गू खाने को ट्रेंड बनाने की कोशिश
♦ धीरेश सैनी
(एनबीटी यानी समीर जैन के नवभारत टाइम्स के एक प्रगतिशील क्रांतिकारी मुलाज़िम धीरेश ने उदय प्रकाश प्रकरण पर जनसत्ता में छपे लेख की प्रतिक्रिया में अपनी यह टिप्पणी लिखी है। इस टिप्पणी का तेवर ज़्यादा स्वाभाविक होता, अगर कुछ आरोपों का ज़िक्र करते हुए वे तथ्यात्मक ग़लतियों के रूप में अपना प्रतिशोध ज़ाहिर नहीं करते। बहरहाल हम इसे बिना किसी काट-छांट के पेश कर रहे हैं : मॉडरेटर)
उदय प्रकाश और उनके समर्थक उनकी करतूत को एक ट्रेंड के रूप में स्थापित करने को उतावले हैं। ऐसा इस मसले पर उदय का निरंतर प्रलाप और उनके समर्थन में आई टिप्पणियों दोनों से जाहिर होता है। इतवारी जनसत्ता में भी उन्होंने एक ब्लॉगर से ऐसा ही कुछ लिखवाया है। इस ब्लॉगर का कहना है कि कई बड़े साहित्यकार अपने समय के तानाशाहों के कसीदे काढ़ चुके हैं, लेकिन उनके रचनाकर्म पर बात होती रही है। यह भी कहा जा रहा है कि बहुत से लेखक हैं, जिन्होंने भाजपा शासित राज्यों में साहित्यिक क्षेत्र के मुनाफे कमाये हैं। तो क्या कहने का मतलब है कि गू खाना पुरानी परंपरा है, सो हमने भी खा लिया और यही ट्रेंड के रूप में माना जाना चाहिए।
हैरत यह भी है कि जिस ब्लॉगर ने यह लेख लिखा है, वह पहले उदय प्रकाश की करतूत पर नाराज़गी जता चुका है, लेकिन फिर वो उदय प्रकाश के घर गया और उसे उनकी आंखों के कोर में अपने सही रास्ते का इलहाम हो गया। इस ब्लॉगर का कहने के मुताबिक यह मान लिया जाए कि उदय प्रकाश का विरोध करने वालों में कई बेदाग़ नहीं हैं, इसलिए उन्हें इस मुद्दे पर विरोध का अधिकार नहीं है। ऐसा है, तो इस ब्लॉगर का निकट इतिहास ही बलात्कार के गंभीर आरोपों से बदनुमा है, फिर वो किस नैतिकता से यह फरमान जरी कर रहा है?
जनसत्ता के इस लेख में हिंदी लेखकों को इस नाते असिह्ष्णु माना गया है कि उन्होंने उदय प्रकाश की चुप्पी को ग़लत ढंग से लिया और उनसे कुछ जानने की ज़रूरत नहीं समझी। अब इससे से बड़ा झूठ ही शायद कोई हो। उदय प्रकाश जब योगी के हुजूर से लौटे, तो उनका ब्लॉग यह जानकारी नहीं दे रहा था। किसी भी तरह के करियरिज़्म से दूर रहे बेमिसाल पत्रकार अनिल यादव (जो जनसत्ता के लेखक के मुताबिक नौजवान हैं और इस नाते लेखक दुधमुहां हैं) ने इस बारे में गोरखपुर के अख़बारों में छपी ख़बर और फोटो को ब्लॉग पर छाप दिया था, तो उदय प्रकाश हिंसा पर उतारू हो गए थे। पुरस्कार वो लाये थे और इस ख़बर को दूसरों की साज़िश बता रहे थे। अनिल यादव को नौकरी से निकलवाने की धमकी दे रहे थे और इस घटना का विरोध करने वाले लेखकों को लांछित करा रहे थे। यह उनके परिवार के संघ की मजबूती के लिए उठा क़दम था और योगी इस संघ की प्रेरणा शक्ति थे (हैं)। बाद में उनका सफाईनामा और उसके समर्थन में उनके द्वारा छापे जा रहे कमेंट भी ग़ज़ब हैं। कई तो योगी आदित्यनाथ को प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बना दे रहे हैं और लगभग सभी सेकुलरिज्म को गरियाते हुए उदय प्रकाश-आदित्यनाथ कंपनी को जायज़ ठहरा रहे हैं। उदय प्रकाश इन समर्थकों के शुक्रगुजार हैं।
ऐसा भी कहा जा रहा है कि कभी अटल बिहारी और कभी सोनिया के कसीदे पढ़ चुके नट के हुनर से लोग जल रहे हैं। कमाल यह भी है कि इस भयानक मसले में असली मुद्दे को दरकिनार करने के लिए ‘कौन दूध का धुला है’ और ‘विरोध करने वालों में कितने बिरहमन – कितने कायस्थ’ आदि सवाल उठाने वालों में ऐसे लोग भी हैं, जिनसे आदित्यनाथ जैसे मसले पर ज़िम्मेदारी की उम्मीद की जा सकती थी। कुछ लोग कह रहे हैं कि बात ठीक है, पर व्यक्तिवादी बात न हो। तो क्या हिटलर को हिटलर कहना व्यक्तिवादी निंदा होगी?
कुछ लोगों को विरोध और ग़ुस्से की भाषा पर एतराज़ है और वीरेन डंगवाल की टिप्पणी का ख़ासकर ज़िक्र किया जा रहा है। नफरत और आतंकवाद के सरगना को लेकर कौन से शालीन भाव व शब्द मन में उठते हैं, यह अशोक वाटिका और संघ परिवार के लोग ही बता सकते हैं। सवाल तो यह उठता है कि इस मसले पर संतुष्ट किस्म की चुप्पी साधे बैठे बहुत से बड़े लेखक, जिनमें नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी, राजेंद्र यादव और दूसरे तमाम लेखक कब अपना रुख जाहिर करेंगे (’संतो कुछ तो कहो इस गाढ़े वक़्त में’)।
दरअसल यह मसला सांप्रदायिक ताक़तों के उभार के बाद लेखकों के एक तबक़े में यह साफ़ हो जाने का है कि अब धर्मनिरपेक्षता से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। पहले लेखकों का हिंदूवाद थोड़ा सफाई के साथ सामने आ रहा था, मगर अब उदय प्रकाश ने जरा आगे बढ़ कर खुलेआम इस डेरे की शरण ले ली (हालांकि निर्मल वर्मा कुछ राह दिखा ही गये थे और कई दोयम पहले ही उस डेरे में बैठ भी चुके थे)। एक तरह से उन्होंने असमंजस में रहे लोगों के लिए रास्ता साफ़ कर दिया है। वे साहित्य के जॉर्ज फर्नांडीज़ कहे जा सकते हैं। देखना है कि अब उनके पीछे कितने लोग इस ट्रेंड का अनुसरण करते हैं।
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जनसत्ता शायद हर न्यायकारी आवाज़ों पर हमले करने का मंच बन गया है। पांचजन्य का ‘बौद्धिक’ वहां छपता ही रहता है। सरकारी हत्यारे गिरोह सलवा जुडूम द्वारा प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान आयोजित करने के नाटक और उसमें कई लेखकों के शामिल होने का कवि-आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने विरोध किया था। इस क़दम का न्याय की पक्षधर शक्तियों ने स्वागत किया है, पर जनसत्ता में अशोक वाजपेयी अपना अलग ही राग अलाप रहे हैं। यह पुराने अफसर का स्वाभाविक अफसर प्रेम भी है और उनका हमेशा प्रगतिशील जनपक्ष का विरोधी होने का भी।
(इस बीच ख़बर यह है की गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया है की उन्होंने उदयप्रकाश को समझाया था की वे उनसे ईनाम न लें क्योंकि इससे उनके वामपंथी साथी नाराज हो जायेंगे।)
एक ज़िद्दी धुन से साभार









प्रिय अविनाश,
उदय प्रकाश पर विवाद समाप्त होना चाहिए। निश्चित रूप से उन्होने योगी के हाथों पुरस्कार लेकर उचित नहीं किया। फिर भी।
भारतेंदु ने विक्टोरिया रानी की प्रशंसा की थी। पर वे आधुनिक हिंदी कविता और रंगमंच के जनक थे और रहेंगे। इसके बावजूद उन्हें कोई गाली नहीं देता और न दिया जाना चाहिए।
मैं हिंदी के ढेरों ऐसे लेखकों को जानता हूं, जो दिन-रात राजनेताओं के तलवे चाटते रहते हैं और महान बने हुए हैं।
और मैं ही नहीं तुम भी और बहुत सारे लोग भी जानते हैं – उदय ने तलवे नहीं चाटे हैं। मैंने दिल्ली में दो पेग शराब और दो बोटी कबाब के लिए बडे़ लेखकों को भागते हुए देखा है। इस तरह भागते हुए कि धोती का पिछुआ खुल जाए।
हिंदी का संसार प्यार और नफ़रत दोनों बेहद हिंसक ढंग से करता है।
उदय प्रकाश से मेरा न तो पत्र व्यवहार है और न ही निकट की मुलाकात। उन्हें पढ़ता रहा हूं। कई बार पसंद आये हैं और कई बार नहीं भी आते।
समीर जैन और आडवाणी का ‘गू’ खाने वाले ‘क्रांतिकारी’ ही नहीं, अभी ताज़ा खबर ये है कि जेसिका लाल के कातिल मनु शर्मा के अखबार से भी मोटी रकम (गू ) पाने वाले ने भी ऐसा ही लिखा है। उसमें पंकज चतुर्वेदी को ‘क्रांतिकारी’ बनाया गया है और हमारे लेखक-साहित्यकार उदय को संघी। अब निंदा अभियान में लगे इन सभी की पोल खोलनी चाहिए। इस काम में मैं भी साथ हूं। मेरा भी संबंध किसी पार्टी से नहीं है, हां उदय प्रकाश जी का मैं पाठक और प्रसंश्क हूं। ‘फ़ैन’ बोलो तो बोल सकते हो।
इस मसले पर संतुष्ट किस्म की चुप्पी साधे बैठे बहुत से बड़े लेखक, जिनमें नामवर सिंह और अशोक वाजपेयी, राजेंद्र यादव और दूसरे तमाम लेखक कब अपना रुख जाहिर करेंगे (’संतो कुछ तो कहो इस गाढ़े वक़्त में’)।
अरे इन महानों के पोथड़े स्वयं गू में सने हुए हैं, ये क्या खाकर इस प्रकरण पर कहे-बोलेंगे।
मुंडे- मुंडे- मतिर्भिन्ना. लगे रहो विद्वानों- आप महान आपकी सहितियक भाषा महान, बाकी सब बेईमान. वाह. क्यूं पढेगा हिंदी का पाठक आपको? इसी गू -गा के लिए क्या? चलिए अपनी तलवारों को म्यान में डाल लीजिये, सब का भला होगा.
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