ख़बर में मिलावट का शिगूफा दरअसल बेमतलब की बहस है
सलीम अख्तर सिद्दीक़ी
ख़बर में मिलावट करने वालों के ख़िलाफ़ कानून बनाने का जो शिगूफा “आउटलुक” के सम्पादक नीलाभ ने छोड़ा है, वह बेमतलब की बहस के अलावा कुछ नहीं है। इस देश में किसी भी चीज़ में मिलावट के लिए कानून हैं। क्या मिलावट रुकी? ख़बर में मिलावट करने वाले ही तो अन्य चीजों में मिलावट के ख़िलाफ़ दिन रात चीख़ते रहते हैं। लेकिन उनकी सुनता कौन है? सुनें भी क्यों जब वह ख़ुद मिलावटखोर हैं। कपिल सिब्बल ने शायद ग़लत नहीं कहा था कि मीडिया के छापने या नहीं छापने से कोई फर्क नहीं पड़ता। वाकई अब ख़बरों के छपने से आसमान नहीं टूट पड़ता। अक्सर अख़बार और न्यूज़ चैनल छापते और दिखाते रहते हैं कि किस चीज़ में क्या और कितनी मात्रा में मिलाया जा रहा है। छापते रहिए, दिखाते रहिए। मिलावट करने वालों के ख़िलाफ़ कभी कार्रवाई नहीं होती। यदि होती भी है तो महज दिखावा होता है। बड़े मिलावटखोरों और झूठ बोलकर अपने प्रोडक्ट को बेचने वालों को तो मीडिया भी छेड़ना नहीं चाहता। उदाहरण के लिए, किसी अखबार ने फेयर एंड लवली क्रीम के निर्माताओं से यह पूछने की हिम्मत नहीं दिखायी कि भैया क्रीम में ऐसा क्या डालते हो, जिससे आदमी काले से गोरा होता जाता है। बता देते तो माइकल जैक्सन को क्यों करोड़ों डालर खर्च करके अपनी चमड़ी गोरी करानी पड़ती। बराक ओबामा भी काले से गोरा हो जाता। जिस अख़बार ने क्रीम निर्माताओं से यह पूछ लिया, उसी दिन फेयर एंड लवली के विज्ञापन बंद हो जाएंगे। मैं अपना एक वाक़या बताता हूं। मेरे पास पेप्सी की एक बोतल आयी, जिसमें गंदगी भरी हुई थी। मैंने उस बोतल के बारे में अपने मीडिया के दोस्तों को बताया, तो उनका जवाब था कि इसे हम नहीं छाप सकते। मैंने कारण पूछा तो जवाब मिला कि पेप्सी से हमें सालाना बहुत बड़ा रेवन्यू विज्ञापन के रूप में मिलता है। इसका मतलब यह हुआ कि ख़बर पर विज्ञापन भारी है। अब यदि चुनाव में एक हारते हुए दिख रहे प्रत्याशी का दिल रखने के लिए कुछ लाख रुपए लेकर किसी अखबार ने उसको जीतता हुआ दिखा दिया, तो प्रभाष जोशी क्यों हंगामा बरपा कर रहे हैं।
अब सवाल यह है कि यदि ख़बर में मिलावट के ख़िलाफ़ कानून बन भी जाए, तो उसका पालन कैसे होगा? ये तय कैसे होगा की ख़बर में क्या मिलाया गया है? यदि विज्ञापन में ख़बर और ख़बर में विज्ञापन को मिलाने की बात है, तो इसके लिए जिम्मेदार तो मीडिया हाउस हैं। यदि कानून बनाने की बात भी आती है, तो यही नीलाभ मालिकों के कहने पर अपने कॉलम में लिखने के लिए मजबूर हो जाएंगे कि प्रेस की आज़ादी को ख़त्म करने की साज़िश की जा रही है। सेंसरशिप लगायी जा रही है। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को धराशायी करने की कोशिश की जा रही है। नीलाभ ये सब इसलिए लिखेंगे, क्योंकि वे खुद आज़ाद नहीं हैं। बग़ावत कर नहीं सकते, क्योंकि बच्चे पालने हैं।
बहस ख़बरों में मिलावट पर ही नहीं होनी चाहिए। बहस इस बात पर भी होनी चाहिए कि मीडिया प्रसार संख्या और टीआरपी बढ़ाने के लिए “बेच” क्या रहा है? बात “आउटलुक” से ही शुरु करें। अभी चार-छह महीने पहले ही “आउटलुक” ने सेक्स पर कवर स्टोरी छापी थी। सेक्स स्टोरी के नाम पर “आउटलुक” को पोर्न मैग्जीन में बदल दिया गया था। जैसे इतना ही काफी नहीं था। स्टोरी सेक्स पर थी तो विज्ञापन कंडोम के थे। विज्ञापन भी इतने अश्लील कि यूरोप भी शरमा जाए। बात “आउटलुक” की ही नहीं है। लगभग हर पत्रिका समय-समय पर प्रसार बढ़ाने के लिए सेक्स पर कवर स्टोरी छापती हैं। इनसे कहा जाएगा, तो जवाब यही मिलेगा कि आजकल बाजार में सेक्स ही बिकता है। दरअसल “आउटलुक” जैसी पत्रिकाओं का टारगेट ही वो मध्यम वर्ग है, जो उदारीकरण के बाद वजूद में आया है, जिसे सेक्स, खाना और सैर सपाटा ही भाता है। इसलिए इन पत्रिकाओं में मध्यम वर्ग को लुभाने वाली सामाग्री ही परोसी जाती है। आम आदमी की समस्याओं से इन पत्रिकओं को कुछ लेना-देना नहीं है। इसलिए ये पत्रिकाएं दिल्ली और चंडीगढ़ में ही बहुत बिकती हैं।
पत्रिका तो खैर बहुत घरों में नहीं पहुंचती, लेकिन दैनिक अख़बार तो बहुत घरों में पहुंचता है। दैनिक अख़बार भी लिंगवर्धक यंत्र, कंडोम और सेक्स बढ़ाने की दवाएं बेचते नज़र आते हैं। विज्ञापनों के साथ कामुक मुद्रा में लड़की की तस्वीर ज़रूर चस्पां होती है। यही नहीं अंडरवियर के विज्ञापनों को अश्लील बना दिया गया है। सेमिनारों में बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है, उन पर अमल करना बहुत मुश्किल है। सच्चाई यह है कि अब अख़बार, पत्रिका और न्यूज चैनल भी किसी साबुन, क्रीम और टूथपेस्ट की तरह एक प्रोडक्ट भर हैं। उन्हें बेचना है। रेवेन्यू लाना है, भले ही मिलावट करके आए या सेक्स परोस कर।
(सलीम साहब मानवाधिकार कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार हैं। मेरठ में रहते हैं।)
ख़बरों में नहीं ख़बरचियों में कितनी है मिलावट, इस पर हो बहस!
राधेश्याम दांगी
ख़बरों में मिलावट की बात मायने नहीं रखती, मायने तो मिलावट करवाने और करने वाले रखते हैं। और वे ऐसा क्यों करते हैं? यह सब करने वालों के पीछे वे कौन लोग हैं? क्यों व कौन का जवाब तलाशने से पहले हमें ख़बरों में मिलावट करने वालों के निजी स्वार्थ, प्रलोभन, रुचि (रुचि यानी इंटरेस्ट ही सबसे बड़ी वजह होती है), मानसिकता, सोच, कार्यशैली और कार्य क्षेत्र को जानना होगा। ख़बरों में मिलावट, कांटछांट, अंडरप्ले, सॉफ्ट करना, ख़बर रोकना आदि को लेकर कई बार मीडिया जगत के कई वरिष्ठ लोगों से कई बार चर्चा हुई और होती है, तो एक बात यही निकल कर आती है कि मीडिया हाउस की अपनी डिमांड होती हैं, इंटरेस्ट होता है, पत्रकारों के अपने हित होते हैं, जिसके आधार पर संस्थानों की नीति निर्धारित की जाती है। किसी विज्ञापनदाता ने विज्ञापन देना बंद कर दिया, तो नीति रातोंरात बदल जाएगी।
दरअसल वर्तमान में संपादकों को मैनेजर कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जो पत्रकार/व्यक्ति संस्थान को जितना लाभ दिलवा सकता हैं, वह संस्थान के लिए उतना ही बड़ा आधार माना जाता है। उसे ही संपादक बनाया जाता है या अन्य महत्वपूर्ण पद दिया जाता है, जहां से वह सब मैनेज कर सके। वही व्यक्ति मालिकों और उनके करीबियों में सही पत्रकार होता है। जो पत्रकार संपादक और अपने बॉस के अनुसार काम करता है, उसका संस्थान में महत्व भी अधिक होता है। मिलावट हर स्तर पर होती है, हम इसमें कहां-कहां फिल्टर लगाएंगे। पत्रकारों ने ईमानदारी और कलम के प्रति वफादारी कम कर दी। वे भी हर स्तर पर समझौते करने लगे। फ्रेशर्स को तो पाठ ही यही पढ़ाया जाता है कि ख़बरों में फिल्टर लगाना सीख लो, दिक्कत नहीं आएगी। उन्हें बताया जाता है कि ख़बर को बाज़ार के हिसाब से देखो। इससे ख़बरों में मिलावट और अधिक होने लगी है। ख़बर को प्रोडक्ट के रूप में देखा जाने लगा। उसका मूल्य/कीमत आंकी जाने लगी है कि फलां ख़बर के कारण कौन पाठक अख़बार ख़रीदेगा/पढ़ेगा और कौन दर्शक टीवी देखेगा? बाज़ारीकरण के कारण ख़बरों की गुणवत्ता गिर रही है।
लेकिन मेरे ज़ेहन में कई सवाल कौंध रहे हैं कि ख़बरों में मिलावट पर बहस करने से क्या होगा? इस बहस का अंजाम क्या होगा? क्या बहस करने से मिलावट नहीं होगी? लेकिन हां, कहीं न कहीं से इसके ख़िलाफ़ एक शुरूआत तो करना ही होगी। बहस करने से मिलावटियों के ख़िलाफ़ एक फौज खड़ी की जा सकती है। विरोधी धड़े यानी मिलावटी और गैर मिलावटी धड़े अलग किये जा सकेंगे। लेकिन फिर एक सवाल उठता है कि गैर मिलावटियों का पलड़ा कितना वज़नदार होगा? क्या गै़र मिलावटी धड़ा मिलावटी धड़े से मुक़ाबला कर पाएगा? खैर… जो भी हैं, ठीक हैं, लेकिन एक बात तो जाहिर है कि यदि ख़बरों में मिलावट के ख़िलाफ़ राष्ट्रीय स्तर पर बहस और बौद्धिक आंदोलन शुरू किया जाए, तो पत्रकारिता में मिलावटी संक्रामक का प्राथमिक उपचार किया जा सकता है।
(युवा पत्रकार राधेश्याम दांगी दैनिक भास्कर समूह से जुड़े हैं और डीबी स्टार, भोपाल के विशेष खोजी संवाददाता हैं)
मिलावट तो होगी ही
संजय द्विवेदी
मीडिया में ख़बरों की मिलावट पर विमर्श तो ठीक है, पर जिस तरह के समाधान बताये जा रहे हैं, उससे सहमत नहीं हुआ जा सकता। मीडिया में मिलावट के बिना कौन-सी ख़बर बन सकती है। आज तो ठीक है किंतु जिस आजादी के पहले की पत्रकारिता के नाम पर कीर्तन किया जा रहा है, उसमें कौन सा स्वनामधन्य संपादक अपनी विचारधारा के बिना लेखन कर रहा था।
ख़बर की पवित्रता एक ऐसा स्वप्न है, जो बेमानी है, क्योंकि पत्रकार की विचारधारा और संवेदना भी तब मिलावट ही मान ली जाएगी। संवेदना और वैचारिकता की मिलावट को रोकने का उपाय क्या है, यह भी सोचना होगा। जो लोग साबुन, तेल की बात कह रहे हैं, या उन्हीं मिलावट रोकने के मानकों को लागू करने की बात कर रहे हैं, उनकी बात समझ में नहीं आती। क्या हम लोग परचून की दुकान पर बैठे हुए लोग हैं, जो मसाले में घोड़े की लीद मिला रहे हैं। यह शब्दों की दुनिया है, वह चाहे बोले जा रहे हैं या लिखे जा रहे हैं। शब्दों और वस्तुओं का फर्क हमें समझना होगा। हम शब्दों के साथ अंर्तक्रिया करते हैं, फिर लिखते या बोलते हैं। इसमें संवेदना, विचारधारा और आपका परिवेश आएगा ही। किसी को स्लम पर हो रही कार्रवाई शहर का सौंदर्यीकरण लग सकती है, तो किसी को आम आदमी पर जुल्म की इंतहां। ये उसके सोच के तरीके पर निर्भर करता है। ख़बरों को देखने का हमारा नज़रिया ही हमें खास बनाता है। ख़बर कंप्यूटर का साफ्टवेयर नहीं है, जो आपकी मांग और सुविधा के लिए बनाया गया है। इसलिए किसी भी तरह का मानक ख़बरों की सच्चाई नापने का हो नहीं सकता। आत्मनियमन और आत्मअनुशासन ही इसके मार्ग हैं। पत्रकारिता में जिस तरह की पीढ़ी आ रही है, उसके सामने जिस तरह के मूल्य रखे जा रहे हैं, उससे वे हतप्रभ हैं। सिर्फ आलोचना और अपने आपको हीन और कलंकित समझने की चर्चाएं कहां तक उचित हैं। चुनावों में जो कुछ हुआ, उसमें पत्रकारों की मंशा या हिस्सेदारी कितनी है। यह सारा कुछ तो मैनेजमेंट के इशारों पर हुआ। प्रबंधन खुद बाज़ार में जाकर अपनी बोली लगा रहा हो, तो पत्रकार की कलम को कौन-सा प्रतिबंध रोक सकता है। नौकरी करने की भी अपनी ज़रूरतें और मजबूरियां हैं। पहले मंदी के नाम पर प्रबंधन ने हकाला, प्रताड़ित किया और चुनाव में वसूली पर उतर आया, इसमें पत्रकारों का दोष क्या है, वह तो सिर्फ प्रताड़ित ही हो रहा है हर तरफ से। प्रबंधन की ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ कौन खड़ा होगा। जो अख़बार वेज बोर्ड के हिसाब से तनख्वाह भी नहीं दे रहे हैं, वे भी सरकारी विज्ञापनों का एक बड़ा हिस्सा ले रहे हैं। हर बार कर्मचारीनुमा पत्रकार को निशाने पर रखा जाता है, उसे निशाना बनाया जाता है। ख़बरों की मिलावट को रोकने का यंत्र आविष्कृत होने के बाद क्या पत्रकार अपना दिल दिमाग़ और विचारधारा सब कुछ छोड़ कर ऑफिस आएंगे। इस तरह की बहस के मायने क्या हैं।
पत्रकारिता या मीडिया की दुनिया हमें जितनी भी बेरहम बना दे, इसमें आये ज्यादातर लोग एक आर्दशवादी सोच, एक अपनी ऐसी दुनिया बनाने के सपने से ही आते हैं, जहां शब्दों की सत्ता होगी और लोगों को न्याय मिल पाएगा। बहुत कम लोग ऐसे होंगे, जो लूटपाट करने के इरादे से यहां आते हैं। कुछ रास्ते में आदर्शों से तौबा कर लेते हैं, रास्ता बदल लेते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रास्ता गलत है। एक ऐसी पीढ़ी भी मालिकों में आयी है जिनके लिए पैसा सबकुछ है पर कुछ अच्छे लोग भी हैं। उनका भी जिक्र कीजिए। अमर उजाला और प्रभात खबर ने लूट के इसी दौर में कहा कि वे चुनावी ख़बरों का पैसा नहीं लेंगे। उनका भी जिक्र कीजिए। मिलावट कहां थी – चुनावी ख़बरें तो विज्ञापन थीं। विज्ञापन को लेकर क्या रोना? पाठक को भी सब समझ में आता है। वह इतना भोला नहीं है। राजनीति के भ्रष्टाचार में हिस्सेदारी की कामना ग़लत है। पर इसे रोका नहीं जा सकता। वे कौन से दूध के धुले लोग हैं – जो जितना भ्रष्ट हो, उसे उतना अधिक मीडिया को देना पड़ा। वे सामने क्यों नहीं आए। हिंदुस्तान के कानून में बहुत से प्रावधान हैं, आप मीडिया को कठघरे में खड़ा करें, किसने रोका है। भाजपा नेता लालजी टंडन ने यूपी के सबसे बड़े अखबार दैनिक जागरण को पैसा नहीं दिया। सार्वजनिक आलोचना की। पर लखनऊ से चुनाव जीते। ऐसे प्रतिवाद राजनीति भी कर सकती है। संकट यह है कि राजनीति और मीडिया दोनों एक ही गटर में है। सो किसी भी तरह का नियमन संभव नहीं है। कानून, सरकार या आयोग जैसी चीजें जो ख़तरा आज का है, उससे बड़ा घोटाला करेंगी। सो मैं ऐसे किसी भी प्रतिबंध के खिलाफ हूं, जो शब्दों की सत्ता को चुनौती देता नज़र आये।
(टिप्पणीकार माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
पहले आम आदमी की सोच को बदलना होगा
काशिफ़ आरिफ़
“खबर में मिलावट” बहुत मुश्किल विषय है। मैने इसे मुश्किल इसलिए कहा क्योंकि ये इंसान की रगों में मिला हुआ है। ये गुण इंसान अपने साथ लेकर पैदा हुआ है। जब भी आप किसी को कुछ बताते हैं, तो वो इंसान उसको सुनता है, लेकिन जब वो उस बात को किसी दूसरे को बताता है, तो वो दूसरे शब्दों का इस्तेमाल करता है और कभी-कभी तो वो न चाहते हुए भी शब्दों को इतना बदल देता है कि उस बात का मतलब ही बदल जाता है। यह तो बात हो गयी, इन्सान की फ़ितरत की।
अब हम मुख्य विषय पर आते है। ये पहले एक रिवाज़ की तरह था कि ख़बर को पढ़नें योग्य और चटपटा बनाने के लिए उसमें मिलावट की जाती थी और उस दौर में ये मिलावट “शब्दों की हेरफ़ेर” होती थी। हल्का-फ़ुल्का-सा झूठ होता था। बिल्कुल “अफ़वाह” की तरह। लेकिन आज जब इंसान “सब कुछ पैसा है” की तर्ज पर चल रहा है, तो वो पैसे के लिए ख़बर में झूठ मिला ही नहीं रहा है, बल्कि झूठी ख़बर पेश कर रहा है। ये लोग ऐसी-ऐसी ख़बरें पेश कर रहे है, जिनको साबित करने के लिए उनके पास कठदलीलों के सिवा कुछ भी नहीं है। इन ख़बरों के बीच में दब कर बहुत सी सच्ची ख़बरें दम तोड देती हैं। हर तरफ़ झूठ छप रहा है और झूठ पढ़ा जा रहा है, लेकिन इस झूठ को बंद कौन कराएगा?
इस सब के पीछे और कुछ नहीं है। वही वजह है, जो हिंदुस्तान में हर ग़लत काम के पीछे रही है। पैसा पावर, सत्ता पावर, कमज़ोर कानून, गै़र-ज़िम्मेदार और लापरवाह जनता। हम लोग हमेशा से ये करते आये हैं कि सारा इल्ज़ाम एक पर लगा कर साफ़ दामन निकल जाते हैं। लेकिन ऐसे नही चलता है कि सारा इल्ज़ाम आप एक ही के ऊपर लगा दें और खुद साफ़ निकल जाएं। पहली बात ये ख़बरें छापने वाले भी हम जैसे लोग ही होते हैं लेकिन जब कहीं कोई हादसा या दुर्घटना होती है, तो अफ़वाह और गलत खबर भी तो हम ही फ़ैलाते है, फिर उसको पढते भी हम हैं, ग़लत ख़बर पढ़ने के बाद मालूम होते हुए भी हम उसकी शिक़ायत न संबंधित अख़बार को करते हैं, न पुलिस को। उलटा उस ख़बर को चटखारा लेकर और लोगों को भी सुनाते हैं। “हम हिंदुस्तानी वैसे भी कान के कच्चे होते हैं और दूसरे की कही हुई बात को या बतायी हुई ख़बर को बगै़र सोचे और जांचे यक़ीन कर लेते हैं”, तो वो ख़बर सब जगह फ़ैल जाती है और इतने सारे लोग उसी ख़बर को बताते हैं कि सच जानने वाले इंसान को भी अपनी बात पर शक़ होने लगता है।
इसके लिये क़ानून बनाने का कोई फ़ायदा नहीं है। क्योंकि वो कानून काम करता है, जिस पर लोग अमल करें और सरकार उस पर अमल करा सके। लेकिन हमारे देश में ये सभंव नही है। क्योंकि यहां पर आम इंसान ख़राब कानून व्यवस्था के लिए सरकार को गाली तो देते हैं, लेकिन खुद किसी कानून का पालन नहीं करते। दूसरों को बताते हैं, आपको इस काम को ऐसे करना चाहिए था, लेकिन जब खुद उस हालात में फ़ंसते हैं तो खुद वो काम नही करते, जो दूसरे को बताया था। यहां के लोगो के दिल-दिमाग़ में भ्रष्टाचार इस तरह से घुस चुका है कि इन्होंने इसके साथ जीना सीख लिया है और उसको अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा मान लिया है।
इसलिए इस देश में मौजूद हर परेशानी का सिर्फ़ एक हल है और वो है कि आम इंसान को अपनी सोच बदलनी होगी। उसे जागना होगा। सच और झूठ के फ़र्क को समझना होगा। मीडिया की नज़रों से देखने के बजाय अपनी नज़रों से देखना होगा और जिस दिन इस देश के आम आदमी ने इस फ़र्क को समझ लिया और अपनी नज़रों से देखना शुरू कर दिया, उस दिन ये सब अपने आप बंद हो जाएगा वर्ना ये लोग हमेशा यही कह कर बच जाएंगे कि हम तो वही लिखते हैं, जो लोग पढ़ना चाहते हैं।
इस सोच को बदलने में इस मीडिया बहुत बडा योगदान हो सकता है। कालीचरन फ़िल्म में कादर खान जी ने एक डायलाग बोला था कि “कीचड़ को साफ़ करने के लिए कीचड़ में उतरना पड़ता है”। आज भी बहुत से ऐसे लोग मीडिया में मौजूद हैं, जो सिर्फ़ सच को लोगो के सामने लाना चाहते हैं, तो उन लोगों को अपने तौर पर कोशिश करनी होगी सच को सबके सामने पेश करने की और आम आदमी को कोशिश करनी होगी उस सच को कुबूल करने की।
(23 वर्षीय काशिफ़ आरिफ़ आगरा निवासी हैं और पिता के साथ जूते व्यवसाय में लगे हुए हैं। पिछले चार साल से ब्लॉगिंग में भी जुटे हुए हैं।)












saleem akhtar जी आप ने bilkul सही लिखा है, आपने तो सिर्फ vigyapan की बात की है, मैंने तो ऐसे channel में काम किया है जहाँ पैर चलते bulletin ruk जाते थे वो भी एक minister के kehne पैर क्योंकि उस minister से उस channel को lakhon रुपये milte थे, ये कोई nai बात तो nai है के channels में politics का dab daba रहता है पैर इतना dab daba की चलते bulletin ruk jayen or darshakon के samne aa जाती है ads. darshak घर baithe सोच te हैं के शायद कोई technical problem aa गयी हो gi, लेकिन उन्हें kon bataye की technical problem नहीं minister का फ़ोन aa gayea था. मुझे याद है मैं उस channel में panel producer के tor पे काम krta था or एक बार उस channel ने कोई program dikhana शुरू किया जिस में punjab police की kartooton को nanga krna था जैसे ही program शुरू हुआ, अभी एक bulletin हुआ था usi टाइम minister जी का fon aa geya, हमारे boss yani channel के malik को कहा यार ऐसा क्यों दिखा रहे हो हमारी sarkaar की besti हो रही है. usi टाइम हमारे boss yani channel के malik का desk पे फ़ोन aayea k program बंद करो or ads शुरू कर दो. usi टाइम hamein program rokna पड़ा or फिर से ads शुरू karni padi…..यह हमारी routine थी……जब मैं अपने घर जाता था तो लोग मुझसे poochte थे यार आप का channel चलते bulletin yan programs को rok के ads क्यों चला देता है. मेरे पास कोई jawab नहीं होता था, क्या kehta minister जी का फ़ोन aa जाता है इस लिए bulletin or programs ruk जाते हैं…..anyways आप ने acha लिखा है or acha लिखते rahiye…हमारी duaein आप के साथ हैं…..
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