मॉनिटरिंग का मतलब होगा कि टीवी पर योग, अध्यात्म
♦ मृणाल वल्लरी
राज्यसभा में ऐसे बहुत से मुद्दे हैं, जिसमें सांसद अच्छी-अच्छी बातें करते हैं। यह तो मानना पड़ेगा कि रवि जी की टीआरपी अच्छी है। मृदुभाषी भी हैं, इसलिए मीडिया में जाने के लिए भाजपा उन पर भरोसा करती है। इन्हें चिंता है कि टीआरपी की आड़ में देश के बड़े हिस्से को चैनल स्क्रीन से बाहर रखने की राजनीति हो रही है। हमें इस बात की चिंता है कि चुनाव आते ही ये देश के एक बड़े वर्ग को देश से ही बाहर रखने की राजनीति करते हैं। एक वो चुनाव भी याद है, जो इन्होंने सिर्फ टीवी विज्ञापनों और होर्डिंग्स की मदद से जीतने की कोशिश की थी। लगता है उसमें मुंह की खाने के बाद ही इन्हें टीआरपी की हकीकत समझ में आयी होगी। टीआरपी बाजार का एक खेल है, जिसे अब आम आदमी भी समझ रहा है। बाज़ार की पटखनियों को हर आमो-खास झेल चुका है। सत्यम के संस्थापक राजू रामालिंगा जैसे लोग हमें बार-बार बाज़ार की हकीकत बताते रहे हैं।वैसे मुझे रविशंकर जी के भाषण से ज्यादा वेबसाइट संचालक की इस बात में जिज्ञासा जगी कि भाजपा के सांसद के मुंह से ऐसी बातें। इस आलेख के निचले हिस्से को पढ़ते ही पता चल जाएगा कि यह किसी भाजपाई नेता के ही विचार हो सकते हैं। यहीं पर आकर एक प्रबुद्ध राजनीतिज्ञ की रचनात्मकता का अंत हो जाता है। समाज और संस्कृति की चिंता की आड़ में वही हिंदुत्वादी नीति। टीवी पर रामदेव और कृष्णा दिखाओ। भारतीय समाज और भारतीय दर्शक को इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। मॉनिटरिंग का यही मतलब होगा कि टीवी पर योग और अध्यात्म का शिकंजा होगा। टीआरपी के केंद्र में होंगे हिंदुत्व के झंडाबरदार बाबा रामदेव।
सच का सामना जैसे कार्यक्रमों पर बहुत हल्ला मचा। लगा अब भारतीय संस्कृति नहीं बचेगी। संस्कृति प्रेमी अदालत की ओर दौड़े। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने इसकी सुनवाई से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ताओं को अदालत ने कहा कि देश में बहुत सारी समस्याएं हैं। भारतीय संस्कृति इतनी कमज़ोर नहीं, जो एक धारावाहिक से हिल जाएगी। मुझे लगता है कि रविशंकर जी के भाषण से ज्यादा अहम दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला है, जिसमें उसने सच का सामना जैसी वर्चुअल समस्या की खिंचाई की गयी। लेकिन सवाल एक यह भी है कि भारतीय दर्शक को एडल्टहुड से इतनी परेशानी क्यों। भारतीय दर्शकों के अलग-अलग वर्ग हैं, अलग-अलग ज़रूरतें हैं। अलग-अलग स्वाद के कार्यक्रमों की ज़रूरत है। लेकिन अश्लीलता और संस्कृति के नाम पर मनोरंजन उद्योग पर इस तरह के लगाम कसने की बात बेतुकी लगती है। एक अति को रोकने के लिए दूसरे अति का पैरोकार नहीं बना जा सकता है। दर्शकों को क्या देखना है और क्या खारिज करना है, यह दर्शकों पर छोड़ दें।
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मृणाल,
एक बढ़िया पोस्ट के लिए आपको बधाई. आपने बिल्कुल सही लिखा है कि रविशंकर प्रसाद जैसे नेताओं के लिए मोनिटरिंग का मतलब है टीवी पर योग और अध्यात्म का शिकंजा. अब हमे और आपको यह समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि वे ऐसा क्यों चाहते हैं. आप अच्छी तरह जानती हैं कि योग और अध्यात्म का चारा फ़ेंक कर आम जनता को उनके वास्तविक सरोकारों से कितनी आसानी से विमुख किया जा सकता है और ऐसे में सत्ता की मलाई बिना किसी तकलीफ के कैसे खाई जा सकती है. यही वजह है कि एक बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री को बाबा रामदेव को अपने राज्य का ब्रांड एम्बेसडर घोषित करने में कोई हिचक नहीं होती.
रही बात ‘सच का सामना’ की, तो इस प्रोग्राम के केंद्र में एडल्टहुड या किसी व्यक्ति विशेष का बेडरूम लाइफ ही क्यों? कोसी का कहर, विदर्भ के किसानो की दुर्दशा या फिर बुंदेलखंड के हालात क्यों नहीं? क्या इन कार्यक्रमों के दर्शक नहीं मिलेंगे? क्या इनसे टीआरपी नहीं बढेगा? मुझे मालूम है कि आप बखूबी समझती हैं कि असली मसला क्या है. आप उन मुद्दों को क्यों न उठायें.
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