारे में कहते फिरते हैं – जिंदगी बर्बाद करते हैं भइया, मीडिया के नाम पर ऐसा पढ़ाया कि जिसकी इंडस्ट्री में कोई ज़रूरत ही नहीं है। सब फालतू और कोरे आदर्श से लदी-फदी बातें।
हर साल देशभर में करीब दो हजार भारतेंदु और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे लोगों की पत्रकारिता से प्रभावित होकर पत्रकारिता करने निकले बच्चे क्यों नहीं कुछ बदलाव कर पाते हैं। जाहिर है, संस्थान से बाहर आकर जिन परिस्थितियों और शर्तों पर उन्हें काम करना पड़ता है, वो मीडिया गुरुओं की बातों से मेल नहीं खाती। वो न तो व्यावहारिक ही हुआ करती है और न ही उनमें एप्रोच के स्तर पर समय के साथ-साथ बदलाव आने की गुंजाइश। नतीजा ये होता है कि संस्थान की पत्रकारिता और गुरुओं के पत्रकारिता-पाठ उसके लिए दो पाट बनते हैं, जिनके बीच की स्थितियों के बीच वो लगातार डूबता-उतरता रहता है। मीडिया कोर्स के दौरान गुरु किसी भी रूप में बाज़ार, आर्थिक नीतियां और दबाव और विज्ञापन जैसे शब्द को स्टूडेंट के आसपास फटकने ही नहीं देते। अगर आ भी जाए तो उसके लिए पहले से ही बाज़ारवाद, अपसंस्कृति और उपभोक्तावाद जैसे शब्द पहले से तैयार रखते हैं जो कि उनके हिसाब से पत्रकारिता के अंदर ज़हर घोलने का काम करते हैं।
दूसरी तरफ पुराने पत्रकार, जिन्होंने कि कभी बड़े घरानों से निकलनेवाले अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं के लिए कम पैसे में ही सही (उनके हिसाब से) लेकिन इत्मीनान की पत्रकारिता की है, सेमिनारों में उनका सारा ज़ोर सिर्फ इस बात पर होता है कि वो आज के पत्रकारों खासकर टेलीविजन पत्रकारों को फूहड़, ग़ैर-ज़िम्मेदार साबित करने में होता है।
अभी करीब पंद्रह दिन पहले एसपी सिंह की याद में हुई संगोष्ठी में बुजुर्ग पत्रकार उमेश जोशी ने कहा कि – “उन्हें आज के पत्रकारों को पत्रकार कहने में शर्म आती है। एक-एक पत्रकार पचास लाख और करोड़ रुपये की कोठी खरीद रहा है।” वो पानी पी-पीकर आज के पत्रकारों को गाली देते हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या इस तरह से गरियाने का आधार सिर्फ इसलिए बनता है कि आज का पत्रकार संपन्न हो रहा है। हमारे भीतर ऐसा कौन-सा माइंड सेट बन गया है कि हम पत्रकार और साहित्यकार को संपन्न होना बर्दाश्त नहीं कर पाते। दूसरी बात कि अगर बुजुर्ग पत्रकारों से मेनस्ट्रीम की पत्रकारिता का नेतृत्व छिनता चला जा रहा है, तो इसकी वजह उनका बुजुर्ग होना भर है या फिर बाज़ार की ताक़तों को नहीं समझ पाने की उनकी कमज़ोरी है? मीडिया संस्थान अगर ये समझ पा रहे हैं कि मीडिया को चलाने के लिए बाज़ा को शामिल करना निहायत ही ज़रूरी है और उसके मिज़ाज से यंग जेनरेशन के ही पत्रकार काम लायक हो सकते हैं तो फिर बुजुर्ग पत्रकारों को लेकर कोई क्यों रिस्क उठाए।
दरअसल आज की संगोष्ठी और इसके पहले की भी मीडिया संगोष्ठियों में टेलीविजन पत्रकारों को कोसने की जो रस्म अदायगी होती है, उसके पलटवार में जो टेलीविजन के पत्रकार उत्तेजित होते हैं, वो पुराने जेनरेशन और नए जेनरेशन के बीच की रस्साकशी है। वो पुराने जेनरेशन की ओर से मौजूदा जेनरेशन को नीचा और पतित दिखाने और मौजूदा जेनरेशन की ओर से पुराने पत्रकारों को वस्तुस्थिति की समझ न होने की तोहमत जड़ने का लीला कीर्तन है। ये अपने-अपने स्तर पर खुद को जस्टीफाई करने की कोशिश है। लेकिन इससे भी बड़ा सच है कि आज की पत्रकारिता अगर बाज़ार के हाथों बिक गयी है, सारे नये पत्रकार उसकी कठपुतलियां बन गये हैं तो ये भी किसी न किसी रूप में बुजुर्ग पत्रकारों की ही हार है। अपनी हठधर्मिता की वजह से पत्रकारिता औऱ बाज़ार के बीच एक संतुलित संबंध नहीं बनाने का नतीजा है। और फिर कौन जाने, ऐसी कोशिशें उन्होंने की भी हो और असफल हो जाने की स्थिति में बाकियों के साथ राग-मालकोश का रियाज़ करने में जुट गये हों।
बिकी हुई पत्रकारिता के बीच क्या बुजुर्ग पत्रकार कोई ऐसी मिसाल हमारे सामने रखते हों, जिससे कि भारतेंदु युग की पत्रकारिता की ट्रेनिंग लेकर निकला यूथ सीधे उनसे जुड़े। सिर्फ संपादकीय पन्नों पर लिखते रहने से बदलाव की गुंजाइश नहीं बन पाती। किसी न किसी ज़माने में रिस्क लेकर पत्रकारिता की लेकिन वर्तमान में प्रासंगिक बने रहने के लिए उन्हें नए-नए मिसाल बनाते रहने की ज़रूरत होती है। आज ज़रूरत इस बात की है कि बुजुर्ग पत्रकारों की ओर से वो सारे मंच तैयार किये जाएं जो बाज़ार की कठपुतली हुए बगैर पत्रकारिता कर सकें। तब देखिए कितने नये पत्रकार उनके साथ-साथ खड़े हो जाते हैं।
अब बात रही कपिल सिब्बल के बयान और उस पर कुर्बान अली के बेचैन होने की तो मैं नहीं जानता कि कपिल सिब्बल ने इतना ग़ैरज़िम्मेदाराना बयान क्यों दिया? लेकिन दावे के साथ कह सकता हूं कि चाहे कपिल सिब्बल हों या फिर देश के कोई भी दूसरे नेता, उन्हें हमारे लिखे एक-एक शब्द का, बोली गयी एक-एक बात का फर्क पड़ता है। नहीं तो मामूली अख़बारों और पत्रिकाओं जिसे कि आम बोलचाल की भाषा में अंडू-झंडू कहते हैं, उनके लोग उनकी कतरनें नहीं जुटाते फिरते। लाख कह लीजिए कि बाजार के हाथों मीडिया बिक चुकी है लेकिन लोग उसकी ताकत को अब भी समझते हैं। कपिल सिब्बल अभी हौसले में हैं, कुछ भी बोल सकते हैं लेकिन आप और हम सच को समझते हैं। इसलिए कुर्बान अली जिस अंदाज में इस पर रिएक्ट कर रहे हैं उससे साफ जाहिर होता है कि वो नए जेनरेशन के पत्रकारों पर आरोप लगा रहे हैं कि आपने हमारा नाम डुबा दिया। उन्हें चाहिए कि कपिल सिब्बल की बात पर स्यापा करने के बजाय उनकी पॉलिटिक्स को समझें, ऐसा कहकर पत्रकारों का मनोबल तोड़ने का जो काम उन्होंने किया है, उसे मजबूत करें।
(लेखक मशहूर हिंदी ब्लॉगर और युवा मीडिया विश्लेषक हैं)









कपिल सिब्बल जैसे लोग ऐसी बात तो करेंगे ही जब पुराने पत्रकार और यार टाईप के लोग उनके सामने हाथ जोड़े रिरियाएंगे-ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। रही बात कोठी और फ्लैट खरीदने की तो ये कोई ऐसा मामला नहीं जो किसी खास पीढ़ी के पत्रकारों की दिलचस्पी का विषय हो। जिसको जहां और जैसे मौका मिला उसने वहां कोठी लेने में आलस नहीं दिखाया। टीवी पत्रकार बाजार के दवाब में हैं, उन्हे हर मौके पर जलील करने का बहाना ढ़ूढ़ना मानसिक रुग्णता से कम नहीं। रही बात हमारे बुजुर्गों पत्रकारों की तो वो स्वर्णयुग तो इस जम्बूद्वीप में कभी नहीं आया था जिसकी मिसाले दी जाती है। अगर ऐसा होता तो पार्टियों के मुखपत्र बनकर अखबार न पैदा होते। माना कि पूंजी लाला का था, लेकिन एक सीमा तक प्रतिरोध करने की कमी तो कई पुराने लोगों ने भी दिखाई थी। तो फिर युवाओं को ही क्यों दोष दें। कितने बुजुर्ग पत्रकार हैं जो इस उम्र में भी अलग-२ आन्दोलनों से जुड़े हैं? मुझे लगता है इनकी तादाद उंगलियों पर गिनने लायक है। सबके बाल बच्चे सेटल हो गए और वे आराम से जिंदगी गुजार रहे हैं। कितने लोगों ने पर्यावरण, समाज, भष्टाचार, और दलित-आदिवासियों के मुद्दे पर आन्दोलन में शिरकत की है। मुझे लगता है कि अगर शोध किया जाए कि साठोत्तरी पत्रकार इसमे कितने हैं तो डराबने सच सामने आएंगे। तो बेहतर है कि हम एक दूसरे पर कीचड़ न उछाले और कमियों को दूर करने का प्रयास करें।
कपिल सिब्बल ने गलत क्या कहा ? इतनी हाय-तोबा क्यूं? हो सकता है कभी पॉलिटिकल लीडर्स के लिए मीडिया इम्पोर्टेंट चीज रहा हों, आज बिल्कुल भी ऐसा नहीं है. आप को राजनीति की जरुरत किसे है. नहीं तो खबरें क्या लिखोगे? मुझे तो डर लग रहा है की आने वाले दिनों में मीडिया वाले पिटने ना लगें. नेताओं के साथ चेअर्स करोगे और नेतिकता की बात करोगे, दोनों नहीं चल सकता है भाई.आज फैशन से जुड़े इवेंट में चार दर्जन पत्रकार पहुँच जाते हैं, लेकिन सूखे की रिपोर्ट के लिए कोई गावों की तरफ नहीं जाता. यदि जाता भी है तो तफरीह के इरादे से. जब खुद आप के पास गिनाने के लिए कुछ नहीं है तो आप को इतराने का क्या हक़ है? किस बात पर आप इतराते हैं? जो बिसनेस के लिए आगे आता है, उसे कुछ निवेश करना पड़ता हैं. जाहिर है वह मुनाफा भी कमाना चाहेगा. बाजार से आये व्यकिति के लिए बाजार तो टॉप प्रायरिटी रहेगा ही, उसे यह समझाना पड़ेगा की जब तक आस पास खुशहाली नहीं आती बाजार खुशहाल नहीं होगा. पर हर महीने लाख-दो लाख से अधिक की सलेरी पाने वालों के पास इतना सब सोचने की फुर्सत कहाँ है? नेताओं- बयूरोक्रेटेस की सिफारिश के साथ-साथ सुरा -सुन्दरी के सहारे संपादक की कुर्सी पाने वालों से और क्या उम्मीद करेंगे? (माफ़ कीजियेगा सभी संपादक ऐसे नहीं नहीं हैं, लेकिन ६० से ७० परसेंट इसी कैटेगिरी में हैं) हिंदी मीडिया का हाल तो सबसे बुरा हैं. यहाँ प्रतिभा बेमानी है, चापलूसी का बोलबाला है. इसलिए नाहक सनसनी फैलाई जाती है. चाहे ख़बरों के जरिये से हो चाहे लेख के जरिये से. ब्लॉग जैसे माध्यम भी इससे अछूते नहीं हैं. जो बात उन्हें नागवार गुजरती है, उसके लिए कोई जगह उनके पास नहीं रहती है. यही वजह है की कपिल सिब्बल जैसे नेता मीडिया को उसका चेहरा दिखा जाते हैं नहीं तो वह ऐसा बोलने से पहले सौ बार सोचते. खैर मैं निजी तौरः पर भाई कुर्बान अली का शुक्रिया अदा करता हूँ. उन्होंने गलत को गलत कहने की कोशिश की, पर इसका खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड सकता है.
कल मै एक पोस्ट डालता हु देखिय्गा
।देश के शहीदो का कथा लिख देना ।
अजादी का नया इतिहास लिख देना ।
इसको लिखना या ना लिखना मेरे दोस्तो ।
पर मेरे मरने पर मेरे कफन पर पन्द्रह अगस्त लिख देना ।
piyoosh kumar kundan
university of hyderabad gachi bowli
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