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सैलरी, इनक्रीमेंट, प्रमोशन के बीच इस बहस के मायने…

18 July 2009 3 Comments

इस मिलावटी बहस में हम रेनकोट पहन कर खड़े हैं

दीप्ति दुबे

deeptidubey1पिछले दिनों अपने परिचित के घर एक युवा पत्रकार से मुलाक़ात हुई। उसने पहली मुलाक़ात में ही कहा कि- मैं तो दलाल हूं, पत्रकार नहीं। मैंने पलटकर कहा कि ठीक भी है तो बस इतना करना कि अगर विज़िटिंग कार्ड छपवाओ तो उस पर ये मत लिखवाना कि पत्रकार हो, लिखवाना कि दलाल हूं। मुझे ये उसकी साफ़गोई तो कतई नहीं लगी, बस बदतमीज़ी लगी। खैर, ये है आज के युवा पत्रकार की सोच। ये है पत्रकारिता की नयी पीढ़ी। अब शुरू से ही ये माना जाता है कि जो बड़े सिखाते हैं, वो बच्चे सीखते है। आज पत्रकारों को ये लगने लगा है कि ख़बरों में मिलावट हो रही है और पढ़नेवालों को इसके खिलाफ़ खड़ा होना चाहिए जैसे कि लोग दूध में मिलावट के खिलाफ़ होते हैं। लेकिन, मेरा सवाल ये है कि कौन से वो लोग हैं, जो दूध में मिलावट के खिलाफ़ खड़े हुए हैं। कही किसी जनआंदोलन की जानकारी मुझे नहीं है। हां, ये ज़रूर मालूम है कि कुछ ख़बरिया चैनलों पर स्टिंग ऑपरेशन के जरिए भांडाफोड़ हुए हैं। सरकार के ऐसे छापों को कुछेक ने कैमरे पर छाप लिया और अब उसे दिखा रहे हैं। ख़बरों में जो मिलावट हो रही है, वो उन लोगों की देखरेख में ही शुरु हुई है, जो कि आज इस पर चिंतित हैं। आज लगभग हर मासिक पत्रिका में तीन से चार महीने में सेक्स सर्वे छपते हैं। पूरे-पूरे पेज के फ़ीचर विज्ञापन छपते हैं किसी एक राजनीतिक पार्टी विशेष के हक़ में। पहली नज़र में ये समाचार लगता है लेकिन जब किसी राजनीतिक पार्टी की इतनी सारी अच्छाइयां पचती नहीं है, तब जाकर नज़रें ऊपर-नीचे घूमती हैं और मालूम चलता है कि ये एक विज्ञापन है।

टीवी का भी हाल ऐसा ही है। प्राइम टाइम पर किसी रीयलिटी शो या फ़िल्म को प्रमोट करने के लिए कलाकार आते हैं। पूरे एक घंटे तक किसी ऐसे ही शो पर कुछ बुद्धिजीवी बात करते हैं। ये सब ख़बरों की मिलावट है लेकिन ये किस की देखरेख में होते हैं। मैंने न तो एसपी सिंह के साथ काम किया है, न ही उदयन शर्मा के साथ – इसलिए मैं पत्रकारिता के उन मूल्यों को नहीं जानती, जो उन्‍हें रचे। लेकिन, आज के मीडिया में उच्च पदों पर बैठे, निर्णय लेनेवाले लोगों ने तो कभी न कभी उनके साथ काम किया है, तो फिर वो क्यों नहीं रोक रहे हैं इसे? क्यों उनके उच्च पदों पर रहते हुए ही ये मिलावट हो रही है। अब अगर बात करें इस पूरी बहस में युवा पत्रकारों की, तो पूरी बहस कुछ ऐसी हो गयी है कि हरेक यहां कीचड़ में कमल बना हुआ है। ख़बरों से जुड़ा हर इंसान इसमें बराबरी का हिस्सेदार है। इस मिलावटी बहस में हम रेनकोट पहनकर खड़े हुए है कि भई हम तो पाक साफ़ हैं, हमारे ऊपरवाले इसमें लिप्त हैं, सो हमें दबाव में ऐसा करना पड़ता है। कुछ ने लिखा है कि जब मीडिया तेल से लेकर दूध तक की मिलावट को ग़लत मानता है, तो ख़बरों की मिलावट को कैसे वो सही ठहरा सकता है। ठीक भी है। लेकिन, क्या मीडिया में रहते हुए ही मीडिया को कोसना या फिर उसकी ग़लतियां निकालना संभव है। हम इंटरनेट के माध्यम से ये कह रहे है कि भई मीडिया ग़लत है। इस विरोध को दर्ज़ करने का महत्तवपूर्ण मंच है ब्लॉग। लेकिन, ब्लॉग में भी तो हमारे पूर्वाग्रह छिपे हुए हैं। हम जिस संस्था से जुड़े हैं, उसकी कमियां हम कभी अपने ब्लॉग पर नहीं लिखते है। कभी किसी की पोल खोलते भी हैं, तो उसके पीछे भी हमारे पूर्वाग्रह होते हैं। जैसे ही दुश्मनी हुई आग उगल दी, जैसे ही दोस्ती हुई अगला-पिछला माफ़। मीडिया सब का सच दिखाता है लेकिन ऐसा कोई भी पारदर्शी माध्यम संभव ही नहीं है कि जिससे मीडिया को स्कैन किया जा सके।

सिस्टम का हिस्सा होकर सिस्टम को बदलने का माद्दा रखनेवाले लोग होते भी होगे तो वो ज़्यादा देर तक ज़िंदा नहीं रह पाते हैं। आप युवाओं की राय मांग रहे हैं। लेकिन, असलियत ये है कि सभी को अपनी नौकरी प्यारी है। क्या कोई ऐसा है, जो नौकरी को दांव पर लगाकर कुछ बदलने में लगा हो। ये कहना कि मीडिया में मिलावट है या मीडिया ग़लत है – बोलना बहुत ही आसान और सहज है – ख़ासकर उनके लिए, जो एक मुकाम पा चुके हैं। जिन्हें नौकरी की हर महीने के किराये की चिंता नहीं है। जिस दिन मैं भी किसी ऐसे मुकाम पर पहुंच जाऊंगी ऐसा कुछ कहीं ज़रूर बोल दूंगी। आज तो चैनल भी किसी न किसी बिल्डर के हैं, किसी उद्योगपति के हैं, जोकि किसी और ज़रिए से कमाया गया पैसा ही चैनल में लगा रहे हैं। ऐसे में वो ख़ुद ऐसा कुछ क्यों दिखाएंगे, छापेंगे जोकि उनके मुख्य धंधे को नुक़सान पहुंचाएगा। हम सभी जो मीडिया के विकृत होते स्वरूप पर चिंतित हैं, उसी में से किसी में काम करते हैं। वक़्त पर तनख्वाह, समय रहते बढ़ोत्तरी और प्रमोशन भी हमें ही चाहिए रहते हैं।

(टिप्‍पणीकार लोकसभा चैनल से जुड़ी हैं)

हमारी पत्रकारिता हर चीज़ जनता के नाम पर सही ठहराती है

हिमांशु शेखर

Himanshu shekharख़बरों में मिलावट न तो नयी है और न ही किसी एक समाचार संस्थान द्वारा की जा रही है। हां ये बात ज़रूर है कि आम चुनाव ने इसे सबके सामने ला दिया। मिलावट सिर्फ चुनावी ख़बरों में ही नहीं की गयी बल्कि यह तो हर तरह की ख़बरों में की जा रही है। किसी नये प्रोडक्ट की लॉन्चिंग होती है, तो उसका नमूना अख़बारों के दफ्तरों में पहुंच जाता है। इसके बाद उस प्रोडक्ट का विज्ञापन करने वाली ख़बरें लिखी जाती हैं। हालिया उदहारण रियलिटी शो का है। एक नया रियलिटी शो आया है, मुझे इस जंगल से बचाओ। ज़्यादातर चैनलों ने इस पर आधारित स्पेशल प्रोग्राम प्रसारित किये। कुछ चैनल के रिपोर्टर तो उसी जंगल से लाइव कर रहे थे। यहां किसी चैनल ने ये नहीं बताया कि वे विज्ञापन कर रहे हैं। या कम से कम इतना तो कह देते कि प्रमोशन कर रहे हैं। पर किसी ने सच बोलने की जहमत नहीं उठायी। हर कोई जानता है कि ख़बरिया चैनल वालों को सोनी टीवी अपने खर्चे पर वहां ले गया और अपने शो का विज्ञापन ख़बरों के तौर पर करवाया। दरअसल, यह मिलावट बहुत गहरी है। सिर्फ चुनावी ख़बरों में मिलावट पर बात करने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

ऐसी ख़बरों पर सवाल उठाने पर बड़े मीडिया समूहों के संपादकों का पहला तर्क यही होता है कि हम तो वही पाठकों और दर्शकों तक पहुंचा रहे हैं, जो वे चाहते हैं। वे कहते हैं कि हम कौन होते हैं तय करने वाले कि क्या प्रकाशित किया जाए या फिर क्या प्रसारित किया जाए। वे यह भी जोड़ते हैं कि अख़बार या ख़बरिया चैनल वे खुद के लिए नहीं चला रहे हैं बल्कि दर्शकों-पाठकों के लिए चला रहे हैं। सतही तौर पर देखने के बाद ये बातें किसी को प्रभावित कर सकती हैं। इस संदर्भ में प्रख्यात अमेरिकी पत्रकार जेम्स कैरी ने कहा था कि हमलोगों ने ऐसी पत्रकारिता विकसित कर ली है, जिसमें हम हर चीज को जनता के नाम पर सही ठहराते हैं। पर इस पत्रकारिता में जनता की कोई भूमिका नहीं होती सिवाय दर्शक, श्रोता या पाठक बनने के। जेम्स कैरी की बातों को विस्तार दिया जाए तो यह स्पष्ट है कि मीडिया जो कुछ भी परोसती है, उसे तय करने में जनता की कोई भूमिका नहीं होती है। हर मीडिया संस्थान में मोटी पगार पाने वाले बड़े ओहदों पर बैठे लोग ही यह तय कर लेते हैं कि क्या दिखाना है या प्रकाशित करना है और क्या नहीं दिखाना है या नहीं प्रकाशित करना है। या यों कहें कि कितनी मिलावट करनी है। वे स्वार्थ साधने के वास्ते लिये गये निर्णयों को जनता की इच्छा कह कर सही ठहरा दिया जाता है। इस चाल को समझने की जरूरत है।

अमेरिका के प्रख्यात लेखक आर्थर मिलर ने अख़बारों की बाबत एक बार कहा था कि सही मायने में समाचार पत्र कहलाने का अधिकार उसे ही है जिसमें देश खुद से बात करता हुआ दिखे। आर्थर मिलर की इस बात को एक पश्चिमी लेखक की सोच कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। इस संदर्भ में तो यह तर्क भी नहीं चलेगा कि अमेरिकी मीडिया और हिंदुस्तानी मीडिया की प्रकृति में काफी अंतर है। इसलिए आर्थर मिलर की बात का भारत में कोई महत्व नहीं है। दरअसल, आर्थर मिलर ने जो बात कही है, उससे दुनिया के किसी भी देश की पत्रकारिता मुंह नहीं मोड़ सकती। भारत की पत्रकारिता की जो परंपरा रही है, उसमें तो उनकी बाद खांटी हिंदुस्तानी मालूम पड़ती है। बहरहाल, जब आर्थर मिलर की इस कथन की कसौटी पर देखा जाए और खुद से पूछा जाए कि क्या भारत में कोई भी ऐसा अखबार है, जिसमें देश खुद से बात करता हुआ दिखता है, तो जवाब नकारात्मक ही होगा। यानी यहां तक बात पहुंचने के बाद निष्कर्ष साफ है कि भारत में मुख्यधारा का कोई भी अख़बार इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। और जब मिलावट इस कदर हो तो फिर कैसे कोई समाचार संस्थान इस कसौटी पर खरा उतर सकता है। क्योंकि हिन्दुस्तानी लोग तो बगैर मिलावट की चीज़ का उपभोग करने के अभ्यस्त रहे हैं।

(टिप्‍पणीकार आईआईएमसी के छात्र रहे हैं और फिलहाल एक टीवी चैनल से जुड़ने के साथ ही मीडिया स्‍कैन नाम के अख़बार का संपादन करते हैं)

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