मोरवाल के ख़िलाफ़ ये साज़िश है या कुछ और
सम्मान लेने के लिए लंदन जाने से रोका
कथा यूके लंदन द्वारा संचालित अंतराष्ट्रीय इंदू शर्मा कथा सम्मान वर्ष 2009 का कथाकार भगवानदास मोरवाल के उनके तीसरे उपन्यास रेत पर देने की घोषणा हुई थी। यह उपन्यास एक तथाकथित अपराधी कही जाने वाली जनजाति समुदाय पर आधारित है। यह सम्मान समारोह 9 जुलाई को ब्रिटिश संसद के नीचले सदन हाउस आफ कामन्स में संपन्न हो चुका है। यह सम्मान भगवानदाल मोरवाल को उनकी अनुपस्थिति में दिया गया।
समाचार पत्रों में छपी खबरों और मेरी जानकारी के अनुसार नौकरशाही की अड़चनों के चलते या कहिए लाख कोशिशों के बावजूद लेखक अपने विभाग (केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड) से देश से बाहर जाने की अनुमति प्राप्त नहीं कर सका। दूसरे शब्दों में कहें, तो एक लेखक के रूप में अपने कर्मचारी को हिंदी के एक सम्मान को, जो स्वंय उसके विभाग के लिए भी प्रतिष्ठा और गौरव की बात होती, लंदन जाकर उन्हें ग्रहण करने की इजाजत नहीं देता।
हम इस प्रसंग की तुलना उस घटना से नहीं कर सकते जिसमें मशहूर रुसी लेखक बोरिस पास्त्रनाक को नोबल पुरस्कार लेने की अनुमति नहीं दी गयी थी पर यह एक चिंतनीय पक्ष ज़रूर है। अब चूंकि पंद्रहवां अंतर्राष्ट्रीय इंदू शर्मा कथा सम्मान लेखक की अनुपस्थिति में दिया जा चुका है, यह घटना बहुत से सवालो को खड़ा करती है।
पहला यह कि क्या कोई सरकारी विभाग किसी व्यक्ति की निजी और व्यक्तिगत उपलब्धियों पर दिये गये ऐसे सम्मान या पुरस्कारों को लेने से रोक सकता है।
दूसरा, यदि किसी कर्मचारी के विरुद्ध किसी तरह का विभागीय मामला बनता है तब क्या जांच हुए बिना या आरोपित हुए बिना उसे एसी उपलब्धियों से वंचित किया
जा सकता है।
दरअसल एसी घटनाएं अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति तेजी से पनपती असंवेदनहीनता और उस मानसिकता की ओर संकेत करती है जिसके चलते विश्व में सबसे ज्यादा तीसरे नंबर पर बोली जाने वाली भाषा तेजी से क्षेत्रीय भाषा का रूप लेती जा रही है। यह घटना भाषाई अस्मिता के संकट की ओर इशारा करती है। इस प्रसंग में मजेदार बात यह है कि हिंदी के तमाम छोटे बड़े लेखक संगठनों ने जिस तरह का मौन साधा हुआ है, उसने हिंदी के तेजी से बनते जा रहे चाटुकारिता और सेवाभोगी चरित्र को उजागर कर दिया है। यह चुप्पी बताती है कि आज हिंदी समाज की चिंताएं और उसके सरोकार कितने बौने हो गये हैं।









शाजिश तो नहीं होगी…बस उपर वाले बड़े बाबू लोगों को जलन होती है मातहतों की एसी उपलब्धियों से
और उनके कहां कहां से धुआं निकलता है वह मैं यहां नहीं लिख सकता.
जन कर दुःख हुआ की मोरवाल जी को पुरुस्कार पाने में नौकरशाही deevar बन गयी. हो सकता है की उनसे चिढे कुछ लोग उनकी राह में रोडे बन गए हों. केकिन अब सर्कार को देखना चाहिए की भविष्य किसी के साथ ऐसा न हो.
मैं morwal का samrthan करता हूँ.अगर वे london जा pate तो बहुत achchha होता.लेकिन क्या indu sharma katha samman के puraskaar vitran में इस sandarbh का ullekh किया गया.wahan maujood lekhak rosh prakat कर सकते थे.high commission के adhikariyon के samaksh अपनी बात rakh सकते थे.tejendra sharma kafi prabhavshali lekhak और vyakti हैं.वे पहले से media के jariye बात utha सकते है.उनकी khamoshi की क्या wajah है.यह भी हो सकता है की unhonne कुछ bola हो और मैं सुन नहीं saka.आप ने zaroori बात chedi है…
यह दुःख की बात है और चिंता का विषय भी. सवाल यह है की क्या किया जा सकता है
मैं नहीं जानता की लंदन मैं क्या हुआ पर यह जानता हु की कथा सम्मान samaaraohmaeim वहंअ की iह्न्दी सस्थाओ के साथ ही Bरतीय दूतावास के लागा भी आते हे क्या वहा eसके इवारोध में आवाज उतहा गेई
यह हम सबा लाएगे के लिये शर्मकी बात है
असल में क्या हुआ होगा, यह तो मोरवाल जी और उनके विभाग के लोग ही बता सकेंगे, लेकिन क्योंकि मैं खुद लम्बे समय तक एक सरकारी विभाग में खासे ऊंचे पद पर रहा हूं, कल्पना कर सकता हूं कि इसके मूल में सरकारी कार्य पद्धति रही होगी. छोटे बाबू ने जो टिप्पणी लिख दी, वह ऊपर तक ‘यथा प्रस्तावित’ चलती रहती है. कोई भी पहल नहीं करना चाहता. बड़े अफसरों में या तो नीचे की टिप्पणी को नकारने का साहस नहीं होता, या उन्हें इसकी फुरसत नहीं मिलती. बहुत मुमकिन है कि मोरवाल जी के मामले में ऐसा हुआ हो. तब इसे भाषा के प्रति साजिश वगैरह कहना अनुचित होगा. वे अगर अंग्रेज़ी के लेखक होते तो भी ऐसा ही होता. लेकिन, बेहतर हो कि कोई जानकार इस बारे में कुछ कहे. खुद मोरवाल जी कुछ कहेंगे (सरकारी नौकरी की ‘मर्यादा’ के चलते) इसकी उम्मीद तो कम ही
इसे साजिश-वाजिश की तरह देखने की जरुरत नहीं है. हम जिस समय में जी रहे हैं, वहां इस तरह के उपक्रम को गैरजरुरी मान लिया जाता है और सरकारी लापरवाही तो हम सब हर रोज़ झेलते है.
EESSE VIBHAGIYA ADHIKARIYOON KI * JALAN * HI कहेंगे. MEIN KHUD BHUGATBHOGI हूँ.
GURMIT बेदी, HIMACHAL PRADESH
यह वाकई बहुत विचार का प्रशन है और हमारे सरकारी तंत्र की लालफीताशाही की जड़ो के शिकंजो को दर्शाता है. सरकारी तंत्र की सवेदान्हीनता का जीता जागता उदाहरण है जिसको किसी भाषा के साथ बाँध कर नहीं देखा जा सकता …… समस्या रुपी कैंसर तो वयवस्था का है जिसकी जड़े गहरी बैठ चुकी है
सरकारी नौकरी में ऐसी अड़चने आती ही रहती हैं. मगर जिस संस्था ने यह सम्मान morvaal jii को diyaa, उसे यह तो pataa करना चाहिए था की मोरवाल जी क्यों नहीं आ रहे हैं? अभी तक हमने अलग-अलग जगहों से यह खबरें तो पढ़ lii की यह सम्मान viatarN हो चूका है, मगर पहली बार आपसे जाना की morvaal जी nahii जा paaye यह samaan lene. any lekhak sangathan इस पर क्या bole? खुद क्या मोरवाल जी अपने daftar से poochh सके हैं क्या? अगर poochha है तो क्या उसे bataayaa है? siidiie rul में srijanaatak, saahityik kaary पर koii rok nahii है, jabatak की usase niyoktaa के अपने hit पर koii aaghaat nahiin pahunchataa हो.
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