उदय प्रकाश का सत्यार्थ प्रकाश – भूल चूक लेनी देनी
“मैंने पिछले तीन दिनों तक लगातार कोशिश की कि मैं अपनी इस भूल के लिए क्षमा मांगू कि मैं एक नितांत पारिवारिक आयोजन के व्यावहारिक राजनीतिक पक्ष के बारे में उस समय नहीं सोच सका। लेकिन जब-जब मैंने यह क्षमा पत्र लिखने की कोशिश की, मेरी चेतना और मेरे मानसिक-वैचारिक और भावनात्मक अंतर्द्वंद्वों ने मुझे हमेशा कोई संतुलित राजनीतिक पाठ तैयार नहीं करने दिया।”
उदय प्रकाश ने अपनी ग़लती मान ली। हिंदी के मिट्टी-प्रदेश का इतना बड़ा लेखक अपनी ग़लती को लिख कर स्वीकार कर ले, तो मान लिया जाना चाहिए कि यह महान लेखक इस वक्त अफ़सोस के घोर क्षणों में जी रहा होगा। मुझे विश्वास है कि ऐसे मुश्किल क्षणों से गुज़र कर यह लेखक पहले से और बेहतर हो जाएगा। इतनी ही अपेक्षा की थी कि वे अपनी ग़लती मान लें। उन्होंने मान ली। उदय प्रकाश ने एक अच्छी शुरुआत की है। उनको स्कूल से बर्खास्त करने की आततायी प्रिंसिपली मानसिकता से बचना चाहिए।
साहित्य के बारे में कम जानकारी है मेरी। जिन चार-पांच लेखकों को पढ़ा है, उन्हीं के आधार पर कह रहा हूं कि उदय प्रकाश हमारे समय के महान लेखकों में से हैं। हिंदी साहित्य का आलोचक झुंड उनकी रचनाओं का किस तरह से मूल्यांकन करता है, वो पढ़ने के लिए मैं पांच रुपये भी खर्च नहीं करता। वजह यह है कि मैं मूल हिंदी का विद्यार्थी नहीं हूं। न ही साहित्य में गहरी दिलचस्पी है।
मुझे याद है, जब जेएनयू में मेरे मित्र कृष्णमोहन झा ने तिरिछ पकड़ा दिया। मैंने कहा कि ये लेखक बड़ा है न। ये इसलिए कहा कि मैंने साहित्य की सिर्फ पांच किताबें पढ़ी हैं। जैसे ही हिंदी की मिट्टी पट्टी के संपर्क में आया, मुझे लगा कि यहां आप कुछ भी हो जाइए, साहित्यकार नहीं हैं और साहित्य नहीं पढ़ा है, तो आप कुछ भी नहीं हैं। अपने सामाजिक अस्तित्व को हल्का-सा टच देने के लिए मैंने आजकल के सबसे बड़े लेखकों के नाम पूछ कर दो-चार किताबें पढ़ने की योजना बनायी। ये कोई पंद्रह साल पहले की बात है। तभी मैंने रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा, मुक्तिबोध, नागार्जुन, मंगलेश डबराल और राजेंद्र यादव का नाम पहली बार सुना। ये वो लेखक थे, जिनकी रचनाएं मुझे बार-बार हिंदी के महान साहित्य संसार में ले जाने के लिए बेचैन करती हैं।
ख़ैर, कृष्णमोहन जी का जवाब था, आप उदय प्रकाश को पढ़ लीजिए। सारे बड़े लेखकों को भी पढ़ लेंगे। तिरिछ ने कई रातों की नींद ख़राब कर दी। आज तक अपने पैसे से इस किताब की न जाने कितनी प्रतियां लोगों में बांट चुका हूं। ये और बात है कि अब तिरिछ की कहानी याद नहीं है। लेकिन पढ़ने के बाद उदय प्रकाश मेरे पहले साहित्यकार बन गये, जिनकी एक भी रचना छूट जाए, तो मुझे लगता है कि मिस कर दिया। जो नहीं पढ़ी है, वो भी ख़रीद कर रखी है।
इसलिए मुझे दुख हुआ कि मेरा लेखक कैसे किसी योगी-वोगी के साथ बैठ सकता है। उदय प्रकाश ने माफी मांग ली है। मेरा लेखक मेरे लिए बड़ा हो गया है। मैं बस उससे यही उम्मीद करता था।
मैं यह अच्छी तरह से जानता हूं कि हिंदी में मूल्यांकन एक काम है। लोग दूसरे का मूल्यांकन करते हैं और अपना करवाना चाहते हैं। इसी कुंठा से कई पत्रकार अच्छा काम नहीं कर पाते। आधे टाइम वो दो-चार संपादकों का मूल्यांकन करते रहते हैं और बाकी टाइम उन्हीं के जैसा बन पाने की ज़िद पाल कर टूटते रहते हैं। वो यह नहीं समझ पाते कि बिना किसी काल खंड वाले संपादक-साहित्यकारों के युग में जीये भी अपना जीवन सार्थक बनाया जा सकता है। मूल्यांकन की इस आदत से बचना चाहिए। इसे हिंसक मत बनाइए। आलोचना और अपमान में फर्क करना चाहिए।
महात्मा गांधी ने तमाम चोरियां करने के बाद माफी मांग कर सत्य पर किताब ही लिख दी। कल ही उनकी सत्य के साथ प्रयोग पढ़ रहा था। ऐसा नहीं कर सकते कि हम सत्य पर गांधी के लिखने की पात्रता को ही चुनौती देने लगें। एक लेखक से ग़लती हुई है। वो अपनी भूल मान रहा है। उसे तो गले लगा लेना चाहिए। जब वो कह रहा है कि उसकी निष्ठा जस की तस है, तो यकीन करना चाहिए।
उदय प्रकाश के माफीनामे को पढ़ कर लगा कि लेखक इस वक्त अपनी बांहों को नोच रहा होगा। क्यों गया वहां? क्यों नहीं उठ कर लौट गया? थोड़ी तो सामाजिकता समझें हम। इस बहस को याद रखने लायक समझ कर ख़त्म हुआ मान लिया जाना चाहिए। जो कर रहे हैं, उनकी तरफ उदय प्रकाश को ध्यान नहीं देना चाहिए। उनका सत्यार्थ प्रकाशित हो चुका है। हर हिसाब के बाद भूल चूक लेनी देनी का प्रावधान होता है। टेंशन कम करो। हिंदी साहित्य जगत की सक्रियता का इतना अच्छा परिणाम आया है, सबको खुश होना चाहिए। अब इसे झोला छाप बोझिल मत बनाइए। कभी कभी ऐसी ग़लतियों पर हंसना भी चाहिए। इतना बड़ा लेखक ऐसा कर सकता है क्या? हा हा हा। मस्त रहो दोस्तो। साहित्य का लोड मत लो।










रवीश जी, आपने बहुत सही लिखा है.
अब इस प्रकरण को समाप्त माना जाना चाहिए.
मित्र रवीश, मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि आपने साहित्य कम पढ़ है और साहित्यकारों को आप कम ही जानते हैं। इन्हें जानना भी नहीं चाहिए क्योंकि हमारे हिंदी साहित्य में सारे के सारे साहित्यकार मुझे टेपचू नजर आते हैं।
सबसे खास बात तो यह है कि यहां हर साहित्यकार बड़ा और महान है। वो यह मानकर चलता कि जीवन में वो कभी गलत हो ही नहीं सकता। हां, उदय प्रकाश जैसे महान और बड़े कथाकार अगर कभी कुछ गलत कर भी देते हैं तब भी उनकी महानता और बड़प्पन में कोई कमी नहीं आती। क्योंकि उनकी महानता और बड़प्पन को कायम रखने के लिए उनके चेले हैं न। यहां अपने अपराध पर साहित्यकार कम चेले ज्यादा कहते-बोलते हैं (देखें कल के जनसत्ता में अविनाश की स्तुति उदय प्रकाश के लिए)।
मित्र बड़े और महान लेखक की बात जहां आती है फिर तो वहां पर हर बहस और विवाद को समाप्त हो जाना चाहिए। क्यों?
अंशुमाली जी
उस माफ़ी का पाठ क्या है यह कोई समझना नहीं चाहता…सब गुड बुक में शामिल होने को बेताब हैं। काश की वह माफ़ी होती और साथ में कोई प्रण होता कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा।
पर एक तो ”महान” लेखक ऊपर से इतना ”ग़रीब” और ”बेरोजगार”…उसके तो सौ ख़ून माफ़ हैं। सब अपने लिये रास्ते आसान कर रहे हैं।
वाम का बाज़ार अब डाऊन हो रहा है तो बहुत कुछ दिखेगा तैयार रहिये।
और उस परमानन्द नामक महान व्यक्ति की तो बात भी नहीं हो रही।
आरोप लगाने वाले कौन सा दूध के धुले हैं…
एक पत्र पोस्ट कर रहा हूँ जो “हंस” २००५ नवम्बर में छपा था. मोहनदास छपने के बाद हंस का पहला पत्र.
उदय प्रकाश की कहानी- मोहनदास! पता नहीं दर का रंग कैसा होता है लेकिन सच का रंग …इससे क्या भिन्न होगा. भिन्न ही नहीं भयावह भी! बिलकुल भी धूसर नहीं साफ़ चमकीला …पारदर्शी….लेकिन फिर भी मुक्तिबोध की बावडियों और खोहों में प्रवेश करने जैसा. आप कहते रहें एक को मुक्तिबोध… दूसरे को प्रेमचंद या रेणु…लेकिन समकालीन सच्चाइयों के धधकते अंगारों को अपनी हथेलियों पर संजोने का दुर्लभ साहस हो तभी पढ़ी जा सकती है यह कहानी! हाँ, “हंस” एक बार फिर श्रेय ले गया.
क्या हमें पता है? इस आजाद देश के लोगो, क्या हमें यह पता है कि यह वह समय था जब हिंदी के एक सर्वाधिक प्रतिभाशाली लेखक को एक विश्वविद्यालय की चयन कमेटी ने हिंदी के प्राध्यापक पद के लिए इसलिए अयोग्य ठहरा दिया था क्योंकि उसके पास नक़ल, सिफारिश, घूस, चापलूसी और तिकड़म से जुगाडी गई “डॉक्टर ऑफ़ फिलोसोफी” का कागज नहीं था. यह बात और है कि उस लेखक के रचना संसार पर कई शोधार्थी शोध रत थे. उदय ने पाल गोमरा में लिखा है कि एक बार हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार को आल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस से इसलिए भगा दिया गया था क्योंकि उनके पास कोई सिफारिश नहीं थी. यह वैसा ही है जैसे उज्जैन कि प्रेमचंद पीठ और कालिदास अकेडमी में क्रमशः प्रेमचंद और कालिदास के आवेदन पत्रों को रिजेक्ट कर दिया जाये क्योंकि इनमे “वांछित अर्हताएं” नहीं हैं. उदय भले ही कितने स्वाध्यायी हों लेकिन शायद उन्होंने तब तक मुक्तिबोध कि ये पंक्तियाँ नहीं पढ़ी थी कि “हमारे विश्वविद्यालय मूर्खों के टीले हैं.
निरंतर…………………………..
निरंतर………
दिक्कत यह है की युवा आलोचक शम्भु गुप्त लाख लिखते रहें कि उदय प्रकाश कि कहानियों के अध्ययन कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे हमारे अब तक के अधिकांश आस्वाद और पाठकीय आलोचना कि कसौटी को अपर्याप्त सिद्ध कर देती है. वे हमें एक भिन्न और उत्तेजक कथा संसार में ले जाती हैंजहाँ न केवल कहानी का स्वरुप बदला हुआ है बल्कि उसकी संवेदना भी काफी कुछ नै है. बेहतर येही है कि उसके लेखन का मर्म समझाने की बजाय अपने “डिफेन्स” में हम उसे कुंठित , जादुई और फंतासी का तकनीशियन कह कर अपनी इर्ष्या से निजात पायें और पुनः अपनी मान्द में घुस जाएँ………………….
निरंतर……….
यह दरअसल उस कठिन समय का ब्यौरा है जब हिंदी साहित्य के सर्वाधिक प्रतिभाशाली लेखक को लेकर बेबुनियाद अफवाहों और कानाफूसियों का बेशर्म दौर जारी था. यह सब उन चुनिन्दा मिदीआकरों द्वारा प्रायोजित थी जो इस लेखक को यहीं कुचलकर कर ख़त्म कर देना चाहते थे. उनकी सीमित और कथित प्रतिबद्ध शब्दावली में यह लेखक एक मिडिल क्लास, कुंठित और अतिमहत्वाकांक्षी लेखक है ( जो इस दौर में अनिवार्य मगर बेशर्म जोड़ तोड़ न कर पाने के कारण अनेक महत्वपूर्ण पदों एवं पुरस्कारों से वंचित है.) …मगर उसकी लेखनी में एक ऐसा jabardast
sammohan था जो हिंदी साहित्य के lakhon pathakon को abhibhut कर देता था और yehi इस लेखक की asli takat थी……….
निरंतर…………………..
nirantar…….. (kshama karen …mere computer par translator kaam nahi kar raha)
apni umra ke is padav wah yuva lekhak usi tarah ganja ho chuka tha jis tarah ek dedh pasali ka aadmi us samay apne baal gavan chuka tha jab bharat ke vibhajan ka masauda taiyaar ho raha tha. yadi aap dhyaan se dekhan to us aadmi aur is yuva lekhak ki tasweer mein aapko adbhut samya dikhai dega.
रवीश जी मोहल्ला पर लिखा हुआ आप का लेख पढा बहुत अच्छा लगा खास तौर पर गांधी जी के बारे में जो लिखा है कि सबकुछ……… करने के बाद यदि गांधी जी सत्य के प्रयोग लिख कर सत्य के मसीहा हो सकते है तो उदय प्रकाश जी के लिए इतनी हंगामा क्यों बरपा……… है ( हालाकि गांधी जी और उदय प्रकाश के कद में जमीन आसमान के अंतर है )
Uday Prakash aadhunik devkinandan khatri जैसे lekhak हैं, jinki rachnayeon unlogo ने भी khoj- khoj कर padhi जो sahitya में khas dilchaspi नहीं rakhate . waren hestings का saand हो या पल gomra का scooter ,tiriksh , chhapan tole का karghan , dili की deewar , mohan daas , pili chhatri wali ladaki ……or ant में prathrna —–inhe मेरे ऐसे mitro ने mangkar padha जो premchand adi को सिर्फ skuli dinoan में pariksha पास karane के लिए padhe थे.
Yogi prakaran kafi ‘takniki’ mamla बन गया है. vichar , pratibhadhta , janvad ,wampanth adi से dur dur तक practicaly nata न rakhane वाले भी uday के khilaf dhuandhar bating कर रहे हैं ! ‘पार्टनर ! tumahari politics क्या है ‘ puchhane वाले खुद politically correct होने का game खेल रहे हैं . मेरे अपने अनिल भैया ने जो अख़बार की report के sahare इस mamle के udhakar logoan से puchha की ‘आपको कैसा लगा ‘—-उसके बाद uday जी भी ‘apana morcha’ kholate huy कुछ katu हो गए . बाद में तो awsarwadiyoan की pau barah हो गयी . khair uday or अनिल
जी के taraf से यह prakaran khatm हो गया है. हमारी shubhkama है की udayji अनिल भाई के प्रिय kathakar bane rahenge!(जो unhone उस sham तक ही प्रिय होना ghosit किया था) bahas- mubahase honi चाहिए लेकिन भासा or bhas की sanskriti के dayare में. …..अरे भैया नीतिश ने modi (narendra ) के साथ न सिर्फ मंच share किया balki hath में hath लेकर galbahiya दी ….uday ने samman ले लिया ..or we sampradyik हो गए ! अरे yogi के sansad share किया जाना च ाहिए की नहीं ?
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