रविशंकर प्रसाद ने जन-चिंता को मुखरित किया
♦ संजीव कुमार सिन्हा
टीआरपी का ‘नेक्सस’ किस कदर मज़बूत है, इसकी एक बानगी तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री श्री प्रियरंजन दासमुंशी के वक्तव्य से सहज मिलती है। श्री दासमुंशी ने यह कहकर हड़कंप मचा दिया था कि टीआरपी के धंधे को ठीक करने के मामले में टीवी चैनलों की ओर से उन्हें पांच बार धमकी दी गयी कि वह इस मामले में दखल न दें। इस परिदृश्य से बहुत कुछ साफ हो जाता है।भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने जन-चिंता को मुखरित किया है। उन्होंने गंभीर ख़तरे की ओर देश का ध्यान आकृष्ट कराया है। रविशंकरजी ने टीआरपी के खेल के पीछे की साजिश को बेनकाब किया है। समाज के आईने को उन्होंने आईना दिखाने का काम साहसपूर्वक किया है वह भी प्रमुख मंच से। उन्होंने कहा है कि टेलीविजन चैनल को यह तय करना होगा कि आप दिखाना क्या चाहते है? यह कहना कि स्टोरी बिकती नहीं है, क्योंकि इसमें टीआरपी नहीं है, इसलिए आप महत्वपूर्ण ख़बरों की उपेक्षा करें, यह अनुचित है। इसके साथ ही उन्होंने सरकारी हस्तक्षेप के बगैर टीआरपी को लेकर ऑटोनॉमस रेग्युलेटर बनाने की मांग की है। संसद में टेलीविज़न के गिरते स्तर पर हुई। चर्चा में श्री प्रसाद के अलावा श्री राजीव शुक्ला और श्रीमती वृंदा कारत ने भी टीआरपी व्यवस्था पर जमकर हमला बोला। ऐसी भी चर्चा है कि जिन चैनलों से इनके संबंध हैं उनकी टीआरपी दिनोंदिन गिरती जा रही हैं।
हम बहुत गर्व से कहते हैं कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। लेकिन आज जिस तरीके की पत्रकारिता हो रही है, उसने इसके ऊपर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। आये दिन इलेक्ट्रॉनिक चैनल को जनाक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। आज पत्रकारिता-धर्म पर बाजारवाद हावी हो गया है। किसी चैनल की टीआरपी बढ़ती है, तभी उसे विज्ञापन मिलते हैं। व्यावसायिक हित के लिए श्लीलता, वैज्ञानिकता, नैतिकता को पत्रकारिता से तिलांजलि दी जा रही हैं। मीडिया यह कहकर नहीं बच सकती कि दर्शक जो देखना चाहते हैं हम वहीं दिखाते हैं। क्या देश और समाज के प्रति मीडिया की कोई जिम्मेवारी नहीं है? राष्ट्रीय मीडिया सामाजिक सरोकारों से कटा हुआ है, इसलिए मीडिया की विश्वसनीयता निरंतर गिरती जा रही है। गांव, गरीब, किसान और दलित की सुधि लेने की फुर्सत उसे नहीं है। ऐसा करके मीडिया राष्ट्रीय अपराध कर रही है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। जन-परिष्कार लोकतंत्र की आधारशिला है। लोगों को शिक्षित करना, सूचित करना और मनोरंजन करना मीडिया का उद्देश्य है। इस कसौटी पर हम मीडिया को कसें तो पाएंगे कि वह अपनी जिम्मेवारी नहीं निभा रही है। ”सच का सामना, राखी-मीका चुम्बन प्रकरण, बिग बॉस, गणेशजी की मूर्ति को दूध पिलाना, बिना ड्राइवर के कार का चलना, राहुल गांधी का आंध्रभवन कैंटीन में भोजन करना” जैसे तमाम समाचार-कार्यक्रम टेलीविजन चैनल को तो टीआरपी रैंकिंग में आगे कर सकते हैं लेकिन इससे समाज में अंधविश्वास और अपसंस्कृति फैलता है। यह चिंता का विषय है। मुझे ‘टीआरपी सिस्टम’ से उतना विरोध नहीं है, यदि इसे देश के सभी राज्यों एवं समाज के सभी वर्गों में सर्वस्पर्शी बनाया जाए और इसके पीछे के ‘नेक्सस’ का पर्दाफाश किया जाये। सबसे महत्वपूर्ण है अश्लील, अवैज्ञानिक और असामाजिक कार्यक्रमों के प्रसारण पर सख्ती बरतना।
और अंत में…
जाने-अनजाने में ‘मोहल्ला live’ ने भयंकर गलती की है। ‘श्रेष्ठताबोध’ ही फासीवाद और सामंतवाद का बीज तत्त्व है। कुछ इसी तरह की बू श्री रविशंकर प्रसाद के भाषण पर प्रस्तुत आमुख से आती है कि ‘इस तरह के भाषण की उम्मीद एक बीजेपी सांसद से तो कतई नहीं थी!’
(टिप्पणीकार प्रखर राष्ट्रवादी युवा और बीजेपी की पत्रिका कमल संदेश के संपादकीय समन्वयक हैं)
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संजीव जी…एक पूर्वाग्रही (या दुराग्रही कहू तो बेहतर) ब्लॉग और ब्लोगर द्वारा आपका भी इस्तेमाल कर लिये जाने पर आपको बधाई दू या संवेदना व्यक्त करू,समझ नहीं पा रहा हु.खैर,जब मीडिया और सरोकारों की बात हो तो बस एक शेर ही याद आता है मुझे….दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें,किस जमाने के आदमी तुम हो.अभी छत्तीसगढ़ में पुलिस अधीक्षक समेत ३० जवान नक्सल हमले मे शहीद हुए..और उस दिन सभी चैनल बेचारे बाबी डार्लिंग को समलैंगिकता की आजादी दिलाने की चिंता मे दुबले हुए जा रहे थे.लालगढ़ मे एक भी माओवादी या अर्द्धसैनिक बलों की मौत भलेही ना हुई हो लेकिन चुकि वो वामपंथी राज्य है और इस बार वहाँ की सरकार ने तय कर लिया था के अपने ही पाले-पोसे भाईयों का सफाया करना ही है तो आपने देखा ही कैसे सारे चैनल वहाँ पहुच गये थे.अभी पिछले साल की बात है बस्तर में नक्सलियों ने बिजली आपूर्ति ठप्प कर दी थी आपको ताज्जुब होगा जानकर की कुल २९ लाख लोग हफ्तों अँधेरे मे रहकर समुचित इलाज़ के बिना बेमौत मर भी रहे थे..लेकिन आरुषी को `न्याय` दिलाने की चिंता मे व्यस्त भाई लोगों ने इन आदिवासियों के बीच झाँकने की भी जहमत नहीं उठायी.ऐसे सैकडों उदाहरण `समाचार चैनल` कहे जाने वाले इन कंपनियों की बदतमीजियों के हैं…बाकी मनोरंजन वालों की तो कहना ही क्या.अपने बुद्धिमान होने के सामंती घमंड मे चूर कोई मीडिया व्यवसायी आपकी बात सुनेगा क्यू भला? सीधी सी बात है की कड़े कानूनों द्वारा ही इनको नियंत्रित करने की ज़रुरत है.आप सोचिये सिनेमा एक कथात्मक माध्यम है.वो कभी भी आपको जगाने का दावा नहीं करता लेकिन सेंसर के कठिन दौर से उसको गुजरना पड़ता है.तो आखिर इन समाचार व्यवसाइयों ने क्या पुण्य कर लिया है की इनको स्व-नियंत्रण की आजादी चाहिये.अभी चुनाव में कितना गंध मचाया है इन लोगों ने यह पूरे समाज के सामने है.कुछ भी ऐसा नहीं रखा जिसे इन्होने बेच ना खाया हो.फिर भी आम आदमी को मिले अभिव्यक्ति की आजादी का सारा मलाई इन्हें ही चाहिए लेकिन उस आजादी पर लगे यूक्ति-यूक्त निर्बन्धन की इन्हें कोई चिंता नहीं..चलिए क्या और कितना लिखा जाए..आपके ग़लत जगह पर प्रस्तुत अच्छे विचार के लिए अभिनन्दन.
रविजी ने बहुत ही प्रासंगिक मुद्दों को उठाया है। टीआरपी के चक्कर में टेलीविजन चैनल जिस तरीके से अंधविश्वास और अश्लीलता को बढावा दे रहे हैं, वह खतरनाक है। प्रबुद्ध समाज को इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। भारत में टीवी की पहुंच समाज के बडे हिस्से तक हो गई है इसलिए हमें इन प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना होगा।
संजीवजी का बेबाकीपन पसंद आया। उन्होंने सही कहा है कि श्रेष्ठताबोध’ ही फासीवाद और सामंतवाद का बीज तत्त्व है। कुछ इसी तरह की बू श्री रविशंकर प्रसाद के भाषण पर मोहल्ला लाइव द्वारा प्रस्तुत आमुख से आती है कि ‘इस तरह के भाषण की उम्मीद एक बीजेपी सांसद से तो कतई नहीं थी!’ क्या रचनात्मकता का सारा ठेका वामपंथियों ने लिया हुआ है। गत 60 साल में एक भी वामपंथी सांसद को हम नहीं जानते जो अटलजी, डा जोशी, प्रमोदजी, सुषमाजी, जेटली जी जैसा संवेदनशील और विचारोत्तेजक भाषण दे सकें।
बहुत ही अच्छा विषय रवि जी ने उठाया है. इस पर और व्यापक बहस होना चाहिये क्योंकि मंदी अपने लक्ष्य से भटक गया है. वह गाँव कई विकास और गरीबों के बारे में कब सोचेगा.
बहुत ही अच्छा विषय रवि जी ने उठाया है. इस पर और व्यापक बहस होना चाहिये क्योंकि Media अपने लक्ष्य से भटक गया है. वह गाँव कई विकास और गरीबों के बारे में कब सोचेगा.
Rajeev ji main aap se bilkul sahmat hoon. media par bajarvad havee hai, jiska dushparinam hai ki TRP
Rajeev ji main aap se bilkul sahmat hoon. media par bajarvad havee hai, jiska dushparinam hai ki TRP badhane ke chakkar me media ka dhyan janhit ke muddon se hatta ja raha hai. khabren dabane ke liye bade star par samjhaute kiye ja rahe hain.
we should raise the voice against enimy of humanbeings
डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच said:
टी. आर. पी. को ही कानून बनाकर अवैध किया जाना संभव हो तो इसके बुरे परिणामों से बचा जा सकता है। और पाठक क्या सोचते हैं?
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