मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाइए प्लीज़!
भाई रंगनाथ,
इतनी गंभीरता से पोस्ट पढ़ने के लिए शुक्रिया। मुझे इस बात की आशंका लिखने के पहले से ही थी कि हंस की संगोष्ठी में जो कुछ भी हुआ और नामवर सिंह ने जो बातें हमलोगों के सामने रखीं, अगर मैं उससे असहमत होते हुए कुछ लिखता हूं, तो लोग (जिसमें कि अब आप शामिल हैं) मेरे ऊपर हंस और राजेंद्र यादव का आदमी होने का लेबल लगा देंगे। इन सबके बावजूद मैंने इस पर लिखा, क्योंकि मुझे पता है कि इस तरह के स्टीगर हवा और पानी के संपर्क में आते ही बहुत जल्द ही उखड़ जाते हैं।
मुझे बहुत अफ़सोस नहीं है कि मैं अपनी बात जिस संदर्भ में करना चाह रहा हूं, आपने उससे ठीक उलट अर्थ लिया बल्कि लिया ही नहीं, अर्थ ही थोप डाला जिसे कि अरुंधति रिप्लेसिंग द मीनिंग ऑफ द वर्ड कह रही थीं। इसमें आपका कोई दोष भी नहीं है क्योंकि जिस परिवेश और औजार से हम निर्मित हुए, साहित्य की समझ जिस ढंग से हमारी बनी है, उसमें व्यापक संदर्भ के आते ही हम घबरा जाते हैं। हमारे हाथ में अभी तक तोड़ती पत्थर वाली साइज़ की छेनी और हथौड़ा है जबकि अब हमें आये दिन पहाड़ों से टकराना पड़ जाता है और हम तब निरस्त हो जाते हैं। कहने को तो हमारी साहित्यिक समझ और बौद्धिकता का विकास प्रकृति, मानवीय संवेदना और दुनिया के तमाम विचारों को लेने से हुआ है, जिसका कि कैनवास बहुत बड़ा है लेकिन सच्चाई ये है कि हम एक बड़े जंगल में एक ऐसा मचान बना कर रह रहे हैं, जहां कुछ ही लोग उस पर बैठे हैं, दिन-रात गप्प-शप करते हैं, हुक्का-सुक्का पीते हैं और बीहड़ जंगल में रहने के महानताबोध से अकड़े रहते हैं। दुनिया को बताते फिरते हैं कि हम जंगल में रहते हैं और कितना रिस्क कवर करते हैं। जबकि मेरी तरह इतना तो आप भी जानते होंगे कि जिस सेफ ज़ोन में रहकर हिंदी के हम जैसे अधिकांश लोग काम कर रहे हैं, वो खुशफहमी के अलावा कुछ भी नहीं है। हमने प्रकृति, जंगल और मानवीय संवेदना से भरे साहित्य के इस बड़े कैनवास को कितना छोटा कर लिया है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि नामवर सिंह को बोले चार दिन हो गये और अभी तक हम उसी को पकड़ कर बैठे हैं। ऐसा लगता है जैसे सचमुच हमारे पास कोई दूसरा काम नहीं है।
मुंबई और नोएडा फिल्म सिटी में काम करनेवाले मेरे दोस्त मेरी इस हालत पर अब हंस रहे हैं। मुझे तो कभी-कभी लगता है कि साहित्यिक बहसें करने और रचने के नाम पर साहित्य का एक बड़ा हिस्सा व्यक्तिगत स्तर की लल्लो-चप्पो और हील-हुज्ज़तों में जाया कर दिया गया है, जिसका कि एक समय के बाद कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इस नजरिए से अगर हम साहित्य को देखना शुरू करें, तो हमें अफ़सोस भी होगा।
कहने को तो साहित्य की इतनी बड़ी दुनिया, जिसमें इंद्रसभा से लेकर अमेरिका का साम्राज्यवाद तक समा जाए, लेकिन सच्चाई देखिए। महज दो सौ से ढाई सौ चेहरों के बीच पूरा का पूरा हिंदी साहित्य सिमट कर रह गया है। हम इन्हीं लोगों की बातों और गतिविधियों के बीच फंसे रह जाते हैं। इसमें बिडंबना है कि इतनी बड़ी दुनिया होने पर भी हम छत्तीसगढ़ के भीतर घुस नहीं पाते, जाकर कुछ लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। दिल्ली में बैठ कर चार दिन तक नामवर सिंह के पक्ष-विपक्ष में कबड्डी खेलना पसंद करते हैं लेकिन भोपाल, पटना में मर रहे किसी रचनाकर्मी को देख आने का जज्बा पैदा नहीं कर पाते। अपनी पोस्ट में मैं यही तो बताना चाह रहा था कि साहित्य के नाम पर हम कितने व्यक्तिवादी हो जाते हैं। नामवर सिंह जैसा आलोचक युवा का मतलब राहुल का मुहावरा इस्तेमाल किये बिना समझ नहीं पाते और युवा रचनाकार का मतलब सिर्फ अजय नावरिया से लगा लेते हैं। मैं अपनी उसी मानसिकता पर तो बात कर रहा था, जहां हिंदी समाज एक बड़े संदर्भ को कैसे संकुचित करता जाता है। अरुंधति राय ने भाषा के सवाल पर जो बात कही, उसकी चर्चा न करते हुए हम आलोचक नामवर सिंह की चुटकुलेबाज़ी में फंस कर रह जाते हैं क्योंकि उसमें हमारी व्यक्तिगत स्तर पर की जानेवाली चुगली का सार्वजनिक रूप दिखायी दे रहा था, हमें मज़ा आ रहा था। क्या हम साहित्य पढ़ते हुए चुगलखोर होते चले जाते हैं।
रंगनाथ भाई, विश्वविद्यालय सहित अब तक मैंने लिखने-पढ़ने के स्तर पर जितना भी समय बिताया है, उस आधार पर इतनी समझदारी तो बन ही गयी है कि हिंदी समाज में जीने-खाने और बने रहने के लिए आपको अपनी पीठ पर किसी न किसी का तो लेबल लगाना ही होगा। बहुत लंबे समय तक आपकी पीठ कोरी नहीं रह जाएगी। मेरी पीठ अब तक कोरी है, तो इसका मतलब कतई नहीं है कि मैं कोई महान किस्म का लिटरेचर प्रैक्टिसनर हूं। बल्कि सच बात तो ये है कि अब तक मैंने इसकी शिद्दत से ज़रूरत महसूस नहीं की है। जिस दिन करूंगा, उस दिन ज़रूर लगा लूंगा। इस बीच आप जैसे लोगों से बातचीत होती रही, तो ज़रूरत पड़ने पर आपसे राय भी लूंगा। लेकिन क्या मैं आपसे पूछ सकता हूं कि मेरे ऊपर राजेंद्र यादव और हंस से जुड़े लोगों का लेबल लगाने का अधिकार किसने दिया। क्या साहित्य में हम इश्तहारों, लेबलों, स्टीकरों से अटी-पड़ी पीठ देखने के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि हमें कोरी पीठ आंखों में चुभने लग जाती है।
क्या नामवर सिंह या फिर किसी भी दूसरे आलोचक की बात से असहमत होने के लिए हंस, राजेंद्र यादव या किसी दूसरे संस्थान और व्यक्ति का लेबल लगाना अनिवार्य है। बिना इसके हम अपनी बात नहीं कर सकते और अगर सचमुच नहीं कर सकते जिसकी घोषणा आपने अपनी पोस्ट में सरोगेट रूप में कर दी है तो क्या हमें इसके विरोध में कुछ काम नहीं करने चाहिए। बजाय इसके कि हम एक पोस्टर के लगने और दूसरे पोस्टर के उखड़ने का इंतज़ार करते रहें और हम अपनी इसी भूमिका को साहित्यिक भूमिका मान कर बौद्धिक होने और कहलाने का क्लेम करने लग जाएं, जैसा कि अधिकांश लोग करते आये हैं। आज आपको सुविधा हो गयी कि मैंने नामवर सिंह से असहमति जतायी नहीं कि दूसरी तरफ मेरी पीठ पर राजेंद्र यादव का लेबल चिपकाने के लिए मौक़ा मिल गया। संभव हो ये सुविधा आपको हमेशा मिलती रहे, क्योंकि कोई न कोई तो आयोजक होगा और जब हमें असहमति होगी, मैं लिखूंगा ही। इस हिसाब से आपको भविष्य में भी मुझे संघी, व्यक्तिवादी, कुंठित, फ्रस्ट्रेड और भी बहुत तरह के लेबल लगाने को मिल जाएंगे। लेकिन एक स्थिति ऐसी भी बनती है कि जब नामवर सिंह एक ऐसी किताब पर बोलने आते हैं, जिसे कि उन्होंने पढ़ा ही नहीं है। केवल इतनी-सी जानकारी के आधार पर 25 मिनट तक उस पर बोल जाते हैं कि इस किताब को दिल्ली की झुग्गियों में रहनेवाले अंडर मैट्रिकुलेशन के बच्चों ने मिल कर लिखी है। नामवर सिंह को किताब के शीर्षक पर आपत्ति होती है, उन्हें ये नाम धुंधला-धुंधला सा-नज़र आता है। आलोचक फिर भाषा पर बात करते हैं, इस बात को नज़रअंदाज़ करते हुए कि इसे किस बैग्ग्राउंड के बच्चों ने कितनी शिद्दत से लिखा है। मैंने लोकार्पण के पांच घंटे बाद ही दीवान (सराय, सीएसडीएस के मेलिंग ग्रुप) पर लिखा, नामवर सिंह से घोर असहमति। बच्चे एक बुजुर्ग के मुख से भाषा-वाषा पर गंभीर बात सुनकर अवाक हो गये थे। रंगनाथ भाई, मैंने उस समय भी नामवर सिंह के रवैय पर असहमति जतायी। बताइए, आप होते तो कौन सा लेबल लगाते। ये भी संभव है कि हवा-पानी से ये लेबल और स्टीगर उखड़ते चले जाएं और आप नया लगाते चले जाएं। आप बिल्कुल नहीं थकें। लेकिन मैं आपसे अपील करता हूं कि प्लीज़ आप मेरी पीठ को एमसीडी की दीवार मत बनाइए। ऐसा करना आपके लिए जितना सुविधाजनक है, मेरे लिए उतनी ही तक़लीफ़देह और शायद हिंदी के नाम पर होनेवाले विमर्श के लिए ख़तरनाक भी।
देखिए न, ये कितनी बड़ी विडंबना है कि हममें से दोनों लोग व्यक्तिवाद के विरोध में लिख रहे होते हैं। हमें नामवर सिंह में व्यक्तिवाद की भनक लगी और आपको हंस में बोलनेवाले कुछ लोगों में। लेकिन अब जब हम लिख रहे हैं तो आप अपनी चिठ्ठी के लगभग हर पैरे में विनीत और विनीत कुमार लिख रहे हैं और मैं रंगनाथ भाई, रंगनाथ भाई किये जा रहा हूं। इससे अधिक और व्यक्तिवादी कैसे हुआ जा सकता है? हम क्यों साहित्य जैसे तालाब पर विमर्श के लिए जुटते हैं और अंत तक आते-आते उसमें मौजूद पानी, उसकी सड़ांध और पहलनेवाले लोगों के बारे में बात करने के बजाय अपने-अपने हिस्से का कुंआ घेरने में लग जाते हैं। क्या हम इस बात की गुंजाइश पैदा नहीं कर सकते कि हम बेबाक तरीके से अपनी बात रख सकें, मेरी पीठ कोरी रह जाए और आपको बार-बार स्टीगर चिपकाने से मुक्ति मिल जाए। मुश्किल तो है लेकिन कोशिश करने में क्या हर्ज है।
बहुत हो गया। जिस तरह से अपन लोग बात कर रहे हैं, ये बहुत ही पर्सनल मामला बनता जा रहा है। इसे पढ़नेवाले जो लोग हमें जानते हैं, वो ज़रूर गरिआएंगे – स्साला, यहां दिखाने के लिए एक दूसरे पर पिल पड़े हैं जबकि मंडी हाउस में एक-दूसरे के पैसे से समोसे खाने के लिए खींचतान करेंगे। ये इनहाउस विज्ञापन हो जाएगा रंगनाथ भाई, कोशिश करते हैं कि हम औरों की तरह इससे बचें और अपना नाम चमकाने के बजाय मुद्दों को व्यापक और सही संदर्भ में समझें… है कि नहीं।
♦ विनीत कुमार









कमल है ये बहस तो व्यक्तिवादी होते हुए भी मजेदार है. अगर साहित्य के नाम पर यही सब है की बहस शुरू हुई नहीं की एक-दुसरे की छीछालेदर शुरू कर दें. ऐसे में हम सृजन की उम्मीद कैसे करेंगे. इसलिए सार्थक बहस हो जो हम जैसे नाचीजों को भी समझ में आये तो मज़ा आये. वैसे विनीत भाई बात तो आप थिक ही कहते हैं.
विनीत आपने अपने लेख में कुछ बहुत ही ज़रुरी बातें छोड़ दी हैं। दरअसल आपके पिछले लेख में जो कुछ भी आपकी निष्पक्षता और पूर्वाग्रह-रहितता को बताता था, उसे भी रंगनाथ जी ने आपके खि़लाफ इस्तेमाल कर लिया है, देखिए:-
*****विनीत, हंस के युवा अंक के बारे में आप खुद अपने विचार देख लें, जो आप ने इस लेख में लिखे हैं, “वैसे अंक देख कर एकबारगी तो ज़रूर लगता है कि साहित्य के नाम पर चश्मा गोला साबुन के विज्ञापन लिखने वाली भाषा की ज़रुरत क्यों पड़ गयी।”*****
*****आप अपने इसी लेख में दी गयी अपनी एक और राय देखिए, “बहुत संभव है कि अजय नावरिया ने हंस के जिस युवा विशेषांक का संपादन किया है, वो अधकचरे साहित्य और मीडिया वेस्टेज की रिसाइकिल करके कोई नयी चीज़ पेश करने की कोशिश भर हो।”*****
*****विनीत, आपने नामवर सिंह के बारे में कहा है कि, “कहने और समझने के बीच कोई फर्क न होने की वजह से ही लंबे समय से हम जैसे लोग उनके मुरीद रहे हैं।”*****
और जो कुछ भी दरअसल नामवरजी और रंगनाथ जी के खि़लाफ जाना चाहिए उसे उन्होंने अपने पक्ष में इस्तेमाल किया है, जैसे कि:-
******उस सभा में कई लोग ऐसे थे, जो कह रहे थे कि कल बहुत दिनों बाद नामवर सिंह अपनी रंगत में थे। वरना पिछले कई समारोहों से तो वो लोगों को आशीर्वचन ही देते आ रहे थे। किसी को जयशंकर प्रसाद, तो किसी को संजय बताते आ रहे थे। कल उन्होंने सभागार में उपस्थित युवाओं के क्षोभ को आवाज़ दी तो सभागार में उपस्थित युवाओं ने उन्हें सिर आंखों पर बैठाया।*****
******विनीत, उस सभागार में बहुत से ऐसे लोग थे, जो नामवर सिंह के भाषण के वक्त ताली भी बजा रहे थे और ठठा-ठठा कर हंस भी रहे थे। किसी ने नामवर सिंह के भाषण के बीच ही यह फिकरा कसा कि जो हंस नहीं रहे हों, समझ लो हंस के हैं!!******
*****वहां कुछ लोग ऐसे भी थे, जो अंदर तो खूब हंसे, ताली बजाये लेकिन बाहर निकलने के बाद शिक़ायत करने लगे कि नामवर सिंह ने उनसे ताली बजवा दी, नामवर सिंह ने भरम गेनवा फेंक कर उन्हें फंसा लिया और हंसा दिया…, नहीं तो बात तो रोने या प्रतिरोध करने वाली थी!*****
राजू श्रीवास्तव अपने एक आयटम में बताते हैं कि कैसे वीर रस और हास्यरस के कवि अजीबो-ग़रीब प्रयत्नों से लोगों से तालियां ‘बजवा’ लिया करते हैं।
और निम्न वक्तव्य से नामवर की कौन-सी योग्यता/विशेषता पता लगती है, रंगनाथ जी खुद ही सोचेंः-
*****वरना पिछले कई समारोहों से तो वो लोगों को आशीर्वचन ही देते आ रहे थे। किसी को जयशंकर प्रसाद, तो किसी को संजय बताते आ रहे थे।*****
और विट और फिकरे में अंतर कैसे किया जाए:-
*****किसी ने नामवर सिंह के भाषण के बीच ही यह फिकरा कसा कि जो हंस नहीं रहे हों, समझ लो हंस के हैं!!******
और क्या यह भी ज़बरदस्ती किसी पर लेबल लगाने वाली बात नहीं किः-
*****जो हंस नहीं रहे हों, समझ लो हंस के हैं!!******
हंसी न आने पर भी कोई ज़बरदस्ती सिर्फ इसलिए हंसे कि कहीं उसे हंस का न समझ लिया जाए !
-संजय ग्रोवर
………और विचार और विश्लेषण का विषय यह भी है कि नामवरजी ने किन लोगों के किस तरह के क्षोभ को आवाज़ दी !
हंस के फ्लॉप शो में राजेंद्र यादव ने बतौर आयटम-गर्ल नामवर सिंह को उतारा।
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जी हां, हुआ यूं कि एवाने-ग़ालिब में हंस के 31 जुलाई वाले सालान कार्यक्रम का 24 वां एपीसोड चल रही था। मुंशी प्रेमचंद के बैनर तले चलने वाले इस एपीसोड में उन ‘दर्शकों’ को नया कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा था जो फिकरों-फब्तियों-तानों-विटों-जुमलों के चाट-मसालों के आदी हो चुके हैं। स्टार-कास्ट भी वही पुरानी-अशोक वाजपेयी, अरुंधति राय, अल्पना मिश्रा, अजय नावरिया, नामवरसिंह आदि। दर्शक जमहाईयां ले रहे थे कि परेशान राजेंद्र यादव को एक युक्ति सूझी। उन्होंने बतौर आयटम-गर्ल नामवर जी को लोर पर उतार दिया। नामवर जी ने लौंडा-लौंडा की धुन पर ऐसा रीमिक्स प्लस यूज़न पेश किया कि दर्शक तालियां बजाते-बजाते लहालोट हो गए। इस तरह सूझ-बूझ दिखाते हुए यादवजी ने अंतिम क्षणों में मैच बचा लिया। अब हंस का नया अंक बड़ी तादाद में बिकने की सम्भावना है। नामवर जी की इस सफलता को देखते हुए कई अन्य पत्रिकाएं भी अपने विभिन्न प्रकार के समारोहों में बुलाने की योजना बना रहीं हैं।
विशेष:- ‘लौंडा’ नामवर जी का ‘विट’ रहा तो ‘आयटम-गर्ल’ हमारा ‘विट’ रहा।
अभिषेक श्रीवास्तव ने दिल्ली और कौरवी बोली क्षेत्र जो खड़ी बोली का मूल क्षेत्र है में युवाओं के समानार्थक शब्द ’लौंडा’ को हिन्दी पट्टी के दूसरे इलाकों मे प्रचलित शब्द लवंडा के समरूप शब्द के रूप में दिखाने की भद्दी कोशिश की है। यह एक घोर निंदनीय कर्म है।
अभिषेक श्रीवास्तव ने लेख में लौंडा शब्द को गाली की तरह प्रयुक्त किया है।
देश की राजधानी दिल्ली में बहुत से माँ-बाप अपने बेटों को ’लौंडे’ और बेटियों को लौण्डिया कह कर पुकारते हैं।
इस पूरे मुद्दे पर पहला लेख लिखते समय लेखक ने पूरे समारोह में से चटखारेदार-मसालेदार बनाए जा सकने की संभावना वाला एक शब्द भर क्यों उछाला ??
अजय नावरिया को लौंडा बताने वाले नामवर सिंह कुछ ही दिन पहले एक किताब के विमोचन समारोह में उस किताब के लेखक पुष्पराज को “संजय” और खुद को और अपने जैसे दूसरे सभी लोगों को “धृतराष्ट्र” बता रहे थे।
लेकिन किताब लेखक पुष्पराज के बारे में मृत्युंजय प्रभाकर ने एक टिप्पणी की थी।
अगर इस टिप्पणी को ध्यान में रखा जाए तो पुष्पराज अजय नावरिया से किस रूप में “श्रेष्ठ” साबित होते हैं।
जिसे भी इस सवाल का जवाब चाहिए, उसे अजय नावरिया और पुष्पराज की जात के बारे में पता लगाना चाहिए।
नामवर सिंह के “लौंडा प्रकरण” के तार एक-एक कर समझ में आने लगेंगे।
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