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क्‍या तुमने सोचा था… भोले पाठक की वे हर लेंगे मति!

23 July 2009 4 Comments

संपादकगण बेबस करें गुमाश्‍तागीरी

♦ हेमेन्द्र मिश्र

myselfअभी अभी बीते आम चुनाव में खबरों को जब बाजार की सुनहली पालकी में झुला कर उपभोक्ता के सामने रखा गया, तो खूब हाय-तौबा मची। चारों ओर से यह आवाज उठने लगी कि पत्रकारीय मूल्य में गिरावट आ गयी है और ख़बरों को अर्थ के आधार पर तय किया जाने लगा है। आप कुछ भी छापें हमें फर्क नहीं पड़ता… और खबरों से खेलना ही आपकी पत्रकारिता है… जैसे जुमले प्रयोग होने लगे। लेकिन ऐसा नहीं है कि ख़बरों को मसाले की छौंक मारकर परोसने का धंधा हाल ही में शुरू हुआ है। बल्कि इस तथाकथित मज़बूत स्तंभ पर आर्थिक या यूं कहे मिलावट की पुताई आज़ादी के बाद से ही शुरु हो गयी थी।

संपादकगण बेबस करें गुमाश्‍तागीरी यद्यपि पेट भर खाएं न बस फांके पनजीरी बढ़ा-चढ़ा तो अख़बार का कारोबार है पांति-पांति में पूंजीवादी प्रचार है क्या तुमने सोचा था कभी काले-गोरे प्रेसपति भोले पाठक समुदाय की हर लेंगे गति और मति

बाबा नागार्जुन ने यह कविता 1950-52 में लिखी थी। इन पंक्तियों को समझने में शायद ही किसी को दिक्कत हो? यहां पूजींवाद और संपादक के बीच पनप रहे नये रिश्ते की तरफ इशारा किया गया है। हां यह बात और है कि अब जाकर भोले-भाले पाठक को यह बात समझ में आयी है। इसलिए बहस का मुद्दा यह नहीं होना चाहिए कि ख़बरों में मिलावट कितनी हो रही है? बल्कि सोचना यह होगा कि आख़‍िर क्यों एक पत्रकार सत्ता की दलाली करने पर मजबूर है? पिछले महीने ही मेरी एक स्ट्रिंगर से मुलाकात हुई। उसने बताया कि उसे एक ख़बर के लिए महज दस रुपये मिलते हैं। अख़बार में रोज़ाना उसकी दो-तीन ख़बर छपती है। इस तरह देखें तो उसकी मासिक आमदनी करीब हजार-बारह सौ रुपये ही बनती है। ऐसे में आखिर कब तक वह ख़बरों से इंसाफ कर पाएगा? एयरकंडीशन सेमिनारों में हम-आप पत्रकारिता को गांवों से जोड़ने की वक़ालत करते है। चलो गांवों की ओर जैसे नारे बुलंद करते है। लेकिन हममें से कौन गांवों में जाकर आदर्श पत्रकारिता करने को उत्सुक है? जवाब अपवाद में ही होंगे। आज भी गांवों की जो हालत है किसी से छुपी नहीं है। यहां चाय-नाश्‍ते के आधार पर ख़बर गढ़ी जाती है। ऐसे में जब तक स्ट्रिंगर या छोटे पत्रकार को सुविधा नहीं दी जाएगी, तब तक आदर्श पत्रकारिता की बात बेमानी ही साबित होगी। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं लगाना चाहिए कि स्टिंगर ही पत्रकारीय मूल्य में आ रही गिरावट के लिए ज़‍िम्‍मेदार हैं। दरअसल यहां भी पूंजीवादी व्यवस्था का प्रभाव है, और यह सारा खेल मठाधीश बने पत्रकारों का खेला हुआ है, जो अपना लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। अपने सौ वर्षों से अधिक का लंबा सफर तय करने के बाद अब तो मीडिया बाकायदा एक उद्योग बन गया है। और हर उद्योग का मक़सद ही होता है, मुनाफा कमाना। मीडियाकर्मी तो मात्र कलम की नौकरी करते हैं और हुक्म की तामील में हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। ऐसे में मीडिया को पत्रकारिता का पर्याय मानना ही मुगालते में रहना होगा। दिनोंदिन मीडिया मैनेजमेंट का दबाव भी इस कदर बढ़ रहा है कि समाचारों की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और तथ्यपरकता की बात बेमानी ही है। ये बात और है कि ख़बर को स्वतंत्र और निष्पक्ष समझने वाले दर्शक-पाठक को धोखा देने के बाद भी हम सिर उठाकर उनकी पत्रकारिता करने का दंभ भरते हैं। दोस्तो, अब सोचना हम नई पीढ़ी को है। आत्ममंथन करें कि वाकई इस क्षेत्र में हम मिशन प्रधान पत्रकारिता करने आये हैं या उपभोग की संस्कृति का हिस्सा बनने? अगर नयी पौध भी पत्रकारीय मूल्य की तिलांजलि देकर ही पत्रकारिता करती है, तो वह भी उसी भीड़तंत्र का हिस्सा बनेगी, जिसकी नज़र में हाशिये पर खड़े आम आदमी की कोई कीमत नहीं। तब फिर बहस की बात बेमानी होगी?

(लेखक युवा पत्रकार हैं और अमर उजाला अख़बार से जुड़े हैं)

बस… इतना नैतिक दायित्व हम उठाकर चलें

♦ मज़्क़ूर आलम

Mazkoor1ये बहस इन दिनों शबाब पर है कि अगर ख़बरों में मिलावट हो तो क्या करना चाहिए? क्या कोई कानून बनाया जाना चाहिए? मुझे लगता है कि ख़बरों में मिलावट का मामला कुछ ऐसा है कि उसे अलग नहीं किया जा सकता। ये कुछ हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने जैसा है। कार्बन और लीड का मिश्रण भी समझा जा सकता है। यानी संजीवनी भी और जानलेवा भी। उदय प्रकाश वाले मामले को ही लें न। कुछ लोग उनके पक्ष में तर्क दे रहे हैं कि भूल से कुछ भावुक क्षणों के आवेग में आकर उन्होंने योगी के हाथों पुरस्कार ले लिया। कुछ लोग मार्मिक कहानी की तरह इस घटना को परोस कर इस बहस को ही बेजान करार देना चाहते हैं, तो दूसरा पक्ष इस बात पर तुला है कि उन्होंने बहुत बड़ा अपराध कर दिया है, जो क्षम्य नहीं है। इसलिए उनके इस पाखंड को देखते हुए उनकी पूरी जीवन साधना और उनके साहित्य को खारिज़ कर दिया जाना चाहिए। अब आप ही बताइए कि इस तरह के विषयों पर बहस में भाग लेते हुए लोग कुछ न कुछ तो कहेंगे ही। तो क्या दोनों पक्ष के लोगों को झूठ लिखने का दोषी करार दिया जा सकता है या दोनों में से किसी एक को। इसे भी छोडि़ए… यही बताइए कि अतिरंजना से ख़बर पेश करने का मामला बनता है क्या? और क्या अनर्गल बकवास के नाम पर इस तरह की बहस पर बंदिश लगायी जानी चाहिए। शायद इसका कोई सीधा जवाब नहीं होगा। हां, हो सकता है कि इसमें किसी कि छवि मलिन हो जाए। भई, हमारे संविधान में भी तो यही लिखा है कि भले सौ गुनहगार छूट जाए, लेकिन एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए। इसको आप दूसरी तरह से देख सकते हैं कि सौ गुनहगार तो छूट गये उनकी गैर जिम्मेदार टिप्पणी की वजह से, न उन पर कोई सामाजिक जिम्मेदारी आयी और न ही कोई उनका समाज में कोई हत्तक हुआ। लेकिन दूसरी तरफ कौन तय करेगा कि ये टिप्पणी या आलेख गैर जिम्मेदार है। क्योंकि सिर्फ तथ्यों की ही बात करें तो एक पक्ष आधा गिलास खाली और दूसरा पक्ष आधा गिलास भरा हुआ बता सकता है। बस मेरा मानना तो इतना है कि एक लेखक-पत्रकार की जिम्मेदारी ज्यादा बड़ी होती है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में उससे ज्यादा सचेतनता कि उम्मीद की जानी चाहिए, लेखन में भी व्यवहार में भी। शायद यही इस मर्ज की दवा है। बस इतना करें कि इतना नैतिक दायित्व हम उठाकर चलें।

(लेखक युवा पत्रकार और द संडे इंडियन पत्रिका से जुड़े हैं)

विवेक सत्‍यमित्रम, पहले अपने अंदर झांकिए

♦ चंदन दुबे

chandan-dubeyजो बहस अरविंद जी ने शुरू की है या फिर जो सवाल उन्होंने उठाये हैं, उसे ईमानदारीपूर्वक देखने की ज़रूरत है। उन्होंने चैनलों को ज़्यादा निशाने पर रखा (यदि विवेक सत्यम मित्रम जी की बात को मान लिया जाए) और अख़बार के साथ रियायत बरती, इस पर चर्चा करने के बजाए इनके लेख के जरिए अपने अंदर झांकने की एक ईमानदार कोशिश होनी चाहिए। मुझे लगता है, अरविंद जी भी अपने लेख के जरिये यही कहना चाह रहे होंगे। लेकिन विवेक जी बड़े परिप्रेक्ष्य में कही गयी बात को एक बार फिर छिछले बहस के दायरे में ला बैठे। विवेक जी की इस बात से सहमत हू कि पत्रकारिता के चारों तरफ बाज़ार का एक मज़बूत आवरण है, जो एक ताकतवर ग्रैविटी फोर्स के जरिये पत्रकारिता को अपने आप में समाहित भी करना चाह रहा है। और टीवी इस माहौल में भी अपने आपको बहुत हद तक बचा रहा है। पर जो कुछ अरविंद जी कह रहे हैं, उसे विवेक महाराज अपने आस-पास टटोलने के बजाय आशुतोष (जिसे वो चैनल के पत्रकारों का नुमांइदा मान बैठ हैं, और मुझे आपत्ति भी नहीं) यानि उनके और हमारे भी जैसे लोगों पर हमला मान बैठे हैं। दरअसल विवेक जो कुछ कह रहे हैं, उसमें सच को स्वीकार न कर पाने की एक कुंठा और आक्रोश दोनो साफ दिखता है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान विज्ञापन के खेल से शायद ही कोई अछूता रहा है। और मुझे लगता है अरविंद जी जो कुछ कह रहे हैं, उसे ईमानदारी से कबूलने की ज़रूरत है। कुर्बान जी का बयान कुछ इसी तरह के सच को कहता है। उनकी बात बताती है कि वो चैनलों की गिरती साख को स्वीकार कर रहे हैं। मुझे लगता है कोई पहली बार न्यूज चैनलों पर सवाल नहीं खड़े किये गये हैं, लेकिन विवेक जी की प्रतिक्रिया देखकर यही लगता है कि वो डर रहे हैं। उन्हें अपनी कमजोरी और कमियों, दोनो का आभास है और इसिलीए उनका गुस्सा इस कदर फूटा है कि कोई सरेआम उनकी (चैनल के पत्रकारों की) कमजोरी जगजाहिर कर रहा है। मैं भी एक न्यूज चैनल में काम करता हूं, लेकिन विवेक जी एक प्रार्थना है कि अपनी कमज़ोरी आप भले ही किसी को न बताएं लेकिन जब आप का ही साथी सवाल खड़ा करे, तो अपने अंदर झांकें न कि ग़लती छुपाने के लिए चिल्लाने लगें।

(लेखक युवा पत्रकार हैं)

बहती गंगा थी, सबने हाथ धोये

♦ विनीत उत्‍पल

vinआप कुछ भी छापिये, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता… कपिल सिब्बल की इस बात के पीछे पत्रकार बिरादरी ही दोषी है। हम इस मामले में कितनी भी बहस कर लें लेकिन शेर के मुंह में जब आदमी का खून लग गया तो वह आदमखोर होगा ही। क्या पत्रकार बिरादरी इस बात से अनजान है कि पिछले लोकसभा चुनाव में इन्‍हीं कपिल सब्बल ने अपने मीडिया नेटवर्क को मज़बूत करने के लिए कुछ बड़े पत्रकारों से संपर्क किया था और मुंहमांगी कीमत भी दी थी। दो वरिष्ठ पत्रकारों ने इसका ठेका भी लिया था। उन वरिष्‍ठ पत्रकारों ने कुछ नये पत्रकारों को पैसे कमाने का लालच देते हुए कहा था कि वे दो महीने के लिए नौकरी से छुट्टी ले लें या उसे छोड़ दें। शर्त यह थी कि उन्हें कांग्रेस के उस बड़े नेता के साथ हमेशा रहना है, जो दिल्ली की एक लोकसभा सीट से लड़ रहा था। कुछ युवा पत्रकारों ने इस ऑफर को स्वीकारा तो किसी ने ठुकराया। तहकीकात करने पर पता चला कि वह कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ही थे। लेकिन मीडिया में यह बात है, तो कहीं न कहीं सच की चिंगारी भी मौजूद है। अब सवाल है कि पूरे मामले को यदि सही मानें, तो जिसने मीडिया की इस सच्चाई को देखा है, वो क्यों नहीं मीडिया को ठेंगा दिखाएगा। क्या कपिल नहीं जानते कि लोकसभा चुनाव में सभी मीडिया कंपनियों ने विज्ञापन की बहती गंगा में अपने हाथ धोये हैं। कोई मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों की बोली लगा रहा है तो कोई खुद कमीशन का ऑफर कर रहा है। क्‍या उन्हें नहीं पता कि किस पार्टी ने किस हद तक विभिन्न पत्रकारों को तमाम सुविधाओं से लेकर चंदा मुहैया कराये? अख़बार का हर स्पेस और न्यूज़ चैनलों के हर मिनट पर बोली लगी थी इस लोकसभा चुनाव में। एक ही अख़बार में एक ही पेज पर दो उम्मीदवारों की जीत की घोषणाएं हो रही थी। समाचार की शक्ल में विज्ञापन छप रहे थे। चुनाव आयोग को जो करना है कर ले, वाली बात रही क्योंकि समाचार और विज्ञापन में अंतर करना मुश्किल है आयोग के लिए। ऐसे में यदि कपिल सिब्बल ने खुलेआम अपने मन की सच्ची भड़ास निकाली, तो किसी को भी कोई एतराज नहीं होना चाहिए। यह तो उनकी भलमनसाहत है कि उन्होंने मीडिया को सच का आईना दिखाया। उन्होंने सच बात कह दी तो क्यों तिलमिलाने लगी पत्रकार बिरादरी। जब आप नैतिकता से हटेंगे तो नेता क्या, समाज भी आपको बहिष्कृत करेगा। और खुलेआम आपको गाली सुननी ही पड़ेगी और जाहिर सी बात है कि इसके लिए आपको तैयार भी रहना होगा। हालांकि मेरे मन में न तो कपिल सब्बल के प्रति दुर्भावना है और न ही कुछ और, लेकिन हकीकत सामने आनी चाहिए। और पत्रकारों को शुक्रगुजार होना चाहिए कपिल सिब्बल का कि उन्होंने एक बार पत्रकारों को अपने गिरेबान में झांकने की सलाह दी।

(लेखक प्रिंट पत्रकारिता से जुड़े हैं और ब्‍लॉगिंग भी करते हैं)

4 Comments »

  • अंशुमाली रस्तोगी said:

    “ऐसे में आखिर कब तक वह ख़बरों से इंसाफ कर पाएगा? एयरकंडीशन सेमिनारों में हम-आप पत्रकारिता को गांवों से जोड़ने की वक़ालत करते है। चलो गांवों की ओर जैसे नारे बुलंद करते है। लेकिन हममें से कौन गांवों में जाकर आदर्श पत्रकारिता करने को उत्सुक है? जवाब अपवाद में ही होंगे।”

    बेहद करारी बात।

  • विवेक सत्य मित्रम् said:

    चंदन जी..धन्यवाद आपने मुझे अहसास दिलाया कि मैं डरा हुआ हूं। मगर किससे? ये आप नहीं बता पाए। धन्यवाद, आपने मुझे आईना दिखाया कि मैं कुंठा का शिकार हूं…मगर कैसी कुंठा? ये भी आप नहीं बता पाए। धन्यवाद, आपने मुझ जैसे नासमझ लोगों को ये बताने की कोशिश की,
    कि अरविंद शेष जी के लेख को ईमानदारी से देखने की जरुरत है…मगर किस तरह की ईमानदारी? ये भी आप साफ नहीं कर पाए। रही बात तथ्यों की, तो शायद आपने ये लेख मौजूदा बहस में अपनी रायशुमारी करने के लिए नहीं लिखा…बल्कि मुझ पर व्यक्तिगत हमले करने की नीयत से लिखा। चलिए…कम से कम आपके भीतर का गुबार तो निकल गया और आपकी आत्मा को शांति पहुंची, मैं आपके किसी काम आ सका यही मेरे लिए बहुत है। बाकी अगर सही मायने में आपकी दिलचस्पी किसी गंभीर बहस को सही दिशा देने की हो…तो प्लीज अगली बार व्यक्ति के दायरे से बाहर निकलकर बात कीजिएगा..वरना पत्रकारिता से बाहर की दुनिया के पास आज की पीढ़ी के युवा पत्रकारों की मानसिक हालत पर तरस खाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। बाकी आपके स्नेह के लिए एक बार फिर धन्यवाद, उम्मीद है..अगली बार आप कोई तार्किक बात कह पाएंगे।

  • चंदन दुबे said:

    विवेक जी ये मैने ब्यक्तिगत हमले की नीयत नही लिखा । मैं केवल इस बहस में अपनी भी राय रखना चाहता था । जाने-अनजाने में अगर आपको ऐसा लगा कि ये आपके लिए टिप्पणी है तो उसके लिए मुझे खेद है । एक बात और जब मैं आप को संबोधित कर रहा हुं उस समय में आपके आसरे अपनी और मेरे जैसे कई नये पत्रकारों की बात कह रहा हुं । धन्यवाद आपने पढ़ा और अपने दिल की बात कही

  • tilak jha said:

    Well written Hemendra g. But, who is writing this article, again a journalist who sits in an AC room far away from villages. Sometimes, it might not be possible to go back to villages, but there are many ways in which we can make this profession free from biases. Probably by giving stringers their due, by going to villages more often than not …

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