ये हिंदी पत्रकारिता का शोककाल है!!!
ख़बरों में मिलावट पर बहस की इस दूसरी खेप में पेश है कुछ और युवा पत्रकारों की राय।
हर बात का समाधान कानून नहीं हो सकता है
अनिल दुबे
हर बात का समाधान कानून नहीं हो सकता है। मीडिया यदि ग़लत रिपोर्ट पेश करता है, तो तय कौन करेगा की रिपोर्ट ग़लत है। कोई जज या कानूनविद। आप ख़बरों को वस्तुनिष्ठ तो बनाने का प्रयास कर सकते हैं लेकिन पत्रकारिता सिर्फ और सिर्फ ख़बरों का ही नाम है क्या? वर्षों से जनमत तैयार करने का काम भी यह करते आ रहा है। फिर यह वस्तुनिष्ठ कैसे हो सकता है।
जनाब, कानून बनवा लें आप, लेकिन ये गारंटी रहेगी निहित स्वार्थों के लिए सिर्फ और सिर्फ उसका दुरूपयोग ही होगा और कुछ नहीं। आप ख़बर लिखिए और उसको अपनी तरह से पेश कर ग़लत करार दिया जा सकता है। और आप पर सेंसर लग जाएगा। क्यों ऐसा सोच रहे हो भाई? हमारे बाप-दादाओं ने मीडिया की जो स्वतंत्रता इतनी मेहनत से कमायी है, उसको कानून के हवाले मत करो। आपको भी पता है इस देश में कानून कैसे काम करता है।
मैं ब्रजमोहन भाई की बात से सहमत हूं। ऐसा हो रहा है लेकिन इसके लिए कानून नहीं चाहिए। इसके लिए प्रेस आचार संहिता संस्थान (बार कौंसिल जैसा ही) जैसी कोई चीज़ बना लो, जो निर्णय सुनाने में सक्षम हो। जिसे हर मीडिया संस्थान या पत्रकार मानने के लिए विवश हो। लेकिन कानून नहीं चाहिए।
(टिप्पणीकार सीनियर जर्नलिस्ट हैं और डीडी न्यूज़ से जुड़े हैं)
जब मिलावटी मसालों पर हो सकती है कार्रवाई तो मिलावटी खबरों पर क्यों नहीं?
आशीष महर्षि
मिलावटी मसालों की तरह मिलावटी खबरों की भी शिकायत? बिलकुल ऐसा होना चाहिए। खासतौर पर ऐसे दौर में जब हम अपने पाठकों को पाठक नहीं बल्कि ग्राहक मानने लगे हैं। यदि पाठक हमारा ग्राहक हैं तो फिर उसे वे सभी अधिकार मिलने चाहिए जो एक ग्राहक को मिलते हैं। हममें से बहुत सारे लोग इससे सहमत तो होंगे लेकिन कभी भी अपने पाठक माफ कीजिए ग्राहक को यह अधिकार नहीं देंगे कि वे मिलावटी ख़बरों को लेकर शिकायत करें। एक पत्रकार अच्छी तरह जानता है कि किस प्रकार आधे सच या फिर दिमागी खुराफत को एक ख़बर का रूप दिया जाता है। यदि हमें मीडिया के बाजार में अपने आपको टिकाना होगा तो हर दिन, हर सेकेंड हमें अपने आपको अपडेट करने की जरूरत है। यह अपडेट तभी हो सकता है जब हमें हमारी ग़लतियों के बारे में बताया जाए। लेकिन आज के माहौल में न सिर्फ अखबारों की समीक्षा कम हुई है बल्कि न्यूज चैनलों की भी समीक्षा में भी दम नहीं रहा। आज एक ही सिद्धांत काम आ रहा है कि बस हर रोज किसी तरह कट जाए। दो दिन पहले की ही बात है। एक न्यूज चैनल की वेबसाइट ने अपनी हैडिंग में लिखा कि प्रेमी युगल के शव के साथ कंडोम भी मिला। ख़बर चंडीगढ़ की थी। लेकिन यकीन मानिए जनाब पूरे मामले में पुलिस ने कभी भी कंडोम मिलने की बात नहीं कही। यानि इस वेबसाइट ने ख़बरों को बेचने के लिए कंडोम शब्द का प्रयोग किया – जो कि मिलावटी खबर का ही एक ताजा उदाहरण है। लेकिन अब इसकी शिकायत कौन और कहां करे। पाठक ख़बरों को पढ़ने के बाद सिर्फ अफसोस करता रह जाता है लेकिन बहुत ही कम पाठक ऐसे होते हैं, जिनकी प्रतिक्रिया मिलती है। यदि वे प्रतिक्रिया देना भी चाहते हैं तो उनके पास ऐसा कोई साधन नहीं है। ऐसे में सबसे पहले एक ऐसी एंजेसी या आनलाइन शिकायत के लिए एक वेबसाइट बनानी चाहिए। यह शुरुआत हमें ही करनी होगी। तो देर किस बात की। मोहल्ला लाइव का उपयोग ऑन लाइन शिकायतों के लिए किया जा सकता है।
(टिप्पणीकार युवा पत्रकार हैं और दैनिक भास्कर के वेब पोर्टल से जुड़े हैं)
एक मिनिट रुकिए
शिरीष खरे
पहली नज़र में यह आइडिया बुरा नहीं लगता! लेकिन ‘उपभोक्ता सामग्री की गुणवत्ता’ का ख्याल आते ही, मैं अल्पविराम लगाकर कुछ बातें सोचने लगता हूं। बात शुरू होती है कि तेल या दूध में मिलावट के खिलाफ अगर ‘दुकानदार’ पर मुकदमा कर सकते हैं, तो ‘मीडिया वालों’ पर क्यों नहीं? लेकिन इसके पहले हमें मीडिया को ‘चौथा स्तम्भ’ से उठाकर ‘दुकान’ घोषित करना होगा। क्योंकि मीडिया के चाल-चरित्र पर होने वाली बहस अक्सर दो धाराओं में बट जाती है। एक धारा के लोग कहते हैं मीडिया ‘चौथा स्तम्भ’ है तो उसकी जवाबदारी भी तो बनती है। दूसरी तरफ के लोग कहते हैं जमाना बदल रहा है भईया, अब मीडिया कॉरर्पोरेट ही है। अगर मीडिया कॉरर्पोरेट ही है, तो ‘चौथा स्तम्भ’ क्यों है? क्योंकि न सरकार में बैठे लोग अपने को कारर्पोरेट कहते हैं, न नौकरशाह, न वकील। जब तीनों ‘दुकान’ नहीं हैं तो ‘चौथा स्तम्भ’ ‘दुकान’ क्यों हैं? और अगर यह ‘दुकान’ ही है तो स्पष्ट कर दो ना! फिर इसके बाद ही नीलाभ जी की बात सोची जा सकती है, अन्यथा तो सरकार, नौकरशाह और वकील को भी मिलावट के केस में कोर्ट घसीटने के तर्क आने लगेंगे।
कानून भ्रष्ट्राचार को रोके ही, ऐसा जरूरी नहीं। कई बार कानून बनने से उल्टा भ्रष्टाचार बढ़ जाता है। मसलन जब ट्रेफिक की दिक्कत को दूर करने के लिए कोई कानून आता है तो दिक्कतें वहीं रहतीं हैं। हां, पुलिस वालों को कानून का ज़रूर फायदा हो जाता है। उनकी ऊपरी आमदनी बढ़ जाती है। जब दूसरे कानून सही तरीके से लागू नहीं हो सकते, तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि मीडिया के कानून उसकी आत्मा का ख्याल रखेंगे ही। मीडिया की हर उलझन को कानून से ही जोड़कर देखना ठीक नहीं है। क्योंकि कानून का फायदा उठाने वाले भी कम(जोर) नहीं हैं। तजुर्बे बताते हैं, कानून का फायदा ताकतवर उठाता है, और उसे भोगता कमजोर ही है। ऐसे में सोचना होगा कि नीलाभ जी का आइडिया कहीं कारपोरेट ताकतों के लिए हथियार न बन जाए, जो मीडिया के अंदर भी है और बाहर भी। फिर यह व्यवस्था बनी भी तो इसका उपयोग कारपोरेट भी कर सकते हैं। अब वह सदुपयोग कर रहे हैं या दुरुपयोग, इसका फैसला कौन करेगा?
(टिप्पणीकार युवा पत्रकार हैं और जनमुद्दों की पत्रकारिता में रमे हुए हैं)
सेंसरशिप जैसा हो जाएगा फोरम का होना
अनिमेष नचिकेता
जिस तरह से तेल या खाद्य पदार्थों में मिलावट की शिकायत पर हम उपभोक्ता फोरम जा सकते हैं, उसी तरह ख़बरों में मिलावट होने पर किसी फोरम की ज़रूरत मुझे नहीं लगती। इसका सीधा कारण है कि अगर ऐसा हुआ तो यह सेंसरशिप जैसा हो जाएगा। और अगर कलम पर सेंसरशिप लग गयी, तो उसकी धार नहीं के बराबर रह जाएगी। फिर तो कोई भी किसी भी ख़बर को लेकर फोरम पहुंच जाएगा। ऐसे में पत्रकार का आत्मविश्वास निश्चित रूप से डिगेगा। लोग लिखने से पहले काफी सोचने लगेंगे। ऐसा होने से सही चीजें भी सामने नहीं आ पाएंगी।
यह बात सच है कि ख़बरों में मिलावट हो रही है। आज के कुछ पत्रकार सिर्फ लिखने भर में यकीन रखते हैं। उसके प्रभाव और अपनी साख की चिंता उन्हें ज्यादा नहीं सताती। नयी और एक्सक्लूसिव लिखने के चक्कर में यह मिलावट कभी-कभार थोड़ी अधिक भी हो जाती है। ऐसा नहीं होना चाहिए। मीडिया तभी तक महत्वपूर्ण और असरदार है जब तक उसकी विश्वनीयता कायम है। आज सवाल यही उठ खड़ा होता है।
(टिप्पणीकार युवा जर्नलिस्ट हैं और दैनिक जागरण के रांची संस्करण से जुड़े हैं)
ख़बरों से खेलने का चक्कर
सुबोध राय
खबर का एंगिल ये नहीं ये लो… खबर के साथ खेलो… जब तक खेल सकते हो… यार उसका फोनो मत चलाओ वो खबर की हवा निकाल देगा… ये तो घटना की बात से इंकार कर रहा है, ऐसा करो इसकी बाइट मत लो… अरे यार ये राजीव प्रताप रुड़ी है तुमने राजीव शुक्ला चला दिया… ठीक करो जल्दी… ये हड़बड़ी इलेक्ट्रानिक मीडिया की है। ख़बरों से खेलते खेलते ख़बरों का कचूमर कैसे निकलता है, ये मैं पिछले एक साल से दिल्ली में आकर देख रहा हूं। मुझे लगता है ये पत्रकारिता का शोककाल है। हम भी शोक मनाते हैं और फिर ख़बरों के साथ बेरहमी से खेलने में जुट जाते हैं। बिना ये सोचे कि पत्रकारिता के अपने नियम और अपनी मर्यादाएं हैं। मर्ज बड़ा है। और अब तो यही लगता है कि कानून के दायरे में लाये बिना कुछ नहीं हो सकता। दूध अगर मिलावटी हो, तो आपकी सेहत ख़राब करता है… और अगर ख़बर मिलावटी हो तो समाज की मानसिकता पर असर डालती है। बाज़ार में मची मारकाट के बीच मिलावट की बीमारी पत्रकारों को भी लग गयी। लेकिन अब पानी सर के ऊपर से जा रहा है। कभी भरोसे पर टिकी पत्रकारिता का खुद का भरोसा डगमगा रहा है। मैं तो यही कहूंगा खबर में मिलावट के ख़िलाफ़ सख्त कानून बने। इसके लिए जो भी मशीनरी बने उसमें पत्रकारों का एक पैनल हो। एक जज इसकी निगरानी करे। अख़बारों और न्यूज चैनल के संपादक इस मशीनरी के प्रति जवाबदेह हों। तभी कुछ हो सकता है। वरना यकीन मानिए हमारे मिशन का अस्तित्व ख़तरे में है और इस खतरे के जिम्मेदार हम खुद हैं।
(टिप्पणीकार युवा जर्नलिस्ट हैं और इंडिया न्यूज़ चैनल से जुड़े हैं)
निष्पक्षता और गुणवत्ता के लिए क़ानून ज़रूरी
एस बिजेन सिंह
मेरा मानना है कि जिस तरह गे कानून को हाईकोर्ट से सामाजिक मान्यता मिली है, तो क्यों न लोकतंत्र के चौथे स्तंभ माने जा रहे मीडिया की ख़बरों में मिलावट के खिलाफ भी कानून बने। यह बहुत ही उचित प्रस्ताव है। यह बनना ही चाहिए, ताकि लोगों को दिग्भ्रमित होने से बचाया जा सके। इससे पाठकों और दर्शकों को भी सही और निष्पक्ष खबरें मिलेंगी। अगर इस तरह का कानून बना, तो निश्चित रूप से दहशत फैलाने वाली ख़बर को मीडिया में जगह नहीं मिलेगी। सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात तो यह होगी कि इससे पत्रकारिता में निष्पक्षता और गुणवत्ता आ सकेगी। जैसे एक समय में बीबीसी में प्रसारित खबरों पर लोग सेंट-परसेंट विश्वास करते थे, उसी तरह ये कानून बनने से लोगों को प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से मिली ख़बरों पर भरोसा हो पाएगा। साथ में मीडिया की प्रतिष्ठा भी बरकरार रहेगी।
(टिप्पणीकार यंग जर्नलिस्ट हैं और साप्ताहिक चौथी दुनिया से जुड़े हैं)









शिरीष की बात से काफी हद तक सहमत हूं। मीडिया कंटेंटे और खबरों को पेश करने के अंदाज को लेकर जो भी गड़बड़ियां है,उसके सामने कानून कुछ कर भी पाएगा,इसकी मुझे कहीं से उम्मीद नहीं दिखती। कोई चैनल खबर दिखाए,उसे पता भी हो कि जिस तरह की वो खबर दिखा रहा है,संभव है कानूनी तौर पर वो फंस सकता है लेकिन ऑडिएंस के उपर असर और टीआरपी के रिपोर्ट कार्ड का काम तो पहले हो जाता है। अब आम ऑडिएंस को क्या दिलचस्पी हो सकती है कि किस खबर के दिखाए जाने पर,किस चैनल के खिलाफ कार्यवाही हुई है। वो इतना पजल्ड होगा कि ऐसे में कानून की खूंटी से टंगा उस झुनझुन की तरह होगा,जिसे आप खूंटी से अलग तो करके नहीं,लेकिन जब औऱ जितना मन हो बजा सकते हैं।
हमारे कैंपस को नो स्मोकिंग जोन फ्री किया गया है,आप यहां स्मोक नहीं कर सकते हैं। लेकिन सच्चाई ये है कि दुगुने दाम पर आप कहीं से भी सिगरेट खरीद सकते हैं। एक,अब दूसरी बात मैंने ऐसे शख्स को देखा है जो पकड़े जाने औऱ पुलिस के कुछ भी बोलने के पहले सौ का नोट पकड़ा देते हैं। पेनॉल्टी देकर लगातार गड़बड़ी करते रहने की संस्कृति में कानून टाइम पास से ज्यादा कुच रह नहीं जाताय़
जैसा कि कहा जा रहा है, नीलाभ जी के महासभा में बोलने से पहले ही वहां सार्थक संवाद की हवाएं गुम हो गई थीं. ऐसे में वह ढंग से अपनी बात भी नहीं रख पाए थे. मुझे लगता है, एक बार उनकी पूरी बात को सही ढंग से सुन लिए जाये. मैं ऐसा नहीं कहता कि उनकी पूरी बातों से बहुत सारे सवालों का जवाब हमें खुद-ब-खुद मिल जायेगा. लेकिन उनके दो-तीन वाक्यों के हिसाब से पूरी तस्वीर और योजना का पता नहीं लगता. इसलिए बहस को सही दिशा देने के लिए उन्हें पूरा समझना जरूरी है.
दोस्तो, कानून तो अपराधी को भी नहीं सुधार पाता। तो क्या अपराधियों को सजा न देने की मुहिम शुरू की जाए! कंटेंट में सुधार की कोशिश निहायत अलग बात है और जो लोग कंटेंट के साथ मिलावट कर रहे हैं, झूठ को सच बनाकर पेश कर रहे हैं- उनके खिलाफ कार्रवाई एक बिल्कुल अलग बात। कंटेंट में सुधार, एक सतत प्रक्रिया है, जो लगातार चलती रहती है। चलती रहेगी। इसकी आड़ में मिलावटखोरों के जुर्म नजरंदाज नहीं किए जाने चाहिए।
मेरा सवाल है और जो लगातार है- पत्रकारों में ऐसा कौन सा सुरखाब का पर लगा है कि उन्हें सारे नियम, कानून बंधन, नियमन से ऊपर मान लिया जाए। यह हक इस मुल्क में किसे और क्यों मिलना चाहिए कि वह हजारों लाखों लोगों के विचार/ सोच/ दिमाग/ को अपने झूठ और मिलावट से दूषित कर दे। और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर छुट्टा घूमता रहे।
दोस्तो, ये बिरादराना भाईचारा से काम नहीं चलने वाला। कन्या भ्रूण को मारने वाले डॉक्टर भी एक दूसरे को बचाने के लिए भाईचारा दिखाते हैं। वे भी अपराधी डॉक्टरों को बचाने के लिए ऐसे ही तर्क देते हैं और भाईचारा दिखाते हैं। उनका भाईचारा फिर कैसे गलत हो गया।
मुझे नहीं मालूम कि नीलाभ जी ने यही कहा है या नहीं। हम इसे यहीं पढ़ कर जान रहे हैं। अगर उन्होंने न भी कहा तो कोई फर्क नहीं पड़ता। हकीकत बदल नहीं जाएगी। हकीकत यही है कि गंदगी है। उसकी सफाई का इंतजाम होना चाहिए। जरूरत पड़े तो फिनायल डालें। एसिड डालें लेकिन सफाई करें। पूरी दुनिया में बुराई देखने वाले हुजूम को अपने अंदर झाँकना चाहिए। वरना दूसरे लोग आँखों में उंगली डाल कर दिखाएँगे।
लगता है की अब भारत में हर काम कानून बनने पर ही संभव होगा..ये तर्क कतई उचित नहीं है की खबरों में मिलावट के लिए कानून बनाया जाये क्यू की जो कानून बनाते है वो इसमें अपना स्वार्थ देखते है.किसी सरकार ने कोई कानून बनाया और दूसरी सरकार ने उसे हटा दिया.अब जब कानून बनाने को लेकर हमारी संसद में ही मतभेद है तो फिर उस कानून का क्या लाभ? ये मानता हूँ की खबरों में मिलावट होती है लेकिन इस बात को कौन साबित करेगा के इस खबर में मिलावट नहीं है? जैसे जनप्रतिनिधि कोई जनता चुनती है उसी प्रकार से खबरों को भी जनता खुद समझती है.आप मिलावटी सामान दे रहे है लेकिन जनप्रतिनिधि कौन सा शुद्ध कानून या विचार देश को दे रही है ये भी तो देखिये.हम उनसे कानून बनाने की उम्मीद कर रहे है जो खुद मिलावटी का धंधा जोरो से चलाये हुए है.
उदय शंकर खवारे
हरियाणा
माननीय महोदय,
आप सभी ने अपने-अपने विचार बखूबी प्रस्तुत किए हैं। लेकिन मैं एक बात यहां अवश्य कहना चाहता हूं कि खबर में मिलावट हमेशा वैसी ही होनी चाहिए जैसी दूध में शक्कर की होती है। जो स्वाद तो देती है दिखाई नहीं देती।
आप सोच रहे होंगे कि मैं इस मिलावट की वकालत क्यों कर रहा हूं। तो मैं यहां साफ कर दूं कि भाष की रोचकता से ही पाठक अखबार की ओर आकर्षित होता है। बस इस रोचकता के लिए अनर्गल शब्दों का इस्तेमाल न करें। साधारण शब्दों में कहूं तो सामंजस्यपूर्ण ढंग से शब्द गूंथे जाएं तो बेहतर होगा। अब इसके लिए कोई नियंत्रण संस्थान या कानून कुछ नहीं कर सकता। क्योंकि अगर ये हो भी गए तो धीरे-धीरे प्रेस की स्वतंत्रता को खा जाएंगे।
फिर हममें और कुत्ते के पिल्ले में कोई अंतर नहीं रहेगा जो अपने गले के पट्टे को छुड़ाने का शिद्दत से प्रयास करता है और सफल नहीं हो पाता। जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है उसका पट्टा भी गले के मुताबिक कुछ सेंटीमीटर बड़ा हो जाता है। सो कृपा करें और ऐसी स्थिति न बनने दें। दूसरी बात खबर को बेचने के लिए ये थोड़ी बहुत मिलावट की जो बात कही गई है उसे सर्वथा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कारण कि मिलावट करने वाले के अलावा मिलावट करते समय कोई और मौजूद नहीं रहता इसलिए वह सही कर रहा है यह कैसे निर्धारित किया जाएगा। फिर क्या सही है और क्या गलत इसका निर्धारण मिलावट करते वक्त वह व्यक्ति ही कर सकता है और कोई भी नहीं। किसी मुकदमे की बात तो भूल ही जाइए क्योंकि अगर ऐसा हुआ माफ कीजिएगा आप में से कुछ कल अदालत में हाजिरी देते मिलेंगे।
फिर अखबार के लिए काम कौन करेगा? भाई साहब समय पर अखबार निकालना कितनी बड़ी जवाबदारी है, जरा सोचिए। मुझे तो लगता है कि मुकदमे चले तो एक अखबार में काम करने वाले जितने भी पत्रकार हैं वे अपनी-अपनी सुनवाई का इंतजार करेंगे और आज का अखबार कल या परसों तक जनता के हाथ में पहुंचेगा।
तो भइया मेरी बात पर गौर करें और ऐसी किसी भी बेवकूफी को होने से रोकें। रही बात मिलावट की तो आदमी खुद सुधर जाए सब सुधर जाएगा। अरे अपने अंदर की बुराई निकाल दो मिलावट नहीं कर पाओगे और करोगे भी तो हिसाब से….।
नोट – : हो सकता है कि मैंने कोई न समझी की बात कह दी हो तो अपने इस अनुज को माफ कीजिएगा। धन्यवाद……
मीडिया पर लगाम लगाने की बात करने वाले युवा पत्रकारों की छटपटाहट देखने लायक है। ऐसी ही कुछ बेचैनी उन युवाओं में भी रही होगी जो जेपी आंदोलन के वक्त सामाजिक क्रांति के नाम पर सियासत में कूदे…और आज की तारीख में वही युवा नेता किस तरह की राजनीतिक क्रांति करने पर तुले हैं… ये बताने की जरुरत नहीं। हालांकि मैं ये नहीं कहना चाहता कि खबरों में मिलावट को लेकर इमोशनल हो रहे युवा पत्रकार भी एक दिन मिलावट के इस बाजार में अलग अलग दुकानें लगाए नजर आएंगे। लेकिन मैं ये जरुर मानता हूं कि रोजी रोटी की खातिर पत्रकारिता की दुनिया में आने वाले युवाओं के भीतर एक किस्म का सिद्धांतवाद अपनी जड़ें जमाए हुए है…और उसकी पीड़ा ही इन युवाओं के भीतर चौथे खंभे पर नकेल कसने की जरुरत का बोध कायम कर रहा है। सिद्धांतवाद कहीं से भी गलत नहीं है, मगर नौकरी हासिल करते हुए अपनी सैलरी के लिए सब्जी खरीदने जैसी बारगेनिंग करने की मजबूरी झेलने के बाद भी ये युवा जब पत्रकारिता में बाजार की दखलंदाजी समझ नहीं पाते, तो कहीं न कहीं मुझे उनकी अबोध समझ पर तरस आता है। आखिर इलेक्ट्रानिक और प्रिंट में काम करने वाले ये युवा कब समझेंगे कि आज की तारीख में व्यक्तिगत जिम्मेदारी और नैतिकता के भरोसे ही पत्रकारिता के उसूलों को बचा पाना मुमकिन है। करोड़ों रुपए झोंककर चैनल या अखबार चलाने वाले कारोबारी से इसकी उम्मीद करना कितना जायज है, जो शुद्ध रुप से कारोबारी हितों को ध्यान में रखकर अपनी संपादकीय नीतियां तय करता है। मैं भी मानता हूं कि खबर खेलने की चीज नहीं है। मगर रास्ता क्या है, कानून बनाकर मीडिया के लिए मानक तय करना। और बड़ा सवाल ये, इस दिमागी खुराफात को अंजाम देने का रास्ता क्या है। कौन तय करेगा, मीडिया खबरों में किस हद तक मिलावट कर रहा है। आप, मैं, मीडिया संस्थानों के मालिक, इसमें काम करने वाले लोग, सरकार या फिर अदालतें। आखिर क्या है इस कानून का फार्मूला। हमारे देश में कानूनों की फेहरिस्त इतनी लंबी है, हमारी आपकी सामान्य से सामान्य हरकतें भी किसी ना किसी तरह अपराध के दायरे में लाई जा सकती हैं। सरकार तो यही चाहती है कि मीडिया उसके हाथ की कठपुतली क्यों नहीं है। ऐसे में हमारे आपके जैसे कुछ बेहद इमोशनल लोग सरकार का काम आसान करने पर तुले हैं। मैं बिल्कुल नहीं मानता कि मीडिया होने का मतलब है कि हम सौ फीसदी सही हैं…या फिर हम कुछ भी करने, लिखने या दिखाने के हकदार हैं। मगर जनाब खबरों में मिलावट हमीं करते हैं, और हमीं इससे निपट सकते हैं। और इसका बस एक तरीका है…वो ये कि हम सभी अपने अपने स्तर पर उतना करें…जितना हम कर सकते हैं। बाकी अगर किसी को लगता है कि पत्रकारिता के सिध्दांतों का हवाला देकर बौद्धिक जुगाली कर लेने भर से वो सही मायने में चौथे खंभे की नींव को मजबूती दे रहा है…तो माफ कीजिएगा, वो अभी तक समय काल परिस्थितियों की सामान्य समझ नहीं डेवलप कर पाया है…पत्रकारिता तो फिर भी बड़ा टेक्निकल मामला है।
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