उदय जी… यह व्यक्तिगत क्या होता है?
अशोक कुमार पाण्डेय
कई दिनों से बड़े दुखी मन से देख रहा था यह सब…
आज रहा नही गया। यह व्यक्तिगत क्या होता है? उदय जी आपको दिवंगत कुंवर साहब के प्रति पूरा आदर रखने की आजादी है पर उसके लिए सार्वजनिक समारोह में एक हत्यारे के साथ बैठना? इन व्यक्तिगतों से लड़कर ही लेखक विचार की राह पर आगे बढ़ता है। आप आज अपने ख़िलाफ़ बोलने वालों को जातिवादी कह रहे हैं। बहुत विनम्रता से बता दूँ किजिस कालेज में आपके दिवंगत अग्रज पढाते थे वह उसी गोरखनाथ मन्दिर द्वारा संचालित होता है जिसका मठाधीश यह हत्यारा है और इस कालेज पर एक विशेष जाति का शतप्रतिशत वर्चस्व है…उसी जाति का जिसका होना योगी बनने के लिए ज़रूरी है। आप यायावर नही हैं – हिन्दी के तमाम लेखकों से ज्यादा बेहतर स्थिति है आपकी। कृपया इसे महिमामंडित ना करें…त्रिलोचन जी और विष्णु प्रभाकर को गए बहुत दिन नही गुज़रे।
आपने गौ पट्टी पर भरपूर कीचड़ उछाला तो यहाँ के एक और आदमी की याद आ गयी। गोरख पांडे नाम था उसका …
शायद लोगों को पता नहीं कि आप वहां कह चुके हैं कि साहित्यकारों को विचार के चौखटे में क़ैद नहीं होना चाहिये और योगी ने उसी मंच से कुंवर साहब को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक बताया था। आपका बयान अमर उजाला में छपा है और यह बयान जिन उदय प्रकाश सिंह के नाम से छपा उन्हे हम अब तक बस उदय प्रकाश ही मानते थे। पेपर कटिंग मेरे पास है।आप सबको गरियाईये … आपको यह अधिकार है कुंवर साहब। जो परमानंद जी ने कहा वह फिर कभी…इस पाप में आपके वह इकलौते भागीदार थे। सांप्रदायिकता के विरोध के झण्डाबरदार कमला प्रसाद क्या इस घटना के बाद उन्हें सज़्ज़ाद ज़हीर के संगठन से बाहर निकालेंगे? किसी को उम्मीद नहीं…मुझे भी नहीं।
उदय जी एक खुला सच है कि आज हिन्दी का पूरा लेखन कास्मेटिक विरोध और सुविधा का लेखन है पर आप तो ख़ुद को हमेशा से पार्टी विथ ऐ डिफरेंस बताते रहे ना…
इसीलिए तो ज्यादा दुःख हुआ था…
पर अब नहीं…अब कोई भ्रम नहीं रहा।
(कब सोचा था इस ब्लाग पर पहली पोस्ट ऐसी लिखनी होगी)
7 टिप्पणियां:
अभिषेक मिश्रा, July 15, 2009 9:43 PM
यह इस चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है. एक लेखक का व्यक्तिगत क्या होता है. उदय प्रकाश जी का कहना है की वह एक पारिवारिक कार्यक्रम था. उनसे पूछा जाना चाहिए की वहां वे ‘कुंवर’ नरेन्द्र प्रताप सिंह के भाई के तौर पर सम्मानित हुए थे या हिंदी के लेखक उदय प्रकाश के रूप में. निश्चित रूप से वे हिंदी के लेखक उदय प्रकाश के रूप में सम्मानित हुए थे.जैसा की अखबार की खबर बताती हैं. क्या लेखक होना एक पारिवारिक चीज होती है ?
और यदि एक बार यह मान भी ले की यह उदय प्रकाश जी का पारिवारिक कार्यक्रम था. तब तो उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. क्या एक संवेदनशील और जागरूक व्यक्ति अपने पारिवारिक कार्यक्रम में किसी साम्प्रदायिक हत्यारे को बुला सकता है ? क्या हम अपनी प्रतिबद्धताओं के लिए परिवार में संघर्ष नहीं करते ?
मैं इस बहस को इस दृष्टिकोण से देखने का पुरजोर विरोध करता हूँ की यह उदय प्रकाश और कबाड़खाने के बीच का मामला है. या उदय प्रकाश ने जो अशोक पांडे जी के बारे में अनाप शनाप कहा है वही असली मुद्दा है. और उदय यदि अशोक से माफ़ी मांग लें तो इसको जल्दी से रफा दफा कर देना चाहिए.
वस्तुतः यह हमारे बौद्धिक जीवन में वैधता ग्रहण कर रहे पाखण्ड का मुद्दा है. यह उदय प्रकाश और परमानन्द श्रीवास्तव में अपने चरम रूप में सामने आ गया है. आदित्यनाथ के पैर छूने वाले ये वही परमानंद श्रीवास्तव हैं जो सालों तक आलोचना जैसी पत्रिका का संपादन करते रहे. ये हमारे वरिष्ठ आलोचक डोमा जी उस्ताद (जो बनता है बलबन) के नवरत्नों में शामिल हो कर इतना कृतज्ञ महसूस कर रहे थे की अपने को रोक नपाए.
यह केवल इन दो व्यक्तियों का मामला नहीं है. ये दोनों तो इस हद तक गिर गए की साम्प्रदायिक हिंसा में लिप्त उस गुंडे के चरणों में लोट गए.
लेकिन मामला इतना ही नहीं है. यह ओफिसिअल वामपंथ की राजनीति के पाखण्ड का भी मामला है. मेरा कहना है की सिंगुर नंदीग्राम और लालगढ़ के बाद जहां तापसी मल्लिक जैसी कई किशोरियों का cpm के गुंडों द्वारा सामूहिक बलात्कार किया गया हो. किसानों पर cpm वालों ने पुलिस के वर्दी में आ कर गोलियां चलाईं हो . cpm ke कार्यकर्त्ता जहां नए जमींदार बन कर किसानों मजदूरों और आदिवासियों पर जुल्म ध रहें हो. ऐसे समय में cpm जैसी छद्म कम्युनिस्ट पार्टियों के लेखक संगठनों में रहना क्या नैतिक है ?
आज लेखक को साफ़ तय करना होगा की वह लालगढ़ में किसके साथ है वह निरपेक्ष नहीं रह सकता.
अशोक कुमार पाण्डेय, July 15, 2009 9:51 PM
बिल्कुल ठीक बात है
ना तो ये सब गोरखपुर की उस सभा में शुरु हुआ और ना ही किसी माफ़ी से समाप्त हो जायेगा।चर्चाअ इसी पर होनी चाहिये कि वामपंथ हिंदी के लेखकों के लिये बस दुधारु गाय है या वैचारिक प्रतिबद्धता?
Syed Ali Hamid, July 15, 2009 10:31 PM
I have learnt one thing from this long drawn debate— that Hindi writers are as fiercely divided on political ideology lines as are the Indian historians.Thankfully, this is not the case with Indian English writers. For me, literature is,basically, expression of human emotions; that it may voice social concerns, philosophy etc. is quite natural,but, in my opinion, it should not become propagandist.
I, therefore, have nothing to say on this debate except that I have known Ashok Pandey for over 20 years ; he used to be my student in Nainital during the mid-80′s. From what I know of him, he is neither communal nor casteist. The allegation that he is a casteist is, I feel, quite unwarranted. He is a very talented young man and a gentle soul. I’m, of course, not giving him any certificate; who am I to do that anyway? I’m only saying what I truly feel. I hope that members and visitors of this blog will, at least, concede him this much.
अशोक कुमार पाण्डेय, July 15, 2009 10:41 PM
अब इस माहौल में कबाडी बना तो स्वागत क्या खाक होता।
पर मै अशोक कुमार पाण्डेय हूं ग्वालियर से
अजित वडनेरकर, July 15, 2009 10:48 PM
शुक्रिया अशोक जी। इस सिलसिले में आपका कुछ कहना सबसे जरूरी था।
अशोक कुमार पाण्डेय, July 15, 2009 10:54 PM
क्यूं भला?
pol, July 16, 2009 1:06 AM
व्यक्तिगत क्या होता है? अब ये भी लोग पूछने लगे हैं। मतलब किसी भी सूरत में उदय प्रकाश को छोड़ा नहीं जाएगा। अशोक कुमार पांडेय जी, व्यक्तिगत क्या होता ये ज्योति बसु से पूछिए… जो भैरो सिंह शेखावत जैसे भगवा नेताओं का स्वागत करते हैं और उनके साथ बैठ कर बात करते हैं। व्यक्तिगत क्या होता है ये ममता बनर्जी से जाकर पूछिए कि रेल मंत्री बनने के बाद ज्योति बसु से मुलाकात करती हैं और उनकी तारीफ करती हैं। निजी संबंध होते हैं और विचारधाराओं की सीमाओं से बाहर जाकर भी निजी संबंध होते हैं। ये आपकी समझ में नहीं आएगा। अगर आपकी समझ में आता तो आप छोटी सी बात का बतंगड़ नहीं बनाते। किसी सभा में कोई पहुंचा है घर के लोगों को उसी इलाके में रहना है। वहां पर योगी को बुला दिया गया है। जिसे वहां कभी कभार जाकर रहना है… आप उससे ये उम्मीद कीजिएगा कि वो मंच पर जाकर ये एलान कर दे कि मैं योगी के साथ मंच साझा नहीं करुंगा।
अशोक कुमार पांडेय जी (ग्वालियर वाले) आप अपने बंधु कबाड़ी पंकज श्रीवास्तव के करीबी हैं। क्या आपने उनसे कभी पूछा है कि जिस लाले के यहां वो काम करते हैं उसकी सभा (कार्यक्रम की बात नहीं कर रहा हूं… आधिकारिक सभा की बात कर रहा हूं) में जब कोई बीजेपी का नेता पहुंचता है तो यह कह कर बाहर चले जाते हैं कि मैं एक फासीवादी के साथ सभा में हिस्सा नहीं लूंगा। कभी आपने अनिल यादव से पूछा है कि भई एक घोर साम्प्रदायिक पार्टी के सांसद की कंपनी में काम करते वक़्त क्या कभी उनकी गैरत उन्हें ललकारती नहीं? क्या कभी महान अनिल यादव जी को ये भी लगता है कि ऐसे जीने से मर जाना बेहतर? तब वो भी कहेंगे कि रोजी रोटी के लिए इतना समझौता तो करना पड़ता है। अरे जनाब ईमान बचाइये .. रोजी रोटी के लिए दलाली तो तुच्छ लोग कहते हैं। आपका तो लक्ष्य बड़ा है… ज़िंदगी का ध्येय बड़ा है… संघर्ष के लिए जीवन समर्पित है… अब बहुत हो चुकी दलाली। एक बार यलगार कर ही दीजिए। और क्यों नहीं इस नेक काम की शुरुआत वो अपनी कंपनी के मालिक के ख़िलाफ़ विरोध पत्र लिख कर करें।
आप लोग कमाल की बात करते हैं। लगता है कि सोचने-समझने की सारी शक्ति चली गई है। दिमागी दिवालियापन हो गया है। वरना आप यह नहीं कहते कि “जिस कालेज में आपके दिवंगत अग्रज पढाते थे वह उसी गोरखनाथ मन्दिर द्वारा संचालित होता है जिसका मठाधीश यह हत्यारा है और इस कालेज पर एक विशेष जाति का शतप्रतिशत वर्चस्व है…उसी जाति का जिसका होना योगी बनने के लिए ज़रूरी है”। कहीं आप यह तो नहीं कहना चाहते कि गोरखनाथ मठ से अगर क्षत्रियों का वर्चस्व समाप्त करके ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित कर दिया जाएगा तो वो साम्प्रदायिक से धर्मनिरपेक्ष हो जाएगा। अगर ऐसा है तो चलिए उस मठ के अगले मठाधीश के तौर पर आपका नाम प्रस्तावित किया जाए। हैरत होती है आप सबकी सोच पर। अगर विरोध करना है कि पूरे कर्मकांड का विरोध कीजिए। विरोध करना ही है तो सभी मठों का विरोध कीजिए। यह कहने का क्या मतलब कि किस मठ पर किस जाति का कब्जा है।
खैर छोड़िए… आप सबसे क्या बात की जाए। आपमें तो इतनी सहिष्णुता भी नहीं बची है कि अगर किसी व्यक्ति ने कोई सफाई दे दी है तो उसे वहीं छोड़ दें। उसे इतना वक़्त तो दें कि थोड़ा शांत मन से अपनी गलती पर कुछ सोच ले। लेकिन आप सभी ने उसे जीवन मरण का प्रश्न बना लिया है। कभी अशोक पांडे, हल्द्वानी वाले तलवार भांजने लगते हैं तो कभी अशोक कुमार पांडेय (ग्वालियर वाले) त्यौरियां चढ़ाने लगते हैं। अरे भई, युद्ध की भी एक मर्यादा होती है। लेकिन बदला लेने और हिसाब चुकाने के उन्माद में फंसे आप लोगों की समझ में ये बातें कहां से आएंगी। आप सभी का एक ही एजेंडा है कि जिस तरह कबाड़खाना में लगी सूची से उदय प्रकाश को निकाल बाहर किया… ठीक उसी तरह उन्हें साहित्य के सभी मंचों से निकाल बाहर करें। ऐसी सोच रखने वाले आप सभी कबाड़ी तो नहीं हो सकते। कबाड़ी तो वो गरीब होता है जो कूड़ा बीन कर माहौल को साफ-सुथरा रखता है। आप लोग तो खाए-पिए-अघाए घरों के … सामंती प्रवृति के वो लोगों हैं जो कूड़ा फैलाते हैं। आप लोग ने तो कबाड़ियों के मुंह पर कालिख पोत दी।









रंगनाथ जी / पोल खोल जी
पता नहीं आप जातिबोध से बाहर नहीं निकल पा रहे। अगर मैं पूछूं कि कुंवर साहब से कोई रिश्तेदारी है तो यह बेहद अश्लील होगा। लेकिन आप जानेबूझे बिना लगातार हर किसी के साथ यही किये जा रहे हैं। आपकी रुचि मुद्दे से ज़्यादा कौन किसको कितना जानता है इसमें है। पंकज जी या अनिल जी तो छोडिये अपने हमनाम को भी मैं बस उनके अनुवादों के लिये जानता था। आप एक अजीब से महानताबोध में जी रहे हैं जहां आपको हर कोई बस नाम- दाम कमाने के लिये लिखता नज़र आता है।
व्यक्तिगत कार्यक्रमों के इश्तेहार अखबारों में शाया नहीं होते न उनमे मंच लगाकर भाषण दिये जाते हैं। अगर यह शोकसभा होती तो किसे एतराज़ था…पर यह सम्मान सभा थी जहां उदय प्रकाश सिंह (यही नाम छपा था अखबार और आमंत्रण में) ने कहा कि अब विचार की कोई ज़रूरत नहीं और लेखक को विचार के चौखटे में नहीं बंधना चाहिये। अगर आप भी यही मानते हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना पर मुक्तिबोध और मार्क्स की माला देखकर भ्रम तो होता है ना। चूंकि आप इस अनाम पोल्खोल के सवाल का जवाब चाहते हैं तो प्रश्न में आपको शामिल क्यों ना माना जाये।
और किसी जाति के वर्चस्व का विरोध क्या दूसरी जाति के वर्चस्व की स्थापना के लिये ही होता है? यही करना होता तो क्या बात थी गोरखपुर मे तिवारी हाता से सब परिचित है और उस दौर के साथी बतायेंगे कि हमारा उससे क्या रिश्ता रहा है।
सूची से शिकायत है आपको शायद सूचना से भी हो कि काश दब गया होता यह सब्। दूसरों के दामन पर दाग़ होने से अपना दाग़ छुप जाता है क्या? मैने अपनी पोस्ट मे वैसे भी इस ओर भरपूर इशारा किया था। और यहां हुई छिछालेदर के बाद ही उदय अब सहिष्णुता दिखा रहे हैं वरना शुरुआत जिस भाषा में हुई थी सच तो वही है।
इसे नेट की सफ़लता मानिये कि जो पत्रिका में महीनों में होता वह यहां दिनो मे हुआ और आज यह उदय जी के कारनामे के खिलाफ़ हुआ है तो कल औरों के खिलाफ़ भी होगा।
रहा सवाल नौकरी का तो भैया यहां अपने देश में कौन सी क्रांतिकारी संस्था है जहां से दाल रोटी कमाने जाया जाय? सारे प्रेस, एन जी ओ और यह ब्लागस्पेस भी अन्तत पूंजीपतियों की सम्पत्ति हैं। पर नौकरी करने और मंच शेयर करने में फ़र्क होता है। पोलखोल साहब ज़रूर उदय फ़ैन्स क्लब के होलटाईमर होंगे।
मैं काहें का बदला लूंगा उदय जी से? उनका कितना बडा फैन रहा हूं वह जानते हैं। दुख यही था कि जिस योगी के खिलाफ़ उनकी कविताओं के पोस्टर बनाये उसी से उन्होंने सम्मान ले लिया।
और खाये अघाये सब हैं। कोई झोपडी में रहकर लालटेन में नही लिखता। सब चलते हैं एसी में और रहते हैं लक्जरी फ़्लैट में तो इस क्लीशे मे अब कोई दम नहीं
निश्चित रूप से उदय प्रकाश समकालीन साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखते है.
किन्तु वे अब व्यक्तिवादी हो गए है. ये सम्मान उन्हें नहीं लेना चाहिए था.
एक लेखक की सामाजिक छवि भी अच्छी होनी चाहिए . ये उदय प्रकाश का
का विचलन है. उनके लिए और अंत में प्रार्थना ही की जा सकती है.
दिल्ली की हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष !
हमारे हाजी साहब बहुत काम के आदमी हैं। उनसे किसी भी विषय पर राय ली जा सकती है और वे किसी भी विषय पर टिप्पणी कर सकते हैं। सुबह-सुबह पढ़ा कि दिल्ली की हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष एक व्यंग्यकार को बनाया गया है, तो उनके पास दौड़ गया। हाजी साहब की एक खूबी और है। कई बार वे मन की बात भांप लेते हैं। उन्होंने ठंडे पानी के गिलास से मेरा स्वागत किया और बोले, ‘बैठो, बैठो। मैं समझ गया कि कौन-सी बात तुम्हें बेचैन कर रही है।’ मैंने आपत्ति की, ‘हाजी साहब, मैं किसी राजनीतिक मामले पर चरचा करने नहीं आया हूं।’ हाजी साहब – ‘हां, हां, मैं भी समझता हूं कि तुम जी-5, जी-8 और जी-14 पर बात करने नहीं आए हो। ये पचड़े मेरी भी समझ में नहीं आते। इस तरह सब अलग-अलग बैठक करेंगे, तो संयुक्त राष्ट्र का क्या होगा? कुछ दिनों के बाद तो वहां कुत्ते भी नहीं भौंकेंगे। लेकिन तुम आए हो राजनीतिक चर्चा के लिए ही, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं।’ मुझे हक्का-बक्का देख कर उन्होंने अपनी बात साफ की, ‘तुम्हें यही बात परेशान कर रही है न कि हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष पहली बार एक व्यंग्यकार को बनाया गया है!’
मैं विस्फारित नेत्रों से उनकी ओर देखता रह गया। वे बोले जा रहे थे, ‘बेटे, यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक है। यह तो तुम्हें पता ही होगा कि दिल्ली की मुख्यमंत्री ही यहां की हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष हैं। वे साहित्यकर्मी नहीं, राजनीतिकर्मी हैं। साहित्यकर्मी होतीं, तो इस प्रस्ताव पर ही उनकी हंसी छूट जाती। राजनीतिकर्मी हैं, सो आंख से नहीं, कान से देखती हैं। उनके साहित्यिक सलाहकारों ने कह दिया होगा कि इस समय एक व्यंग्यकार से ज्यादा उपयुक्त कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री जी ने बिना कुछ पता लगाए, बिना सोचे-समझे ऑर्डर पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे। इसमें परेशान होने की बात क्या है? बेटे, दुनिया ऐसे ही चलती है। हमारा राष्ट्रीय मोटो भी तो यही कहता है – सत्यमेव जयते। आज का सत्य राजनीति है। सो राजनीति ही सभी अहम चीजों का फैसला करेगी। वाकई कुछ बदलाव लाना चाहते हो, तो तुम्हें राजनीति ज्वायन कर लेना चाहिए।’
मेरे मुंह का स्वाद खट्टा हो आया। मैंने यह तो सुना था कि साहित्य में राजनीति होती है, पर यह नहीं मालूम था कि राजनीति में भी साहित्य होता है। आजकल राजनीति की मुख्य खूबी यह है कि मेसेज छोड़े जाते हैं और संकेत दिए जाते हैं। हाजी साहब से पूछा, ‘फिर तो आप कहेंगे कि एक शीर्ष व्यंग्यकार के हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने में भी कुछ संकेत निहित हैं !’ हाजी साहब ने मुसकराते हुए कहा, ‘तुम मूर्ख हो और मूर्ख ही रहोगे। संकेत बहुत स्पष्ट है कि यह व्यंग्य का समय है। पहले दावा किया जाता था कि यह कहानी का समय है, कोई कहता था कि नहीं, कविता का समय अभी गया नहीं है, तो कोई दावा करता था कि उपन्यास का समय लौट आया है। हिन्दी अकादमी का नया चयन बताता है कि यह व्यंग्य का समय है। व्यंग्य से बढ़ कर इस समय कोई और विधा नहीं है।’
मैंने अपना साहित्य ज्ञान बघारने की कोशिश की, ‘हाजी साहब, आप ठीक कहते हैं। आज हर चीज व्यंग्य बन गई है। हिन्दी में तो व्यंग्य की बहार है। कविता में व्यंग्य, कहानी में व्यंग्य, उपन्यास में व्यंग्य, संपादकीय टिप्पणियों में व्यंग्य — व्यंग्य कहां नहीं है? एक साहित्यिक पत्रिका ने तो अपने एक विशेषांक के लेखकों का परिचय भी व्यंग्यमय बना दिया था। क्या इसी आधार पर आप कहना चाहते हैं कि व्यंग्य इस समय हिन्दी साहित्य की टोपी है — इसके बिना कोई भी सिर नंगा लगता है। शायद इसीलिए सभी लेखक एक-दूसरे पर व्यंग्य करते रहते हैं। कभी सार्वजनिक रूप से कभी निजी बातचीत में।’
हाजी साहब बोले, ‘तुम कहते हो तो होगा। पर मेरे दिमाग में कुछ और बात थी। हिन्दी में तो दिल्ली शुरू से ही व्यंग्य का विषय रही है। इस समय मुझे दिल्ली पर दिनकर जी की कविता याद आ रही है – वैभव की दीवानी दिल्ली ! / कृषक-मेध की रानी दिल्ली ! / अनाचार, अपमान, व्यंग्य की / चुभती हुई कहानी दिल्ली ! डॉ. लोहिया ने लिखा है कि दिल्ली एक बेवफा शहर है। यह कभी किसी की नहीं हुई। पूरा देश दिल्ली की संवेदनहीनता पर व्यंग्य करता है। लेकिन दिल्ली पहले से ज्यादा पसरती जाती है। हड़पना उसके स्वभाव में है। इसी दिल्ली में कभी हड़पने को ले कर कौरव-पांडव युद्ध हुआ था। इसलिए अगर आज दिल्ली में व्यंग्य को इतना महत्व दिया जा रहा है, तो इसमें हैरत की बात क्या है? तुम भी मस्त रहो और जुगाड़ बैठाते रहो। यहां जुगाड़ बैठाए बिना जीना मुश्किल है।’
मैंने कहा, ‘हाजी साहब, लगता है, आज आपका मूड ठीक नहीं है। मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे ! मेरा जुगाड़ होता, तो मैं मुंह बनाए आपके पास क्यों आता?’ हाजी साहब – ‘नहीं, नहीं, मैं तुम्हें अलग से थोड़े ही कुछ कह रहा था। मैं तो तुम्हें युग सत्य की याद दिला रहा था। हर युग का सत्य यही है कि युग सत्य को सभी जानते हैं, पर उसे जबान पर कोई नहीं लाता। अपनी रुसवाई किसे अच्छी लगती है?’
मैंने हाजी साहब का आदाब किया और चलने की ख्वाहिश जाहिर की। हाजी साहब का आखिरी कलाम था – ‘आदमी की फितरत ही ऐसी है। फर्ज करो, तुमसे पूछा जाता कि जनाब, आप हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनेंगे, तो क्या तुम इनकार कर देते? क्या तुम यह कहने की हिम्मत दिखाते कि ‘मुआफ कीजिए, दिल्ली में बड़े बड़े काबिल लोग बैठे हैं। मैं तो उनके पांवों की धूल हूं। मुझसे पहले उनका हक है।’ आती हुई चीज को कोई नहीं छोड़ता। यहां तो लोग तो जाती हुई चीज को भी बांहों में जकड़ कर बैठ जाते हैं। और जब आना-जाना किसी नियम से न होता हो, तो अक्लमंदी इसी में है कि हवा में तैरती हुई चीज को लपक कर पकड़ लिया जाए। सागर उसी का है जो उठा ले बढ़ाके हाथ।’
राजकिशोर
साहित्यिक कार्यक्रमों के दौरान शाम को दारू चढाने के बाद तथाकथित प्रगतिशील साहित्यकारों का असली चेहरा तो कई बार देखा था लेकिन उदय जी तो दिन में ही उस सुरूर में बहक गये. परमानन्द जी भी अपना पैंट उतार kr उसके निचे के हलके भगवा रंग वाले हाफ पैंट को आखिर दिखा ही दिए.
चलो अच्छा ही हुआ.इनको प्रगतिशील मानने की gलत फहमी में रहने वाले कई साहित्यिक जीवो को अपने को करेक्ट करने का मौका समय रहते ही मिल गया.पूर्वांचल को गुजरात बनाने की बार -२ धमकी देने वाले दंगाई के साथ आने की क्या कीमत मिली है ,इसे आपके समर्थक जरुर जानना चाहेंगे.”बाबा मझंदर” की शिक्षाओं को दफ़न करके सांप्रदायिकता की फसल बोने वाले योगी ने -सामाजिक समरसता का प्रतिक गोरख धाम को ,पूर्वांचल की राजपूत लाबी के राजनितिक केंद्र के बतौर विकशित करदिया है.भला इसे कौन नही जनता ? lgता है अब आपने साम्प्रदायिकता की” स्याही से “rajput-योगी गाथा”लिखने का मन बना ही लिया है.
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