ये सूरत बदलनी चाहिए…
(मुझे खुशी है कि मैं गलत साबित हुआ। हिंदी में गलत को गलत कहने वाले वीरों की कोई कमी नहीं है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण नीचे का विरोधपत्र है। हिंदी के 50 से ज्यादा महत्वपूर्ण लेखकों ने योगी आदित्यनाथ के हाथों सम्मानित होने के लिए उदयप्रकाश की निंदा की है। नीचे हस्ताक्षर करने वाले कुछ लेखकों ने सक्रियता दिखाते हुए बाकी लेखकों से टेलीफोन पर विरोधपत्र जारी करने पर सहमति ली है। क्या उदय प्रकाश अब भी कहेंगे कि उनकी आलोचना जातिवादी फासीवादियों की साजिश का नतीजा है: पंकज श्रीवास्तव, सदस्य, कबाड़खाना)
विरोध-पत्र
हमें इस घटना से गहरा आघात पहुंचा है कि कुछ दिनों पहले हिंदी के प्रतिष्ठित और लोकप्रिय साहित्यकार उदय प्रकाश ने गोरखपुर में पहला “कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह स्मृति सम्मान” योगी आदित्यनाथ जैसे कट्टर हिंदुत्ववादी, सामंती और सांप्रदायिक सांसद के हाथों से ग्रहण किया है, जो ‘उत्तर प्रदेश को गुजरात बना देना है’ जैसे फ़ासीवादी बयानों के लिए कुख्यात रहे हैं। हम अपने लेखकों से एक ज़िम्मेदार नैतिक आचरण की अपेक्षा रखते हैं और इस घटना के प्रति सख्त-से-सख्त शब्दों में अपनी नाखुशी और विरोध दर्ज करते हैं।
ज्ञानरंजन
आलोक धन्वा
विद्यासागर नौटियाल
विष्णु खरे
मैनेजर पाण्डेय
लीलाधर जगूड़ी
भगवत रावत
राजेन्द्र कुमार
राजेन्द्र राव
चंचल चौहान
पंकज बिष्ट
इब्बार रब्बी
नीलाभ
वीरेन डंगवाल
मंगलेश डबराल
त्रिनेत्र जोशी
मनीषा पाण्डेय
रविभूषण
प्रदीप सक्सेना
अजय सिंह
जवरीमल्ल पारख
वाचस्पति
अतुल शर्मा
विजय राय
असद ज़ैदी
मदन कश्यप
रवीन्द्र त्रिपाठी
अजेय कुमार
वीरेन्द्र यादव
देवीप्रसाद मिश्र
कात्यायनी
निर्मला गर्ग
अनीता वर्मा
योगेन्द्र आहूजा
बोधिसत्व
संजय खाती
नवीन कुमार नैथानी
कृष्णबिहारी
विनोद श्रीवास्तव
प्रणय कृष्ण
राजेश सकलानी
विजय गौड़
आशुतोष कुमार
मनोज सिंह
सुन्दर चन्द ठाकुर
नीलेश रघुवंशी
आर. चेतनक्रान्ति
पंकज चतुर्वेदी
शिरीष कुमार मौर्य
रामाज्ञा शशिधर
प्रियम अंकित
अंशुल त्रिपाठी
प्रेमशंकर
मृत्युंजय
धीरेश सैनी
अनुराग वत्स
व्योमेश शुक्ल
10 टिप्पणियां:
नई पीढ़ी, July 14, 2009 9:14 PM
‘नई पीढी’ भी इस बात का कदा विरोध जताई है की उदय प्रकाश जैसे लोग एक न केवल साम्प्रदायिक बल्कि कई कत्ले आम की जिम्मेदार व्यक्ति से ‘सम्मान’ ग्रहण करें. उन्हें सम्मानित होने का इतना ही शौक है तो कम से कम ये तो देख लेते की किस भेडिये के हाथों उनका सम्मान हो रहा है.
विजय प्रताप, July 14, 2009 9:18 PM
ये क्या हुआ….
हिंदी के लेखक कवियों का सम्मान का स्तर इतन गिर गया है की वो खुद को हत्यारों के तों सौंप दे. शर्मनाक !
dhiru singh {धीरू सिंह}, July 14, 2009 9:29 PM
गौतम बुद्ध जब ऊँगलीमाल से मिले तब कहीं आप लोग होते उस समय बुद्ध का क्या करते.
स्वप्नदर्शी, July 14, 2009 9:37 PM
I am shocked to see that how much “gutbaazi” is going on in name of sahitya. I hoped to learn “tolerance” from the section of intelligentsia known as “saahityakaar”. And it is very clear to what extent people in this community can go to malign each other.
But this issue of Mr Uday Prakash does not need so much stretching. This blog has used equally abusive tone for him. This is not a revolution, and has nothing to do with any value.
विजय प्रताप, July 14, 2009 9:43 PM
बुद्ध (उदय प्रकाश) उंगलीमाल (मुस्लिममार) से अपने ज्ञान का प्रमाणपत्र लेने गए थे क्या?
बोधिसत्व, July 14, 2009 9:46 PM
मैं उदय प्रकाश जी से यह उम्मीद नहीं रखता था। इसलिए इस दुर्घटना की निंदा करता हूँ और
अपनी नाखुशी और विरोध दर्ज करता हूँ।
संदीप, July 14, 2009 10:27 PM
लेखकों के अलावा साधारण पाठकों की ओर से भी कोई विरोधपत्र जैसा कुछ तैयार किया जाए तो उसपर हस्ताक्षर करने वालों में मेरा नाम भी शामिल करें।
कुछ लोगों को यह गुटबाजी लग रही है, लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता, फिर भी उन्हीं की बात को मान लिया जाये तो भी यह ज़रूर सोचना चाहिये कि जिस चीज या विचार का विरोध हो रहा है वह सही है या गलत और यदि गलत है तो आपको भी विरोध में शामिल होना चाहिए। किसी के साथ आने में आपत्ति हो, तो अलग से ही विरोध कीजिए, लेकिन कीजिए जरूर। क्योंकि अब और सन्नाटा या तटस्थता घातक होगी।
हालांकि, यह बात ज़रूर कहना चाहूंगा कि कबाड़खाना के साथियों ने उदयप्रकाश द्वारा भोगी के हाथों सम्मान लेने का जो विरोध किया है,उसका दायरा बढ़ाएं और फासीवाद के खिलाफ भी व्यापक एकजुटता दिखाएं। वरना, सबको यही लगेगा कि यह विरोध केवल व्यक्तिगत द्वेष के कारण हो रहा है।
अभिषेक मिश्रा, July 14, 2009 11:20 PM
लेखकों की इस घोषणा का स्वागत है.
मुनीश ( munish ), July 14, 2009 11:24 PM
साहित्य से मेरा नाता जो है वो एक उपभोक्ता का है, महज़ पढने वाले का और अब तो वो भी …खैर छोडिये ! क्या रक्खा है इन बातों में बिन चंदा की रातों में. बहरहाल , यहाँ एक नाम विजय गौड़ का देखता हूँ ! ये शख्स अभी अभी जन्स्कार जैसे दुर्गम क्षेत्र से लौटा है ..उसके यात्रा वृत्त पढ़े हैं मैंने . अब यदि ऐसा आदमी कुछ कह रहा है तो क्या कहें –’महाजने गतः येन सः पन्थः ‘, लिखिए जी मेरा भी नाम इन विरोधियों के समर्थकों में.
मुनीश ( munish ), July 14, 2009 11:56 PM
दो बार लिखिए हमारा नाम ! एक पाठक के तौर पे दूसरा नागरिक के तौर पे!









पंकज जी यह सही किया आपने। ये पूरी सूची छाप दी। अब कम से कम हम अंदाजा लगा सकते हैं कि आखिर “साम्प्रदायिक” उदय प्रकाश के ख़िलाफ़ इस “पवित्र” अभियान में कौन-कौन लोग शामिल हैं। इस पूरी सूची में ६० फ़ीसदी सिर्फ़ दो ही जाति के “धर्मनिरपेक्ष” साहित्यकार हैं। सदैव आदरणीय ब्राह्रमण और कायस्थ। वैसे भी साहित्य जगत में इन दोनों जातियों का सबसे अधिक योगदान रहा है। तभी तो हिंदी साहित्य इतनी समृद्ध है। घर-घर में पढ़ी जाती है। उसके लेखक भी खूब समृद्ध हैं। उन्हें सरकारों और बिल्डरों के रहमो-करम पर नहीं जीना पड़ता।
यही वजह है कि पंकज श्रीवास्तव और अशोक पांडे की अगुवाई में ज्ञानरंजन, आलोक धन्वा, विद्यासागर नौटियाल, विष्णु खरे, मैनेजर पाण्डेय, लीलाधर जगूड़ी, मैनेजर पांडे, नीलाभ, वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, त्रिनेत्र जोशी, मनीषा पाण्डेय, रवीन्द्र त्रिपाठी, अजेय कुमार, वीरेन्द्र यादव, देवीप्रसाद मिश्र, विनोद श्रीवास्तव, एवं पंकज चतुर्वेदी जैसे महान धर्मनिरपेक्ष और साम्यवादी विचारक अब लंगोट खोल कर उदय प्रकाश के पीछे चढ़ गए हैं।
मेरा दावा है कि इनमें से किसी भी क्रांतिकारी ने तथाकथित सभ्य समाज में ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए कभी कोई समझौता नहीं किया। ना ही कभी रिश्तों का कोई लिहाज किया है। मेरा ये भी दावा है कि इन महान लोगों में से सबने सामंतवाद की जड़ों को काटने की शुरुआत अपने घरों से की है। पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता जोड़ा है। मैं ये भी दावा करता हूं कि इन महान हस्तियों ने भौतिक सुखों के लिए सत्ता के साथ कभी किसी तरह का गठजोड़ नहीं किया है। ना ही यथास्थितिवाद की रखवाली में जुटी किसी भी व्यवस्था का समर्थन किया है।
तो चलिए हम सब राष्ट्रीय शर्म के इस सबसे बड़े मुद्दे पर मिल कर आंसू बहाए। ज़िंदगी में अच्छे कर्म करने के ऐसे मौके मिलते ही कहां हैं? हमारे समाज में कोई और बुराई कहां है? अब तो बस एक ही लड़ाई बची है कि किसी तरह उदय प्रकाश को उसके महाघृणित कार्य के लिए, जघन्य अपराध के लिए सूली पर चढ़ा दो। साहित्य जगत के मुंह पर पुती कालिख को उसके लहू से मिटा दो।
भाई आप लोगों की मासूमियत पर तरस आता है. आप लोग उदय प्रकाश को न जाने क्या समझते हैं कि उनके एक सांप्रदायिक और हिंसक हिन्दुत्ववादी के हाथों से पुरूस्कार लेने से आहत हो गए. क्या आप उन्हें मुक्तिबोध, शमशेर, निराला, रेणू या प्रेमचंद समझते हैं ? वो महज एक सड़क छाप फुटपाथी और व्यावसायिक लेखक है, लिखना जिसका बिजनेस है. वो अपनी जमात के लेखकों की ही तरह व्यवहार कर रहा है, इसमें आश्चर्य की और आहत होने की क्या बात है ? जब तक सोवियत संघ था, वो वामपंथी बनता था. अब कांग्रेस और बीजेपी दोनों से तालमेल रखना चाहता है. कल बीजेपी शासन में आयी तो उसके पास यह दावा करने का पूरा आधार होगा कि मैं तो हमेशा से आपका था. कल वामपंथियों का शासन आया तो यह उनका भी सगा अपने को साबित कर देगा. छोडिये, कल खुदा न करे तालिबानों का राज्य आ गया तो यह भी साबित कर देगा कि मैं तो हमेशा से … ऐसे लोगों का कोई विचार नहीं होता, सिर्फ पैसा, नाम, ख्याति, सफलता उनका मकसद होती है. शायद उनकी कहानियों से आप धोखा खा गए, जिसमें बड़ी बड़ी बातें हैं. वो बड़ी बड़ी बातें थोड़ी प्रक्टिस के बाद आप भी लिख सकते हैं. वो तो सिर्फ बातें हैं, बिकने वाले शब्द. एक आड़, जिसके पीछे लेखक कातिलों से हाथ मिलाता रहे और पाठक शब्दों में उलझे रहकर वाह वाह करते रहें. इस धोखे और भोलेपन से मुक्ति पाओ.
सच
यह बहस हमेशा से रही है कि लेखक जो लिखता है और जो जीवन जीता है उसमें साम्यता होनी चाहिए या नहीं। उदय प्रकाश जो लिख रहे हैं, वह शायद आज भी उतना ही पंसद किया जा रहा होगा जितना कल था। या किया जाता रहेगा। पर उनके इस कृत्य की भर्त्सना तो जरूर ही होनी चाहिए। लेखक आखिरकार समाज में रहता है । उसके कुछ सामाजिक मूल्य होने ही चाहिए।
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