प्रेमचंद की रचनाएं अपने समय का पॉप हैं
अश्िवनी कुमार पंकज ने प्रेमचंद के रचना-समग्र में आदिवासियों के लिए थोड़ी संवेदना खोजने की कोशिश की, तो वे रूआंसे हो गये। उन्होंने इस मसले पर प्रेमचंद से कोई कहानी नहीं मांगी, बल्कि एकाध संपादकीय टिप्पणियों से ही संतोष कर लेते – लेकिन हमारे समय के ज़्यादातर टिप्पणीकारों को उनकी बात नागवार गुज़री। उन्हें लगा कि यह एक मूर्ति पर बेवजह पत्थर फेंकने का मसला है। आप देखिए उनकी टिप्पणियां: मॉडरेटर
प्रेमचंद को दलित-विरोधी बताना प्रगतिशीलता नहीं
♦ राजीव रंजन
वेद में हवाई जहाज ढूंढना और प्रेमचंद में अदिवासी समस्या की तलाश करना दोनों एक तरह कि मूर्खताएं हैं। पहले तरह की मूर्खता कुछ पोंगापंथी-रूढ़ीवादी किस्म के लोग करते हैं, वे अविवेकी, अतार्किक, पुनरुत्थानवादी और अंततः दक्षिणपंथी कहे जाते हैं। वे आज के वैचारिक जगत के सबसे बड़े अपराधी माने जाते हैं क्योंकि वो समाज को, चिंतन को और साहित्य को गलत दिशा में मोड़ते हैं। परंपरा को श्रेष्ठ ठहराने कि जल्दबाजी में वो हर बात को परंपरा से जोड़ने के अग्रही होते हैं। इसलिए उनके दिये गये तर्कों को हमेशा नज़रअंदाज किया जाता है (भले ही कभी कभी उनमें सच्चाई हो)। परंतु दूसरी ओर तुलसी को ब्राह्मणवादी या प्रेमचंद को दलित विरोधी ठहराने को प्रगतिशीलता मान लिया जाता है। सवाल यह उठता है कि पहले वर्ग के लोग अगर प्रतिगामी ठहराये जाते हैं कि वे अतार्किक हैं, इतिहास विरोधी हैं तो ऐसे लोगों को क्या माना जाए, जो तुलसी और प्रेमचंद की युगीन सीमाओं को समझे बगैर, उनके देश और काल को समझे बगैर उलजलूल बातें करते हैं। कोई भी चिंतक अपनी युगीन सीमाओं के भीतर प्रासंगिक या अप्रासंगिक, ग्राह्य या अग्राह्य होता है। उसकी प्रासंगिकता इससे तय होती है कि वह अपने समय और समाज के प्रति कितना ईमानदार है। इसे समझे बगैर किसी पर कीचड़ उछालना, उसकी प्रासंगिकता की बात करना अपनी मूर्खता का प्रदर्शन है। दुर्भाग्यवश हिंदी साहित्य में यह काम जोरों पर है। इसकी एक वजह साहित्य कि दुनिया मे लफ़्फ़ाजों की बढ़ती भीड़ जिम्मेदार है। इसमें कुछ मीडिया के लोग भी हैं, जो वहां के चलताऊ जुमलों को यहां फ़िट करने के आदी हैं। मसलन वह यह नया प्रयोग है, यह रचना फ़्रेम को तोड़ती है, या यह सामाजिक जीवन की व्याख्या है जैसे तमाम जुमले इन्हीं के इजाद किये हुए हैं, जिन्हें नये लोग भी अब इस्तेमाल करने लगे हैं। पर यह किस फ़्रेम को तोड़ती है? इसमें क्या नया प्रयोग है? किस समाजिक जीवन कि व्याख्या है? इस पर बात नहीं करते। अब अलोचना के नाम पर ये सारे ऊलजलूल टोटके बंद होने चाहिए। साथ ही इस तरह के बे-सिर-पैर के फ़तवे भी और बाल में खाल निकालने की आदतें भी। तभी आलोचना का कोई हित हो सकता है और साहित्य का भी। ये काम वाद और पंथ के आग्रहों से ऊपर उठकर होना चाहिए, यह भी जरूरी है।
प्रेमचंद ने जितना लिखा, उतने पर बात करें
♦ प्रकाश कुमार राय
आपकी चिंता से यारों की सहमति है लेकिन आपका आग्रह कुछ बेमानी भी लगता है। आदिवासी समाज से जुड़े होने के कारण आपने उन कृतियों का अध्ययन ज़रूर किया होगा जिनमें इस समाज का चित्रण है। अच्छा हो अगर आप उनसे यारों का परिचय कराएं। प्रेमचंद ने जितना लिखा है, उतने पर ही बात हो तो उचित है। यदि हिंदी या अन्य भाषाएं आदिवासियों से कटी हुई हैं तो उनकी अपनी ज़ुबानों से तर्जुमा कर बात दूर तक पहुचायी जाए तो बेहतर होगा।
प्रेमचंद की प्रगतिशीलता दलितों को दयनीय बना देती है
♦ दिलीप मंडल
“वह इसलिए कि प्रेमचंद की रचनाएं 1903 से 1936 तक के कालखंड में फैली हुई हैं और उन्होंने भारत की उत्पीड़ित जनता के शोषण व यथार्थ को 300 से अधिक कहानियों, एक दर्जन उपन्यासों तथा अनगिनत सामाजिक-राजनीतिक लेखों और समाचारों में समर्थ लेखकीय कौशल के साथ उदघाटित किया है। वे साहित्य, पत्रकारिता और सांस्कृतिक आंदोलन के मोर्चों पर आजीवन युद्धरत रहे। सामंती और औपनिवेशिक गुलामी के विरुद्ध उन्होंने भारतीय प्रायद्वीप के एक बड़े क्षेत्र की भाषा हिंदी-उर्दू में हमारा नेतृत्व किया और उनकी कालजयी रचनाएं एवं विचार आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही हैं।”
अश्विनी जी, आपने तो प्रेमचंद को कुछ भगवान जैसा बना दिया और शिकायत इस बात की कि उनकी रचनाओं में आदिवासी क्यों नहीं हैं। प्रेमचंद की रचनाएं अपने समय का पॉप हैं। उसमें सामंतवाद विरोध और उत्पीड़ित जनता का यथार्थ तलाशेंगे तो निराशा हाथ लगेगी। कम उम्र में जिन्होंने प्रेमचंद को पढ़ा है उन्हें उन रचनाओं का पुनर्पाठ करना चाहिए। कफन को पढ़िए। दलित दृष्टि के साथ पढ़िए और फिर एक बार कहिए कि प्रेमचंद दलितों के प्रति संवेदनशील होकर ये लिख रहे थे। प्रेमचंद की रचनाओं में आपको वो दलित आक्रोश भी नजर नहीं आएगा, जिसका प्रतिनिधित्व उसी दौर में आंबेडकर कर रहे थे। प्रेमचंद जब ज्यादा प्रगतिशील होते हैं तो उनके दलित करेक्टर दया के पात्र होते हैं।
अश्विनी जी अखिल भारतीय कुछ नहीं है। हर किसी के सच का अपना अपना टुकड़ा है। प्रेमचंद के सब कुछ पाने की उम्मीद क्यों करते हैं। प्रेमचंद से उस कालखंड के सच का एक टुकड़ा जानिए। लेकिन उनसे दलित-आदिवासी लेखन की उम्मीद तो न पालिए।
आप किसके समय और समाज की बात कर रहे हैं
♦ वीरेंद्र मुंडा
…प्रासंगिकता इससे तय होती है कि वह अपने समय और समाज के प्रति कितना ईमानदार है…
सच कहते हैं आप। इसीलिए तो ये सवाल है। पर आप तो सवाल करने वाले को ही मूर्ख ठहरा रहे हैं? क्या आप बताएंगे कि जिस समय और समाज की बात आप कर हैं, वह कौन-सा समय और समाज है? किसका है? सिर्फ अपने हितों पर चोट पड़ते ही कितना तिलमिला रहे हैं आपलोग। सोचिए ज़रा हम आदिवासी लोग आज भी मारे जा रहे हैं।
सब कुछ प्रेमचंद ने ही करना था क्या?
♦ संजय ग्रोवर
कल को कोई यह सवाल भी उठा सकता है कि प्रेमचंद ने समलैंगिकता और अल नीनो पर क्यों नहीं लिखा? क्लोनिंग पर क्यों नहीं लिखा? सब कुछ प्रेमचंद ने ही करना था क्या?
नयी रचनाशीलता में आदिवासी कहां हैं?
♦ रंगनाथ सिंह
पंकज जी, आपके आदिवासियों से जुड़े सरोकार देखते हुए इस प्रश्न की संवेदनशीलता उदघाटित होती है। लेकिन आप से अनुरोध है कि आप अपनी राय पर पुनः विचार करें। आप सोचें कि क्या दुनिया के किसी रचनाकार के लिए यह संभव हुआ है कि वह अपने समय की सभी शोषित अस्मिताओं को कलमबंद कर सके।
किसी रचनाकार का मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि जिन विषयों पर उसने अपनी कलम चलायी है, उसमें कितनी ईमानदारी दिखायी है। जिस तरह से आप जब आदिवासी मुद्दों पर काम करते हैं, तो उसी वक्त तमाम दूसरे मुद्दे को नज़रअंदाज़ कर रहे होते हैं, जो दूसरों की नज़र में आप के मुद्दे जितने ही ज़रूरी हैं। उसी तरह जब कोई लेखक किसी खास मुद्दे पर अपनी राय केंद्रित करता है तो सहज स्वाभाविक कारणों से दूसरे कई विषय उसकी निगाह की जद से बाहर हो जाते हैं।
आपके प्रतिमान पर कसा जाए, तो बड़े-बड़े दलित चिंतक भी उसी अपराध के दोषी पाये जाएंगे, जिस अपराध के लिए आप प्रेमचंद को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं। संक्षेप में यही कहूंगा कि किसी भी रचनाकार के लिए संभव नहीं है कि वह अपनी सीमित रचनाओं में असीमित संसार की सभी चीज़ों को समेट लेगा।
पंकज जी, आपका सवाल सही है लेकिन गलत व्यक्ति से पूछा गया है। मैं आपकी जगह होता तो आज के तमाम युवा कथाकारों से पूछता कि तुम्हारी रचनाओं में आदिवासी कहां हैं?
गर हैं तो उनके संग तुमने क्या बरताव किया है ?
नहीं हैं तो क्यों नहीं हैं ?
प्रेमचंद गांव के लेखक थे, शहर और आदिवासी के नहीं
♦ अनिकेत
वीरेंद्र की बातों से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि हर व्यक्ति के हित होते हैं। उन हितों पर चोट कोई बरदाश्त नहीं कर पाता। यहां तक कि वीरेंद्र भी नहीं। पर केवल हित के लिए देश और कल की सीमाओं से काट कर किसी लेखक या चिंतक के बारे में लगातार दुराग्रहपूर्ण बातें करना मूढ़ता है। या फिर हद दर्जे कि हितांधता।
प्रेमचंद ने क्या किया या क्या नहीं, यह अलग बात है। हम आज हर बात को हित पर तोलते हैं। असल बात है। हम साहित्य पढ़ना नहीं, अपना हित तलाशना चाहते हैं। आप यह काम बखूबी कर रहे हैं।
एक बात और, यदि प्रेमचंद सब कुछ लिख ही गये होते, तो आपके लिखने के लिए क्या बचता? फिर दलित और अदिवासी साहित्य कि बातें क्यों की जातीं? मित्र प्रेमचंद ब्रह्म नहीं थे। सर्वज्ञ नहीं थे। वो मनुष्य थे और इसलिए उनकी सीमाएं थीं। उन सीमाओं के भीतर उनके रचनाकर्म पर बात होनी चाहिए। शायद वो आदिवासी समस्याओं पर उतना प्रामाणिक नहीं लिख पाते जितना आप लिखेंगे।
उन्हें गांव का जितना अनुभव था, शहर का भी नहीं, आदिवासी का भी नहीं। इसलिए शहरी जीवन में उनसे अच्छा लेखन जैनेंद्र और निर्मल का है। उसी तरह आदिवसी जीवन में महश्वेता का। आप उसमें अपनी अस्मिता और उसकी प्रामाणिकता तलाशें। सच ये है कि अस्मिताओं की तलाश और विमर्शों बात उत्तरआधुनिकता की देन है और प्रेमचंद उत्तरआधुनिक नहीं थे। प्रगतिशील या प्रतिगामी चाहे जो रहे हों।
इसलिए हमें वही पढ़ना चाहिए जो उन्होंने लिखा है।











जो समाज एक नाटक से डरता है, वह अपने साहित्य में सच को आने से भला क्यों नहीं रोकेगा
प्रेमचंद और प्रेमचंद की परंपरा में आदिवासी समाज कहां है? अपनी यह जिज्ञासा मैंने 2 अगस्त को भारत के समर्थ हिंदी समाज के समक्ष रखी थी। इस पर किस तरह की टिप्पणियां सामने आई हैं, उसे आप देख ही रहे हैं। मेरा सवाल प्रेमचंद के बहाने प्रेमचंद की परंपरा से ज्यादा था। लोग इस पर बात ही नहीं कर रहे हैं। प्रवचन दे रहे हैं कि आदिवासी समाज को क्या करना चाहिए। यदि ऐसा ही है तो हिंदी साहित्य ‘आम जन’ का ‘मसीहा’ बनने पर क्यों तुला हुआ है? दिलीप जी ठीक कहते हैं, ‘उसमें सामंतवाद विरोध और उत्पीड़ित जनता का यथार्थ तलाशेंगे तो निराशा हाथ लगेगी।’ इसी के साथ यह भी जान लेना जरूरी होगा कि जो सबसे ज्यादा सत्य, न्याय और राष्ट्रप्रेम का दंभ भरता है, वही सबसे ज्यादा इन चीजों से डरता है। समर्थ समाज और राजनीति किस कदर सच से डरता है इसका ताजा उदाहरण है छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा 3 अगस्त को ‘चरणदास चोर’ पर पाबंदी लगा देना। जो समाज एक नाटक से डरता है, वह अपने साहित्य में सच को आने से भला क्यों नहीं रोकेगा।
हिंदी समाज के ठेकेदार और प्रगतिशीलता के मठाधीश यह जान लें कि दुनिया के आदिवासी समाजों ने अपनी लड़ाईयां खुद ही लड़ी हैं। इतिहास में भी और आज भी। दुनिया भर की विभिन्न भाषाओं में रचित लाखों टन क्रांतिदर्शी व मार्गदर्शी साहित्य के शब्दों ने उनकी कोई मदद नहीं की है। वे आज भी अलिखित समाज हैं। विश्वास न हो तो सरकार के आंकड़ें उठा कर देख लीजिए उनकी साक्षरता दर क्या है। वे स्वावलंबी जीवन जीते हैं। हमारी तरह नहीं कि उनके संसाधनों को लूट लेने के बाद भी उनके नाम पर पिछले साढ़े छः दशक से विकास का पैसा खा रहे हैं।
9 नवंबर 1947 को ही यह तय हो गया था कि भारत आदिवासियों, दलितों ओर कमजोर लोगों का देश नहीं है, जब नेहरू-पटेल के साथ जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में झारखंडी समूह की वार्ता टूट गई थी। भारतीय संविधान बनने के पहले हुई इस वार्ता में जयपाल सिंह मुंडा ने कहा था, ‘संविधान तुम्हारा है, सीमाएं तुम्हारी हैं, संप्रभुता तुम्हारी है, झंडा तुम्हारा है। हमारा क्या है? क्या है तुम्हारे प्रस्तावित संविधान में जो आदिवासियों और मुख्यधारा, दोनों के लिए एकसमान है।’ कैसी विडंबना है भारत के आदिवासी समुदाय को आज भी यही सवाल करना पड़ रहा है। भाषा तुम्हारी है। साहित्य तुम्हारा है। अकादमियां तुम्हारी हैं। पत्रा-पत्रिकाएं तुम्हारी हैं। लेखक तुम्हारे हैं। मान-सम्मान और पुरस्कार तुम्हारा है। हमारा क्या है?
इंटरनेट पर ‘झारखंड’ सर्च मारिए। महेन्द्र सिंह धौनी मिलेंगे। जयपाल सिंह मुंडा नहीं। जिन्होंने 1928 के आलंपिक में भारतीय हाॅकी की कप्तानी की थी और स्वर्ण जीतकर लाए थे। बाजार के उन्मादी ‘भारतीय’ देशी हाॅकी की शान जयपाल सिंह मुंडा को नहीं जानते हैं। वैसे ही हिंदी में प्रेमचंद की परंपरा के माठाधीश आदिवासियों को नहीं जानते हैं। उनकी इतिहास की लड़ाईयों को और आज के संघर्षों को नहीं जानते हैं। यूनेस्को के अनुसार देश की 196 जन भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है। इनमें अधिकाशं भारत की आदिवासी भाषाएं हैं। उनकी चिंता किसी को नहीं है। भारत की दो करोड़ से भी जयादा आबादी नगरीय सज्जनों को सुख-सुविधा देने की एवज में ग्रामीण-आदिवासी नक्शे से ‘डीलीट’ हो चुकी है, इंडिया को क्या फर्क पड़ता है। नहीं जानना बुरा नहीं है। जान कर नहीं जानना सबसे बुरा है। मुख्यधारा का हिंदी साहित्य यही कर रहा है। साहित्य यदि बाजार के लिए नहीं है मनुष्य और मनुष्यता के लिए है, तो हिंदी साहित्य की प्रस्तुति आदिवासी समाज के बगैर क्यों है?
अंत में नवंबर 1947 में हुई वार्ता के दौरान पटेल ने नेहरू ओर मौलाना आजाद से क्या कहा था, इसे जरूर जान लेना चाहिए। पटेल ने कहा था, “we don’t fight the tribals. These people fought wars of independence years before 1857. They are the original nationalists.”
हिंदी साहित्य की मुख्यधारा प्रभावशाली प्रभुत्वशालियों की धारा है। वरना भारतीय साहित्य में स्पार्ट्कस जैसी रचनाएं नदारद क्यों हैं। स्पार्टकस का विद्रोह तो हजारों साल पुराना है। सिर्फ श्रुति परंपरा में जिंदा था। हार्वर्ड फास्ट ने उसे साहित्य का हिस्सा बना दिया और ऐसे लेखन के लिए अकल्पनीय दंड सहे। भारतीय साहित्य में सिद्धू-कान्हू पर फिक्शन क्यों नहीं लिखा गया। ये तो दो सौ साल पुरानी बात भी नहीं है जब संथाल विद्रोहियों ने अंग्रेजों की सत्ता को हिला कर रख दिया था। सिद्धू-कान्हू, बिरसा मुंडा, चांद-भैरव पर किसी मसीहा साहित्यकार ने क्यों नहीं लिखा, ये सवाल अश्विनी जी पूछते हैं तो लोगों को अश्लील लगता है।
मुझे ऐतराज इस बात पर नहीं है कि प्रेमचंद ने आदिवासियों के बारे में जिक्र तक क्यों नहीं किया। मुझे प्रेमचंद को, एक साहित्यकार से बढ़कर, दबे-कुचले लोगों का मसीहा साहित्यकार कहे जाने पर विरोध है।
हालांकि जो लोग पंकज जी के उठाए सवाल पर चल रही इस बहस में शामिल हैं वो हिंदी साहित्य की मुख्यधारा के सही प्रतिनिधि नहीं है। मुख्यधारा का हिंदी साहित्य तो ऐसे सवालों को सिर्फ नजर फेरकर मार देने की कोशिश करता है। ऐसे सवालों की मौजूदगी से इनकार कर देना उनके हाथों का सबसे प्रभावशाली हथियार है। इसलिए अश्विनी जी, अब भारत का स्पार्टकस और ऐसी रचनाएं वो लिखें जो खुद हाशिए पर हैं और वो जो इसकी पीड़ा को समझते हैं। ये साहित्य ५०० के प्रिंटऑर्डर वाले मुख्यधारा के महान साहित्य से अलग होगा। दमदार और असरदार होगा।
कृपया स्पार्टकस और हावर्ड फास्ट को गलत तरीके से लिखने के लिए क्षमा करें। हावर्ड फास्ट के बारे में और जानने के लिए ये लिंक देखें
-
हावर्ड फास्ट को जानें
मठाधीशों से आपकी shikaayat समझ में आती है मगर इसमें खुद प्रेमचंद का कोई बहुत बड़ा अपराध मुझे तो नहीं लगता .
भाई प्रेमचंद को वहां से चलना था जहां तक की परंपरा थी उनके पीछे। उनके पहले क्या लिखा जा रहा था? तोता मैना के किस्से या फ़िर ऐयारी के कारनामे…
ऐसे में उनको बुनियाद भी बनानी थी और इमारत भी… ऐसे में वो जहां तक पहुंचे वह चमत्कार से कम नहीं लगता।
आज उनको गरियाना फ़ैशन बन गया है।
हां एक बात और दलित विमर्श को औरों की तरह मैं भी बडी उम्मीद से देख रहा था लेकिन लगता है कि यह जितना आगे गया है उतना ही पीछे भी…जाति के दलदल में वह इतना गहरा धंस गया है कि अब मैं उसे शंका के साथ देख रहा हूं। उनके लिये ख़ुद को स्थापित करने के लिये प्रेमचंद और उनकी परंपरा को ख़ारिज़ करना ज़रूरी है।
“जयपाल सिंह मुंडा ने कहा था, ‘संविधान तुम्हारा है, सीमाएं तुम्हारी हैं, संप्रभुता तुम्हारी है, झंडा तुम्हारा है। हमारा क्या है? क्या है तुम्हारे प्रस्तावित संविधान में जो आदिवासियों और मुख्यधारा, दोनों के लिए एकसमान है।’ कैसी विडंबना है भारत के आदिवासी समुदाय को आज भी यही सवाल करना पड़ रहा है। भाषा तुम्हारी है। साहित्य तुम्हारा है। अकादमियां तुम्हारी हैं। पत्रा-पत्रिकाएं तुम्हारी हैं। लेखक तुम्हारे हैं। मान-सम्मान और पुरस्कार तुम्हारा है। हमारा क्या है? ”
पंकज जी गद्य के इस टुकड़े से रोंगटे सिहर उठे !!
एक-एक शब्द सौ फीसद सच है। भारत के आदि-वासियों को लेकर आपने अब जो लिखा है वह बहस का असल केन्द्र है। आपने प्रेमचंद की बजाए प्रेमचंद की परंपरा शब्द का प्रयोग करके अब बहस को एक सही परिप्रेक्ष्य में रखा है।
पटेल ने कहा था, “we don’t fight the tribals. These people fought wars of independence years before 1857. They are the original nationalists.”
अश्विनी पंकज जी
मैंने आपकी मूल पोस्ट और आज की टिप्पणी को जोड़कर एक पोस्ट बनाकर अपने ब्लाग “बना रहे बनारस” पर लगाई है। पोस्ट को संक्षिप्त रखने के लिए मैंने काफी बड़ा हिस्सा काट के निकाला है। हाँ, मैंने एक भी शब्द अपनी तरफ से जोड़ा नहीं है। आप उस पोस्ट को देख लें। आपकी आपत्ति या सहमति के अनुसार ही उस पोस्ट का भविष्य तय होगा।
mere blog ka pataa hai,
http://www.vipakshkasvar.blogspot.com
[...] है। हर कोई बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहा है। कुछ के मुताबिक प्रेमचंद के लेखन में दल…। कुछ यह भी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर [...]
पुराने पन्ने
Categories
Tag Cloud
abraham hindiwala anil chamadia anna hazare anurag kashyap arundhati rai arundhati roy Bahastalab bihar dalit dilip mandal gorakhpur hindi hindi cinema Hindi language Hindi Literature hindi media jansatta jawaharlal nehru university JNU Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalaya mahatma gandhi international hindi university maoism maoist MGIHU mihir pandya namwar singh naxal naxalism naya gyanodaya Nirupama Pathak om thanvi prabhash joshi prabhat khabar Prakash K Ray rajendra yadav ravindra kaliya ravish kumar uday prakash vibha rani Vibhuti Narayan Rai Vice Chancellor vineet kumar vn rai women मीडिया मंडीRecent Posts
Most Commented
Recent Comments