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मीडिया में सेटिंग-गेटिंग का खेल अभी अपने शबाब पर है!

21 July 2009 No Comment

हम सब ख़बर नहीं, शाही पनीर पका रहे हैं

गिरींद्र नाथ झा

girindraअब ख़बर लिखी नहीं, पकायी जाती है। वह भी तमाम तरह के मसालों को मिलाकर। वैसे ही, जैसे हम शाही पनीर पकाने में दूध का इस्तेमाल करते हैं। रसोइए की भाषा में कहूं, तो मसालों के सहारे दूध के मूल रूप को बदल दिया जाता है ताकि पनीर का स्वाद मसालेदार हो जाए। मोहल्ला लाइव की बहस में शामिल होने से पहले हज़ार बार सोचा कि जो भी मेरी प्रतिक्रिया होगी, क्या वह मेरा सच होगा? क्योंकि जिस पेशे की खिचड़ी पर बात चल रही है, उसमें तो मैं भी शामिल हूं। ऐसी स्थिति में सब सच लिखना क्या मेरे लिए मुमिकन होगा?

ख़बरों की दुनिया में मिलावट का खेल महानगरों से लेकर देश के सुदूर इलाकों तक फैला है। आप इसे वायरल कह सकते हैं, क्योंकि यह काफी तेजी से फैल रहा है। मेरे शहर पूर्णिया में एक हिंदी दैनिक के संवाददाता को ख़बरों में मिलावट के लिए पैसे मिलते हैं। दरअसल अख़बार के मालिक तो सैलेरी देते हैं, लेकिन ख़बरों में मिलावट के लिए जनाब को दूसरी जगह से दाम मिल रहे हैं।

मेरा मानना है कि ख़बरों में जो मिलावट हो रही है, वो उन लोगों की देखरेख में ही शुरू हुई है, जो कि आज इस पर चिंतित हैं। प्रिंट से लेकर इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया तक प्रायोजित-सा लगता है। आज हर चैनल पर रियलिटी शो को लेकर कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं। यहां किसी चैनल ने ये नहीं बताया कि वे विज्ञापन कर रहे हैं। या कम से कम इतना तो कह देते कि प्रमोशन कर रहे हैं। पर किसी ने सच बोलने की ज़हमत नहीं उठायी।

कभी-कभी काम के दौरान ऐसी प्रेस रिलीज टेबल पर ख़बर बनाने के लिए फेंक दे दी जाती है, जिसकी हेडलाइन पढ़ कर ही लग जाता है कि यह किस दुकान की उपज है। कहने का मतलब यह है कि पीआर ऐजेंसियों के प्रेस नोट अब ख़बरों का हिस्सा बन चुके हैं। (मैं कोई नयी बात नहीं कह रहा हूं।) आप यह गांठ बांध लीजिए कि ख़बरो में मिलावट सिर्फ चुनावी ख़बरों में ही नहीं की गयी बल्कि यह तो हर तरह की ख़बर में की जा रही है। किसी नये प्रॉडक्ट की लॉन्चिंग होती है, तो उसका नमूना सबसे पहले अख़बारों के दफ्तरों में पहुंच जाता है।

खबरों में मिलावट को बरसों से देखते हुए कभी-कभी खुद से पूछता हूं कि क्या देश में कोई भी ऐसा अख़बार है, जिसमें देश खुद से बात करता हुआ नजर आ रहा हो?

अब सवाल यह है कि यदि ख़बर में मिलावट के ख़‍िलाफ़ कानून बन भी जाए, तो उसका पालन कैसे होगा? ये तय कैसे होगा कि ख़बर में क्या मिलाया गया है? यदि विज्ञापन में ख़बर और ख़बर में विज्ञापन को मिलाने की बात है, तो इसके लिए ज़‍िम्मेदार कौन हैं। ऐसे कई सवाल हैं, जिस पर हम सभी को सोचना होगा, कानून बनाने के बजाय यदि मीडिया हाउस इस मुद्दे पर गंभीर रुख अपनाये, तो बात बनती दिखेगी। दरअसल हमें ही ख़बरों को रायता बनाने से बचाना होगा।

(टिप्‍पणीकार युवा पत्रकार हैं और आईएएनएस न्‍यूज़ सर्विस से जुड़े हैं)

मंजीत ठाकुर

mnjtपहली बात, दीप्ति दूबे की बात से सौ फीसद सहमत हूं, और हिमांशु की बात से भी। मिलावटी बारिश के दौर में हम रेनकोट पहन कर खड़े होने का दंभ भरते हैं। लेकिन संतोष की बात है कि हम अपने अखबार और चैनल में जो नहीं कह पाते, कम से कम अपने ब्लॉग पर तो कह ही डालते हैं।

मुझे याद है कि बहुत पहले किसी ब्लॉगर ने ब्लॉग के भड़ास-युग खत्म करने की अपील की थी। यह किसी एक ब्लॉग पर टिप्पणी नही थी। यह थी पूरे दौर पर एक टिप्पणी। बहरहाल, अच्युतानंदन मिश्र के एक लेख में एक पंक्ति पढ़ी थी… ये कैसी रौशनी आयी कि लोग अंधे हो गए…

जिस दूरदर्शनी आधिपत्य को पानी पी-पीकर कोसा जाता रहा है, चैनलों की बाढ़ में लगभग वैसा ही चोला सभी चैनलों और प्रायः सभी अखबारों ने ओढ़ रखा है। लेकिन ये बात और है कि खुद को पाक-साफ़ साबित करने में और हम-किसी-खेमे-में-नहीं वाला दंभ उनके चेहरे पर है। अख़बारों का दोहरा चरित्र इस लोकसभा चुनाव में उघड़ गया, तो सेमिनार तक आयोजित होने लगे। लेकिन प्रिंट मीडिया से जितना मेरा ताल्लुक है, मुझे पता है कि अख़बारों में स्पेस किस क़दर बिकते रहे हैं। सरकारी सब्सिडी पर मिलने वाले अख़बारी काग़ज़ के कारोबार के बारे में किस पत्रकार को पता नहीं है? बड़े अखबारों के खेल तो जगजाहिर हैं।

मेरा पक्का भरोसा है कि इस दौर में न्यूट्रल तो कोई नहीं। चुनाव में और चुनावों के बाद किस चैनल ने किस राजनितिक दल स्टैंड लिया, किसके पक्ष में किस कदर हवा बनाई, ये छिपा है क्या? और सत्ता का समीकरण साफ होते ही किस-किस चैनल ने पाला बदल लिया, ये भी छिपा है क्या?

दीप्ति ने सही ही कहा, ज्यादातर चैनल उद्योगपतियों और बिल्डरों के हैं…। मैं जोड़ना चाहूंगा कि अपराधियों के भी हैं। लेकिन इसकी कोई काट है? और ज्यादातर चैनल कूड़ा परोस रहे हैं, किसके आदेश पर परोस रहे हैं? अगर सरकार (मैं सरकार की मंशा का उल्लेख नहीं करना चाहता) कोई कायदा-क़ानून लागू करना चाहती है, तो हम चिल्लाते हैं – अभिव्यक्ति की आज़ादी। जिस ग्लोबलाइजेशन ने हमें मीडिया में भी रोज़गार के बेहतर मौके मुहैया कराये हैं, और झोलाछाप कहे जाने वाले पत्रकार भी लाखों की तनख्वाह पा रहे हैं, उसने प्रेस की आज़ादी पर बिना कोई कानून बनाये कैसे बंदिशें लगायी हैं, इस पर किसी ने कोई सेमिनार किया है?

मुझे तो जेम्स बॉण्ड की एक फिल्म याद आ रही है। संभवतः टुमॉरो नेवर डाइज़ थी। रुपर्ट मर्डोक सरीखा एक किरदार रोज़ अपने हैडलाइन के हिसाब से घटनाएं अंजाम देता है। क्या हम उसी स्टेज पर नहीं पहुंच गए हैं? पिछले कुछ महीनों से मैं भारत दर्शन पर हूं। पूरा पूरब देख रहा हूं। सड़क के ज़रिए। इसलिए भारत और इंडिया की असलियत ज़्यादा ज़ाहिर हुई है। पहले भी जानता था, क्योंकि मैं भी गांव से हूं – लेकिन इतनी गहराई से नहीं। लेकिन जिस चकाचौंध से इंडिया का गुणगान हो रहा है और एक अदना-सी आइटम गर्ल के स्वयंवर की चर्चा बेशकीमती प्राइम टाइम पर हो रही है – वह मीडिया के स्खलन का छोटा-सा सुबूत है। इस मुद्दे पर टीआरपी का बहाना बिलकुल नहीं चलेगा… और अगर चलेगा तो फिर मीडिया की ज़‍िम्मेदारी और नैतिकता जैसे ढकोसलों पर चर्चा करना फिजूल है।

पाठकों का ध्यान पिछले दिनों की एक घटना पर भी खींचना चाहूंगा। रविवार को मेट्रो की दुर्घटना हुई। उसी दिन छत्तीसगढ़ में 36 लोगों को नक्सलियों ने मार डाला। मेट्रो की ख़बर कम महत्वपूर्ण नहीं थी, लेकिन छत्तीससगढ़ की ख़बर अपने देश की ही थी, उसे महज डबल कॉसम में छापना पत्रकारीय मूल्यों पर मज़ाकिया लहजे की ओर इशारा करता है। नियरनेस का बहाना हो सकता है, लेकिन छह गुना ज़्यादा लोगो की मौत कैसे कम अहम हो सकती है, जब लालगढ़ अभी ख़त्म भी नहीं हुआ?

मीडिया में सेंटिंग-गेटिंग का खेल बहुत पुराना है – लेकिन अभी यह अपने शबाब पर है। जिसे पसंद नहीं करते हो, मंदी के बहाने उसे निकालो। अपने लोगो को भर लो। क्या ये सच नहीं? ऐसे ही किसी सेमिनार में एक सीनियर ने कहा था, हमारे मीडिया के हैडलाइंस विदेशों से तय होते हैं। हम उनके हाथों की कठपुतलियां बन कर रह गये हैं। नव-साम्राज्यवाद का एक पूंजीवादी चेहरा ये भी है। जहां तक दलाली का सवाल है, चर्चा थी कि एक नये-नवेले चैनल के मालिक ने अपने पत्रकारों (पढ़ें – नौकरों) से कहा कि रोज़ाना 5 हज़ार लेकर आओ, तो नौकरी बचेगी। क्या यह सच नहीं है?

…दीप्ति जी, हमें मान लेना चाहिए कि हम सब मीडिया संस्थानों में दलाली नहीं तो कम से कम नौकरी तो कर ही रहे हैं। पत्रकारिता?? भूल जाइए, फिलहाल कम से टीवी में।

(टिप्‍पणीकार युवा पत्रकार हैं और डीडी न्‍यूज़ से जुड़े हैं)

pawan cartoon1

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