‘झूठी ख़बरों’ पर उछलती ‘झूठी टीआरपी’
टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट बड़ी ताक़तवर चीज़ है, वरना किसकी मजाल थी, जो राखी का बीच चैनल पर स्वयंवर करवा देता। ‘सच का सामना’ सेक्स का सामना हो जाता, घने जंगलो में सुंदर कन्याओं को लाकर खड़ा कर दिया जाता और वे आकर आधे-अधूरे कपड़ों में कैमरे के सामने खड़ी भी हो जातीं। आप सोचते होंगे सब कुछ नवयौवनाओं के साहस की वजह से संभव हो पा रहा है। नहीं जी, नहीं। यह सब साहस का नहीं साहब, टीआरपी का खेल है।
‘खबरों की दुनिया’ में रहना है तो ‘रजत शर्मा’ बन जाओ प्यारे!
सुबह-शाम टीआरपी के गुण गाओं प्यारे!
नहीं तो दूसरे चैनल की टीआरपी जीने नहीं देगी
और विज्ञापन देने वाली एजेंसियां खाने नहीं देगी – पीने नहीं देगी!!’
यही टीआरपी का सीधा-सा फंडा है। यह टीआरपी तय करने वाली एजेंसियों का घाल-मेल आज तक मेरी समझ में नहीं आया। उन पार्टियों का ज़िक्र अक्सर सुनता रहा हूं, जो टीआरपी बेहतर होने पर पत्रकारों को चैनल प्रबंधन की तरफ से मिलती हैं। वास्तव में टीआरपी लॉटरी लगने जैसा ही है। किस कार्यक्रम की टीआरपी ऊपर जाएगी, यह बता पाना अधिकतर मामलों में वरिष्ठ पत्रकारों के लिए भी मुश्किल होता है। इसलिए इंडिया टीवी जैसा चैनल किसी प्रकार के असंमजस में पड़ने की जगह, कभी मस्तराम मार्का तन दिखाऊ कहानियां परोसता है और कभी मनोहर कहानियां हो जाता है और कभी डेबोनायर। अब दर्शक बच कर जाएंगे कहां?
पिछले दिनों खली ने खलबली मचायी। स्टार न्यूज़ ने अपना विशेष 24 घंटे 24 रिपोर्टर जैसा कार्यक्रम रोक कर खली को लाइव दिखाया। उस चैनल में काम कर रहे कई पत्रकारों को लगा, यह एक ग़लत निर्णय है। पिछले एक सप्ताह से दर्शक खली को देख-देख कर बोर हो गये होंगे। लेकिन टीआरपी रिपोर्ट ने वाया खली स्टार को नंबर वन घोषित किया।
भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी संचार एवं पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जुड़े पुष्पेंद्र पाल सिंह ने अपने एक मित्र पत्रकार की कथा सुनायी थी, जो एक राष्ट्रीय चैनल में काम करता है और भोपाल में उसकी छवि गंभीर पत्रकार की रही है। एक दिन सिंह सर को भागता हुआ मिला, उन्होंने औपचारिकता वश पूछ लिया, ‘कोई बड़ी खबर है क्या?’ पत्रकार महोदय का जवाब काबिले गौर था। वे अपने चैनल के लिए एक ‘एक्सक्लूसिव’ खबर लाने जा रहे थे। खबर थी, बाघिन की आंखों का ऑपरेशन। यह ख़बर, ख़बर के लिहाज से जैसी भी हो, लेकिन टीआरपी के लिहाज से यह नंबर वन है।
विभिन्न संगठनों के धरना-प्रदर्शन के दौरान अच्छे विजुअल्स के लिए इलैक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों द्वारा प्रदर्शन करने वालों को उकसाते हुए देखा जाना अब आम सी बात हो गयी है। टीआरपी के ही संदर्भ में मुज़फ्फरपुर के जनसंपर्क अधिकारी गुप्ताजी की बात भला कैसे भूल सकता हूं, जिन्होंने उस खबर की खाल निकाली, जिसमें बिहार के एक स्थानीय चैनल ने रातों रात हर पत्ते पर ‘राम’ लिखे होने की ख़बर दिखायी थी। गांव में मेला लग गया। गुप्ता जी ने जब पेड़ की सबसे ऊपरी शाख से पत्ते मंगाए तो राम नाम ग़ायब। यह कैसा चमत्कार था, जिसमें राम का नाम नीचे वाले पत्तों पर लिखा था लेकिन ऊपर वाले पत्तों पर नहीं। गुप्ताजी ने पता किया तो जानकारी मिली, यह सब उस पत्रकार और कुछ गांव वालों की मिलीभगत से हुआ था। इसके बावजूद इस झूठी ख़बर पर भी टीआरपी मिली। एक बात और, वह पत्रकार आजकल बिहार के चैनल से निकल कर एक राष्ट्रीय चैनल का प्रतिनिधि हो गया है।
विकास भीम राव अंबेदकर कॉलेज से निकल कर आज एक अच्छे चैनल में काम करता है। वह खुद को पत्रकार नहीं कहता। लंबे समय तक उसने एक चैनल के लिए भूत-पिशाच ढूंढने का काम किया। इसमें उसे पत्रकारिता नज़र नहीं आती। वह इसे खालिस नौकरी ही कहता है।
कलिमपोंग (नई जलपाईगुड़ी), वहां हिल वेलफेयर एसोसिएशन की अध्यक्ष शोभा क्षेत्री ने बताया, उनके यहां के एक पुराने किलेनुमा मकान को जो पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता था, एक चैनल वाले ने भूत बंगला कह कर दिखा दिया। यह ख़बर चैनल देखने वालों के लिए भले रोमांचक हो लेकिन कलिमपोंग के लोगों के लिए हास्यास्पद थी।
‘झूठी खबरों’ का यह सारा खेल ‘झूठी टीआरपी’ बटोरने के लिए खेला जा रहा है। इस टीआरपी को बढ़ाने-घटाने में उन रिमोट कंट्रोलों का एक फीसदी भी योगदान नहीं है, जो भारत की आत्मा कहे जाने वाले गांवों से नियंत्रित होती है।
(टिप्पणीकार जनसरोकार की पत्रकारिता के चंद युवा चेहरों में से एक हैं और सोपान नाम की एक पत्रिका के लिए पूरे देश में घूम-घूम कर रिपोर्टिंग करते हैं)














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