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	<title>Comments on: उदय जी&#8230; यह व्यक्तिगत क्या होता है?</title>
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		<title>By: O P  Pal</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/07/16/udayji-what-is-the-personal/comment-page-1/#comment-355</link>
		<dc:creator>O P  Pal</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Jul 2009 12:52:31 +0000</pubDate>
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		<description>साहित्यिक कार्यक्रमों के दौरान   शाम को दारू चढाने के बाद तथाकथित प्रगतिशील साहित्यकारों का असली चेहरा तो कई बार देखा था लेकिन उदय जी तो दिन में ही उस सुरूर में बहक गये. परमानन्द जी भी अपना पैंट उतार kr उसके निचे के हलके भगवा रंग वाले  हाफ  पैंट  को आखिर दिखा ही दिए. 
चलो अच्छा ही हुआ.इनको  प्रगतिशील मानने की  gलत फहमी में रहने वाले कई साहित्यिक जीवो को अपने को करेक्ट करने का मौका समय रहते ही मिल गया.पूर्वांचल को गुजरात बनाने की बार -२ धमकी देने वाले दंगाई के साथ आने की क्या कीमत मिली है ,इसे आपके समर्थक जरुर जानना चाहेंगे.&quot;बाबा मझंदर&quot; की शिक्षाओं को दफ़न करके सांप्रदायिकता की फसल बोने वाले  योगी ने -सामाजिक समरसता  का प्रतिक गोरख धाम को  ,पूर्वांचल की राजपूत लाबी के राजनितिक केंद्र के बतौर विकशित करदिया है.भला इसे कौन नही जनता ? lgता है अब आपने साम्प्रदायिकता  की&quot; स्याही से &quot;rajput-योगी गाथा&quot;लिखने का मन बना ही लिया है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>साहित्यिक कार्यक्रमों के दौरान   शाम को दारू चढाने के बाद तथाकथित प्रगतिशील साहित्यकारों का असली चेहरा तो कई बार देखा था लेकिन उदय जी तो दिन में ही उस सुरूर में बहक गये. परमानन्द जी भी अपना पैंट उतार kr उसके निचे के हलके भगवा रंग वाले  हाफ  पैंट  को आखिर दिखा ही दिए.<br />
चलो अच्छा ही हुआ.इनको  प्रगतिशील मानने की  gलत फहमी में रहने वाले कई साहित्यिक जीवो को अपने को करेक्ट करने का मौका समय रहते ही मिल गया.पूर्वांचल को गुजरात बनाने की बार -२ धमकी देने वाले दंगाई के साथ आने की क्या कीमत मिली है ,इसे आपके समर्थक जरुर जानना चाहेंगे.&#8221;बाबा मझंदर&#8221; की शिक्षाओं को दफ़न करके सांप्रदायिकता की फसल बोने वाले  योगी ने -सामाजिक समरसता  का प्रतिक गोरख धाम को  ,पूर्वांचल की राजपूत लाबी के राजनितिक केंद्र के बतौर विकशित करदिया है.भला इसे कौन नही जनता ? lgता है अब आपने साम्प्रदायिकता  की&#8221; स्याही से &#8220;rajput-योगी गाथा&#8221;लिखने का मन बना ही लिया है.</p>
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		<title>By: suresh neerv</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/07/16/udayji-what-is-the-personal/comment-page-1/#comment-338</link>
		<dc:creator>suresh neerv</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2009 14:57:40 +0000</pubDate>
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		<description>दिल्ली की हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष ! 
हमारे हाजी साहब बहुत काम के आदमी हैं। उनसे किसी भी विषय पर राय ली जा सकती है और वे किसी भी विषय पर टिप्पणी कर सकते हैं। सुबह-सुबह पढ़ा कि दिल्ली की हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष एक व्यंग्यकार को बनाया गया है, तो उनके पास दौड़ गया। हाजी साहब की एक खूबी और है। कई बार वे मन की बात भांप लेते हैं। उन्होंने ठंडे पानी के गिलास से मेरा स्वागत किया और बोले, ‘बैठो, बैठो। मैं समझ गया कि कौन-सी बात तुम्हें बेचैन कर रही है।’ मैंने आपत्ति की, ‘हाजी साहब, मैं किसी राजनीतिक मामले पर चरचा करने नहीं आया हूं।’ हाजी साहब – ‘हां, हां, मैं भी समझता हूं कि तुम जी-5, जी-8 और जी-14 पर बात करने नहीं आए हो। ये पचड़े मेरी भी समझ में नहीं आते। इस तरह सब अलग-अलग बैठक करेंगे, तो संयुक्त राष्ट्र का क्या होगा? कुछ दिनों के बाद तो वहां कुत्ते भी नहीं भौंकेंगे। लेकिन तुम आए हो राजनीतिक चर्चा के लिए ही, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं।’ मुझे हक्का-बक्का देख कर उन्होंने अपनी बात साफ की, ‘तुम्हें यही बात परेशान कर रही है न कि हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष पहली बार एक व्यंग्यकार को बनाया गया है!’ 


मैं विस्फारित नेत्रों से उनकी ओर देखता रह गया। वे बोले जा रहे थे, ‘बेटे, यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक है। यह तो तुम्हें पता ही होगा कि दिल्ली की मुख्यमंत्री ही यहां की हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष हैं। वे साहित्यकर्मी नहीं, राजनीतिकर्मी हैं। साहित्यकर्मी होतीं, तो इस प्रस्ताव पर ही उनकी हंसी छूट जाती। राजनीतिकर्मी हैं, सो आंख से नहीं, कान से देखती हैं। उनके साहित्यिक सलाहकारों ने कह दिया होगा कि इस समय एक व्यंग्यकार से ज्यादा उपयुक्त कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री जी ने बिना कुछ पता लगाए, बिना सोचे-समझे ऑर्डर पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे। इसमें परेशान होने की बात क्या है? बेटे, दुनिया ऐसे ही चलती है। हमारा राष्ट्रीय मोटो भी तो यही कहता है - सत्यमेव जयते। आज का सत्य राजनीति है। सो राजनीति ही सभी अहम चीजों का फैसला करेगी। वाकई कुछ बदलाव लाना चाहते हो, तो तुम्हें राजनीति ज्वायन कर लेना चाहिए।’ 


मेरे मुंह का स्वाद खट्टा हो आया। मैंने यह तो सुना था कि साहित्य में राजनीति होती है, पर यह नहीं मालूम था कि राजनीति में भी साहित्य होता है। आजकल राजनीति की मुख्य खूबी यह है कि मेसेज छोड़े जाते हैं और संकेत दिए जाते हैं। हाजी साहब से पूछा, ‘फिर तो आप कहेंगे कि एक शीर्ष व्यंग्यकार के हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने में भी कुछ संकेत निहित हैं !’ हाजी साहब ने मुसकराते हुए कहा, ‘तुम मूर्ख हो और मूर्ख ही रहोगे। संकेत बहुत स्पष्ट है कि यह व्यंग्य का समय है। पहले दावा किया जाता था कि यह कहानी का समय है, कोई कहता था कि नहीं, कविता का समय अभी गया नहीं है, तो कोई दावा करता था कि उपन्यास का समय लौट आया है। हिन्दी अकादमी का नया चयन बताता है कि यह व्यंग्य का समय है। व्यंग्य से बढ़ कर इस समय कोई और विधा नहीं है।’ 


मैंने अपना साहित्य ज्ञान बघारने की कोशिश की, ‘हाजी साहब, आप ठीक कहते हैं। आज हर चीज व्यंग्य बन गई है। हिन्दी में तो व्यंग्य की बहार है। कविता में व्यंग्य, कहानी में व्यंग्य, उपन्यास में व्यंग्य, संपादकीय टिप्पणियों में व्यंग्य -- व्यंग्य कहां नहीं है? एक साहित्यिक पत्रिका ने तो अपने एक विशेषांक के लेखकों का परिचय भी व्यंग्यमय बना दिया था। क्या इसी आधार पर आप कहना चाहते हैं कि व्यंग्य इस समय हिन्दी साहित्य की टोपी है -- इसके बिना कोई भी सिर नंगा लगता है। शायद इसीलिए सभी लेखक एक-दूसरे पर व्यंग्य करते रहते हैं। कभी सार्वजनिक रूप से कभी निजी बातचीत में।’ 


हाजी साहब बोले, ‘तुम कहते हो तो होगा। पर मेरे दिमाग में कुछ और बात थी। हिन्दी में तो दिल्ली शुरू से ही व्यंग्य का विषय रही है। इस समय मुझे दिल्ली पर दिनकर जी की कविता याद आ रही है - वैभव की दीवानी दिल्ली ! / कृषक-मेध की रानी दिल्ली ! / अनाचार, अपमान, व्यंग्य की / चुभती हुई कहानी दिल्ली ! डॉ. लोहिया ने लिखा है कि दिल्ली एक बेवफा शहर है। यह कभी किसी की नहीं हुई। पूरा देश दिल्ली की संवेदनहीनता पर व्यंग्य करता है। लेकिन दिल्ली पहले से ज्यादा पसरती जाती है। हड़पना उसके स्वभाव में है। इसी दिल्ली में कभी हड़पने को ले कर कौरव-पांडव युद्ध हुआ था। इसलिए अगर आज दिल्ली में व्यंग्य को इतना महत्व दिया जा रहा है, तो इसमें हैरत की बात क्या है? तुम भी मस्त रहो और जुगाड़ बैठाते रहो। यहां जुगाड़ बैठाए बिना जीना मुश्किल है।’ 


मैंने कहा, ‘हाजी साहब, लगता है, आज आपका मूड ठीक नहीं है। मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे ! मेरा जुगाड़ होता, तो मैं मुंह बनाए आपके पास क्यों आता?’ हाजी साहब – ‘नहीं, नहीं, मैं तुम्हें अलग से थोड़े ही कुछ कह रहा था। मैं तो तुम्हें युग सत्य की याद दिला रहा था। हर युग का सत्य यही है कि युग सत्य को सभी जानते हैं, पर उसे जबान पर कोई नहीं लाता। अपनी रुसवाई किसे अच्छी लगती है?’ 


मैंने हाजी साहब का आदाब किया और चलने की ख्वाहिश जाहिर की। हाजी साहब का आखिरी कलाम था – ‘आदमी की फितरत ही ऐसी है। फर्ज करो, तुमसे पूछा जाता कि जनाब, आप हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनेंगे, तो क्या तुम इनकार कर देते? क्या तुम यह कहने की हिम्मत दिखाते कि ‘मुआफ कीजिए, दिल्ली में बड़े बड़े काबिल लोग बैठे हैं। मैं तो उनके पांवों की धूल हूं। मुझसे पहले उनका हक है।’ आती हुई चीज को कोई नहीं छोड़ता। यहां तो लोग तो जाती हुई चीज को भी बांहों में जकड़ कर बैठ जाते हैं। और जब आना-जाना किसी नियम से न होता हो, तो अक्लमंदी इसी में है कि हवा में तैरती हुई चीज को लपक कर पकड़ लिया जाए। सागर उसी का है जो उठा ले बढ़ाके हाथ।’ 

राजकिशोर</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दिल्ली की हिन्दी अकादमी में उपाध्यक्ष !<br />
हमारे हाजी साहब बहुत काम के आदमी हैं। उनसे किसी भी विषय पर राय ली जा सकती है और वे किसी भी विषय पर टिप्पणी कर सकते हैं। सुबह-सुबह पढ़ा कि दिल्ली की हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष एक व्यंग्यकार को बनाया गया है, तो उनके पास दौड़ गया। हाजी साहब की एक खूबी और है। कई बार वे मन की बात भांप लेते हैं। उन्होंने ठंडे पानी के गिलास से मेरा स्वागत किया और बोले, ‘बैठो, बैठो। मैं समझ गया कि कौन-सी बात तुम्हें बेचैन कर रही है।’ मैंने आपत्ति की, ‘हाजी साहब, मैं किसी राजनीतिक मामले पर चरचा करने नहीं आया हूं।’ हाजी साहब – ‘हां, हां, मैं भी समझता हूं कि तुम जी-5, जी-8 और जी-14 पर बात करने नहीं आए हो। ये पचड़े मेरी भी समझ में नहीं आते। इस तरह सब अलग-अलग बैठक करेंगे, तो संयुक्त राष्ट्र का क्या होगा? कुछ दिनों के बाद तो वहां कुत्ते भी नहीं भौंकेंगे। लेकिन तुम आए हो राजनीतिक चर्चा के लिए ही, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूं।’ मुझे हक्का-बक्का देख कर उन्होंने अपनी बात साफ की, ‘तुम्हें यही बात परेशान कर रही है न कि हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष पहली बार एक व्यंग्यकार को बनाया गया है!’ </p>
<p>मैं विस्फारित नेत्रों से उनकी ओर देखता रह गया। वे बोले जा रहे थे, ‘बेटे, यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक है। यह तो तुम्हें पता ही होगा कि दिल्ली की मुख्यमंत्री ही यहां की हिन्दी अकादमी की अध्यक्ष हैं। वे साहित्यकर्मी नहीं, राजनीतिकर्मी हैं। साहित्यकर्मी होतीं, तो इस प्रस्ताव पर ही उनकी हंसी छूट जाती। राजनीतिकर्मी हैं, सो आंख से नहीं, कान से देखती हैं। उनके साहित्यिक सलाहकारों ने कह दिया होगा कि इस समय एक व्यंग्यकार से ज्यादा उपयुक्त कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री जी ने बिना कुछ पता लगाए, बिना सोचे-समझे ऑर्डर पर हस्ताक्षर कर दिए होंगे। इसमें परेशान होने की बात क्या है? बेटे, दुनिया ऐसे ही चलती है। हमारा राष्ट्रीय मोटो भी तो यही कहता है &#8211; सत्यमेव जयते। आज का सत्य राजनीति है। सो राजनीति ही सभी अहम चीजों का फैसला करेगी। वाकई कुछ बदलाव लाना चाहते हो, तो तुम्हें राजनीति ज्वायन कर लेना चाहिए।’ </p>
<p>मेरे मुंह का स्वाद खट्टा हो आया। मैंने यह तो सुना था कि साहित्य में राजनीति होती है, पर यह नहीं मालूम था कि राजनीति में भी साहित्य होता है। आजकल राजनीति की मुख्य खूबी यह है कि मेसेज छोड़े जाते हैं और संकेत दिए जाते हैं। हाजी साहब से पूछा, ‘फिर तो आप कहेंगे कि एक शीर्ष व्यंग्यकार के हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने में भी कुछ संकेत निहित हैं !’ हाजी साहब ने मुसकराते हुए कहा, ‘तुम मूर्ख हो और मूर्ख ही रहोगे। संकेत बहुत स्पष्ट है कि यह व्यंग्य का समय है। पहले दावा किया जाता था कि यह कहानी का समय है, कोई कहता था कि नहीं, कविता का समय अभी गया नहीं है, तो कोई दावा करता था कि उपन्यास का समय लौट आया है। हिन्दी अकादमी का नया चयन बताता है कि यह व्यंग्य का समय है। व्यंग्य से बढ़ कर इस समय कोई और विधा नहीं है।’ </p>
<p>मैंने अपना साहित्य ज्ञान बघारने की कोशिश की, ‘हाजी साहब, आप ठीक कहते हैं। आज हर चीज व्यंग्य बन गई है। हिन्दी में तो व्यंग्य की बहार है। कविता में व्यंग्य, कहानी में व्यंग्य, उपन्यास में व्यंग्य, संपादकीय टिप्पणियों में व्यंग्य &#8212; व्यंग्य कहां नहीं है? एक साहित्यिक पत्रिका ने तो अपने एक विशेषांक के लेखकों का परिचय भी व्यंग्यमय बना दिया था। क्या इसी आधार पर आप कहना चाहते हैं कि व्यंग्य इस समय हिन्दी साहित्य की टोपी है &#8212; इसके बिना कोई भी सिर नंगा लगता है। शायद इसीलिए सभी लेखक एक-दूसरे पर व्यंग्य करते रहते हैं। कभी सार्वजनिक रूप से कभी निजी बातचीत में।’ </p>
<p>हाजी साहब बोले, ‘तुम कहते हो तो होगा। पर मेरे दिमाग में कुछ और बात थी। हिन्दी में तो दिल्ली शुरू से ही व्यंग्य का विषय रही है। इस समय मुझे दिल्ली पर दिनकर जी की कविता याद आ रही है &#8211; वैभव की दीवानी दिल्ली ! / कृषक-मेध की रानी दिल्ली ! / अनाचार, अपमान, व्यंग्य की / चुभती हुई कहानी दिल्ली ! डॉ. लोहिया ने लिखा है कि दिल्ली एक बेवफा शहर है। यह कभी किसी की नहीं हुई। पूरा देश दिल्ली की संवेदनहीनता पर व्यंग्य करता है। लेकिन दिल्ली पहले से ज्यादा पसरती जाती है। हड़पना उसके स्वभाव में है। इसी दिल्ली में कभी हड़पने को ले कर कौरव-पांडव युद्ध हुआ था। इसलिए अगर आज दिल्ली में व्यंग्य को इतना महत्व दिया जा रहा है, तो इसमें हैरत की बात क्या है? तुम भी मस्त रहो और जुगाड़ बैठाते रहो। यहां जुगाड़ बैठाए बिना जीना मुश्किल है।’ </p>
<p>मैंने कहा, ‘हाजी साहब, लगता है, आज आपका मूड ठीक नहीं है। मुझ पर ही व्यंग्य करने लगे ! मेरा जुगाड़ होता, तो मैं मुंह बनाए आपके पास क्यों आता?’ हाजी साहब – ‘नहीं, नहीं, मैं तुम्हें अलग से थोड़े ही कुछ कह रहा था। मैं तो तुम्हें युग सत्य की याद दिला रहा था। हर युग का सत्य यही है कि युग सत्य को सभी जानते हैं, पर उसे जबान पर कोई नहीं लाता। अपनी रुसवाई किसे अच्छी लगती है?’ </p>
<p>मैंने हाजी साहब का आदाब किया और चलने की ख्वाहिश जाहिर की। हाजी साहब का आखिरी कलाम था – ‘आदमी की फितरत ही ऐसी है। फर्ज करो, तुमसे पूछा जाता कि जनाब, आप हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनेंगे, तो क्या तुम इनकार कर देते? क्या तुम यह कहने की हिम्मत दिखाते कि ‘मुआफ कीजिए, दिल्ली में बड़े बड़े काबिल लोग बैठे हैं। मैं तो उनके पांवों की धूल हूं। मुझसे पहले उनका हक है।’ आती हुई चीज को कोई नहीं छोड़ता। यहां तो लोग तो जाती हुई चीज को भी बांहों में जकड़ कर बैठ जाते हैं। और जब आना-जाना किसी नियम से न होता हो, तो अक्लमंदी इसी में है कि हवा में तैरती हुई चीज को लपक कर पकड़ लिया जाए। सागर उसी का है जो उठा ले बढ़ाके हाथ।’ </p>
<p>राजकिशोर</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: govind mathur</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/07/16/udayji-what-is-the-personal/comment-page-1/#comment-337</link>
		<dc:creator>govind mathur</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2009 13:28:06 +0000</pubDate>
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		<description>निश्चित  रूप से   उदय  प्रकाश  समकालीन  साहित्य  में  महत्वपूर्ण  स्थान  रखते है.
      किन्तु  वे  अब  व्यक्तिवादी   हो गए है.   ये सम्मान  उन्हें  नहीं  लेना  चाहिए   था.
      एक लेखक  की  सामाजिक  छवि  भी  अच्छी  होनी  चाहिए .  ये उदय प्रकाश  का 
     का विचलन है.  उनके  लिए और  अंत  में प्रार्थना  ही की जा सकती है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>निश्चित  रूप से   उदय  प्रकाश  समकालीन  साहित्य  में  महत्वपूर्ण  स्थान  रखते है.<br />
      किन्तु  वे  अब  व्यक्तिवादी   हो गए है.   ये सम्मान  उन्हें  नहीं  लेना  चाहिए   था.<br />
      एक लेखक  की  सामाजिक  छवि  भी  अच्छी  होनी  चाहिए .  ये उदय प्रकाश  का<br />
     का विचलन है.  उनके  लिए और  अंत  में प्रार्थना  ही की जा सकती है.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: ashok</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/07/16/udayji-what-is-the-personal/comment-page-1/#comment-335</link>
		<dc:creator>ashok</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2009 12:45:29 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://mohallalive.com/?p=1719#comment-335</guid>
		<description>रंगनाथ जी / पोल खोल जी

पता नहीं आप जातिबोध से बाहर नहीं निकल पा रहे। अगर मैं पूछूं कि कुंवर साहब से कोई रिश्तेदारी है तो यह बेहद अश्लील होगा। लेकिन आप जानेबूझे बिना लगातार हर किसी के साथ यही किये जा रहे हैं। आपकी रुचि मुद्दे से ज़्यादा कौन किसको कितना जानता है इसमें है। पंकज जी या अनिल जी तो छोडिये अपने हमनाम को भी मैं बस उनके अनुवादों के लिये जानता था। आप एक अजीब से महानताबोध में जी रहे हैं जहां आपको हर कोई बस नाम- दाम कमाने के लिये लिखता नज़र आता है।

व्यक्तिगत कार्यक्रमों के इश्तेहार अखबारों में शाया नहीं होते न उनमे मंच लगाकर भाषण दिये जाते हैं। अगर यह शोकसभा होती तो किसे एतराज़ था…पर यह सम्मान सभा थी जहां उदय प्रकाश सिंह (यही नाम छपा था अखबार और आमंत्रण में) ने कहा कि अब विचार की कोई ज़रूरत नहीं और लेखक को विचार के चौखटे में नहीं बंधना चाहिये। अगर आप भी यही मानते हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना पर मुक्तिबोध और मार्क्स की माला देखकर भ्रम तो होता है ना। चूंकि आप इस अनाम पोल्खोल के सवाल का जवाब चाहते हैं तो प्रश्न में आपको शामिल क्यों ना माना जाये।

और किसी जाति के वर्चस्व का विरोध क्या दूसरी जाति के वर्चस्व की स्थापना के लिये ही होता है? यही करना होता तो क्या बात थी गोरखपुर मे तिवारी हाता से सब परिचित है और उस दौर के साथी बतायेंगे कि हमारा उससे क्या रिश्ता रहा है।

सूची से शिकायत है आपको शायद सूचना से भी हो कि काश दब गया होता यह सब्। दूसरों के दामन पर दाग़ होने से अपना दाग़ छुप जाता है क्या? मैने अपनी पोस्ट मे वैसे भी इस ओर भरपूर इशारा किया था। और यहां हुई छिछालेदर के बाद ही उदय अब सहिष्णुता दिखा रहे हैं वरना शुरुआत जिस भाषा में हुई थी सच तो वही है।
इसे नेट की सफ़लता मानिये कि जो पत्रिका में महीनों में होता वह यहां दिनो मे हुआ और आज यह उदय जी के कारनामे के खिलाफ़ हुआ है तो कल औरों के खिलाफ़ भी होगा।

रहा सवाल नौकरी का तो भैया यहां अपने देश में कौन सी क्रांतिकारी संस्था है जहां से दाल रोटी कमाने जाया जाय? सारे प्रेस, एन जी ओ और यह ब्लागस्पेस भी अन्तत पूंजीपतियों की सम्पत्ति हैं। पर नौकरी करने और मंच शेयर करने में फ़र्क होता है। पोलखोल साहब ज़रूर उदय फ़ैन्स क्लब के होलटाईमर होंगे।

मैं काहें का बदला लूंगा उदय जी से? उनका कितना बडा फैन रहा हूं वह जानते हैं। दुख यही था कि जिस योगी के खिलाफ़ उनकी कविताओं के पोस्टर बनाये उसी से उन्होंने सम्मान ले लिया।

और खाये अघाये सब हैं। कोई झोपडी में रहकर लालटेन में नही लिखता। सब चलते हैं एसी में और रहते हैं लक्जरी फ़्लैट में तो इस क्लीशे मे अब कोई दम नहीं</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रंगनाथ जी / पोल खोल जी</p>
<p>पता नहीं आप जातिबोध से बाहर नहीं निकल पा रहे। अगर मैं पूछूं कि कुंवर साहब से कोई रिश्तेदारी है तो यह बेहद अश्लील होगा। लेकिन आप जानेबूझे बिना लगातार हर किसी के साथ यही किये जा रहे हैं। आपकी रुचि मुद्दे से ज़्यादा कौन किसको कितना जानता है इसमें है। पंकज जी या अनिल जी तो छोडिये अपने हमनाम को भी मैं बस उनके अनुवादों के लिये जानता था। आप एक अजीब से महानताबोध में जी रहे हैं जहां आपको हर कोई बस नाम- दाम कमाने के लिये लिखता नज़र आता है।</p>
<p>व्यक्तिगत कार्यक्रमों के इश्तेहार अखबारों में शाया नहीं होते न उनमे मंच लगाकर भाषण दिये जाते हैं। अगर यह शोकसभा होती तो किसे एतराज़ था…पर यह सम्मान सभा थी जहां उदय प्रकाश सिंह (यही नाम छपा था अखबार और आमंत्रण में) ने कहा कि अब विचार की कोई ज़रूरत नहीं और लेखक को विचार के चौखटे में नहीं बंधना चाहिये। अगर आप भी यही मानते हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना पर मुक्तिबोध और मार्क्स की माला देखकर भ्रम तो होता है ना। चूंकि आप इस अनाम पोल्खोल के सवाल का जवाब चाहते हैं तो प्रश्न में आपको शामिल क्यों ना माना जाये।</p>
<p>और किसी जाति के वर्चस्व का विरोध क्या दूसरी जाति के वर्चस्व की स्थापना के लिये ही होता है? यही करना होता तो क्या बात थी गोरखपुर मे तिवारी हाता से सब परिचित है और उस दौर के साथी बतायेंगे कि हमारा उससे क्या रिश्ता रहा है।</p>
<p>सूची से शिकायत है आपको शायद सूचना से भी हो कि काश दब गया होता यह सब्। दूसरों के दामन पर दाग़ होने से अपना दाग़ छुप जाता है क्या? मैने अपनी पोस्ट मे वैसे भी इस ओर भरपूर इशारा किया था। और यहां हुई छिछालेदर के बाद ही उदय अब सहिष्णुता दिखा रहे हैं वरना शुरुआत जिस भाषा में हुई थी सच तो वही है।<br />
इसे नेट की सफ़लता मानिये कि जो पत्रिका में महीनों में होता वह यहां दिनो मे हुआ और आज यह उदय जी के कारनामे के खिलाफ़ हुआ है तो कल औरों के खिलाफ़ भी होगा।</p>
<p>रहा सवाल नौकरी का तो भैया यहां अपने देश में कौन सी क्रांतिकारी संस्था है जहां से दाल रोटी कमाने जाया जाय? सारे प्रेस, एन जी ओ और यह ब्लागस्पेस भी अन्तत पूंजीपतियों की सम्पत्ति हैं। पर नौकरी करने और मंच शेयर करने में फ़र्क होता है। पोलखोल साहब ज़रूर उदय फ़ैन्स क्लब के होलटाईमर होंगे।</p>
<p>मैं काहें का बदला लूंगा उदय जी से? उनका कितना बडा फैन रहा हूं वह जानते हैं। दुख यही था कि जिस योगी के खिलाफ़ उनकी कविताओं के पोस्टर बनाये उसी से उन्होंने सम्मान ले लिया।</p>
<p>और खाये अघाये सब हैं। कोई झोपडी में रहकर लालटेन में नही लिखता। सब चलते हैं एसी में और रहते हैं लक्जरी फ़्लैट में तो इस क्लीशे मे अब कोई दम नहीं</p>
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