विज्ञापन ख़बरों की शक्ल में आने लगे हैं, कुछ बोलिए…
पत्रकारों में मिलावट पर बात करें, खबरों में नहीं
अभिषेक श्रीवास्तव
दरअसल जिस मसले पर बात हो रही है, उसका उद्देश्य बहस के प्रस्थान बिंदु से जुदा मालूम पड़ता है। सबसे पहले नीलाभ की बात को लें। उन्होंने जो भी बात उदयन शर्मा की पुण्यतिथि वाले कार्यक्रम में कही, उसमें वह यह मान कर चल रहे थे कि खबर ‘उपभोग’ की सामग्री है, खबर सुनने या देखने वाला ‘उपभोक्ता’ और खबर तैयार करने वाला या लाने वाला ‘दुकानदार’। यह बाज़ार का फॉर्मूला है। ज़ाहिर है, इस फॉर्मूले के तहत सामग्री यानी खबर में मिलावट तो होगी ही, क्योंकि मिलावट अतिरिक्त मुनाफा कमाने की तरकीब है जो बाज़ार को स्वीकार्य है। यदि ऐसा है, तो खबर के मामले में उपभोक्ताओं के हित कानून बनाने में कोई दिक्कत नहीं। शौक से बनाइए। हां, यह कानून ‘पत्रकारिता को पटरी पर लाने’ में कामयाब नहीं होगा, इतना तय है। (और हां, नीलाभ की बात पर इतना लहालोट होने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि उनका ब्रह्मवाक्य पत्रकारिता से कोई ताल्लुक नहीं रखता, न ही इस बहस के मूल उद्देश्य से। ऐसे वाक्य सार्वजनिक सभाओं में नौकरी बचाने के लिहाज से पहले से ही तैयार कर लिए जाते हैं)।
‘पत्रकारिता को पटरी पर लाने’ का उद्देश्य बाज़ार के तर्क के दायरे में संभव नहीं। इसीलिए मैंने सबसे पहले कहा, कि ‘बहसतलब मसले का उद्देश्य बहस के प्रस्थान बिंदु से जुदा है।’ आप कोई भी उपभोक्ता कानून बना लें, पत्रकारिता में सुधार नहीं ला सकते। वजह साफ है। पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जिसमें एक नैतिक मूल्य प्रणाली (वैल्यू सिस्टम) अंतर्निहित होती है। यह नैतिक मूल्य खबर बनाने की प्रक्रिया से जुड़े लोगों की निजी नैतिकता पर निर्भर करता है। सांस्थानिक दबाव, मालिक की विचारधारा, उसका राजनीतिक एजेंडा, टीआरपी, रीडरशिप समेत और भी कई कारक होंगे इसे तय करने वाले, लेकिन सबसे पहले पत्रकार की निजी नैतिकता ही खबर के आड़े आती है क्योंकि पहली कॉपी उसे ही तैयार करनी होती है। (इस बात को समझने के लिए मुक्तिबोध का एक निबंध बहुत कारगर है ‘कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी’)। ज़ाहिर है, जब पत्रकार अपनी निजी नैतिकता के साथ ईमानदारी बरतता है और खबर यदि उसी मूल रूप में प्रकाशित या प्रदर्शित हो जाती है, तो वह अगले चरण में पहुंच जाती है जहां यह तय करना होता है कि पाठक ठगा गया या नहीं। इसे सुनिश्चित करने के लिए सबसे ज़रूरी यह तय करना है कि पत्रकार की नैतिकता वायवीय न हो, देश-काल की परिस्थितियों के मुताबिक अधिसंख्य आबादी की वस्तुपरक स्थितियों के लिहाज से बनी हो। यह सिर्फ अनुभव का ही सवाल नहीं, पढ़ने-लिखने से भी जुड़ा है ताकि अनुभव की जमीन तार्किक होती जाए।
खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आज पत्रकारों में (पत्रकारों का अर्थ मुख्यधारा के जन माध्यमों में नौकरी करने वालों से है) इस किस्म की निजी नैतिकता के प्रति ईमानदारी कम ही दिखती है। जिनमें है, उनमें साहस की कमी है या फिर दाल-रोटी और घर-परिवार की मजबूरी है। पढ़ना-लिखना तो दूर की चीज़ है। दोनों ही कारण उसे इस कदर बाज़ार और नौकरी के खूंटे से बांध देते हैं कि वह पाठक या दर्शक को ठगने में भागीदार बन जाता है। इस तरह वह पत्रकार नहीं रह जाता, महज एक लिपिक में तब्दील हो जाता है।
जिस माहौल में पत्रकार लिपिक हों और संपादक मैनेजर, वहां खबर की शुद्धता का सवाल ही अपने आप में अजीब लगता है। फिर आप चाहे इस पर कितनी भी बहस करते रहें, असल सवाल तो निजी प्राथमिकता और नैतिकता का ही रह जाता है न… बहस में नैतिक होने से अर्थ का नुकसान नहीं होता… दफ्तर में होकर देखें, नौकरी चली जाएगी।
मैं पूरे विश्वास के साथ अंत में यही कहना चाहता हूं कि पत्रकारिता से जुड़ा कोई भी सवाल निजी प्राथमिकताओं, ईमानदारी और नैतिकता के मानदंडों से ही तय हो सकता है, बाकी कारण और बहाने बाद में आते हैं। और आज पत्रकारों की पहली प्राथमिकता नौकरी बचाना, बॉस के प्रति ईमानदार रहना तथा अवसरवादी नैतिकता ही है। यह दुखद स्थिति है। ऐसी स्थिति में खबरों में मिलावट की जगह यदि पत्रकारों में मिलावट पर बहस की जाए, तो वह कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो सकती है।
(टिप्पणीकार जुझारू तेवर वाले युवा पत्रकार हैं)
आम आदमी को हांकने और ‘बुद्धिमानों’ को हांकने में बड़ा फर्क है
सुशांत झा
एक बात बताइए कि अगर मिलावट के खिलाफ कानून या आयोग या कुछ इसी तरह की संस्था बना भी दी गई तो क्या हो जाएगा। चलाएगा तो आदमी ही न। अब आप ये मत कहिए कि आदमी ही तो अदालत और संसद चलाता है, घपला तो वहां भी हो सकता है। बल्कि होता ही है, लेकिन मेरा मानना है कि ये अलग-आदमी चीजे है। आम आदमी को हांकने और ‘बुद्धिमानों’ को हांकने में बड़ा फर्क है। सरकार से तो हम ये उम्मीद नहीं कर सकते कि वो कोई आयोग बनाएगी तो वो निष्पक्ष भी होगा। उल्टे वो अपने समर्थक मीडिया घरानों को बख्श देगी और विरोधियों को रोज नोटिस भेजेगी। वैसे भी उसका जो चरित्र है उस हिसाब से ये उसके माकूल ही है कि मीडिया अपनी राह से भटकती रहे। रही बात स्वनियंत्रण की या मीडीया द्वारा खुद के रेगुलेशन की तो हम ब्राडकार्स्टर्स एसोशिएशन का हाल देख ही चुके हैं। जब भी किसी मीडिया हाउस के खिलाफ आवाज उठाई जाएगी तो वो खुद को अलग ही कर लेगा और एसोशिएशन को अंगूठा दिखा देगा। ब्लाग या वेब मीडिया कुछ हिम्मतवरों को मौका दे रहा है लेकिन हिंदी वेबसाईट्स अभी अपनी कमाई का जरिया नहीं ढ़ूढ़ पाए है। तब रास्ता क्या बचता है। कोई ऐसा तरीका है कि हम कम से कम सास्थानिक रुप से इन मिलावटों की आलोचना भी कर सके। यूं ब्लाग पर छिटपुट ढ़ंग से ये काम होता रहता है।
फिर क्या तरीका है कि हम इन जोकों से एकहद तक लोगों को सचेत करते रहे जो लोगों की भावनाओं को हर रोज तरह-तरह के एंगिल से चूसते रहते हैं। सुना कि चुनाव के वक्त नेताओं पर निगाह रखने के लिए एक इलेक्शन वाच नामकी संस्था है जो उनके आमदनी, आपराधिक चरित्र और उनके बेटे-बेटियों के कारनामों के बारे में रिपोर्ट जारी करती रहती है। कोई इस तरह का तरीका होता कि हर सप्ताह या पखवाड़े कोई संस्था मीडिया में हुए मौलिक घपलों पर रिपोर्ट देती। क्योंकि सवाल यहां फैक्चुअल गलती का नहीं है, सवाल इसका है कि वे कौन सी खबरे हैं जो मानवीय सरोकारों से अलहिदा हैं और इंसान को बरगलाने का काम करती है। वे कौन से विज्ञापन हैं जो खबरों की शक्ल में आते हैं और हमें बरगला कर चले जाते हैं। कोई ऐसा गैरसरकारी-गैर पत्रकारीय संगठन हो जो हर माह या पखवाड़े अपना रिपोर्ट जारी करे और इस आधार पर अदालतों में जनहित याचिका दायर किया जाए कि क्यों न उस अखबार का लाईसेंस रद्द कर दिया जाए या उस पर जुर्माना लगाया जाय। लेकिन फिर इस तरह की संस्था की फंडिग कैसे होगी, इसमें कौन से लोग होंगे और इसको किस तरह से प्रचारित किया जाएगा-ये एक सोचनीय विषय है। इस मुद्दे पर नए विचार आमंत्रित किए जाएं और उस पर बहस हो-तो शायद कुछ बात बनें।
(टिप्पणीकार मशहूर ब्लॉगर और युवा पत्रकार हैं)
ख़बरों की दुनिया दाल के सामान होती जा रही है
सुरेश पांडेय
हम लोगों में से जयादातर ने दाल ज़रूर खायी होगी। हिंदी भाषियों के लिए तो यह प्रोटीन का मुख्य सोर्स है। दाल फ्राई हम कितने दिन खाते हैं? शायद रोज नहीं, सादी दाल ही हमारी थाली का हिस्सा होती है, क्यूं? कभी आपने सोचा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि दाल फ्राई करने के लिए कुछ चीजें मिलानी पड़ती है। लगातार दाल फ्राई सेहत के लिए खतरनाक हो जाती है। अब ख़बरों की दुनिया भी दाल के सामान होती जा रही है। यहाँ हर चीज फ्राई किये बिना सीधे -सादे ढंग से रखने की रवायत ख़त्म हो चली है। इसकी कई वजह हैं। दरअसल शार्टकट का जमाना आ गया है। मीडिया के मौजूदा दौर में नक़ल मारने वाले रिपोर्टर देखते -देखते संपादक बनने लगें है। मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूँ जिन्हें यह पता नहीं था की करांची मेट्रो सिटी है या कोई प्रांत। कुछ तो यह लिखते-लिखते चीफ रिपोर्टर बन बैठे-की नगर निगम का हाई-कोर्ट को नोटिस। ऐसे लोग आज संपादक की कुर्सी पर विराजमान हैं। मौलिक सोच रखने वालों के लिए इस जमात में कोई जगह नहीं हैं। अब तो अखबार के बॉस खुलेआम यह कहतें हैं की हमारा टारगेट क्या है – इसका खयाल रखो। यह सब बिसनेस प्रेसर का नतीजा है और इसका खामियाजा ख़बरें मिलावट के रूप में भुगत रहीं हैं। नहीं तो किसी सिब्बल-टंडन की यह जुर्रत नहीं थी की वह यह कह देते कि जो कुछ छापना हो छाप लीजिए, कुछ फर्क नहीं पड़ता। मैं गवाह हूं उन दिनों का जब मध्यप्रदेश के छिन्दवारा में उप चुनाव हुआ था और तब एक लीडिंग हिंदी दैनिक की ख़बरें कमलनाथ को इतनी भारी पड़ी कि वह सुन्दरलाल पटवा से चुनाव हार गये। लब्बोलुवाब यह कि मीडिया में पढ़े-लिखे अज्ञानियों की वजह से ख़बरों में मिलावट रोक पाना आसान नहीं है। हां, जिस दिन समाज ही जग जाएगा, बात दूसरी होगी। अभी तो मौलिक सोच रखने वाले सिरफिरे कहलाते हैं, क्या करेंगे।
(जबलपुर में देशबंधु से कैरिअर शुरू करने वाले सुरेश पाण्डेय को पत्रकारिता में दो दशक हो चले हैं। फिलहाल वह आई नेक्स्ट के रांची एडिशन से जुड़े़ हैं।)












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