और अंत में घृणा
♦ अविनाश
जब पहली बारिश की उमस के बाद
पौधे बढ़ना चाहेंगे, चिड़िया चहचहाना
बच्चे हंसना, नदी बहना
लड़की जब प्यार के लंबे अंतराल के बाद
ऊब कर ब्याह करना चाहेगी
वे अपने पैने दांत निकाल कर
गुर्राना शुरू कर देंगे
आख़िरकार बहेलिये हैं वे!
(कथाकार उदय प्रकाश की कुछ काव्य पंक्तियां)
हमारे लिए यह पखवारा हैरानी, दुख, क्रोध, ग्लानि और पश्चाताप के एक ऐसे कोलाज में क़ैद रहा, जहां रोने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था। एक मूर्ति थी, जो मज़लूमों के दर्द को शब्दों की जादुई तराश के साथ किस्सों-कहानियों में ढालती रही थी, अचानक ढह-सी गयी थी। जो पंछी की लय में गाते थे, अचानक बहेलिये के साथ दिखे और ठीक उसी वक्त एक इतिहास अदृश्य हो गया, जो शिकार के क्रूरतम तथ्यों की तहरीर से मानवता का झंडा बुलंद करता रहा था। हुआ यों कि एक अख़बार के कस्बाई संस्करण में उग्र हिंदुत्व की तलवारें भांजने वाले पूर्वांचल के बाहूबली सांसद योगी आदित्यनाथ के ठीक बाजू में खड़े “और अंत में प्रार्थना”, “तिरिछ”, “टेपचू”, “वारेन हेस्टिंग्स का सांड” जैसी अनेक कहानियों के सिद्ध कथाकार उदय प्रकाश की तस्वीर छप गयी। इसे हिंदी के एक नौजवान कथाकार-पत्रकार ने देखा और कबाड़खाना नाम के एक ब्लॉग पर सार्वजनिक कर दिया। साइबर स्पेस में जारी की गयी इस तस्वीर के साथ चस्पां एक सूचना ने राष्ट्रीय स्तर पर हतप्रभ लेखकों और पाठकों की तादाद बढ़ा दी। सूचना के अनुसार, यूपी के गोरखपुर में दिग्विजय नाथ पीजी कॉलेज के सभागार में इसी कॉलेज के दिवंगत प्राचार्य के नाम पर स्थापित पहला कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह स्मृति सम्मान गोरक्षपीठ के दबंग उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ के हाथों कथाकार उदय प्रकाश को दिया गया।
यह एक हादसा था और इस हादसे के कुछ ही महीनों पहले महाराष्ट्र के अमरावती में दलितों के एक विशाल जुलूस में उदय प्रकाश एक नायक की तरह उपस्थित थे। कुछ महीनों के अंतराल में दिखने वाला ये विरोधाभास हम जैसे सैकड़ों उदय प्रकाश के प्रशंसकों की आत्मा को बेध गया। हमने नाराज़गी जाहिर की, हमने विरोध दर्ज किया – लेकिन उदय प्रकाश खामोश रहे। एक शुरुआती संक्षिप्त प्रतिक्रिया के बाद कि मौजूदा गोरखपुर संदर्भ में उनकी आलोचना हिंदी साहित्य में फैली जातीय गिरोहबंदी को बेपर्दा कर रही है। इस प्रतिक्रिया ने यही जताया कि गोरखपुर में जो हुआ, उदय प्रकाश उससे सहमत हैं और विचलित तो कदापि नहीं हैं। नतीजा यह कि हमले शुरू हो गये और पुरोधा-शलाका से लेकर नवान्न-नवोदित लेखकों ने प्रत्यंचा चढ़ा ली। कोई यह कहता हुआ मिला कि चंद रुपयों की ख़ातिर उदय प्रकाश किसी भी हद तक गिर सकते हैं और किसी के श्रीमुख से ये समाचार फूटता रहा कि उदय प्रकाश बीजेपी से टिकट लेने के जुगाड़ में हैं। जैसी जिसकी ज़बान, वैसे आये बयान।
“बंदर के हाथों कुत्ते की लेंडी को पुरस्कार की तरह लेना बंद करो दोस्तो! और अपनी भाषा का सम्मान करना सीखो! ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद, ठाकुरवाद मुर्दाबाद…”
वीरेन डंगवाल, कबाड़खाना ब्लॉग पर
“मुझे तो इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं लगा। पतन का दस्तावेज इसी तरह बनते रहना चाहिए ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आये…”
विजय शंकर चतुर्वेदी, कबाड़खाना ब्लॉग पर
किसी ने लेखक से आत्मीय होकर ये पूछने की हिम्मत नहीं की कि आख़िर आपने ऐसा छल क्यों किया और अगर ये छल नहीं था, तो एक ज़हरीली शख्सियत के साथ छपी आपकी तस्वीर का दूसरा पहलू और दूसरा पाठ क्या है।
अगर हम इस घटना को बड़े कैनवास में देखने की कोशिश करें, तो उदय प्रकाश का योगी के हाथों पुरस्कार लेना और साहित्यकारों के एक बड़े झुंड का उन पर टूट पड़ना महज फौरी, अनायास और स्वाभाविक प्रसंग नहीं है बल्कि हिंदी के साहित्यिक समाज की उन सच्चाइयों का प्रदर्शन है, जहां सहिष्णुता और सबूतों से निकटता का सर्वथा अभाव है। उदय प्रकाश के इस कृत्य के ख़िलाफ़ विरोध पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले लेखकों में कई ऐसे हैं, जो ‘सांप्रदायिक फासीवादी सरकारों’ के कार्यकाल में लाभ पाने वालों में शामिल रहे। चाहे भाजपा के शासनकाल के दौरान झारखंड से अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में सूरीनाम जाने का मामला हो, या अपनी-अपनी पत्रिकाओं में मध्यप्रदेश की बीजेपी सरकार के कामकाज को प्रचारित करने वाले विज्ञापन छापने का मामला हो, या छत्तीसगढ़ में होने वाली करोड़ों की पुस्तक-खरीद-कमेटियों में शामिल होने का मामला। इतना ही नहीं, हस्ताक्षर करने वालों में कई लेखक ऐसे हैं, जिन्होंने भाजपा की सरकारों से पुरस्कार ग्रहण किये हैं। अव्वल अगर सूचना के अधिकार के तहत केंद्र में बीजेपी की पांच साला सरकार के दौरान लाभ पाने वालों की फेहरिस्त जुटायी जाए, तो ज़्यादातर लेखकों के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा। ऐसे में हमें समझना होगा कि उदय प्रकाश के ख़िलाफ़ ये मोर्चाबंदी महज एक दंगाई के साथ उनकी उपस्थिति से असहज और असहमत होकर नहीं, बल्कि किन्हीं और निहितार्थों के चलते की गयी है।
एक सवाल ये भी है कि ऐसे अप्रिय मामलों में हम अपने लेखक के साथ कैसा बर्ताव करें? क्या उसे अकेला छोड़ दें, क्योंकि वो एक तस्वीर और एक ख़बर में अल्पसंख्यकों की संवेदना से खिलवाड़ करता हुआ नज़र आ रहा है – या हम उसकी मन:स्थिति समझने की कोशिश करें? उससे मिल कर उन सबूतों की असलियत समझने की कोशिश करें, जिसके आधार पर हम उसे अपराधी घोषित करने जा रहे हैं? क्या हम उसके सारे रचनाकर्म और अतीत भुला दें, जो समाज के अंतिम आदमी के स्वप्न और उसकी आकांक्षा से भीगे रहे हों? क्या एक धुंधला दृश्य पिछले तमाम स्पष्ट दृश्यों की हत्या कर सकता है?
एक सच तो ये है कि फासीवाद तक के समर्थक कई लेखकों का जीवन बाद की पीढ़ियों ने याद नहीं रखा, उनकी रचनाएं जीवित रहीं। अमेरिकी लेखक एज़रा पाउंड हिटलर और मुसोलिनी के समर्थक थे, तो हमारी हिंदी के श्रीकांत वर्मा ने इंदिरा गांधी इमर्जेंसी का समर्थन किया था। साहित्य जगत के अनेक लोग अब तक उनके नाम से चलने वाला पुरस्कार लेते रहे हैं। क्या हम आज इन लेखकों के जीवन काल की राजनीतिक मान्यताओं को आधार बना कर उनकी रचनाओं से भेदभाव कर पाते हैं? शायद नहीं। फिर उदय प्रकाश को महज एक चूक के लिए एक तरह घेर कर अपमानित करना कितना उचित है, जब वे उन्हें गोरखपुर में पुरस्कार थमाने वाले की विचारधारा को लेकर अपना मत साफ कर चुके हैं और अपनी पक्षधरता के बारे में मार्मिक बयान अपने ब्लॉग पर जारी कर चुके हैं?
“मेरा जीवन और मेरी समस्त रचनाएं सांप्रदायिकता, साम्राज्यवाद, जातिवाद, वर्गीय शोषण, भ्रष्टाचार, अनैतिकता और वैयक्तिक पतनशीलता के खिलाफ़ सतत संघर्ष के लिए समर्पित रही हैं…”
उदय प्रकाश, अपने ब्लॉग पर पाठकों से क्षमायाचना करते हुए
बहरहाल, उदय प्रकाश जी के गोरखपुर प्रसंग पर अपना विरोध कबाड़खाने में दर्ज करने के बाद मैं अपने इस प्रिय लेखक से मिलने गया। कह सकते हैं कि एक पाठक की तरह, अधिकारपूर्वक – जो सीधे सीधे सवाल करना चाहता है कि उदय जी, आपने ऐसा क्यों किया? बहुतों को यक़ीन नहीं होगा कि मैंने इस लेखक की आंखों की कोर में वो बाढ़ देखी, जो एक बेदाग़ कैरियर में लगे इस दाग़ को बहा देना चाहती है। वो दाग़, जो एक परिवार के दुख को समझने और उसकी संवेदना का मान रखने के लिए खुद ही लगा लिया गया हो। जिन नरेंद्र जी की स्मृति में उदय प्रकाश को योगी ने सम्मानित किया, वे नरेंद्र जी उदय प्रकाश के फुफेरे भाई थे। दोनों में तीन दशकों की वैचारिक दूरी थी, जो हर मुलाक़ात में बहसों की शक्ल लेकर परिवार वालों का जीना दूभर करती रही थी। एक बरस पहले कुंवर नरेंद्र की मृत्यु के बाद की शोकाकुल स्थितियों में उदय प्रकाश उपस्थित नहीं हो सके – लेकिन पहली बरसी पर वे गये। इस बरसी में वे भी मौजूद थे, जो कुंवर साहब के जीवन की छटाओं में बिखरे थे। योगी भी इसलिए आये। लेकिन उस वक्त उदय प्रकाश अपनी मौजूदगी के राजनीतिक अर्थ नहीं निकाल पाये। अबोध बने रहे। यह अबोधपन एक परिवार की संवेदना से जुड़ा हुआ था, अपनी सार्वजनिक छवि के ध्वस्त हो जाने की क़ीमत पर।
इस प्रतिक्रियावादी हिंदी समाज में माफी और सार्वजनिक आत्म-स्वीकार ही उदय प्रकाश की नयी स्वीकृत रचना हो सकता था, जिसे रच कर उन्होंने अपनी शख्सियत को ऊंचा ही किया है। अपने ब्लॉग पर उन्होंने योगी के साथ अपनी मौजूदगी और उनके हाथों सम्मान लेने के लिए पाठकों से क्षमायाचना की है। क्षमायाचना के साथ ही यह अप्रिय विवाद ख़त्म हो जाना चाहिए। मगर उदय प्रकाश की अंतर्राष्ट्रीय ख्याति और प्रशस्ति से रश्क करने वाले उनके ख़िलाफ़ अभियान चलाने के मौक़े से जैसे चूकना नहीं चाहते थे, आसानी से छूटना भी क्यों चाहेंगे।
जनसत्ता, 19 जुलाई 2009 से साभार









इसे कहते हैं अपने गुरु की स्तुति में सबकुछ को न्यौछावर कर देना।
वाह! अविनाश वाह!
लाजवाब….आप इतना अच्छा कैसे लिख लेते हैं!
और अंत में समर्पण
आप से यही उम्मीद थी
पहले ख़ुद उठाये गये सवालों का जवाब दीजिये
एक बार मिलने में ही…
अब आप भी मोदी और आदित्यनाथ से मिल ही आईये
देखिये शायद कोई बाढ वहां भी दिख जाये और आपका भला हो जाये
वहां उन आरोपों मे मर्दों को निकाला भी नहीं जाता
[...] ने मोर्चा संभाला और जनसत्ता में और अंत में घृणा के नाम से एक लेख लिख कर उदय की दलीलों [...]
asprishyata की jay हो! uday achhut हैं . manch share कर लिया , samman ले लिया . wap रे wap ! Nitish ने Narandra मोदी के साथ hath milaya , gale मिल लिया. bhak हम अब उस sansad में नहीं baidhenge, jisme कोई मोदी, yogi, aadwani baidhega. हमारा अलग sansad होगा. ‘loktantra amar रहे ‘ . ‘or anta में ghrina, samarpan,udha- baidahaki “.
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