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बिकाऊ मीडिया से पर्दा उठाने के लिए थैंक यू आम चुनाव!

16 July 2009 3 Comments

मिलावट खिलवाड़ का ही दूसरा नाम है

पूजा प्रसाद

fotooख़बरों में मिलावट ऊपरी तौर पर भले ही ख़बर को केवल सनसनीखेज या ‘कैची’ बनाने का मामला लगता हो, लेकिन कई बार यह मारक साबित होता है। अब इसका क्या कहिए कि आरोप लगते ही ख़बरनवीस आरोपी को अपराधी बना देते हैं और न्यूज सिनॉपसिस ले कर हेडलाइन तक में लिख दिया जाता है कि फलां ने फलां का क़त्ल किया। ख़बर में मिलावट दरअसल घुमा-फिरा कर तथ्यों से छेड़छाड़ का ही मामला है। जिसे, अक्सर हल्के में लेते हुए यह कह दिया जाता है कि सनसनीखेज हो तो ही बिकता है। अपराध की ख़बर हो या राजनीति की, कोई मामला एग्जागरेट करने की हद तक लिख डालने पर रोक होनी ही चाहिए।

आचार संहिता जैसे आत्म निगरानी वाले नियमों का कोई खास फायदा होगा, ऐसा लगता नहीं है। क्योंकि मिलावट के पीछे एक फैक्टर टीआरपी या सर्कुलेशन के प्रेशर से जुड़ा होता है। किसी बिजनेस में केवल वही आचार संहिता काम करती है, जो बिजनेस को मुनाफे की ओर ले जाए। मिलावट को रोकने का कोई भी नियम मुनाफे के ख़‍िलाफ़ होगा, इसलिए इससे विशेष फायदा नहीं होगा।

ख़बरों में मिलावट के खिलाफ़ कानून हो, जुर्माना हो और ‘मिलावट से होने वाले नुकसान के अनुसार’ सज़ा भी हो। सज़ा या जुर्माने का मापक वह नुक़सान हो जो व्यक्ति या संस्था विशेष को ख़बर में मिलावट के चलते पहुंचा है। शुरू में इस तरह के कदम का मीडिया में अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता पर रोक के नाम से विरोध होगा। अंतत: यह मास मीडिया के गिरते स्तर को सुधारेगा और इसे स्वीकार लिया जाएगा। आपसी अस्वास्‍थ्‍यकर प्रतियोगिता भी थमेगी। लेकिन सवाल यहां यह है कि क्या मीडिया में इस बाबत आम सहमति बनेगी? क्या इस मांग को मीडिया द्वारा खुद प्रचारित और प्रसारित किया जाएगा?

(टिप्‍पणीकार युवा जर्नलिस्‍ट हैं और टाइम्‍स ग्रुप से जुड़ी हैं)

पत्रकारिता में हमेशा रही है मिलावट

मृणाल वल्‍लरी

mrinal_1पत्रकारिता में मिलावट थी है और रहेगी। पारंपरिक तरीके से भारतेंदु युग में नहीं जाऊंगी। हां, गोधरा के समय से बात ज़रूर करना चाहूंगी। किस तरह से स्थानीय अख़बारों ने अपनी तरफ से मिलावट करके सांप्रदायिक दंगों को भयानक रूप दे दिया था। ज़रा नंदीग्राम के समय हुए मीडिया कवरेज पर ध्यान दें। बस लालगढ़ आते ही मीडिया की पकाई खिचड़ी की पोल खुलने लगी। अब कोई मानवाधिकार नहीं था। इस साल हुए आम चुनाव में मीडिया के कवरेज पर जितने आरोप लगे वो शायद ही कभी लगे हों। चुनाव से संबंधित ख़बरों के नाम पर प्रत्याशियों की प्रोफाइल। प्रोफाइल माने सब कुछ गुडी गुडी। दो कालम प्रोफाइल ए के नाम और दो कालम प्रोफाइल बी के नाम। अरे इसमें तो कोई मिलावट नहीं। फिर कैसे फैसला लेगा द ग्रेट इंडियन पाठक। अरे बहुत आसान है। बचपन में खेल नहीं खेला। उंगली लेकर शुरू करो। इंटी बिंटी पापर टिंटी… आउट गो यू। जिस पर उंगली गयी वही उम्मीदवार सबसे बेहतर। जा और वोट दे आ।

सवाल है पक्षधरता का। किसी खास वर्ग के पक्ष के लिए खबरों में घालमेल। बिना पक्ष लिये तो ख़बर ही नहीं बन सकती। लेकिन सवाल यह है कि पक्ष लें किसका। सीधी सी बात है, जिसके हाथ में सत्ता है। उसके लाभ के लिये ख़बरों में कुछ भी मिलावट कर लो। मेरी तरह हर मीडियाकर्मी के साथ मीडिया का पाठक दर्शक भी इस बात से पूरी तरह वाकिफ है कि संरक्षणकर्ताओं या विज्ञापनदाताओं के खिलाफ़ एक भी ख़बर नहीं जाएगी। मैं अक्सर बीएसएनएल या एमटीएनएल के खिलाफ़ ढेरों ख़बरें तैयार करती थी। लेकिन मैं तरस जाती थी ऐसी ख़बरों के लिए, जो एयरटेल या रिलायंस के खिलाफ़ हो। मेरे बहुत से दोस्तों ने रिलायंस की मनमानियों के खिलाफ़ पुख्ता सबूत के साथ ख़बरें दी थीं। लेकिन मैं उसे लगवाने में हमेशा नाकाम रही। क्योंकि ख़बर छपने के बाद रिलायंस विज्ञापन नहीं देता। एनसीआर के पन्नों पर काम किया। वहां शॉपिंग मॉल अनियमितताओं के कहर ढा रहे थे। मगर क्या मजाल कि एक ख़बर शॉपिग मॉल्स के खिलाफ़ छप जाए। हां, डेस्क डिस्पैच पर शॉपिंग मॉल्स के गुणगान में ढेरों ख़बरें लिखी जा रही थीं। माफ़ कीजिएगा, अब ऐसे विज्ञापन गान को ख़बर कहने की आदत पड़ गयी है। लेकिन इतना जानती हूं कि ये विज्ञापन गान वाली मिलावटी ख़बरें समाज के सेहत के लिए नुक़सानदेह हैं। इन ख़बरों की पक्षधरता सिर्फ पावर के साथ है। पैसे का पावर, सत्ता का पावर। हमारे इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले दोस्तों को इन सवालों पर कई सेमिनारों में बड़ी मासूमियत से कहते सुना, क्या करें, बहुत कड़ी प्रतियोगिता है। मैं भौंचक होकर रह जाती हूं। प्रतियोगिता तो बहुतों को है। तो फिर किसी डाक्टर के किडनी निकालने पर हल्ला क्यों? किसी थाने में बिना नतीजा निकले केस बंद कर देने पर हल्ला क्यों? क्यों चीन और मेरठ में दुग्ध पदार्थों के मिलावट पर हल्ला बोला? क्या सिर्फ मीडिया वालों को प्रतियोगिता के नाम पर कुछ भी मिलावट करने की छूट है? डाक्टर, पुलिस, हलवाई को क्या मुनाफा नहीं चाहिए, जो ये मिलावट न करें? इन पर उंगली उठाने से पहले हमें अपनी मिलावट को रोकना होगा। नहीं तो जल्दी हमारे खिलाफ़ भी कोई मिलावट कानून बनेगा।

(टिप्‍पणीकार युवा जर्नलिस्‍ट हैं और इंडियन एक्‍सप्रेस समूह से जुड़ी हैं)

वो आवाज़ भी दब जाएगी, जिसमें सच शामिल है

विनीत कुमार

vineet kumar12 जुलाई की शाम देश के मशहूर पत्रकार उदयन शर्मा की याद में आयोजित मीडिया संगोष्ठी में आउटलुक हिंदी के संपादक नीलाभ मिश्र ने जो बात कही है, वो हममें से कई लोगों को एकदम से नयी और बाकी पत्रकारों की समझ से बिल्कुल अलग लग रही है। ऐसा इसलिए भी है कि सोचने और करने के स्तर पर चाहे अधिकांश पत्रकार वही कर रहे हों, जिसे नीलाभ ने मीडिया के लिए अब तक प्रचलित शब्दों से अलग टर्मनलॉजी का इस्तेमाल करते हुए कहा है, लेकिन विचारने के स्तर पर नीलाभ जैसा क्लियर स्टैंड नहीं बना पाये हैं। पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग है, जो अभी तक इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि पत्रकारिता के नाम पर वो जो कुछ भी कर रहा है, दरअसल बाजार के बीच की बाकी गतिविधियों की तरह ही एक किस्म की गतिविधि है। वो दिन-रात पाठक और ऑडिएंस की चिंता शामिल करते हुए उसके नाम पर वो सब कुछ लिख रहा है, दिखा रहा है, जिससे कि आम पाठक और ऑडिएंस की समझ में इज़ाफा होने के बजाय बाज़ार, पूंजी और दमन करनेवाली मशीनरी के हाथ मज़बूत होते हैं, लेकिन अपने को इस तरह की गतिविधि में शामिल होने से साफ बचाना चाहता है। इसलिए वो अपनी जुबान से ये बात मानने को तैयार है कि मीडिया के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है वो सब बकवास है, कूड़ा है, इसमें अधकचरापन है – खुद ऑफिस से निकलते हुए ये कहता है कि बंडलबाजी करते हुए एक दिन और बीत गया, लेकिन ये बात सुनने के लिए तैयार नहीं है कि वो ये सब कुछ मीडिया संस्थान के मालिकों की इच्छा और इशारे से कर रहा है… बाज़ार की शर्तों के आगे गुलाम होकर कर रहा है। इसलिए नीलाभ जब ये कहते हैं कि जिस तरह से दूध सहित बाकी उपभोक्ता वस्तुओं में मिलावट होने की स्थिति में उसके उत्पादकों के खिलाफ शिकायत की जाती है, तो ख़बरों के मामले में ऐसा क्यों नहीं – तो लगता है कि मीडिया को दुरुस्त करने की दिशा में एक नये पहलू को समझने की चिंता सामने आ रही है। ख़बरों को उत्पाद और पाठक को खालिस उपभोक्ता समझने से एकबारगी तो ऐसा लगता है कि मीडिया विमर्श का एक नया सिरा हाथ लग गया है और इसके जरिए मीडिया और दर्शकों-पाठकों के बीच अमन का राग गाया-बजाया जा सकता है। लेकिन, ठहर कर सोचिए तो नीलाभ जो बात कह रहे हैं, वो मीडिया में फैले कचरे को दूर करने से कहीं ज्यादा इस बात को घोषित करने की मुहिम ज्यादा है कि कुछ भी करने से पहले आप ये मानिए कि आप लोगों के बीच हाथ में कलम, की-बोर्ड और बाइक लिये जहां खड़े हैं, वो समाज सुधारकों की पवित्र भूमि होने के बजाय बाज़ार है, जहां कि मानवीय संवेदना, भावना और बड़े-बड़े मूल्यों के लागू होने के बजाय बाज़ार की शर्तें लागू होंगी।

नीलाभ ने मीडिया के कचरे को दूर करने के लिए, उसके अंदर घुल चुके मिलावटीपन को फिल्टर करने के लिए जो उपाय बताये हैं, ज़रूरी नहीं कि व्यवहार के स्तर पर वो उसी रूप में काम करेंगे, जैसा कि हर उपाय को सोचने के दौरान किये जाते हैं। हर कानून को बनाने के पहले शैतान से साधु बनने की प्रक्रिया एकदम से दिमाग़ में घूमने लग जाती है। मुझे लगता है कि नीलाभ के इन नये शब्दों के छिलके को अगर उतार दें, तो पूरी बहस एक बार फिर मीडिया मिशन या प्रोफेशन है, के दायरे में चक्कर काटने लगती है। हां, यहां हम उनकी बातों के मुरीद इसलिए बन गये हैं कि उन्होंने साहस के साथ ये मान लिया है कि पत्रकारिता मिशन के बजाय बाज़ार का हिस्सा है और हमें इसके बारे में उसी तरीके से सोचने चाहिए जिस तरह से बाज़ार को रेगुलेट करने की दिशा में सोचते हैं। हमें पाठकों पर नैतिकता, मानव मूल्य जैसे भारी-भरकम एहसान करने के बजाय एक उपभोक्ता के तौर पर न्याय करने की दिशा में सोचना होगा। ऐसा करते हुए नीलाभ मीडिया विमर्श करने आये बुद्धिजीवियों के दरवाजे़ को बदल देते हैं। अब तक दिन-रात बाजार के भीतर रह कर खाने-कमाने वाले लोग जैसे ही विमर्श के लिए आते हैं, तो वो उसी दरवाजे़ से न आकर साहित्य, नैतिक शिक्षा, समाजशास्त्र के दरवाजे़ से घुस कर आ जाते हैं। सब कुछ अच्छा-अच्छा बोल कर निकल जाते हैं। नीलाभ इन दरवाजों से आने के बजाय उसी दरवाजे़ से आने की बात करते हैं, जिससे कि उनका रोज़ का आना-जाना होता है। मीडिया विमर्श के लिए अलग से पूजाघर बनाने की ज़रूरत को सिरे से नकार देते हैं।

मुझे लगता है कि मौजूदा मीडिया, चाहे वो प्रिंट हो, इलेक्ट्रॉनिक हो और अब वेब, इन सबके ऊपर कानून और आयोग जैसे मसले के साथ जोड़कर देखने से पहले इस बात पर विचार करने की ज़रूरत ज्यादा है कि बुनियादी तौर पर इसकी प्रकृति क्या है, ख़बरों को जुटाने से लेकर पेश किये जाने तक का तरीका कैसा है, उसके पीछे की शर्तें किस रूप में काम करती हैं। इसे जाने-समझे औऱ विश्लेषित किये बिना आप चाहे जितने भी कानून बना दें, वो पेनकीलर (pain killer) का काम करेगा, कोई ठोस निदान संभव न हो सकेगा। अब देखिए न, अभी तक प्रिंट मीडिया ने देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों से संपादकीय पन्नों पर टेलीविजन और न्यूज़ चैनलों के विरोध में जम कर लिखवाया। भला हो लिखनेवाले का कि बिना वस्तुस्थिति को समझे ही टीवी और न्यूज़ चैनलों के खिलाफ़ लिखते रहे। कभी इसे सामाजिक संदर्भ से जोड़ कर ग़लत साबित किया, कभी इसके प्रभाव को लेकर नकारात्मक लिखा और रही-सही कसर ये कह कर निकालते रहे कि ये पूंजी के हाथों बिका हुआ माध्यम है, उपभोक्ता संस्कृति को बढ़ावा देता है। नतीजा ये हुआ कि इनके लिखने का टेलीविजन देखनेवाले लोगों पर कितना असर हुआ, इसे तो छोड़ दीजिए लेकिन प्रिंट मीडिया को दूध का धुला साबित करने का एक महौल बनाया। ऐसा महौल कि टेलीविजन में काम करनेवाले सारे लोग अनपढ़ हैं, कम जानकार लोग हैं जबकि प्रिंट के लोग विश्लेषण की ताक़त रखतें हैं, भले ही वो दिनभर साइट से उठा-उठाकर जर्जर अनुवाद हमारे सामने ख़बर की शक्ल में रखते हों। ये तो 2009 के लोकसभा चुनाव का शुक्रिया अदा कीजिए, जिसने कि मज़बूत सरकार देने से ज़्यादा ये साबित कर दिया कि प्रिंट मीडिया बाज़ार के हाथों ज़्यादा बुरी तरह बिके हैं, ख़बरों के नाम पर मिलावटी का काम न्यूज़ चैनलों से ज्यादा यहां हुआ है। इसलिए पहला काम जो कि मुझे लगता है, माध्यमों के स्तर पर साधु और शैतान साबित करने का, जेनरेशन के आधार पर मसीहा और हैवान साबित करने का और प्रस्तुति के स्तर पर अवतार रूप और भांड रूप देने का जो काम चल रहा है, वो बंद होने चाहिए। पहले आप इसे समझिए कि आप जो कर रहे हैं वो कर क्या रहे हैं, किसके लिए कर रहे हैं, इसका असर क्या हो सकता है, आपके लिए कितना टिकाऊ है ऐसा करना। उसके बाद कानून और आयोग को लेकर बात कीजिए। इसे आप मैनेजमैंट का आरवाइ यानी रिस्पॉन्सीविलिटी योरसेल्फ कह सकते हैं।

अंतिम बात कि अगर आपको पूरे मीडिया में बाज़ार ही इतना ज़रूरी लगता है तो उसे ईमानदारीपूर्वक, स्थिर होकर सोचने की कोशिश कीजिए। आपको बाज़ार की वास्तविकता को समझने के नाम पर न तो उसका ग़ुलाम बनने की ज़रूरत है और न ही उसका भोंपा बनने की अनिवार्यता। ऐसा होने से एक धारणा पनपती है कि बिना मोटी पूंजी के मीडिया का चलना संभव ही नहीं है। अब देखिए कि जिन अख़बारों ने पैसे लेकर चुनावी ख़बरें छापी, उन्होंने कितने सस्ते में मीडिया का बट्टा लगा दिया। बाज़ार का एक शब्द है, ब्रांड इमेज। उसे समझ ही नहीं पाये। अब है कि मीडिया की ऐसी हर ख़बर झूठी मानी जाने लग जाएगी, जिनको लेकर परेशानी पैदा हो सकती है। वो तमाम लोग इसकी जम कर आलोचना करेंगे, मीडिया की उस आवाज़ को दबाने की कोशिश करेंगे जिसमें सच भी शामिल है। जाहिर हममें से कोई नहीं चाहते कि स्वार्थवश, क्षुद्रताओं की आड़ में जिस तरह की हरकतें जारी हैं उसे मीडिया आलोचना की कैटेगरी में शामिल कर लें और हम भी उसमें शामिल हो जाएं।

(टिप्‍पणीकार चर्चित ब्‍लॉगर और मीडिया विशेषज्ञ हैं)

कानून को कोर्ट में ही आराम करने दें

विपिन चौधरी

vipin chaudhariजब ज़माना ही मिलावट का हो, तो ख़बरें बिना मिलावट के कैसे और कहां तक बची रह सकती हैं। हमारे यहां सुरेंद्र प्रताप जैसे निष्‍ठावान पत्रकार का उदाहरण सामने हो, तो यह तो माना ही जा सकता है कि ख़बरें सौ प्रतिशत शुद्ध भी होती हैं। आज भी कुछ पत्रकार ऐसे अवश्य हैं, जो आग में कूद कर सच को सामने लाने का साहस रखते हैं। आज जब अख़बारों में धुंआधार प्रतियोगिता का दौर जारी हो और सब को धक्का मारते हुए आगे निकल जाने का चालू मुहावरा अमल में लाया जा रहा हो, बहुत मुमकिन है कि ख़बर खालिस ख़बर न हो कर मसाला ही हो। फिर चाहे उस मसाले के सेवन से पाठक की सेहत पर बुरा असर ही क्यों ना हो।

हमारे देश में क़ानून तो फकत लिखत-पढ़त का मामला ही पेश करता है। कोई भी कानून ढंग से लागू हुआ हो, ऐसा अब तक कम ही प्रकाश में आ सका है। तो अब हम किस नये कानून पर मुंह धोये बैठे हैं – जो अब ख़बरों में मिलावट पर शिकंजा कसेगा – सो बात सिर्फ और सिर्फ पत्रकार के ईमान और उसकी मेहनत पर जा ठहरती है। सो कानून को कोर्ट में ही आराम करने दें और अपनी पाठक और पत्रकार दोनों को अपनी आंखों को खुला रखना होगा, केवल तब ही तस्वीर खुद ब खुद साफ होगी।

हां, मोहल्ला लाइव की इस सार्थक बहस से यह ज़रूर हुआ है कि आम पाठकजन को यह ज़रूर मालूम हो गया है कि आज की तारीख़ में ख़बरों में मिलावट भी एक मुद्दा है और बेहद ज़रूरी मुद्दा है।

(टिप्‍पणीकार ब्‍लॉगर हैं और रेडियो पत्रकारिता से जुड़ी हैं)

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3 Comments »

  • shambhugaon said:

    आपके अंदर की पत्रकारिता जिंदा रहे… बहुत अच्छा है आप लोग जिस समुह में हैं… उसमें तो सुधार करने की आपकी औकात नहीं है या नौकरी के डर से करेंगे ही नहीं… बस ब्लॉग के जरिए बौद्धिक दस्त करते रहिए… या अगर इतनी ही आग है तो अपने ग्रूप टाइम्स ग्रूप या एक्सप्रेस ग्रूप या मेरे दोस्त जो सरकारी रुपए खा रहे है वो सड़क पर निकलकर संघर्ष करें… या वो मैडम जो रेडियो पर गाना सुनाती हैं या समाचार वाचती है… पता नहीं वो क्यों नहीं अपने माध्यम से इसका हल निकालती हैं… ये तो वहीं हुआ विचार कुछ और व्यवहार कुछ और,,, भाइयों और बहनों अगर हिम्मत है तो अपने अपने माध्यम में आग उगलकर दिखाओं… नहीं तो चलने दो… जैसे चल रहा है.. क्यों बौद्धिकता झाड़ रहे हैं… अविनाश जी का ब्लॉग है उसे इस लिए पढ़ता हूं क्योंकि वो कहते नहीं बल्कि करते हैं… नौकरी को कई बार लात मार चुके हैं… वैसे आपके मनमोहक सुंदर तस्वीर हिन्दुस्तान में छपी मृणाल पांडे की तस्वीर को भी फिका कर रही है… बस एक दो किताब हाथ में रख लेते…

  • samjho said:

    खबरें खबरें हें इन्हें मजाक न समझो. खबरें पढ़ क्रर आपने अपनी सोच में बदलाव क्र लिया हो, एसा तो कदाचित नहीं
    हुआ होगा. फिर काहे की चिंता चलने दीजेये जो चल रहा हे. खबरें सुन कर आप दींन भर उसकी चर्चा दिन भर इधर -उधर
    करते ही तो फिरते रहते हें. बीएस इतना भर ही तो है . यदी आपको कोइ खबर ऐसी लगती है की आपका मन ना मान रहा
    हो तो न मानो . पर जब क्या करोगे यदि आपके बेटे का सलेक्शन कीसी कम्पनी में हो गया है.उसकी खबर छापी है कम्पनी
    ने. फीर भी ना मानीये आप . कम से कम खबरों का अस्तित्व तो स्वीकार कीजिए . शायद आप समझ गये होगे . थोडी को
    ज्यादा समझें ….अलविदा ऐ पढ़ने वालो ….सलामत रहो ….

  • काशिफ आरिफ said:

    आप लोगो के लेख पढकर मुझे मेरे शहर आगरा में प्रचलित एक कहावत याद आ गयी….

    “दुसरों को नसीहत और अपने को वसीहत”

    कालीचरन फ़िल्म में कादर खान जी ने एक डायलाग बोला था कि “कीचड को साफ़ करने के लिये कीचड में उतरना पडता है”

    आप लोग इस मैदान में है और आप लोगो का लेख पढने के बाद दिल करता है कि आपसे उम्मीद की जाये कि आप लोग इस गन्दगी को अपने – अपने तरीके दुर करने की कोशिश करेंगे

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