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अरविंद जी, मुगालते में रहने से सच नहीं बदलता!

21 July 2009 6 Comments

♦ विवेक सत्‍यमित्रम

vivekअरविंद शेष जी आपको हार्दिक बधाई। आपने हम जैसे कमअक्ल लोगों के सामने तथाकथित नेता और तथाकथित पत्रकार के दो मानक रखे। ये अलग बात है कि साफ-सुथरी छवि वाले तेज़तर्रार नेता कपिल सिब्बल और जुझारू तेवर वाले पत्रकार आशुतोष को मानक बना देने से तथाकथित की परिभाषा थोड़ी कन्फ्यूजिंग हो गयी है। बहरहाल, कोई बात नहीं… अगर आपको नहीं लगता कि कपिल सिब्बल नेता हैं, और आशुतोष पत्रकार, तो हम भी मान ही लेते हैं। मगर क्या आपके ज़हरबुझे तर्कों का असल मक़सद इन्हें तथाकथित साबित करना भर था, या फिर आपको सचमुच ये बुरा लगा कि कपिल सिब्बल को मीडिया की ख़बरों से कोई फर्क नहीं पड़ता और आशुतोष को जवाहर लाल नेहरु की ज़रूरत महसूस नहीं होती?

चलिए, मैं ये मानकर चलता हूं कि आपके लिए आशुतोष की ऐसी-तैसी करना कोई मसला नहीं हो सकता! आपकी नीयत उन पर व्यक्तिवादी हमले करना नहीं था! क्योंकि आप तो आशुतोष को पत्रकार मानते ही नहीं! रही बात कपिल सिब्बल की, तो आपने उन्हें इस बुनियाद पर बरी कर दिया है कि जब खुद मीडिया ख़बरों से खिलवाड़ करने लगी है, तो ऐसे में कपिल सिब्बल ने ग़लत क्या कहा।

घूम फिरकर आपकी शिक़ायत उस मीडिया से है, जो बाज़ार के हाथों गिरवी हो गया है। मगर एक बात मुझे समझ में नहीं आयी कि जिस मीडिया को आप बाजार की रखैल साबित करने पर तुले हैं, उसकी परिभाषा के दायरे में केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया क्यों है। आपके पूरे लेख में जिस तरह के सवाल खड़े किये गये हैं, उनकी जद में केवल इलेक्ट्रानिक मीडिया ही क्यों है? क्या आप ये मानकर चल रहे हैं कि अख़बारों में ख़बरों के साथ खिलवाड़ नहीं होता? या ख़बरों का सेलेक्शन करते हुए इस बात का ध्यान नहीं रखा जाता कि कौन सी ख़बर पाठकों की लारग्रंथियों में हलचल मचाएगी? कहीं आप ये तो नहीं कहना चाहते कि ख़बर को सनसनीखेज़ करने, न्यूडिटी का छौंका लगाने से लेकर उसे मसालेदार बनाकर परोसने तक का काम केवल न्यूज चैनल करते हैं? या फिर आपने इलेक्ट्रानिक मीडिया का चीरहरण करने का फ़ैसला इसलिए किया, क्योंकि आशुतोष एक न्यूज चैनल के सर्वेसर्वा हैं… और आपको इमरजेंसी के पीरियड में ब्लैंक अख़बार छापने वाले रामनाथ गोयनका की कंपनी से जुड़े होने की सहूलियत हासिल है? आपको लग सकता है कि मैं भला आशुतोष के बचाव में क्यों उतर आया हूं… तो जनाब, आपको बताना चाहूंगा, मेरा उनसे कोई लेना-देना नहीं है। न तो वे मुझे जानते हैं, न ही मैं अपने उज्‍ज्‍वल भविष्य की संभावनाएं टटोलने के लिए ये लेख लिख रहा हूं। इसकी एकमात्र वजह ये है कि आपने अपनी बात कहने के लिए जिन उपमाओं और शब्दावलियों के कंधों पर रख कर बंदूक चलायी, वो सारी चीजें हमारे (मेरे और आशुतोष के) बीच साझा हैं। मैं भी एक न्यूज चैनल का पत्रकार हूं, जिन्हें आपने पानी पी पीकर गरिआया है। लिहाजा मुझे लगा कि बेशक मेरा नाम आशुतोष न हो… कहीं न कहीं आपके आरोपों के घेरे में मैं भी आता हूं। इसलिए अपने हिस्से का जवाब मैं आपको देना चाहता था।

अपनी बात आगे बढ़ाऊं, उससे पहले मैं आपको कपिल सिब्बल के अल्फाजों की याद दिलाना चाहता था, जिनका आपने भी हवाला दिया है। कपिल सिब्बल ने कहा था कि “आप कुछ भी छापते रहिए, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता”। जिस तरह की उम्दा तल्ख ज़बान में आपने अपनी बात रखी है, मेरा मन ये यक़ीन करने को तैयार नहीं कि आप ‘छापने’ जैसी टर्मिनोलॉजी के मायने नहीं समझते। वैसे भी खुद आपने ही कहा है कि चैनल ‘खेलते’ हैं, ऐसे में ये तो साफ हो जाता है कि ‘छापने’ का काम अख़बारों का है। बावजूद इसके आपकी दलीलें महज चैनलों के इर्द-गिर्द घूम रही हैं। अगर आप मेरे तर्कों का मतलब ये निकालना चाहते हैं कि मैं ये साबित करने पर तुला हूं कि अख़बार भी चैनलों की तरह ही बिकाऊ हैं… या उनकी भी विश्वसनीयता पर उतने ही स्याह निशान लगे हैं, जितने किसी न्यूज चैनल पर, तो आप मेरे साथ नाइंसाफी कर जाएंगे। प्रभु, मैं तो आपसे बस एक बात कहना चाहता हूं कि तर्कों के जरिये आप कुछ भी साबित कर सकते हैं, मगर ऐसा करते हुए आप हकीकत का गला नहीं घोंट सकते। आप ये क्यों मानकर चल रहे हैं कि न्यूज़ चैनलों में सारे बिल्डरों और शराब माफियाओं का पैसा लगा है… और अख़बारों में साधु-संतों-महात्माओं का, जिनका मक़सद अख़बार निकालकर समाज सेवा करना है… ताकि मोक्ष हासिल किया जा सके।

आपको आशुतोष की ये बात शायद सबसे ज्यादा नागवार गुज़री है, जिसमें वो बाज़ार की एक सच्चाई बता रहे हैं। आपकी बात बिल्कुल सही है, बाज़ार ने हमे ख़रीदा नहीं है, लेकिन बाजार खुद में एक हकीकत नहीं है… ऐसा आप कैसे कह सकते हैं। क्या आप जिस अखबार या समूह में काम करते हैं, उसकी कोई मार्केटिंग स्ट्रेटेजी नहीं है? क्या वो ख़बरों की ब्रांडिंग में यकीन नहीं रखता? क्या उसे चटखारे लेकर ख़बरें लिखने से गुरेज है? क्या उसके मालिकों का कोई पॉलिटिकल इन्क्लाइनेशन नहीं है? क्या रेसेशन के नाम पर वहां छंटनी नहीं हुई है? क्या कंपनी की आर्थिक चुनौतियों का हवाला देते हुए वहां लोगों की तनख्वाहें कम नहीं की गयी हैं? क्या वो कंपनी अपने प्रॉडक्ट का प्रचार करने के लिए विज्ञापनों का सहारा नहीं लेती? हो सकता है, इनमें से एकाध सवाल ऐसे हों, जिनका जवाब आप नहीं में दे सकें, वरना ये क्रूरतम सच्चाई है बाज़ार की। क्योंकि आपके मेरे जैसा कोई पत्रकार शायद कभी कोई अख़बार या चैनल खड़ा नहीं कर पाएगा, जिसके पास बस सिद्धांत की पूंजी है। अर्थ इस दुनिया की सच्चाई है, इसे नकार कर, इसकी मजबूरियों को एक सिरे से खारिज करके… और केवल बकबक करके हम खुद को धोखे में रख सकते हैं, इससे ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते। मैं ये कतई नहीं कहता कि बाज़ार की दलीलें रख कर हमें अपनी मजबूरियों और गलतिंयों को सही ठहराने का हक मिल जाता है? लेकिन बाजार एक सच है… और हमें इसे कबूल करना ही होगा। रही बात बाज़ार के दबाव में ख़बरों के साथ खेलने वाले पत्रकारों को बेईमान साबित करने की, तो मैं इस तर्क पर अफ़सोस भर जाहिर कर सकता हूं।

आखिर में, मैं आपको ये ज़रूर कहना चाहूंगा कि जिस अंदाज़ में आशुतोष ने ये कह दिया कि आज जवाहर लाल नेहरु की ज़रुरत नहीं है, आप भी ये कहते हुए कि आशुतोष की ज़रूरत नहीं है, कहीं न कहीं वही ग़लती दोहरा रहे हैं, जिसके बूते आपको आशुतोष जैसे वरिष्ठ पत्रकार पर सवाल खड़े करने की ज़मीन हासिल हुई। क्योंकि यहां सवाल किसी व्यक्ति विशेष के बारे में किसी की राय का नहीं है। यहां सवाल है समय काल परिस्थितियों में सच की नब्ज टटोलने का, जो किसी पूर्वाग्रह के साथ तो कतई मुमकिन नहीं है। इसलिए मीडिया की परिभाषा को महज चैनल तक बांधकर मत रखिए। इस पर उठने वाली अंगुलियां हम सभी की ओर उठती हैं। और हां, पत्रकारिता में व्यक्तिगत नैतिकता ही आखिरी और सबसे कारगर हथियार है। अगर आप ये समझ पाएं, तो शायद ये भी समझ पाएंगे कि बाज़ार कोई तर्क नहीं, एक हकीकत है… और इसकी चुनौतियों से लड़ने के लिए तो ये समझना और भी जरुरी है। लेकिन अगर मकसद बौद्धिक जुगाली करना भर है, तो कोई बात नहीं। आप कुछ भी सोचने, कहने या लिखने के लिए स्वतंत्र हैं।

(टिप्‍पणीकार युवा पत्रकार हैं और इंडिया न्‍यूज़ चैनल से जुड़े हैं)

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6 Comments »

  • सुशांत झा said:

    बहुत देर कर दी…हुजूर आते-आते।

  • आदर्श राठौर said:

    विवेक भाई.. हमेशा की तरह बहुत बढ़िया लिखा है। सटीक जवाब…

  • aam admi said:

    विवेक जी,
    यह सही है कि बाज़ार एक सच है और मिलावट उस सच का एक पहलु. क्या आप ख़म ठोक कर मिलावट को किसी भी कोण से जायज़ ठहरा सकते हैं? यदि नहीं, तो खुलकर कहिये कि मिलावट चाहे किसी भी किस्म की हो बर्दाश्त के काबिल कतई नहीं हो सकती. अरविन्द जी के लेख का यही मर्म है. यह ठीक है कि आजकल बाज़ार का ‘बाज़ार’ बहुत ही गर्म है मीडिया में. तो क्यों नहीं वास्तविक सरोकारों का बाज़ार लगाया जाये? अगर सरोकारों और विचारों का बाज़ार सही एवं वास्तविक सन्दर्भों के साथ लगाया जाये तो कोई कारण नहीं कि उन अख़बार/ चैनल/ वेबसाइट/ब्लॉग की टीआरपी ऊँचाइयों को न छूने लगे क्योंकि अभी भी इनकी मांग है और संवेदनाएं अभी भी जिंदा हैं हमारे समाज में.

  • Amlendu Asthana said:

    बुद्धिजीवी हमेशा जोड़ने की बात करता है पर तथाकथित बुद्धिजीवियों ने आदमी को आदमी से हमेशा घटाया ही है. हम लेखक हुए तो दलित और सवर्ण लेखक में बंट गये. अब प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खटास घोल रहें हैं.
    बात है की हर किसी के लिए हेर किसी की महत्ता नहीं होती किसी के लिए कोई महान है किसी के लिए कोई. कोई लेनिन को मानता है कोई गोडसे को तो कोई हिटलर को. अच्छा है आप अपने विश्वास के साथ चलें औरों के विश्वास पर प्रशन खडा न करें. किसी के यह कहने से की गाँधी और नेहरु की महत्ता नहीं है अगर आपका या मेरा विश्वास डोलता है तो यकीं मानिये हम कमजोर हैं. कमजोरी हमारे अंदर है. मुझे तो यह बहस ही कागज काला करने जैसी लगी.
    अमलेंदु अस्थाना चंडीगढ़

  • Amlendu Asthana said:

    यहाँ तो सब के सब दुह्शासन हैं.
    तुम भी दुह्शासन तो हम भी दुह्शासन. तुम मेरी साडी खिचोगे तो मई तेरी साडी खीचूँगा.
    इसी सिधांत पर चलते जाओ बंधू और समाज तमाशा देखेगा .

  • Ashok Priyadarshi said:

    विवेकजी, आप भी असली मुद्दे से भटक गए. वरना आशुतोष वर्सेस अरविन्द करने के बजाय मीडिया वर्सेस कपिल सिब्बल पर लिखते. आप में और अरविन्द शेष में यही अंतर है कि आप सारा दोष प्रिंट को देना चाह रहे हैं, जबकि अरविन्द इलेक्ट्रॉनिक को. बेहतर होता यदि आप लोग इसे मीडिया वर्सेस पॉलिटिक्स बनाते.

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