प्रेमचंद और प्रेमचंद की परंपरा में आदिवासी कहां हैं?
♦ अश्िवनी कुमार पंकज
प्रेमचंद और प्रेमचंद की परंपरा में आदिवासी कहां हैं? 2009 की 31 जुलाई के एक दिन बाद जब सारे हिंदी साहित्यकार प्रेमचंद जयंती आयोजनों की थकावट दूर कर चुके होंगे, मैं अपना यह सवाल उनके सामने रखना चाहता हूं कि प्रेमचंद और प्रेमचंद की परंपरा में आदिवासी समाज कहां हैं?
विनम्र निवेदन यह है कि इस सवाल को ‘आरोप’ नहीं माना जाए और न ही मैं असंदिग्ध रूप से भारत के प्रगतिशील साहित्यकारों में सर्वश्रेष्ठ प्रेमचंद को कठघरे में खड़ा करना चाह रहा हूं। यह सिर्फ आदिवासी विषय पर सक्रिय एक विद्यार्थी की जिज्ञासा है। वह इसलिए कि प्रेमचंद की रचनाएं 1903 से 1936 तक के कालखंड में फैली हुई हैं और उन्होंने भारत की उत्पीड़ित जनता के शोषण व यथार्थ को 300 से अधिक कहानियों, एक दर्जन उपन्यासों तथा अनगिनत सामाजिक-राजनीतिक लेखों और समाचारों में समर्थ लेखकीय कौशल के साथ उदघाटित किया है। वे साहित्य, पत्रकारिता और सांस्कृतिक आंदोलन के मोर्चों पर आजीवन युद्धरत रहे। सामंती और औपनिवेशिक गुलामी के विरुद्ध उन्होंने भारतीय प्रायद्वीप के एक बड़े क्षेत्र की भाषा हिंदी-उर्दू में हमारा नेतृत्व किया और उनकी कालजयी रचनाएं एवं विचार आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही हैं। परंतु, प्रेमचंद के संपूर्ण लेखन से गुज़रने के बाद भी (शायद कुछ छूट भी गया हो) मेरी यह जिज्ञासा शांत नहीं हो पा रही है कि उनके साहित्य से आदिवासी दुनिया अदृश्य क्यों है? कम से कम उनके बहुचर्चित किसी कहानी, उपन्यास, नाटक या आलेख में तो नहीं ही है।
इस प्रेमचंद जयंती के कुछ दिन पहले मैंने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए कई मित्रों से बातचीत की। अनेक साहित्यकारों, आलोचकों और पाठकों से यह जानने की कोशिश की कि क्या सचमुच प्रेमचंद के साहित्य में आदिवासी कहीं नहीं हैं? सबका उत्तर यही था, ‘नहीं है’। कई लोग तो यह सवाल सुन कर ही बिगड़ उठे। तुम्हारा/आपका यह सवाल संकीर्णतावादी, गैर-वर्गीय, क्षेत्रीयतावादी और विखंडनवादी है। आम जन के इतने महान लेखक, जिनकी कलम की रोशनी से आज भी भारतीय साहित्य (विशेषकर हिंदी) और समाज का मार्गदर्शन हो रहा है, उस पर अंगुली उठाना तुम्हारी/आपकी तुच्छता ही बताती है। लेखक, कलाकार, साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी को ऐसे संकीर्ण सोच से देखना कहीं से भी उचित नहीं है। कई लोगों ने कहा – प्रेमचंद तो हमेशा बनारस, इलाहाबाद आदि शहरों में ही ज़्यादा रहे। शायद उन्हें आदिवासी समाज को देखने का मौका नहीं मिला होगा। पहले किस्म के जवाब पर मुझे कुछ नहीं कहना है क्योंकि यह सर्वविदित है कि जब भी वंचित समाज और उत्पीड़ित राष्ट्रीयताएं अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और मुक्ति का सवाल उठाती हैं, उनका दमन इसी सोच के साथ किया जाता है। जो दूसरा जवाब है कि प्रेमचंद शहरों में ही रहे इसलिए वे आदिवासियों के बारे में नहीं जान पाये होंगे, उनको एक संवदेनशील सजग लेखक-पत्रकार के रूप में देखते हुए भी और उनके बनारस व इलाहाबाद में रहने पर भी सही नहीं मालूम होता है। औपनिवेशिक शासन के दिनों में समाचार-सूचना लेने-देने के पेशे से प्रतिबद्धता के साथ जुड़ा समाचार-पत्र का कोई संपादक और आंदोलनकारी पत्रकार कैसे आदिवासी विषय से अनभिज्ञ रह सकता है? वह भी 1900 में जब झारखंड के रांची जिला का दक्षिणी हिस्सा एक बड़े आदिवासी विद्रोह ‘उलगुलान’ से अंग्रेजी शासकों की नींद हराम किये हुए था? इतिहास प्रसिद्ध आदिवासी नायक बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुआ यह उलगुलान कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले उस समय के अंग्रेजी अखबारों की सुर्खियों में था। और यह भी कि 1899 में प्रेमचंद पहली बार आजीविका के लिए लमही से बाहर निकले थे। 18 रुपये प्रतिमाह पर उन्होंने शिक्षक की पहली नौकरी मिर्जापुर जिला के चुनार में की थी। एक मिशन स्कूल में।
विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा मिर्जापुर और चुनार प्राकृतिक रूप से आदिवासियों का स्वाभाविक इलाका है। वैसे भी, बनारस से लेकर इलाहाबाद तक विंध्याचल के जंगल-पहाड़ों का जो विस्तार है, उसमें अगरिया, भील, कोरवा, गोंड, कोल, चेरो आदि आदिवासी समुदायों का पारंपरिक निवास है। चुनार में प्रेमचंद ज़्यादा समय तक नहीं रहे, परंतु बनारस से चुनार तक की यात्रा और चुनार के अल्प प्रवास में क्या उन्होंने आदिवासी समाज के बारे में कुछ भी नहीं देखा-सुना और जाना होगा? चुनार के बाद प्रेमचंद इलाहाबाद के नज़दीक प्रतापगढ़ चले आये थे, जहां वे दो साल रहे। इलाहाबाद से प्रतापगढ़ तक का इलाका भी आदिवासी आबादी से विहीन नहीं है। फिर भी देश-दुनिया का साहित्य पढ़ने तथा पत्रकारिता में रहने का बावजूद उनके साहित्य में आदिवासी जीवन से कहीं मुठभेड़ नहीं होती है। ध्यान देने की बात है कि बीसवीं सदी की शुरुआत में समाज, राजनीति और साहित्य में सक्रिय सभी लोगों ने दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के हितों की बात तो की, लेकिन किसी ने भी आदिवासियों के बारे में सोचने की ज़हमत नहीं उठायी। समाज सुधारक, लेखक और राजनीतिज्ञ, किसी ने भी उन लोगों की सुध लेने की आवश्यकता नहीं महसूस की, जिनकी बेदखली, लूट और नरसंहारों पर नये औद्योगिक भारत की नींव रखी जा रही थी। स्वतंत्रता के पहले भी और स्वतंत्रता के बाद भी।
कोयला, लोहा, बाक्साइट, लकड़ी और अन्य सभी प्राकृतिक संसाधन जहां से आ रहे थे, इन संसाधनों के जो नैसर्गिक स्वामी थे, उनके साथ क्या हो रहा था, यह जानने की कोशिश ही नहीं की गयी। क्यों हमारी दृष्टि चार वर्णों तक ही संकुचित है। हमें अपनी ही तरह बलशाली दूसरे धर्म-संप्रदाय तो दिखते हैं, लेकिन वह प्रकृति पूजक एवं आदि धर्मानुयायी आदिवासी नहीं दिखता है। जिसकी आवश्यकताएं सबसे न्यूनतम है और जो सर्वाधिक भाषाओं व संस्कृतियों के बीच बिना किसी टकराव या रक्तरंजित साम्राज्यवादी खेल के आनंद से जीता है। चूंकि अपनी संख्या बल और रिहाइश के आधार पर दलित एवं अल्पसंख्यक समुदाय वोट की राजनीति को प्रभावित करते हैं, इसीलिए उनको अनदेखा नहीं किया जा सका। बाबा साहेब आंबेडकर की उपस्थिति और दमदार दलित आंदोलनों के कारण भी शासक वर्ग को दलितों की बात सुननी पड़ी। यह अलग बात है कि आज तक व्यवहार में उसका क्या हश्र हुआ।
हम सभी जानते हैं कि फूले, आंबेडकर, राजा राम मोहन राय और गांधी जी जैसे समाज सुधारकों और विचारकों ने दलित, अल्पसंख्यक एवं स्त्री मुक्ति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समाज को आंदोलित किया। चाहे जिसकी जैसी भी जातीय-धार्मिक सीमा या राजनीतिक नीयत रही हो। पर सबने इन शोषित-वंचित समुदायों के लिए कुछ न कुछ कहा। कुछ न कुछ किया। लेकिन आदिवासी समुदायों के बारे में एक लंबी चुप्पी इतिहास से वर्तमान तक अजगर की तरह पसरा हुआ है। दुर्गम क्षेत्रों में अपने निवास स्थलों और नगरीय जीवन से अलगाव के कारण आदिवासी आज भी दलितों-अल्पसंख्यकों की तुलना में भारतीय राजनीति पर दवाब डालने की स्थिति में नहीं हैं, पर निःसंदेह वे भारतीय विकास की रीढ़ हैं। उनके संसाधनों पर कब्ज़ा करके ही आधुनिक भारत का विकास संभव हो सका है।
सभी लोग यह स्वीकार करते हैं कि भारत में सबसे ज़्यादा खोने और सबसे कम पाने वाला समाज आदिवासियों का ही है। इतिहास में मुक्ति की सबसे ज़्यादा लड़ाइयां आदिवासी समुदायों ने ही लड़ी हैं। उन्होंने भारत के किसी भी समुदाय से सबसे ज़्यादा त्याग और बलिदान किया है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट और दोहन के लिए वे औपनिवेशिक काल में भी मारे जा रहे थे और आज के स्वतंत्र भारत में भी मारे जा रहे हैं। कोयलकारो, नेतरहाट, कलिंग नगर, सिंगूर, नंदीग्राम और लालगढ़ इक्कीसवीं सदी के सबसे नये आदिवासी मृत्यु क्षेत्र हैं। लेकिन उनकी चर्चा न तो भारतीय मुख्यधारा के समाज में है, न इतिहास में है। हिंदी साहित्य में तो है ही नहीं। जो है, वह ‘सॉरी’ बोलने लायक जितना भी नहीं है।
यह आदिवासी जिज्ञासा प्रेमचंद से ज़्यादा उन लोगों से है, जो अपने आपको उनकी परंपरा का वाहक बताते हैं। जो प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री, प्रेमचंद के साहित्य में दलित, प्रेमचंद के साहित्य में अल्पसंख्यक, प्रेमचंद के साहित्य में किसान आदि-आदि विषय सामने लाते हैं और उन्हें भारतीय समाज का सबसे प्रमुख प्रतिनिधि साहित्यकार घोषित करते हैं। प्रेमचंद से छूट गया आदिवासी आज भी उनकी परंपरा से क्यों बहिष्कृत है? प्रेमचंद की परंपरा के लोगों को ‘प्रेमचंद के साहित्य में आदिवासी’ भी लिखना चाहिए। आदिवासी भारत को बहिष्कृत कर कोई कैसे संपूर्ण भारतीय समाज का प्रतिनिधि कहला सकता है? अगर प्रेमचंद की परंपरा और आज के भारतीय साहित्य, समाज और राजनीति में आदिवासी समाज के लिए कोई स्थान नहीं है, फिर तो देश भर के आदिवासी इलाके जिन्हें पूरी तरह से माओवादियों या नक्सलियों के नियंत्रण में बताया जा रहा है, जहां पिछले तीन सौ वर्षों से आदिवासी अपने अस्तित्व-अधिकार की अंतिम निर्णायक लड़ाई लड़ रहे हैं, वे आपके साहित्य, समाज और राजनीति को क्यों नहीं खारिज कर दें।
(लेखक रांची से निकलने वाली संताली पत्रिका जोहार सहिया के संपादक हैं)









वेद में हवाई जहाज ढूंढना और प्रेमचंद मेन अदिवासी समस्या की तलाश करना दोनों एक तरह कि मूर्खताएं हैं . पहले तरह की मूर्खता कुछ पोंगापंथी- रूढिवदि किस्म के लोग करते हैं, वे अविवेकी , अतार्किक , पुनरूत्थनवदी और अंततः दक्षिणपंथी कहे जाते हैं.वे आज के वैचारिक जगत के सबसे बडे अपरधी मने जाते हैं क्योंकि वो समज को चिन्तन को और सहित्य को गलत दिशा में मोडते हैं. परम्परा को श्रेष्ठ ठहरने कि जल्दबजी में वो हर बात को परम्परा से जोडने के अग्रहि होते हैं. इसलिये उनके दिये गये तर्कों को हमेषा नजरन्दाज किया जता है ( भले हि कभी कभी उनमेन सच्चाई हो ) . परनतु दुसरी ओर तुलसी को ब्राह्मनवदि या प्रेमचन्द को दलित विरोधी ठहरने को प्रगतिषीलता मान लिया जता है. सवल यहा उठता है कि पहले वर्ग के लोग इसलिये प्रतिगमी ठहराये जते हैनं कि वे अतर्किक हैं, इतिहास विरोधी हैं तो क्या दूसरा वर्ग इससे मुख मना जा सकता है जो तुलसी और प्रेमचन्द कि युगीन सीमाओं को समझे बगैर, उनके देश और काल को समझे बगैर उला जलूल बते करता है.कोई भी चिन्तक अपनी युगीन सीमाओं के भीतर प्रसंगिक या अप्रसंगिक ग्राह्य या अग्रह्य होता है.उसकि प्रासंगिकता इससे तय होती है कि वह अपने समय और समाज के प्रति कितना ईमानदार है. इसे समझे बगैर कीसी पर किचद उछालना उसकि प्रसनगिकता कि बात करना अपनी मुर्खता का परदर्शन है. दुर्भाग्यवश हिंदी सहित्य मेन यह कम जोरों पर है. इस्क एक करण सहित्य कि दुनियां मे लफ़्फ़ाजों कि बढती भीद जिम्मेदार है .इसमेंकुछ मिदिय के लोग भी हैन जो वहां के चलताऊ जुमलों को यहन फ़ित करने के अदि हैं. मसलन वह यह नया प्रयोग है , यह रचन फ़्रेम को तोडती है, या यह समजिक जीवन कि व्यख्या है जैसे तमा जुमले इन्हीं के इजद किये हुए हैन जिन्हेन नवर लोग भि अब इस्तेमाल करने लगे हैं. पर यह किस फ़्रेम को तोदति है? इसमें क्य नया प्रयोग है ? किस समजिक जिवन कि व्यख्या है ? इसपर बात नहीं करते . अब अलोचन के नाम पर ये सारे ऊल जलूल टोटके बन्द होने चाहिए. साथ ही इसतरह के बे-सिर-पैर के फ़तवे भी और बाल में खाल निकलने कि आदतें भी . तभी अलोचना का कोइ हित हो सकत है और साहित्य का भी. ये काम वाद और पन्थ के अग्र्हों से उपर उथकर होन चहिये यह भी जरूरई है.
आपकी चिंता से यारों की सहमति है लेकिन आपका आग्रह कुछ बेमानी भी लगता है. आदिवासी समाज से जुड़े होने के कारण आपने उन कृतियों का अध्ययन ज़रूर किया होगा जिनमें इस समाज का चित्रण है. अच्छा हो अगर आप उनसे यारों का परिचय कराएँ. प्रेमचंद ने जितना लिखा है उतने पर ही बात हो तो उचित है. यदि हिंदी या अन्य भाषाएँ आदिवासियों से कटी हुयी हैं तो उनकी अपनी ज़ुबानों से तर्ज़ुमा कर बात दूर तक पहुचाई जाये तो बेहतर होगा.
प्रकाश
“वह इसलिए कि प्रेमचंद की रचनाएं 1903 से 1936 तक के कालखंड में फैली हुई हैं और उन्होंने भारत की उत्पीड़ित जनता के शोषण व यथार्थ को 300 से अधिक कहानियों, एक दर्जन उपन्यासों तथा अनगिनत सामाजिक-राजनीतिक लेखों और समाचारों में समर्थ लेखकीय कौशल के साथ उदघाटित किया है। वे साहित्य, पत्रकारिता और सांस्कृतिक आंदोलन के मोर्चों पर आजीवन युद्धरत रहे। सामंती और औपनिवेशिक गुलामी के विरुद्ध उन्होंने भारतीय प्रायद्वीप के एक बड़े क्षेत्र की भाषा हिंदी-उर्दू में हमारा नेतृत्व किया और उनकी कालजयी रचनाएं एवं विचार आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही हैं।”
अश्विनी जी आपने तो प्रेमचंद को कुछ भगवान जैसा बना दिया और शिकायत इस बात की कि उनकी रचनाओं में आदिवासी क्यों नहीं हैं। प्रेमचंद की रचनाएं अपने समय का पॉप हैं। उसमें सामंतवाद विरोध और उत्पीड़ित जनता का यथार्थ तलाशेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। कम उम्र में जिन्होंने प्रेमचंद को पढ़ा है उन्हें उन रचनाओं का पुनर्पाठ करना चाहिए। कफन को पढ़िए। दलित दृष्टि के साथ पढ़िए और फिर एक बार कहिए कि प्रेमचंद दलितों के प्रति संवेदनशील होकर ये लिख रहे थे। प्रेमचंद की रचनाओं में आपको वो दलित आक्रोश भी नजर नहीं आएगा, जिसका प्रतिनिधित्व उसी दौर में आंबेडकर कर रहे थे। प्रेमचंद जब ज्यादा प्रगतिशील होते हैं तो उनके दलित करेक्टर दया के पात्र होते हैं।
अश्विनी जी अखिल भारतीय कुछ नहीं है। हर किसी के सच का अपना अपना टुकड़ा है। प्रेमचंद के सब कुछ पाने की उम्मीद क्यों करते हैं। प्रेमचंद से उस कालखंड के सच का एक टुकड़ा जानिए। लेकिन उनसे दलित-आदिवासी लेखन की उम्मीद तो न पालिए।
….. प्रासंगिकता इससे तय होती है कि वह अपने समय और समाज के प्रति कितना ईमानदार है. …
सच कहते हैं आप. इसीलिए तो ये सवाल है. पर आप तो सवाल करने वाले को ही मुर्ख ठहरा रहें हैं. क्या आप बताएँगे की जिस समय और संमाज की बात आप कर हैं वह कौन-सा समय और समाज है? किसका है? सिर्फ अपने हितों पर चोट पड़ते ही कितना तिलमिला रहें हैं आपलोग. सोचिये ज़रा हम आदिवासी लोग आज भी मारे जा रहें हैं.
कलको कोई यह सवाल भी उठा सकता है कि प्रेमचंद ने समलैंगिकता और अल नीनो पर क्यों नहीं लिखा !? क्लोनिंग पर क्यों नहीं लिखा ? सब कुछ प्रेमचंद ने ही करना था क्या ?
पंकज जी आपके आदिवासियों से जुड़े सारोकार देखते हुए इस प्रश्न की संवेदनशीलता उद्घाटित होती है। लेकिन आप से अनुरोध है कि आप अपनी राय पर पुनः विचार करें। आप सोंचे कि क्या दुनिया के किसी रचनाकार के लिए यह संभव हुआ है कि वह अपने समय की सभी शोषित अस्मिताओं को कलमबंद कर सके।
किसी रचनाकार का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि जिन विषयों पर उसने अपनी कलम चलाई है उसमें कितनी ईमानदारी दिखायी है। जिस तरह से आप जब आप आदिवासी मुद्दों पर काम करते हैं तो उसी वक्त तमाम दूसरे मुद्दे को नजरअंदाज कर रहे होते हैं जो दूसरों की नजर में आप के मुद्दे जितने ही जरूरी हैं। उसी तरह जब कोई लेखक किसी खास मुद्दे पर अपनी राय केंन्द्रित करता है तो सहज स्वाभाविक कारणों दूसरे कई विषय उसकी निगाह की जद से बाहर हो जाते हैं।
आपके प्रतिमान पर कसा जाए तो बड़े-बड़े दलित चिंतक भी उसी अपराध के दोषी पाए जाएंगे जिस अपराध के लिए आप प्रेमचंद को कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं। संक्षेप में यही कहुँगा कि किसी भी रचनाकार के लिए संभव नहीं है कि वह अपनी सीमित रचनाओं में असीमित संसार की सभी चीजों को समेट लेगा।
पंकज जी आपका सवाल सही है लेकिन गलत व्यक्ति से पूछा गया है। मैं आपकी जगह होता तो आज के तमाम युवा कथाकारों से पूछता कि तुम्हारी रचनाओं में आदिवासी कहाँ हैं ??
गर हैं तो उनके संग तुमने क्या बरताव किया है ?
नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं ?
तुम्हारे पास शब्द हैं, तर्क है, बुद्धि है
पूरी की पूरी व्यवस्था है तुम्हारे हाथों
तुम सच को झुठला सकते हो बार बार बोल कर
कर सकते हो खारिज एक वाक्य में सब कुछ मेरा
आँखों देखि को
ग़लत साबित कर सकते हो तुम
जानती हूँ में
पर मत भूलो
अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुए
सच को सच
और झूठ को
पूरी ताक़त से झूठ कहने वाले लोग.
– निर्मला पुतुल
विरेन्द्र की बातों से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि हर व्यक्ति के हित होते हैं उन हितों पर छोट कोई बरदाश्त नहीं कर पाता यहां तक की विरेनदरा भी नहीं. पर केवल हित के लिये देश और कल कि सीमाओं से काट किसी लेखक या चिंतक के बारे में लगातार दुराग्रहपूर्ण बतें करना मूढता है. या फिर हद दर्जे कि हितान्धता.
प्रेमचन्द ने क्या किया या क्या नहीं यह अलग बात है. हम आज हर बात को हित पर तोलते हैं. असल बात है. हम सहित्य पढना नहिं अपना हित तलषना चाहते हैं. आप यह कम बखूबि कर रहे हैं .
एक बात और यदि प्रेमचन्द सब कुछ लिख ही गये होते तो आपको लिखने को क्या बचता ? फिर दलित और अदिवासी साहित्य कि बतें क्यों की जातीं ? मित्र प्रेमचन्द ब्रह्म नहीं थे. सर्वज्ञ नहिं थे.वो मनुष्य थे और इसलिये उनकी सीमाएं थीं. उन सीमाओं के भीतर उनके रचनाकर्म पर बत होनि चाहिए. शायद वो अदिवासी समस्यओं पर उतना परमनिक नहीं लिख पाते जितना आप लिखेंगे.
उन्हें गांव का जितना अनुभव था शहर का भी नहिं , अदिवसी का भी नहीं. इसलिये शहरी जीवन में उनसे अच्छा लेखन जैनेन्द्र और निर्मल का है. उसी तरह अदिवसी जीवन में महश्वेता का. आप उसमें अपनी अस्मिता और उसकी प्रामनिकता तलाशें. सच ये अस्मितओं कि तलश और विमर्शों बात उत्तरआधुनिकता की देन है और प्रेमचन्द उत्तरआधुनिक नहीं थे. प्रगतिशील या प्रतिगमी चाहे जो रहे हों.
इसलिये हमें वहि पढना चाहिये जो उन्हों ने लिखा है, वह नहीं जो उनहोंने लिखा हि न हो.
अपनी अवाज खुद बनो विरेन्द्र. किसी और में अपनी अवज मत तलश. हर तलाश अधूरी रहती है. पूरी होति हैं भावनाएं, अपनी अवाज. निर्मला पुतुल कि कविता अच्छी है. पर वो उनकी अवाज है. प्रेमचन्द का लेखन अच्छा है पर वो उनका है. तुम्हरा सिर्फ वो है जो तुम कहते हो. बुद्ध ने कहा है—- अप्पदिप्पो भव………. खुद अपनी अवाज बनो. खुद अपना मार्ग प्रशस्त करो. आगे बढो.
आदिवसियों को अपनी बात खुद करनी होगी.
हम हिंदी वाले “लौन्डेपन” की बहस से ऊपर कभी नहीं उठ पाएंगे. जैसे ही दलित-आदिवासी और कमजोर समुदाय के लोग अपने इतिहास, अस्मिता, अधिकार और दबंग लोगों द्वारा हड़पे गए संसाधनों के बारे में पूछने लगते हैं. हम उपदेशक की साधुई मुद्रा अपना लेते हैं. बेहतर यही होगा की अभी भी हम धूर्तता से बाज आयें और उनके सवालों के साथ खड़े हों, पूरी इमानदारी से.
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