ऐवाने-ग़ालिब में नामवर सिंह को हो क्या गया था?
♦ विनीत कुमार
युवा होने के नाते ये देख-सुन कर आपको भी हैरानी हो रही होगी कि हिंदी साहित्य के अमिताभ बच्चन माने जानेवाले आलोचक नामवर सिंह की जिस बात पर युवाओं से खचाखच भरे ऐवाने ग़ालिब में हंगामा हो जाना चाहिए था कि साहब आप क्या बात कर रहे हैं, नामवरजी ये आप क्या कह रहे हैं, ऐसा कैसे कह सकते हैं नामवरजी, अफ़सोस कि इस जमात के अधिकांश युवाओं ने स्तुति करते हुए ताली पीटने का काम किया। जिस ऐवाने में युवाओं की ओर से नामवर सिंह के ख़िलाफ प्रतिरोध के स्वर फूटने चाहिए थे, उसमें गदगद हो जाने का एक विस्मय कर देनेवाला नज़ारा सामने था। किसी के बुरी तरह लताड़े और लतियाये जाने के बीच भी वो कौन-सी मनःस्थिति होती है कि इंसान इससे तृप्त होता है, आनंद लेता है और श्रद्धा भाव से लतियाये जानेवाले की स्तुति करने लग जाता है, तीन साल तक काव्यशास्त्र तक पढ़ने के बाद भी न तो हमें उस स्थिति से कभी पाला पड़ा और न ही कभी उस रस का हमने पहले कभी स्वाद चखा।
सभागार से बाहर निकलने के बाद अधिकांश लोगों की ज़ुबान पर बस एक ही बात – हिला दिया आज नामवरजी ने, गजब का भाषण दिया नामवर ने, आज तो नामवरजी ने अजय नावरिया को ऐसी पटकनी दी है कि जल्दी उठकर पानी नहीं पी पाएगा… आदि-आदि। सभागार से बाहर निकल कर लोगों की बात सुनते हुए तब आपको अंदाजा लग जाता है कि आखिर क्यों नामवर सिंह की बात पर अधिकांश युवाओं को परेशानी होने के बजाय मज़ा आ रहा था और वो किसी भी तरह का विरोध करने के बजाय उनकी बातों को ताली पीटते हुए और शह दे रहे थे।
लंबे समय से वाचिक परंपरा की ताकत पर हिंदी साहित्य में अपना आसन बचाये रखने वाले आलोचक नामवर सिंह इस कला में सिद्धहस्त तो हैं ही कि वो ऐसी बात कहें, जिसे सुन कर सभागार में बैठे श्रोता वही अर्थ लें जो अर्थ वो खुद प्रेषित करना चाहते हैं। कहने और समझने के बीच कोई फर्क न होने की वजह से ही लंबे समय से हम जैसे लोग उनके मुरीद रहे हैं। संभवतः इसलिए जब वो सावधान रहो इन लौंडों से, बहुत ख़तरनाक रास्ता अपना रहे हैं आप, बहुत न बढ़ाइए इन लोगों को, साहित्य में चालू किस्म का नारा न लगाओ जैसी नसीहत युवा जो देखन मैं चला शीर्षक से संपादकीय लिखनेवाले हंस के संपादक राजेंद्र यादव को दिया, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
हिंदी समाज, जो अब तक अरुंधति राय की बात को अपने इलाके का गपशप नहीं जान कर कुम्हाने लग गया था, नामवर सिंह की इस बात पर अचानक से खिल उठा। ये हुई न बात, इसको कहते हैं वक्ता के अंदाज़ में पूरा सभागार अहो, अहो हो उठा। नामवर सिंह ने युवा जैसे व्यापक शब्द को अजय नावरिया के पर्याय रूप में इस्तेमाल करते हुए व्यक्तिगत बना दिया, सभागार में बैठे युवाओं ने भी उसका अर्थ उतने ही व्यक्तिगत तौर पर लिया। नामवर सिंह की संगत और लगातार संगोष्ठी में आने-जानेवाली युवा पीढ़ी शायद बेहतर तरीके से समझती है कि किस शब्द के अर्थ को कितना फैलाकर या सिकोड़ कर समझना है। इसलिए यहां तक आते-आते नामवर सिंह की बात पर अगर किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई तो ये मान लिया गया कि युवा के नाम पर नामवर सिंह ने जो फुफकार मारी है, उसका ज़हर सिर्फ अजय नावरिया पर चढ़ेगा, बाकी के युवा ताली पीटने के लिए पहले की तरह ही सलामत रहेंगे। युवा रचनाशीलता और नैतिक मूल्य विषय पर इससे अधिक बड़ा क्या मज़ाक हो सकता है कि हिंदी साहित्य का सबसे बड़ा आलोचक ये तय कर दे कि मौजूदा युवा पीढ़ी को किस शब्द का अर्थ किस हद तक जाकर लेना है, कौन-से शब्द का अर्थ किस मुहाने पर ले जाकर छोड़ देना हैं और किस शब्द के अर्थ को गुठली और गूदे के रूप में लेना और छोड़ देना है। हिंदी समाज में व्यक्तिवादी सोच की इससे और अधिक पराकाष्ठा और क्या हो सकती है कि अगर देश का एक युवा कहते ही राहुल गांधी को पर्याय के तौर पर इस्तेमाल करता है, तो सबसे बड़ा आलोचक भी विरोध करने के नाम पर अपने-अपने राहुल जैसे मुहावरे का प्रयोग करने से अपने को रोक नहीं पाता।
नामवर सिंह अक्सर रचनाकर्म के पहले भाषा की तमीज होने और लाने की बाद करते हैं। आज के अलावा भी दो-तीन जगहों पर कहानीकारों और उपन्यासों को ये तमीज सीखने और न सीखने में झड़प लगा चुके हैं। वो हमेशा से इस एप्रोच के ख़िलाफ़ रहे हैं कि साहित्य में चालू किस्म के नारे नहीं लगाने चाहिए। नामवर सिंह की तर्ज पर मीडिया आलोचना करनेवालों की एक छोटी किंतु कर्कश जमात पैदा हो चुकी है, जो समय-असमय उसे लताड़ती रहती है कि वो भाषा के नाम पर बाज़ारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, वो बाज़ारूपन के शिकार हैं। नामवर सिंह और उनसे प्रभावित होकर आलोचना करनेवाले लोगों की बातों को अगर कोई सचमुच में सीरियसली ले रहा है, तो उसे तब तक कुछ नहीं लिखना चाहिए जब तक कि नामवर सिंह उसके लिए भाषाई तमीज और तालीम अख्तियार कर लेने का सर्टिफिकेट न जारी कर देते हों। अब आप इस बहस में मत जाइए कि जिसकी सधी भाषा नहीं है लेकिन व्यक्त करने की छटपटाहट बहुत ज्यादा है, इतना ज्यादा कि अगर लिखे नहीं तो मर जाएगा… तो वो क्या करेगा? बजाय इसके अब वो किस भाषापीठ से सिद्धहस्त होकर आये – इस मामले की तहकीकात शुरू कर दे।
बहुत संभव है कि अजय नावरिया ने हंस के जिस युवा विशेषांक का संपादन किया है, वो अधकचरे साहित्य और मीडिया वेस्टेज की रिसाइकिल करके कोई नई चीज़ पेश करने की कोशिश भर हो। ये भी संभव है कि नयी नज़र का नया नज़रिया जो अनुप्रास अलंकार के तौर पर भाषाई प्रयोग किया गया है, उससे नामवर सिंह को तकलीफ हुई हो। वैसे अंक देख कर एकबारगी तो ज़रूर लगता है कि साहित्य के नाम पर चश्मा गोला साबुन के विज्ञापन लिखने वाली भाषा की ज़रुरत क्यों पड़ गयी। नामवर सिंह को इस बात से भी तकलीफ हुई होगी जब अजय नावरिया 35 से 40 मिनट तक मासूम वजह बताते हुए लिखा हुआ पेपर पढ़ते जाते हैं, जिसे कि फारिग होने के लिए सभागार से बाहर आये लोग विमर्श के लिए तैयार की गयी कुंजी कह रहे थे, सारे कोटेशन्स को अंबेडर की एक ही कितबिया से चेंपा हुआ आइटम बता रहे थे। नामवर सिंह की नाराज़गी भी इस बात से साफ तौर पर रही कि अजय नावरिया ने जाति की तरह युवाओं की कई कैटगरी गिना दी, विशेषज्ञ होने का ये रवैया जितना हास्यास्पद था उतना ही छिछला भी। इन सबके बावजूद नामवर सिंह जैसे आलोचक का युवा, रचनाशीलता, नैतिक मूल्य और संभावना जैसे बड़े शब्दों और संदर्भों को अजय नावरिया, हंस पत्रिका, राजेंद्र यादव और अपने-अपने राहुल तक सीमित कर देना क्या भाषा को लेकर खेला जानेवाला एक खतरनाक खेल नहीं है?
हमें सिर्फ इस बात की जानकारी हो जाए कि किस तरह की भाषा बोलने से तालियां पिटवायी जा सकती है और हम उसी भाषा का प्रयोग करने लग जाएं तो क्या तालियों की वो आवाज़ अर्थ की ताक़त को भी मज़बूत कर रही होती है। अगर ऐसा है तो हिंदी साहित्य पढ़नेवाले हममें से हर किसी को रूटीन के तहत लाफ्टर चैलेंज शो देखना चाहिए।
भाषा, उसके प्रयोग की राजनीति और उसके अर्थ को निगल जाने की राजनीति को इसी संगोष्ठी में अरुंधति राय व्यापक स्तर पर उठाती हैं। अरुंधति का साफ मानना रहा कि स्टेट मशीनरी किस तरह से किसी शब्द के अर्थ को रिड्यूस करने का काम करती है। वो हमारे शब्दों को हमारे बीच से लेती है, उसका अपने तरीके से अर्थ देती है और फिर हम उस शब्द का सिर्फ वही अर्थ लेते हैं जिसे कि स्टेट मशीनरी तय कर देती है। हम विकास, न्याय और समानता जैसे शब्दों को रिप्लेस करते हैं। ऐसा करना ठीक उसी तरह से होता है जिस तरह से कि किसी जेनुसाइड के पहले ऐसा महौल बनाया जाता है कि जिसमें बीस-पच्चीस औऱ पचास लोगों के मरने, क़त्ल किये जाने को आम घटना मान लिया जाए। भाषा और उसके अर्थ इसी तरीके़ से ख़त्म किये जा रहे हैं।
ये वो समय है जब हमें अपनी भाषा को फिर से पाना होगा… दिस इज द टाइम टू रिक्लेम दि लैंग्वेज। हमें भाषा और विचार के बीच के गैप को ख़त्म करना होगा क्योंकि ऐसा नहीं किये जाने पर हम कुछ भी करने की स्थिति नहीं होगें। इसलिए सवाल बांग्ला, अंग्रेजी, हिंदी या फिर किसी दूसरी भाषा के प्रयोग से नहीं है, सवाल उस एप्रोच से है जहां हम कंटेंट के ओछेपन को ढोते हुए भाषा को बहुत ही बौना बना देते हैं। अरुंधति राय की भाषा की इसी समझदारी के बीच से रचनाशीलता और नैतिकता के मूल्यों के सवाल का जवाब मिलता है।
अब सवाल है कि इस पूरे प्रसंग से क्या ये समझा जा सकता है कि हिंदी समाज, उसके भीतर जीनेवाले लोग, नियम तय करनेवाले आचार्य जो दिन-रात बाजारवाद के ख़िलाफ़, विज्ञापन और नारे की भाषा के विरोध में बात करते आए हैं, वो काफी हद तक जाने और कई बार अनजाने उसी भाषा की सवारी करने लग गये हैं। स्टेट मशीनरी की तरह संभवतः वो भी शब्दों के अर्थ को रिप्लेस करने में जुटे हैं। शायद यही वजह है कि नैतिक मूल्य के नाम पर बहुत ही बारीक और महीन शब्दों के प्रयोग करने के बावजूद हिंदी के आचार्य उन अर्थों तक जाने से रह जाते हैं, जिसे कि अरुंधति सिर्फ एक लाइन में कि – now morality has become luxury that can’t afford – बोल कर विश्लेषित कर जाती हैं। इतना होने के बावजूद भी अगर सभागार से बाहर निकल कर लोग अरुंधति की बात पर चर्चा करने के बजाय हिला दिये नामवर जैसे हेडलाइन रचते हैं तो ये मान लिया जाए कि स्टेट मशीनरी की तरह नामचीन आलोचकों ने शब्दों के अर्थ को व्यक्तिवादी होते हुए रिप्लेस करने का काम किया है और दुर्भाग्य से जिसे पहचानने तक की ताकत युवाओं की एक बड़े जमात के बीच नहीं पैदा हो पायी है।
(लेखक युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक और मशहूर ब्लॉग राइटर हैं।)









भाई बहुत-बहुत मजा आ रहा है। उदय प्रकाश के प्रसंग के बाद यह नया लौ़ड़ाबाजी वाला प्रसंग तो अच्छी नामवरिए टीआरपी समेटकर ले जाएगा। मैं फिर कहता हूं दरअसल यही और ऐसा ही है हमारा हिंदी साहित्य और बड़े साहित्यकार। जब युवा इनकी धोतियों को खोलते हैं तो बूढ़ऊ बुरा मान जाते हैं। असल में हमारा हिंदी साहित्य डेढ़ टांग की बैसाखी पर खड़ा है।
ओशो रजनीश ने बहुत पहले कहा था, हमारे देश में युवा होते ही नहीं। बच्चा सीधे बुढ़ापे में प्रवेश करता है और मर जाता है।
दूसरे जो साहित्यकार अकसर खुदको मंच के हास्य कवियों से अलग दरशाने की चालू चेष्टाओं में जी-जान लगाते दिखते हैं, ख़ुद वही अकसर मंचीय कवियों जैसे ‘जुमलों’ या ‘तानों’ या ‘छेड़खानियों’ का प्रयोग करते या प्रयोग करने वाले पर मरते-मिटते नज़र आते हैं।
नामवर सिंह ने जो कहा, उसे तर्क नहीं, जुमले, ताने या छेड़खानी की श्रेणी में ही रखा जा सकता है। आप कहेंगे कि छेड़खानी शब्द लड़कियों के संदर्भ में प्रयुक्त होता है। मगर आप इतिहास में जाएं (जो कि अपने-आप खुल-खिल कर वर्तमान में आ गया है। और आप विश्वास करें कि हमारे ये महान बुज़ुर्ग अपनी सारी विशेषताएं और अपनी सफलताओं के राज़ इसी तरह खुद अपने मुंह से बताएंगे) तो पाएंगे कि लौंडेबाज़ी के शौकीन इसी तरह की छेड़खानी लौंडो के साथ किया करते थे।
[...] पर चर्चा गर्म है। भाई अभिषेक और विनीत ने नामवर सिंह के बयान पर रोचक आलेख [...]
असगर वजाहत की एक कहानी याद आ रही है. शायद शीर्षक है ‘खूंटा’…इसे फिर पढना चाहिए.
भाई बहसबाजी तो कमाल की है लेकिन गंभीर बहस की बजाय कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना वाले अंदाज़ में टिप्पणिया शुरू गयी है. ये गलत है लेकिन मुद्दे और प्रस्तुति कमाल की है इससे इंकार महीन किया जा सकता और न इस आधार पर मंचीय घटिया साहित्य को गंभीर साहित्य के समांतर खडा किया जा सकता है. सियार के बियाह में खुरपी का गीत थिक नहीं. इतने गंभीर मुद्दे उठाने के लिए विनीत भाई को बधाई.
मैं इस सभा में मौजूद नहीं था, पर आपका लेख पढ़कर ऐसा लगा कि लोग नामवर जी को इसलिए बेहतर सराह पाए क्योंकि वे हिंदी में बोले, जिसे लोग समझ सके, पर अरुंधती अंग्रेजी में बोलीं, जो अधिकांश लोगों के सिर के ऊपर से निकल गई, इसलिए गुरु गंभीर बात बोल देने के बावजूद अरुंधती को वह वाहवाही नहीं मिल पाई जो नामवर के आपत्तिजनक भाषण को भी मिल गई।
यह हमारे देश का एक ध्रुव सत्य है, फिर भी निहित स्वार्थ उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है। इस देश में अंग्रेजी समझी नहीं जाती है, हिंदी समझी जाती है। अंग्रेजी यदि यहां अब भी टिकी हुई है तो इसलिए कि भारत में अभी लोकतंत्र ठीक से स्थापित नहीं हुआ है और विशेषाधिकार वाली चीजें अब भी महत्वपूर्ण बनी हुई हैं, जैसे अंग्रेजी।
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