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साथियो, ये निवेदन प्रार्थना के शिल्‍प में नहीं है!

14 July 2009 11 Comments

निरंजन श्रोत्रिय

udayji-orkut1यह सब ग़लत हो रहा है। अब हिंदी साहित्य उस निम्न स्‍तर तक आ पहुंचा है, जब लेखक के हगने, मूतने, खांसने से उसकी प्रतिबद्धता तय की जा रही है। जो लोग बात का बतंगड़ बना रहे हैं, उन्हें इतना तो सोचना चाहिए था की क्या उदय दंगाइयों के पक्ष में खड़ा कोई छद्म लेखक है? जो कवि जनसत्ता में गुजरात विभीषिका पर ध्रुपद जैसी अद्भुत और मार्मिक कविता लिख रहा हो, उसके बारे में ऐसे शक कई दूसरे शक पैदा करते हैं। जो लोग उदय और अशोक वाजपेयी को लेकर स्यापा मना रहे हैं, उन्हें पूर्वग्रह के लेटेस्ट अंक में उनकी कहानी “आवरण” पढ़ना चाहिए। उनके दिमाग़ के सारे जाले साफ हो जाएंगे। यार, जो लेखक बगैर किसी सरकारी मेहरबानी के हिंदी को उसका सर्वश्रेष्ठ दे रहा हो, उसे तो बख्श दो। और हां, मैं जो ये निवेदन कर रहा हूं वह प्रार्थना के शिल्प में नहीं है… क्योंकि जो लोग इस पर लिख रहे हैं, उनके बारे में यदि बात की जाए, तो बात फिर दूर तलक जाएगी।

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11 Comments »

  • anil yadav said:

    श्रोत्रिय जी
    वह कलाकारी दो कौड़ी की है जिसका जिंदगी से कोई नाता नहीं। इसीलिए लिखनी- करनी में न्यूनतम साम्य की अपेक्षा की जा रही है। उदय प्रकाश जैसे लेखक से नहीं तो फिर और किसी से अपेक्षा क्यों। जज दोपहर को बलात्कार के खिलाफ फैसला देगा, रात में संपन्न करेगा। नेता भ्रष्टाचार के विरोध में भाषण देकर स्विस बैंक में खाता खोलेगा। पत्रकार पहले हत्या करेगा फिर उसकी खबर लिखेगा। आप आवरण के अनावरण में लिप्त भूल जाएंगे कि उदय प्रकाश बस जरा दिन पहले अशोक बाजपेयी को अपनी समस्त संवेदना से भारत भवन का अल्शेसियन कहा करते थे।

    अफसोस है कि थोड़ा अशालीन और कठोर हो रहा हूं लेकिन आप जैसा आदमी जो बात को दूर तलक ले जाने का माद्दा रखता है उससे कहना जरूरी है। माफ कीजिएगा।

    पहली बात- साहस कीजिए बात को दूर तलक ले जाइए।

    दूसरी- उदय के हगे से अपना घर लीपिए प्रतिबद्धता की खुशबू आएगी।

    तीसरी- बाजपेयी के मूते से स्नान कीजिए संवेदना की तरलता का अंदाजा होगा।

    चौथी- दोनों की समवेत खांसी पर गौर कीजिए ध्रुपद सुनाई देगा।

    पांचवीं- उदय के ब्लाग पर पुनश्च पढ़िये कान के कीड़े झर जाएंगे और आपके कान ध्रुपद सुनने के अनुकूल बनेंगे।

    आइए दोगुने वेग से जो पढ़ा है उसकी लफ्फाजी कीजिए। स्वागत है।

  • ajaykumar said:

    भाई यादव जी आपकी सुंदर भाषा के लिए बधाई. मैं उदय प्रकाश जी के साथ १५ साल काम कर चुका हूं. उनकी प्रतिबद्धता, संघर्ष और मेहनत का गवाह और साथी रहा हूं. आप तो सिर्फ़ भाड़े के टट्टू और टांग खींचू हैं. इससे पहले आपने कौन सा महान तीर मारा है?
    और जिन लेखकों की सूची इस ब्लाग मे निंदा प्रस्ताव में लगी है, उनमें आप अपने उस बलात्कारी साथी के खिलाफ़ निंदा प्रस्ताव और ऐसी घिनौनी भाषा क्यों नहीं इस्तेमाल करते, जिसका जुर्म साबित हो चुका है. और वह बर्खास्त हुआ है. मंत्रियों और अफ़सरों के चापलूसों की पुरी लाबी एक अकेले लेखक पर टूट पड़ी है…..शर्म है….शर्म है….!

  • anil yadav said:

    टट्टू जानवर बढिया होता है। कभी भाड़ा नहीं मांगता, किसी दूसरे की टांग नहीं खींचता और उससे महानता की उम्मीद करना बेकार है।

    कहीं उदय प्रकाश का नाम लेकर आप भी महान एवं मशहूर होने की चतुराई तो नहीं कर रहे हैं। उनकी कीर्ति के छींटों से स्नान का फैशन चल रहा है आज कल। सबसे पहले इसका वैरीफिकेशन जरूरी है।

  • Niranjan Shrotriya said:

    जब दिमाग की तमाम विष्ठा पोस्ट में उंदेल दी जाये तो उसका जवाब देना अपनी तौहीन है.

  • anil yadav said:

    किसने शुरू किया था मित्र। क्या योगी के हाथों सम्मान लेना उदय प्रकाश का ह… मू… खां… है। हाथ की-बोर्ड पर हो और सार्वजनिक तौर पर कुछ कह रहे हों तो जरा जिम्मेदार तो होना चाहिए। आपसे आग्रह करता हूं कि उन लोगों को जरूर बेनकाब करें जो आपके मुताबिक “कपट स्यापा” कर रहे हैं लेकिन पूरी जवाबदेही के साथ।
    शुभकामनाएं

  • Niranjan Shrotriya said:

    अनिलजी,
    आप तो नाहक बुरा मान गए. पहली बात तो यह कि मैंने आपको संबोधित कर तो कुछ लिखा नहीं जो आपने इतनी ” सुलभ” भाषा में मुझे अपना घर लीपने इत्यादि की बिन मांगी सलाह दे डाली. दूसरे, जब किसी का चरित्र हनन करने ही निकले हो तो पूरी तरह से करो यह क्या आधा अधूरा! मैं आपके साथ हूँ, उदय चीज क्या है? उसे तो हम यूँ ही निपटा देंगे. आपको एक राज की बात बताऊँ? उदय तो बेसिकली सांप्रदायिक सोच का ही आदमी है. यकीं न हो तो राजेंद्र यादव से पूछ लो. कितना सही कहा था उन्होंने कि “वारेन हास्टिंग्स का सांड” में सांड क्यों है, कुत्ता क्यों नहीं? सांड सांप्रदायिक और कुत्ता धर्मनिरपेक्ष प्राणी है. उदय की हिम्मत देखो की एक तो ऐसी सांप्रदायिक कहानी लिखते है, दूसरे उसे “हंस” की जगह “इंडिया टुडे” में छपाते हैं. ऐसे कई प्रमाण मैं आपको दे सकता हूँ क्योंकि मैं आपके साथ हूँ. आप यदि कोशिश करें तो गुजरात दंगों में भी उन्हें घसीटा जा सकता है. बाबरी मस्जिद वाली विडियो क्लिप्पिंग्स यदि आपके पास हो तो गुम्बद पर खड़ी भीड़ में उदय का चेहरा हम दिखा सकते हैं. न हो तो ग्राफिक्स का कमाल किस दिन काम आएगा? तो भाई मेरे, करो तो पूरा करो, वैसे भी उदय प्रकाश जैसे खतरनाक लेखक को अधमरा छोड़ देना ठीक नहीं.

    और हाँ, मैं तो आपको जानता नहीं लेकिन आज ही मुझे एक ईमेल मिला है (नाम में क्या रक्खा है?) जो दैनिक जागरण लखनऊ में रहे आपके किसी सहयोगी का है. उन्होंने आपकी काफी “तारीफ़” की है. तो क्या साहस की शुरुआत यहीं से करें?

    एक बात और बता दूं. उदय की ईश्वर में बहुत आस्था है. यदि उदय ने गलती की है तो उसकी सजा ईश्वर उन्हें देगा और वे इसे स्वीकारेंगे.अमा यार ऐसी अदालत तो लगाओ कि वकील की नहीं तो कम से कम मुलजिम को दो लफ्ज न्यायमूर्ति के सामने बोलने कि इजाजत हो. इतनी सुविधा तो हमारी न्यायपालिका हत्यारे को भी देती है.

    बाकी सब खैरियत!

  • anil yadav said:

    दोस्त।
    वह मेल कबाड़खाने पर लगा हुआ है। शुरूआत हो चुकी।
    देखें- एक पत्तरकार का पत्र अपने प्रिय लेखक के नाम

  • anil yadav said:

    अविनाश से प्रार्थना है कि उसे यहां भी लगा दें।

  • anil yadav said:

    निरंजन श्रोत्रिय जी

    गलती हुई। तैश में आकर मैं खुद ही अपनी आरती उतारने चल पड़ा था।

    आपके पास जो दैनिक जागरण, लखनऊ के जिन साथी ने मेरी तारीफ वाला ई-मेल किया है, उसे आप पहले ही प्रचारित करना शुरू कर चुके हैं। मैं चाहता हूं कि आप जरूर साहस करें। सप्रमाण उसे सार्वजनिक तौर पर प्रस्तुत करें।

    अब दिक्कत तब होगी। जब ट्रेलर देने के बाद उसे आप गोपनीय रखेंगे।

    अनिल यादव
    लखनऊ

  • ashok said:

    निरंजन भाई साहब

    दोस्ती बहुत अच्छी चीज़ है पर प्रतिबद्धता दूसरी चीज़ जो ज़्यादा मुश्किल है।
    हगनेमूतने पर कोई बात नहीं कर रहा
    यह गोरखपुर जा कर एक हत्यारे के साथ मंच पर बैठ कर पुरस्कार ग्रहण करने का मामला है।
    चुपचाप यह सुनने का मामला है कि आपके भाई साहब राष्ट्रवाद के प्रखर प्रवक्ता थे और यह कहने का कि विचार का अब साहित्य से कोई लेना देना नहीं।

    जिसे दूसरा नोबल पुरस्कार उपन्यास के लिये मिला था वह बाद में फ़ासीवाद का प्रचण्ड समर्थक हो गया।
    इतिहास उनका इस कृत्य के विपरीत रहा है आपत्ति इसीलिये है वरना तरुण विजय मोदी से पुरस्कार ले तो हमे क्या?

    जहां तक कहानियों का मामला है को तो जितनी क्रांति कहानियों में हुई है उतनी व्यवहार में होती तो अब तक दस इंक़लाब हो चुके होते… मामला लिखे और व्यवहार में फ़ांक का ही है भाई साहब।

    यह जुगलबंदी के स्वरभंग पर स्यापा है सर।
    आशा है व्यक्तिगत नहीं लेंगे।

  • ashok said:

    हां प्लीज़ बात दूर तलक ले जायें
    उदय जी तक रुकनी नहीं चाहिये ये बात

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