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कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे नीमकश को

14 July 2009 No Comment

upमैं कबाड़खाना पर उदय प्रकाश को लेकर आखिरी पोस्ट लिख रहा हूँ। दो मुद्दे स्पष्ट रूप से मेरे सामने हैं। जिन पर लिखना बहुत जरूरी लगा।

1- क्या यह उदय प्रकाश के खिलाफ साजिश थी ?

2-क्या यह किसी के कातर दुख के वशीभूत हो किए कर्म पर हमला था ?

मेरे लिए इन दोनों प्रश्नों के उत्तर “नहीं” है। उदय प्रकाश के लिए “हाँ” है।

उदय प्रकाश अपने लेखों से ऐसा जाहिर करने की कोशिश कर रहे हैं कि कुछ लोगों ने उनके निहायत पीड़ा भरे क्षणों में उन पर सुनियोजित आक्रमण किया !

जहाँ तक मेरी जानकारी है यह बात सरासर गलत है और कोरी लफ्फाजी है। मेरे पास उदय जी जैसे सूत्रों का अभाव है इसलिए मेरी जानकारी की अपनी सीमा है। जिस बात पर मेरा पूरा दावा है वो ये है कि मुझे कोई रेगुलेट नहीं कर रहा था। उदय जी ने गर अपने कुछ सूत्र जामिया में छोड़े हैं तो वो उनके माध्यम से मेरा मन-मिजाज इत्यादि पता कर सकते हैं। मेरे बारे मे कई संदेह बादल बन कर उनकी नजर पर तैरते होंगे। उन सूत्रों से प्राप्त खबरों की रोशनी से उनकी आँखे पर पट्टर बन कर छाए वो बादल इतना जरूर छँट जाएंगे कि उन्हें चीजें साफ नजर आएं।

उदय प्रकाश की आलोचना लिखने वालों में मेरा सक्रियता क्रमाँक अव्वल आएगा। गर कोई साजिश चल रही थी तो उसमें मेरा रोल होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं था। यह सब बहुत औचक था। मुझे तो यही पता है कि मुझे किसी ने कभी भी कुछ लिखने को नहीं कहा। फिर मैंने इतना क्यों लिखा ?

मैं उदय प्रकाश के क्लासिक “पुनश्च“ को पढ़ कर सदमे में आ गया। हिन्दी के सबसे पाप्यूलर साहित्यकार का नग्न सच इतना घिनौना है। उनका वही “पुनश्च“ मेरी सीने में टूटे काँच की तरह जा चुभा। दूसरी तरफ उदय प्रकाश और उनके डैश डैश डैश अपनी दे दनादन कठदलीली का पिछला सारा कीर्तमान तोड़ते जा रहे थे।

अपनी भूमिका को लेकर मुझे कुछ निजी तथ्य सामने लाने होंगे। उदय प्रकाश गर चाहें तो अपने सूत्रों से मेरी आगे कही बात की जाँच करवा सकते है।

“मैं सार्वजनिक रूप से स्वीकार करता हूँ विचारों को लेकर मैं आब्सेस्ड हूँ। कोई सोच सिर पर चढ़ जाए तो मैं उसका ही गुलाम हो जाता हूँ। वो सोच मेरी नहीं रहती ,मैं उस सोच का हो कर रह जाता हूँ। इसलिए उसी दिन से दिन-रात उस पुनश्च से जूझता रहा। इसके कुछ नतीजे पाठकों को अब तक कबाड़खाना पर दिखें हैं। शेष नतीजे पाठकों को आने वाले दिनों में मेरे ब्लाग “बना रहे बनारस“ पर दिख जाएंगे। मैं पहले ही बता चुका हूँ कबाड़खाना पर उदय प्रकाश से जुड़ी मेरी यही आखिरी पोस्ट होगी।”

अब उदय की कुप्रचारित कांसपिरैसी थियरी की बात करते हैं। मैं इस मामले में अपनी स्थिति को अच्छी तरह जानता था इसलिए मुझे उदय प्रकाश की कांसपिरैसी थियरी पर टका भर भरोसा नहीं हुआ।
उदय प्रकाश के दुस्साहसिक टिप्पणीयों ने आग में घी काम किया। मैंने अपने पहले लेख में ही इस मामले के व्यक्ति सापेक्ष एंगल से तौबा कर ली थी। जिसे मेरी इन पँक्तियों मे देखा जा सकता है।

“कबाड़खाना का इतिहास मुझे नहीं पता। उदय प्रकाश इससे मुझसे बहुत पहले से इससे जुड़े रहे हैं इसलिए वो जानते होंगे। कबाड़खाना का अंदरूनी चाल-चरित्र क्या है इस पर उदय जी के आरोप का जवाब वही लोग देंगे जो इसके कर्ता धर्ता है। मैं सिर्फ और सिर्फ अनिल यादव की पोस्ट का उदय प्रकाश के लिखे जवाब पर अपनी बात रख रहा हूँ। मेरी बात का जोर तथ्यों के हेर-फेर पर है।”

उदय प्रकाश ने संभवतः यह पँक्तियां नहीं पढ़ी होंगी। उन्हें अपनी छाती कूटने और दूसरों को साहित्यिक गाली देने से फुरसत मिलती तो न पढ़ते !

हिन्दी आइकन के खिलाफ साजिश के इस मुल्जिम (न कि मुजरिम!) ने कुछ और पंक्तियां टिप्पणी के रूप में लिखीं थीं। जो यूँ
हैं
“उदय जी बार-बार अपने खिलाफ साजिश की शिकायत कर रहे हैं। उदय जी के खुल कर अपनी बात लिखनी चाहिए। अगर ऐसी कोई साजिश है तो उसके लिए गोल गोल सरलीकृत आरोपों की बजाए ठोस बात कहें। हिंदी के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखक को इस उम्र में किससे भय है। मुझे नहीं लगता कि नई पीढ़ी में उदय प्रकाश से ज्यादा समर्थक किसी और लेखक के होंगे। उदय जी सही हुए तो उनके समर्थक की कमी नहीं होगी। – July 12, 2009 2:27 ऍम”

“उदय जी का ब्लाग आज शाम को गायब हो गया था। पहले मुझे लगा उदय जी की इच्छा से ऐसा हुआ होगा। अभी उनकी टिप्पणी देखी तो मामला कुछ और निकला। कबाड़खाना के सदस्य होने के नाते मैं इसका पुरजोर विरोध करता हूँ। उदय जी के खिलाफ इतनी कड़ी प्रतिक्रियाएं आने के बावजूद

बीच बहस में उनका ब्लाग (जिसे हम विपक्ष का स्वर कह सकते हैं!) हटाना एक निंदनीय कृत्य है। कुछ लोग उदय प्रकाश के खिलाफ अपने निजी हिसाब चुकाने की फिराक में नजर आ रहें है। ये लोग बहती गंगा में हाथ धोने की आदत से लाचार लगते हैं। ऐसे लोगों को उदय प्रकाश से ज्यादा सावधान रहना चाहिए। जब उनका नंबर आएगा तो उनके दिन में तारे नजर आने लगेंगे। क्योंकि उनके पास उदय प्रकाश जितने संचित सद्कर्म भी नहीं होगे कि लोग मुरव्व्त कर जाए !!कोई बहस लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए होनी चाहिए। अपने निजी रंजिशों को सुलझाने के लिए सार्वजनिक मंच का चालाक दुष्प्रयोग निंदनीय है।- July 12, 2009 2:33 ऍम”

उदय ने नहीं पढ़ा, तो कुछ तो कारण जरूर रहा होगा। संभवतः इस साजिश की सीबीआई या सीआईए से जाँच करवाने की कोशिशों में उलझे रहें होंगे !

उदय प्रकाश अभी या भविष्य में कभी भी यह साबित कर दें कि यह सब उनके खिलाफ षडयंत्र था और मैं उसमें शामिल था तो मैं उस दिन से हिन्दी में लिखना छोड़ दूँगा। इस मामले में इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं कहना चाहता।

अब बात करते हैं कि आखिर जो सब हुआ उसमें असल मामला क्या था ? उनके खिलाफ षडयंत्र कौन कर रहा था यह तो उदय प्रकाश बताएंगे। मैं पाठकों से पूछना चाहता हूँ कि इस समूची होनी के लिए पुख्ता ठोस कंक्रीट की जमीन किसने उपलब्ध करवाई ?

मेरे देखे तो उदय प्रकाश ने । जी हाँ, उदय प्रकाश ने। यहाँ कबाड़खाना पर जो कुछ हुआ उसके लिए जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ उदय प्रकाश और उनका लिखा क्लासिक “पुनश्च” था।

अगर मेरे जीते जी उदय प्रकाश समग्र छपा तो मैं जरूर देखना चाहुगा कि उसमें उदय प्रकाश का यह क्लासिक “पुनश्च” छपा है कि नहीं। जिस संदर्भ में उदय प्रकाश में उदय प्रकाश ने वह क्लासिक “पुनश्च” और अपनी अन्य टिप्पणियों को लिखा है उनके आलोक में मैं उनके विवेकवान पाठक से उसकी राय जानना चाहुँगा।

उदय प्रकाश के महंत से सम्मान लेने की खबर पर आई सभी प्रतिक्रियाएं मैंने पढ़ी हैं। उनमें कुछ भी असामान्य नहीं था। ऐसी खबर पढ़ने पर उनकी कल्पनाओं में उदय प्रकाश के साहित्य पढ़ने से बसी उदय प्रकाश की पूर्व निर्मित काल्पनिक छवि खण्डित हो गई। इस स्थिति में जो प्रतिक्रियाएं आईं उनमें रोष का होना अपेक्षित था।

दूसरों की नहीं लेकिन अपनी उस पोस्ट पर की गई टिप्पणी पर पाठकों का ध्यान एक बार फिर दिलाना चाहुँगा। टिप्पणी यूँ थी,

“अनिल जी सर्वप्रथम इस पोस्ट के लिए गहरा आभार।उदय के अस्त होने से हम सब को गहरा दुख है। पूत के पाँव पालने में ही दिखने लगे थे। मुझे तो सबसे गहरा धक्का उस दिन लगा था जब उदय प्रकाश ने इटली में सोनिया गाँधी के घर को ऊँगलियों को छुआ था। समूचे गाँधी परिवार की प्रशस्ति लिखने के बाद उदय प्रकाश ने अपनी उस पोस्ट के नीचे बहुत ढिठाई से लिखा था कि क्योंकि मैं एक राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूँ इसलिए मेरी टिप्पणी का राजनीतिक पाठ न किया जाए !!हमेशा हाशिए पर धकेले जाने की बात करने वाले उदय प्रकाश को हाशिए से केन्द्र तक के इस सफर की बधाई !!
July 10, 2009 1:39 Pm”

“अनिल जी आप के पास सुविधा है तो कल के अखबारों की शोभा बने जरदारी के बयान को भी इसी तरह पोस्ट कर दें। जिससे हृदय परिवर्तन का यह कन्ट्रास्ट और मजेदार दिखे। एक तरफ उदय प्रकाश का दूसरे बाजू जरदारी का।
July 10, 2009 1:41 Pm”

इससे ज्यादा लिखने का योग्य वह खबर थी नहीं। मैं उदय प्रकाश के ब्लाग का नियमित पाठक रहा हूँ इसलिए उनके हृदय परिवर्तन के सुराग पहले ही दुख चुका था। इसलिए मुझे जोर का झटका जोर से लगने के बजाए धीरे से लगा।

उदय जी भी जानते होंगे आज किसी भी लेखक से राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के मामले में पाठक इतनी उम्मीद नहीं पालते कि उसके इस तरह की किसी अप्रत्याशित हरकत पर एकदम से फट पड़े। उदय जी की इस हरकत पर लोगों की प्रतिक्रियाओं में ऐसा कुछ नही था जो अशोभनीय या षडयंत्रकारी कहा जा सके। उदय जी के “पुनश्च“ जंगल में आग की तरह इसलिए फैली कि राजनीति को लेकर पाठकों को कोई आग्रह हो न हो लेखक के चरित्र को लेकर पाठकों में कुछ अपेक्षाएं आज भी बनीं हुई है।

हो सकता है उदय प्रकाश इसे गऊपट्टीपन भी कह सकते हैं। ऐसा कहने का उनको लोकतांत्रिक अधिकार है। ठीक उतना ही जितना मुझे यह लेख लिखने का अधिकार है।

कबाड़खाना में उदय जी के सम्मान समारोह की खबर से हुई प्रतिक्रिया बताती है कि किसी की उदय के प्रति नियत नहीं खराब थी। उदय जी जब गोरखपुर से लौट चके थे। अपने हैप्पी टुअर की रपट और कुछ अन्य प्रचार सामाग्री अपने ब्लाग पर लगा चुके थे। कुशीनगर से लौटकर लिखे उनके यात्रा विवरण को पाठक दोबारा पढ़े और निर्णय लें कि उदय प्रकाश के उस विवरण में कहीं भी इस बात की हल्की सी झलक मिलती है कि कि वो “फासीवाद की सुरंग में अपने मृत भाई से मुलाकात” करके आए हों।

अब उदय मामले को कुछ और ही रंग दे रहे है। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे किसी बच्चा चोर को जब लोग रंगे हाथ पकड़ लेते हैं तो छूटते ही बोल पड़ता है कि, अरे भाई मैं तो बच्चा को खेला रहा था। इतना ही नहीं वो यह कहने से भी नहीं चूकेगा

देखो तो ! क्या जमाना आ गया है ? लोगों को अब प्रेम के निस्वार्थ सार्वजनिक प्रदर्शन पर भी भरोसा नहीं रहा ! पाठकों आप ही बताएं…… इस चिंता के दार्शनिक उरूज पर भला किसका दिल न पसीज जाए ?

उदय प्रकाश कहानी कला की बारीकियों पर मजबूत पकड़ रखते हैं। इसलिए बाद में उन्होंने अपने सधे वागाडम्बर से पूरे मामले को पलट देने कि चेष्टा की। मोहनदास के लेखक उदय प्रकाश को अच्छी तरह पता है कि इस सिस्टम की न्याय व्यवस्था में कितने छेद है। अपनी इसी समझ के आधार पर उन्होंने पूरे मामले को अपनी सफल किस्सागोई से एक अलग रूप देने की चेष्टा की है। उदय प्रकाश की गऊ-पट्टी और उसकी समझ को लेकर जो अवधारणा है वो सबके सामने आ चुकी है।

मैं भी जानता हूँ इस क्षेत्र का हालोजार क्या है। फिर भी मैं उदय की तरह नहीं सोचता। उदय और उन जैसों के लिखे को पढ़कर मुझे एक महबूब शायर का कहा शेर याद आता है

दिल नाउम्मिद तो नहीं, नाकाम ही तो है
लंबी है गम की शाम,मगर शाम ही तो है

उदय के हालिया लिखे लेखों से यह साफ जाहिर हो गया है कि उदय की कलम का जादू स्रिफ कहानी लिखने में चलता है। उनकी कलम का यही जादू छठे छमाहे किसी कविता में उतर आता है। लेकिन(पाठक ध्यान दें कि यह एक बहुत भारी लेकिन है !), जब उदय प्रकाश कोई वैचारिक निबंध या टिप्पणी लिखने की कोशिश करते हैं उनकी कलम का जादू फुस्स हो जाता है। इतना ही नहीं कभी-कभी तो यह जादू उलटा ही काम कर जाता है। जिन पाठकों को मेरी बात पर शक हो उनके लेखों को दोबार पढ़ ले। उनकी हर दूसरी लाईन उसके पहले लाईन में कही बात को काटती नजर आएगी।

खैर ऐसा गऊ-पटटी में ही होना संभव है कि कोई लेखन की एक विधा में योग्यता दिखा कर दूसरी सभी विधाओं में अपना दावा ठोंक दे। मुझे कोई आश्यर्य नहीं होगा कि कलको नामवर सिंह कोई कविता या कहानी लिख दें और उसे लोग श्रेष्ठ मान लें। नामवर सिंह के लिए तो यह और भी आसान होगा। क्योंकि उनकी स्थापनओं को काटने का साहस हिन्दी में कम को ही होगा। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण काशीनाथ के संद्रभ में नामवर सिंह के मूल्यांकन से मिल ही चुका है। सभी खुश हैं कि इक्कसवीं सदी की शुरूआत में हिन्दी को तोल्सतोय मिल गया। खैर नामवर सिंह की तो उम्र हो चली है। उनकी जबानी स्थापनाओं के बारे में इस बात को ध्यान में रखकर सोचना पड़ता है।

उदय प्रकाश से उनकी तुलना नहीं की जा सकती। उदय ऐसा ही कंसेशन चाहते हैं तो खुल कर बताए। इसमें लजाने जैसा क्या है ? आखिर वो तो जानते ही हैं कि वो गऊ-पट्टी के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले लेखक है। जब पट्टी गऊ माता (तथाकथित) की है तो उसके साहित्यिक सुस्वाद में उसका आर्शिरवाद तो शामिल ही होगा। गऊ माता के विभिन्न आर्शिरवादों से बने “चरणामृत” को पूरी श्रद्धा से घोंटते गऊ-पट्टी वासियों को मैंने रोज ही देखता हूँ। इन्हीं जैसे भी मगर कई स्तरों पर मुझ से जुड़े लोगो का ये नया बहरूप भी देख लूँगा

कोई यह न समझे कि मैं उदय प्रकाश के महत्व से अनजान हूँ। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि उदय प्रकाश हिन्दी मध्यम वर्ग के सबसे पाप्युलर कहानी लेखक का नाम है। सबसे पाप्यूलर सबसे सम्मानित।

इतिश्री कहने से पहले ना जाने क्यों मुझे बार-बार इसी ब्लाग पर उन्हीं के जन्मदिन पर कहे उदय प्रकाश के कुछ शब्द याद आ रहें हैं। गलतबयानी की गुंजाइश न रहे इसलिए मै उदय को कोट करते हुए अपनी बात समाप्त करता हूँ।

Uday Prakash said…
वह सब कुछ जो गलत है, अमर्यादित है और किसी सन्करे स्वार्थ से प्रेरित है…हम सब उसके विरुद्ध खडे हो….हम साहस के साथ अपने देश और अपनी भाषा की हिफ़ाज़त मे खडे हो….आप सबको ढेरो ढेरो..अनन्त शुभकामनाये…January 1, 2008 11:06 PM

“पुनश्च”
अपने पाठकों (गर वो सिर्फ एक है तो इसे पढ़े ‘पाठक’ ) के लिए किसी दिन फुरसत से दुनियाभर के रेनेसाँ में अनुवाद की भूमिका पर लिखुँगा। मेरा वह लेख उन लोगों को समर्पित होगा जो भारत में रेनेसाँ लाने का जबानी हव्यास रखते हैं।

1 टिप्पणियां:
रंगनाथ सिंह, July 14, 2009 10:55 AM

मैंने अपने पहले के लेखों में कुछ चीजें लिखने का वादा किया था। इस बहस की पर्णाहुति का मंत्र पढ़ा जा चुका है इसलिए उन्हें यहाँ लिखना ढिठाई होगी। इस प्रवृत्ति को देख
“मुझे आश्चर्य है कि फिर कोई हिन्दी के वैचारिक दारिद्रय का रोना क्यों रोता है ?”

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