फ़ासीवाद की सुरंग में मृत भाई से मुलाक़ात

♦ उदय प्रकाश

जब फ़ांसी की सज़ा से बचने के लिए गैलेलिओ ने चर्च से क्षमा मांग ली तो उसके एक अनुयायी ने गुस्से और निराशा में टिप्पणी की: ‘कितना अभागा होता है वह समाज, जिसका कोई नायक नहीं होता।’

महान वैग्यानिक गैलेलियो का उत्तर था :’ लेकिन उससे अभागा होता है वह समाज, जिसे नायक की ज़रूरत होती है।’

स्मृतिशेष : कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह

DSCN2777कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह मेरे भाई थे। मेरी तीसरी फुआ के बेटे। मेरे पिता उनके मामा थे। मां के पक्ष से उनकी और पिता के पक्ष से मेरी शिराओं में बहने-दौड़ने वाला रक्त एक ही था। निकट और सगे संबंधों को प्रगट करने के लिए मुहावरों में जैसा कहा जाता है : `रक्त-संबंधी´, तो मेरे और उनके बीच वही रिश्ता था।

जब फुआ का विवाह इलाहाबाद के निकट हंडिया तहसील के नौलखा घराने में हुआ था, उस समय तक जमींदारी प्रथा कायम थी। राजस्व कर की बसूली और बहुत से अन्य कानूनी अधिकार सामंतों को परंपराओं से प्राप्त थे। कहा जाता है कि शाहीपुर गांव के उस सामंत घराने का नाम `नौलखा´ इसलिए पड़ा था कि वहां के राजस्व की वार्षिक उगाही नौ लाख रुपये थी। स्वतंत्रता के पहले नौ लाख की राशि आज करोड़ों में होगी। कहने का अर्थ यही कि कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह एक संपन्न और अधिकार संपन्न सामंत परिवार के सबसे बड़े बेटे थे। मेरे पिता जी तत्कालीन विंध्यप्रदेश के जिस सामंत घराने से संबंधित थे, वह सारंगगढ़ के नाम से जाना जाता था। सारंगगढ़ और नौलखा के बीच का यह वैवाहिक संबंध, उस दौर में एक विशेष सामाजिक महत्व रखता था। नौलखा की प्रतिषठा इस बात को लेकर भी थी कि उस दौर की विख्यात अभिनेत्री नरगिस की मां और सुप्रसिद्ध नृत्यांगना जिद्दन बाई को संरक्षण इस सामंत घराने से भी प्राप्त था। `मदर इंडिया´ में जब नरगिस को अखिल भारतीय लोकप्रियता हासिल हुई तो इस परिवार के लोग गर्व से कहते थे कि देखो जिद्दन बाई की बेटी नौलखा का नाम किस तरह से रौशन कर रही है। अब आज के समय में पता नहीं संजय दत्त और प्रिया दत्त पूर्वजों के इन संबंधों के बारे में कुछ जानते भी हैं या नहीं।

लेकिन ये तो बहुत सुदूर अतीत की बातें हैं। जैसा सब जानते हैं, आज़ादी मिलने के बाद, 1952 के प्रथम संसदीय चुनावों में नेहरू और सरदार पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस की जीत के तत्काल बाद, 1953 में जमींदारी उन्मूलन विधेयक पारित हुआ और जमींदारों के सारे अधिकार छिन गये। इसके बाद नौलखा और सारंगगढ़ ही नहीं, उत्तर-मध्य भारत के प्रतिष्ठित और संपन्न सामंत घरानों के निरंतर बढ़ते पराभव और विपन्नता के दिन शुरू हुए। राजस्व की वसूली से लेकर आय के दूसरे साधन जमीदारों के हाथ से निकल कर सरकार के हाथ में आ गये। उन दिनों की जो प्रचलित लोकोक्ति थी -`उत्तम खेती, मध्यम बान। अधम चाकरी भीख निदान।´ उसका अर्थ-विपर्यय हो गया। खेती के लिए जितना श्रम और श्रमिक चाहिए, उसका अभाव होने पर जिस चाकरी को `अधम´ मान लिया गया था, अब उसके अलावा कोई दूसरा आसरा नहीं बचा। इन परिवारों में पहली बार आजीविका का साधन बन सकने वाली पढ़ाई-लिखाई का महत्व समझ में आया। कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह हमारे पारिवारिक संबंधियों में दूसरे भाई थे, जिन्होंने उत्तर-स्नातक की विश्वविद्यालयीन शिक्षा हासिल की और बाद में गोरखपुर के महंत दिग्विजय नाथ डिग्री कॉलेज में अध्यापन से लेकर महाविद्यालय के प्राचार्य तक की सेवा करते हुए अपने परिवार का भरण-पोषण किया। उनसे पहले मेरी बड़ी फुआ, जिनका विवाह बिहार के प्रसिद्ध गिद्धौर सामंत परिवार में हुआ था, के बेटे कुंवर सुरेश सिंह उच्च शिक्षा के बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा के तहत पहले जिला न्यायाधीश और बाद में एंथ्रोपोलाजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के महानिदेशक (डायरेक्टर जनरल) बने। उन्होंने मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) में अंतरराष्ट्रीय ख्याति हासिल की और संथाल विद्रोही बिरसा मुंडा के जीवन और उलगुलान आंदोलन से जुड़े तथ्यों को पहली बार खोज कर अपनी ऐतिहासिक पुस्तक लिखी। कुंवर सुरेश सिंह (उनके बारे में सरसरी तौर पर जानने के लिए नाम पर क्लिक करें) को पृथक झारखण्ड की अस्मिता की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। (जिन पाठकों ने ‘पीली छतरी वाली लड़की’ पढ़ी है, वे ‘किन्नू दा’ को याद करें, जो ‘राहुल’ के फुफेरे भाई थे, और जिन्होंने ‘राहुल’ के पूरे जीवन की दिशा बदल डाली थी।)

इस कड़ी में, आप कह सकते हैं कि तीसरा भाई मैं था, जिसने पढ़-लिख कर पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, फिर मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग और फिर टाइम्स ऑफ इंडिया की नौकरी की। आज जब मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं तो विधि की विडंबना ही है कि पहले दोनों भाई, पिछले दो वर्षों में, इस संसार से विदा ले चुके हैं। यह सचमुच शोक-संसिक्त स्मृति के दुखदायी पल हैं।

bhaabhee and me with shaashvatकुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह बचपन से ही मेरे परिवार से जुड़े हुए थे और हमारे घर लगातार उनका आना-जाना बना रहता था। इसके दो कारण मेरी समझ में आते हैं। पहला तो यह कि मेरे पिताजी यानी उनके मामा का साहित्य से अनुराग और दूसरा मेरी मां, यानी उनकी मामी, जो हंडिया से कुछ ही दूर आगे, मिर्जा़पुर ज़िले के विजयपुर घराने से संबंधित थीं। यानी उनकी बानी-बोली, खान-पान आदि के मामलों में समानता थी। कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह का घर का नाम `लाल बहादुर´ था। हम भाइयों में वह सबसे बड़े थे, इसलिए हम उन्हें `लालबहादुर दादा´ कहा करते थे। बार-बार बोलने में यह संबोधन कुछ बड़ा और कठिन लगता था, इसलिए `मुख-सुखार्थम्´, हम उन्हें आदर और प्यार से `लाबूदा´ कहने लगे। महंत दििग्वजयनाथ डिग्री कॉलेज के आचार्य और प्राचार्य हमारे लिए कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह नहीं, `लाबूदा´ ही थे।
बचपन से ही उनकी मेधा, स्मृतिप्रज्ञता और अध्यवसाय का लोहा हर कोई मानता था। उनकी स्मृति अत्यंत प्रखर थी। वैदिक ऋचाओं से लेकर संस्कृत महाकाव्यों और पुराणों के ‘लोक उन्हें कंठस्थ थे। `कुमार संभव´ और `मालविकाग्निमित्रम्´ के प्रसंग वे हमें बचपन में सुनाते थे। आवाज़ में पौरुषत्व का उदात्त प्रभाव था। शंकराचार्य द्वारा विरचित रावण की शिव-स्तुति को जब वे अपनी ओजपूर्ण वाणी में गाते तो उसकी ध्वन्यात्मकता सारे वातावरण को अभिभूत कर लेती। लगता जैसे सचमुच कहीं शिव का डमरू बज रहा है और उनके महाताण्डव के पगताल की अनुगूंज से सारा वातावरण भर उठा है :

……`डमडडमडडडमडडमडडडिन्ननादवड्डमरवयं…..चकार चण्डताण्डवम् तनोतु न: शिव: शिवम्!!´

एक बार उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में संस्कृत नाटक `स्वप्न वासवदत्ता´ में नायक की भूमिका निभाई थी। हमें वे उस अभिनय का रोचक किस्सा सुनाते कि संवाद भूल जाने पर कैसे उन्होंने प्रत्युत्पन्नमति से संस्कृत में दूसरा संवाद रच लिया और इस बात को दर्शक तो ठीक, संस्कृत के प्राध्यापक तक नहीं लख पाये। संस्कृत भाषा में उनकी विदग्धता अद्भुत थी। उन्होंने कालिदास के `मेघदूतम्´ का बोलचाल वाली अवधी में अनुवाद भी प्रारंभ किया था, लेकिन बाद में भोजपुरी में एक दूसरा अनुवाद देख कर उन्होंने अपना विचार बदल दिया। उनका कहना था कि `मेघदूतम्´ का जो लालित्य कालिदास की मौलिक भाषा में है, उसका अनुवाद अन्य भाषा में हो ही नहीं सकता। किसी दूसरी भाषा में `मेघदूतम´ के अनुवाद के लिए सिर्फ भाषा का ज्ञान ही नहीं, कालिदास जैसी काव्य-प्रतिभा भी चाहिए।

एक बार हमारे एक चचेरे भाई के विवाह में जब बारातियों का कौटुंबिक पुरोहित समय पर नहीं पहुंचा और विवाह का शुभ-मुहूर्त निकला जा रहा था तो सबने एक छल किया और कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह ने भेष बदल कर पंडित की भूमिका निभानी शुरू कर दी। धोती, उत्तरीय, ललाट पर वैष्णव तिलक-चंदन, गले में तुलसी की माला। कद-काठी में वे ऊंचे पूरे थे। लंबी और ऊंची नाक, प्रशस्त ललाट। छह फुटा शरीर। अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितना प्रभावशाली उनका यह वेश रहर होगा। मंडप में, विवाह वेदी में, जब घरातियों के पंडित ने पुरोहित-संवाद के अंतर्गत उनसे उनकी जाति-कुल-गोत्र आदि के बारे में पूछा तो उसका उत्तर उन्होंने जिस द्वि-अर्थी श्लेष में दिया, उसे सुन सुनकर लोग हंसी के मारे लोट-पोट होते रहे। उन्होंने घरातियों के पंडित के उच्चारण दोष और अन्य गलतियां निकाल कर उसे इतना लज्जित किया कि उसने उनके हाथ जोड़ लिए। बाद में बारातियों के ज्यौनार में जब उन्हें घरातियों ने वर पक्ष के साथ अगली पंक्ति में साफा-पगड़ी बांधे हुए क्षत्रिय वेश में देखा तो उन्हें अचरज हुआ। कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा : `बंधुवर, वह हमारा आपद्धर्म था। जैसे विष्णु को वामन अवतार लेना पड़ा था, वैसे ही हमने भी संकट देख कर बारातियों के पुरोहित का अवतार लिया। द्विज तो ब्राह्मण भी होते हैं और हम भी हैं। खैर अब खड़े-खड़े हमारा मुंह मत निहारो, जो माल-टाल और व्यंजन पका रखा है, हमारी थाली में परोसो। हां इतना ध्यान रखना कि हम सामिष नहीं, निरामिष बंम्हन भोजन ही लेते हैं!´

वे मुझसे लगभग बारह वर्ष बड़े थे। लेकिन आयु की यह दूरी हमारे संवाद-प्रतिवाद और कहा-सुनी के बीच कभी आड़े नहीं आती थी। हमारे बीच बहुत सी बहसें हुआ करती थीं। कविताएं वे भी लिखते थे और मैं भी। उन दिनों ज्ञानोदय, कल्पना, ज्योत्सना, धर्मयुग, अवंतिका, कल्याण जैसी बहुत-सी पत्रिकाएं हमारे घर पर, पिताजी की वजह से आती थीं। हमारे प्यारे लाबूदा ने बहुत सुव्यवस्थित तरीके से उन पत्र-पत्रिकाओं की अलग-अलग खंडो में ज़िल्दसाज़ी करवाई और उन्हें संरक्षित किया। सामुद्रिक शास्त्र, अमरकोष, वृहदारण्यक, सृश्रुत और चरक संहिता, करिकल्पलता, रविपुराण, आठों उपनिषदों और रामायण-महाभारत आदि ग्रंथों का महत्व वह मेरे भाई-बहनों और घर में काम करने वाले नौकरों को बताते जिससे उनकी देख-रेख हो सके। आज जब मैं अपने गांव अपने घर जाता हूं तो यह देख कर बहुत दुख होता है कि वहां एक भी ग्रंथ नहीं बचे। सब नष्ट हो गये। हमारी परवर्ती पीढ़ी की संस्कारहीनता के चलते ऐसा हुआ। अब वहां कार, स्कूटर, फ़्रिज, टीवी, मोबाइल-डीवीडी जैसी आज की चालू सभी उपभोक्ता चीज़ें हैं, लेकिन ग्रंथ और पुस्तकों को रद्दी की तरह बरत लिया गया। लगता है यह समूचे देश के घर-घर की कथा है। पश्चिम से आने वाली इस आंधी ने भले ही हमारे घर को आधुनिक उपभोक्ता चीज़ों से पाट दिया हो, लेकिन सांस्कृतिक स्तर पर इसने हमें दरिद्र और कंगाल बना डाला है।

1953 में जब सरदार पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने जमींदारी उन्मूलन किया और सामंत घरानों के आय के स्रोत छिन गये तो उन दिनों उत्तर-मध्य भारत के अधिकांश जमींदार कांग्रेस विरोधी हो गये। कुछ समाजवादी हुए, कुछ चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी में सम्मिलित हुए, कुछ कम्युनिष्ट तो कुछ विश्व हिंदू परिषद और तत्कालीन जनसंघ में। नौलखा का इलाका फूलपुर संसदीय क्षेत्र में आता था। यहां नेहरू परिवार की चुनावी टक्कर आचार्य करपात्रीजी और श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के साथ होती थी। नौलखा परिवार करपात्रीजी और प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का सकृय समर्थक था। दूसरी तरफ मेरे पिताजी पर महात्मा गांधी और समाजवाद का असर था। नेहरू की लोकप्रियता अपने शिखर पर थी। मैं दिन-रात `चाचा नेहरू´ के चित्र और उनकी शिल्पाकृतियां बनाता रहता था। मुझे याद है कि जब 1962 में चीन ने हमला किया और भारतीय सेना पीछे हटने लगी और फलस्वरूप प्रधानमंत्री नेहरू के व्यक्तित्व का प्रभामंडल क्षीण होने लगा, तब मेरे और लाबूदा के बीच खूब बहसें होती थीं। वे नेहरू की नीतियों की कठोर आलोचना करते जब कि 10-11 साल की मेरी उम्र सिर्फ भावनात्मकता को ही समझ सकती थी। मैं नेहरू जी की आलोचना बिल्कुल सुन नहीं सकता था। बस, मुझे चिढ़ाने के लिए वे जान बूझ कर नेहरू प्रसंग छेड़ते और हमारी गर्मी की छुटि्टयों की रातें हमारे बीच की नोंक-झोंक और रूठने-मनाने में खूब मज़े में गुज़रतीं।

एक घटना आज और याद आती है। यह संभवत: 1967 के आसपास की बात है। कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह ने मध्यप्रदेश प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी और लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये। साक्षात्कार के लिए वे पिताजी के साथ मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल गये। उन दिनों हमारे एक निकट संबंधी श्री कृष्णपाल सिंह राज्य के कानून एवं जेल मंत्री थे। कृष्णपाल सिंह जी स्वतंत्रता सेनानी भी थे और आचार्य नरेंद्र देव तथा डॉ. राममनोहर लोहिया के अनुयायी हुआ करते थे। 1967 में ही उन्होंने संविद के समय पहली बार मंत्रिपद पाया था। कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह का साक्षात्कार अच्छा रहा और स्वतंत्रता सेनानी का कोटा तो उन्हें मिलना ही था। जिस रात वे भोपाल से लौट कर आये उस रात वे कुछ दुविधा और असमंजस में थे। लगता है प्रशासनिक सेवा में जाने से उनका मन हिचक रहा था। वे अकादेमिक कार्य और समाज सेवा करना चाहते थे। उन्होंने अपनी नोटबुक में एक कविता लिखी, जिसकी कुछ पंक्तियां मुझे अभी तक याद हैं :

`मुझसे डिप्टीगिरी नहीं होगी। अपना खपरैल ही कहां कम है, माना बारादरी नहीं होगी।´
उन्होंने डिप्टी कलेक्टर बनने से अपनी गर्दन बचाई और महंत दििग्वजयनाथ महाविद्यालय में संस्कृत के प्राध्यापक बने तो जीवन उसी में गुज़ार दिया। सत्ता और धन का लोभ उनके आदर्शवादी और धर्मपरायण नैतिक व्यक्तित्व के आसपास भी नहीं फटक सकता था। उनमें धैर्य और आत्मसंयम के साथ-साथ सामाजिक मर्यादाओं के प्रति प्रतिबद्धता भी भरपूर थी। भोपाल से इसी वापसी के दो-चार दिनों बाद ही हमारे घर में एक रात चोरी हुई, जिसमें एक रेडियो, दो बंदूकों के अलावा कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह का सूटकेस भी चोर ले गये। उस सूटकेस में उनके कपड़े आदि ही नहीं, सारी डिग्रियों, मार्कशीट, प्रमाणपत्रों आदि की मूल प्रतियां थीं। उनकी कविता-शायरी की नोटबुक भी उसी में थी। बहुत खोज के बाद, नदी के पार के जंगल में उनके कुछ कागज़ात और कविताओं के फटे-चिथड़े टुकड़े मिले। यह एक बडा हादसा था। उन्हें अलग अलग स्कूलों से लेकर महाविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों से उन दस्तावेज़ों की प्रतितिलपि निकलवाने में निश्चय ही लंबा समय लगा होगा।

1963 में मेरी मां की तबियत खराब रहने लगी। उनका प्रारंभिक इलाज़ इलाहाबाद में ही चला। लाबूदा उन दिनों लगातार हमारे साथ ही रहते थे। राजेंद्र नगर, बलुआघाट में वे रहा करते थे। उनके साथ बीते त्रिवेणी और प्रयाग के दिन अब हमेशा के लिए स्मृति का हिस्सा हैं। गंगा की रेत पर बैठ कर उनकी कविताओं के पाठ के स्वर अभी भी गूंजने लगते हैं :

`सुधियों का ढेर-ढेर उमड़ घुमड़ आता है, सावन का भीतर से जाने क्या नाता है।
मेरा तो पोर-पोर भीग चुका रिमझिम में, तुम्हारे गांव क्या बादल ही नहीं जाता है।।´

मेरे माता-पिता को वे अपने माता-पिता जैसा ही मानते थे। 1964 में मेरी मां की मृत्यु हुई और उसके बाद जब पिता जी बीमार पड़े तो उनको लेकर इंदौर जाने वाले कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह ही थे। उन्होंने जान लिया था कि पिताजी भी अब ज़्यादा दिन जीवित नहीं रहेंगे इसलिए उन्होंने मेरी एक बहन शशिप्रभा का विवाह तय करवाया और पिताजी के जीवित रहते ही विवाह संपन्न करने में भी उनकी प्रमुख भूमिका रही। 1970 में पिताजी भी चल बसे। उन्हें भी मां की तरह ही कैंसर था। हमारे परिवार पर यह एक बड़ा आघात था। मैं उस समय बहुत छोटा था। कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह भी इससे बहुत विचलित थे। उन्होंने महामाया की स्तुति में जो छंदोबद्ध रचना की, उसमें उन्होंने लिखा :

`वही हैं मेरे माता-पिता, हो रहे उन्हें गये कुछ साल।
नाम सुनते ही मेरा बोल पड़ेंगे, पूछेंगे सब हाल।।
यही कह देना उनसे देवि, पूछ लेना फिर मेरा हाल।
वही परिचय देंगे भरपूर, उन्हीं का पालित-लालित लाल।।
अकेला पाता हूं मैं बहुत, आज खुद को विचलित निरुपाय।
बिना उनके कह देना देवि, लग रहा जीवन ही अन्याय।।´

आज जब वे नहीं हैं, उनकी स्मृतियां और सघन हो उठी हैं। मैं जब मार्क्सवाद के संपर्क में आया और आंदोलनों में हिस्सा लेने लगा, तब उनसे कई बार बहुत लंबी बहसें हुईं। लेकिन हमारे भीतर आत्मीयता और रागात्मकता के जो ताने-बाने थे, वे कभी टूटे नहीं। बीच के कई दशक ऐसे गुज़रे जब उनसे मिलना नहीं हो सका। लेकिन पिछले चार-पांच वर्षों से उनसे फिर से मिलना प्रारंभ हुआ। हम सोच रहे थे कि अब जब हमारी संतानें अपने-अपने पैरों पर खड़ी हो गईं हैं तो जीवन की संध्याकाल के कुछ पल हम फिर अपने बचपन और अतीत को जिएंगे। एक बार फिर वही कविता, शेरो-शायरी और वैचारिक बहसों की हम दोनों भाइयों के बीच बैठकी फिर जमेगी, लेकिन वे अचानक ही चले गये।

उनका लिखा एक शेर बार-बार दिमाग़ में कौंधता है :

`मर चुका है ‘शबाब´ गुल कर दो, फातिहा-ओ-दुरूर कुल कर दो।
ज़िंदगी ढूंढ़ न ले फिर मुझको, यारो सारे चराग़ गुल कर दो।।´

सचमुच उनके जाने के साथ ही हमारे घर का एक पवित्र आलोक और ऊर्जा से भरा चिराग बुझ गया है। लेकिन इस अंधेरे में उनकी स्मृतियां और साफ दिखने लगी हैं।

(वायदे के मुताबिक ‘इससे बेहतर शबाब क्या होगा’ की भूमिका यहां पोस्ट कर रहा हूं। यह बहुत ज़ल्दबाज़ी में स्मृतियों के आधार पर लिखा गया एक बेहद निजी लेकिन औपचारिक संस्मरण था। इसे सार्वजनिक करते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा है, फिर भी….शायद ‘लोकतंत्र’ का तकाजा यही है..।)

4 COMMENTS:
स्वप्नदर्शी said…

Aap isee tarah apane rachnaakarm me lae rahe bina vichlit huye, yahee kaamana hai.

July 13, 2009 12:04 PM

Vidhu said…

आ उदय जी ,वे आपसे दूर गये ही नही …आपकी स्मृति के /प्रेम के/श्रधा के आलोक मैं वे हमेशा ही जीवित रहेंगे ..इस दुनिया के तमाम ताम-झाम के बावजूद …क्योंकि ये तो निश्चित है की कुछ दुखों -सुखों और स्मृतियों का महत्व अलौकिक होता है …जिन्दगी मैं उनके ना रहने पर वो ज्यादा ठीक समझ आता है ..उनकी कर्मठता -सरलता और आपकी श्रद्धा के साथ मेरा भी प्रणाम …जैसा की आपने इस लेख मैं उल्लेख किया है …

July 13, 2009 1:24 PM

अजित वडनेरकर said…

बहुत तरल-विरल संस्मरण। लाबूदा के साथ जिये लम्हों को आपने इन यादों के जरिये हमसे साझा किया इसका शुक्रिया। इस क्रम को बनाए रखें।

सब कुछ सहज, सरल और पूर्ववत…

July 13, 2009 3:49 PM

Sushila Puri said…

आपने सच कहा -लोकतंत्र का तकाज़ा यही है …….जिस भी मनःस्थिति में आपने अपने बड़े भाई ‘लाबुदा ‘ को याद किया पर वह सारे विवादों से परे बिलकुल संवेदनाओं में भीगा हुआ एक अकाट्य सत्य है ……………….
”अली को हक ने उतारा तो एन काबे में ,
खुली जो आँख तो पहले खुदा का घर देखा .’

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