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टीआरपी से टशन : गुड़ खाये, गुलगुल्ले से परहेज

30 July 2009 7 Comments

♦ रंगनाथ सिंह

हमारे तीन सांसद चैनलों की टीआरपी मार्का चूहादौड़ के खिलाफ़ मुखर हो गये हैं। इनका कहना है कि ये तीनों मीडिया चैनलों की टीआरपी की होड़ मे की गयी टुच्ची हरकतों से त्रस्त हैं। इसीलिए इनके मन में मीडियाई नैतिकता की ब्रह्मपुत्र महानदी उफान मार रही है।

सबसे मज़ेदार बात ये है कि ये तीनों सांसद तीन परस्पर विरोधी दलों के हैं। ये तीनों नेता जिस तरह इस मुद्दे पर दलगत भावनाओं से ऊपर उठे हैं, ससंद में ऐसी उठान भारत की जनता को कम ही देखने को मिलती है। इन्हें पूंजीवादी गुड़ से कोई परहेज नहीं है लेकिन उसी गुड़ से बने गलाकाट प्रतिद्वंद्विता के गुलगुल्ले से परहेज है।

इनका कहना है कि ये लोग ख़बरिया चैनलों की गैर-ज़‍िम्मेदार हरकतों से तंग आ गये हैं। सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि देश का बहुमत इन नेताओं और मीडिया – दोनों की गैर-ज़‍िम्मेदार हरक़तों से पूरी तरह आजिज आ चुका है।

सांसदों द्वारा प्रश्‍न के बदले धन लेने के मामले के रहस्योद्-घाटन के बाद जनता की संसद में पूछे गए प्रश्‍नों के प्रति कोई खास निष्ठा नहीं बची है। फिर भी इन प्रश्नों का अपना महत्व है। महत्व यह है कि इस देश की किस्मत का फैसला करने के लिए अर्धवृत्त बना कर बैठने वाले मान-नीय सांसद सवालो-जवाबों की अंत्‍याक्षरी खेल-खेल कर ही इस देश की एक अरब से ज्यादा आबादी का भविष्य लिखते हैं। इसी खेल में ये सांसद दो नागरिकों में से एक के माथे पर छप्पन भोग और छत्तीस तल्ले का मकान लिख देते हैं और दूसरे के माथे पर भूख से तड़प-तड़प कर मौत और खरपत की झोपड़ी में मौत को तरसती तड़फड़ाती देह लिख देते हैं।

इस बार इन तीनों सांसदों का खास कारनामा यह है कि इन तीनों ने एक महामारी के लक्षणों को चीन्‍ह लेने के बावजूद उस रोग के इलाज के बजाय उसके लक्षणों को दूर करने के लिए कमर कसी है। और जिसे आपरेशन की सख्त ज़रूरत है उसके लिए होमियोपैथिक इलाज की पैरवी की है। दलगत भावनाओं से उठ कर संसद के सभापति से टीआरपी तंत्र को ख़त्म करने या अपनी सुविधा के हिसाब से संशोधित करने की मांग करते वक्त हमारे तीनों सांसद भूल गये कि चैनलों की इस दुर्दशा का ज़‍िम्मेदार सिर्फ टीआरपी तंत्र नहीं है। न्यूज चैनलों समेत हर क्षेत्र में मुनाफे की खातिर मानवीय मूल्यों और नैतिकताओं को कुचल कर आगे बढ़ जाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने के लिए ज़‍िम्मेदार इन तीनों दलों द्वारा पोषित-प्रचारित-संरक्षित विकास का पूंजीवादी माडल है।

न्यूज चैनलों की (और करीब-करीब समूचे पत्रकारिता की) मिट्टी पलीद करने का असल अपराधी यह पूंजीवादी तंत्र है, जिसको लाने का श्रेय हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जाता है। वर्तमान प्रधानमंत्री ने हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समाजवादी-जनवादी आदर्शों को धता बताते हुए इंडिया दैट इज भारत को अपने लिबरलाइल्ड-प्राइवेटाइज्ड-ग्लोब्लाइज्ड आदर्शों के दलदली रास्ते पर धकेल दिया। कौन नहीं जानता कि पूंजीवादी तंत्र का एकमात्र उद्देश्य है मुनाफा कमाना? गलाकाट खुली प्रतिस्पर्धा और अनैतिक आर्थिक शोषण इस पूंजीवादी रथ के पहिये हैं।

कौन कहता है कि सारे मीडिया चैनल टीआपी की चूहादौड़ में भ्रष्ट हुए हैं? ऐसा कहने वाले लोग भी बखूबी जानते हैं कि समूचा मीडिया और सभी दूसरे तंत्र मुनाफे की कभी न ख़त्म होने वाली अंधी दौड़ के लिए ही जनवादी सारोकारों से मुंह फेरे हुए हैं। रविशंकर प्रसाद ने आधा सच बयान करते हुए माना है कि हमारे मीडिया में योग्य और अच्छे लोग हैं, जो अच्छी स्टोरी करना चाहते हैं। लेकिन उन्होंने असली खलनायकों यानी मुनाफाखोर चैनल मालिकों के ऊपर ऊंगली उठाने के बजाय एक छद्म खलनायक टीआरपी को निशाना बनाना चाहा है।

दूसरी तरफ वृंदा करात ने सही कहा है – औरतों के शरीर को न्यूज चैनल चॉकलेट की तरह बेच रहे हैं। लेकिन वृंदा जी भूल गयीं कि यह तो पूंजीवादी संस्कृति की मूल प्रवृत्ति है कि वो हर चीज़ को विक्रय के लिए उपलब्ध कमॉडिटी में बदल देती है। वृंदा करात को इस बात पर कोई आपत्ति है कि नहीं कि टाटा अपनी कार बेचने के लिए, ब्लेड बेचने के लिए या फ्रिज बेचने के लिए औरतों को कमॉडिटी में बदल कर उनसे विज्ञापन करवाता है कि नहीं। वृंदा करात के लिए तो बेहतर है कि वो अपने ही दल के पिछले दशक के लिखे लेख वगैरह पढ़ लें। उन्हें यह बात साफ समझ आ जाएगी।

संसद में सबसे मज़ेदार तर्क किसी ने दिया है, तो वो हैं राजीव शुक्ला जी। उनका कहना है कि गर पूरे देश में टीआरपी लेने वाले एक लाख मीटर लगाएं जाएं, तब टीआरपी से उपजने वाली बुराई अच्छाई में बदल जाएगी। उनका यह भी मानना है कि बिहार और बंगाल के ग़रीबों के बीच भी मीटर लगाना चाहिए। इनको इस बात की ज़रा भी ख़बर नहीं है कि देश के जिन इलाकों में टीआरपी मीटर नहीं हैं, उन इलाकों में इतनी बिजली ही नहीं आती कि लोग मनचाहे समय पर टीवी देख सकें। राजीव शुक्ला को सही टीआरपी चाहिए, तो उन्हें खांटी समाजवादी ढंग से देश के हर घर में केबल टीवी, बिजली और ज़रूरी रोज़गार देना होगा, जिससे लोग निश्चिंत हो कर फुर्सत के समय टीवी देख सकें और राजीव जी सौ फीसद खरा टीआरपी जान सके।

राजीव शुक्ला ने टीवी वालों को कुछ अखबारों का उदाहरण दे कर नसीहत देना चाहा है। अफ़सोस कि राजीव जी को यही नहीं पता कि रीडरशिप सर्वे के आंकड़ों का ये सारे अख़बार किस तरह दुरुपयोग करते हैं। कोई अपने को किसी तरह का नंबर एक बताता है, तो किसी दूसरे तरीके से खुद को नंबर एक बताता है। राजीव ने जिन भी अख़बारों का नाम लिया है, वो अख़बार किन हथकंडों के सहारे लाखों की संख्या में पढ़े जाते हैं, इसकी जानकारी तो उन्हें ज़रूर ही होगी। आखिरकार वो भी एक पत्रकार रहे हैं।

राजीव जी ने जिन अख़बारों का नाम लिया है, उसमें से एक अख़बार ने तो न्यूज़ को प्रोडक्ट साबित करने के लिए न जाने कितने जिश्त कागज काले किये हैं??

और क्या यह बात राजीव शुक्ला नहीं जानते?

गर ये सभी लोग मीडिया के गिरते स्तर पर चिंतित हैं तो इस बात पर बहस क्यों नहीं करते कि हर क्षे़त्र में गिरावट के लिए असल ज़‍िम्मेदार कौन है?

रवि जी, वृंदा जी, राजीव जी इस बात पर संसद में बहस क्यों नहीं करते कि ख़बरनवीसी एक ज़‍िम्मेदारी भरा रोज़गार है या मुनाफाखोरी का धंधा है?

इस बात पर संसद में बहस क्यों नहीं करते कि न्यूज़ और किसी फेस क्रीम में कोई फर्क है कि नहीं?

ये सभी सासंद, बुद्धिजीवी और पत्रकार इस बात पर क्यों नहीं बहस करते कि गलाकाट प्रतियोगिता को बढ़ावा देने वाले पूंजीवादी तंत्र में मानवीय मूल्यों की रक्षा संभव है भी या नहीं?

टेलीविजन के गिरते स्तर पर बहस हो, तो उसके पहले एक बहस संसद में बहस के गिरते स्तर को लेकर हो!

और गर इन बातों पर बहस नहीं हो सकती, तो कमजकम इसी बात पर बहस चले कि हमारी संसद में इन बातों पर बहस क्यों नहीं हो सकती?

जुड़ा हुआ लिंक : समाज, सरकार, संसद, सर्जना, सेंसर और रविशंकर प्रसाद

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7 Comments »

  • aam admi said:

    राज और काज करने की नीति का जहाँ तक सवाल है, रविशंकर जी और राजीव शुक्ल जी का दल एक दुसरे के कार्बन-कॉपी हैं. उदारीकरण से लेकर सामाजिक व्यवस्था के प्रति उनके चिंतन में कोई भी अंतर नहीं है. रही बात वृंदा जी के दल की, तो उनका दल तो बातें अच्छी-अच्छी करता है पर वे बातें इस देश की बहुसंख्यक जनता को अपनी नहीं लगती. इसलिए इनमे एक सकारात्मक बहस का कितना माद्दा होगा इसका अंदाजा आसानी लगाया जा सकता है.

  • anjule shyam maurya said:

    हम अगर अपनी विश्वश्नियत अगर खो देंगे तो जो भी आएगा , एसे ही ठोकर मर कर जायेगा……..
    अंजुले श्याम मौर्य

  • ajay brahmatmaj said:

    राजीव शुक्ल और रवि शंकर प्रसाद का रिश्ता न्यूज़ २४ से है.वृंदा करात की बहन राधिका एनडीटीवी की मालकिन राधिका की बहन हैं.मुझे तो यह एक नया दल नज़र आ रहा है.बाकि आप गुणीजन हैं…

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