अरुंधती के ख़‍िलाफ़ आलोक मेहता का राग सलवा जुडूम

(बहस के लिए जारी)

alok mehta editorialआलोक मेहता हममें से ज़्यादातर नौजवान पत्रकारों के बीच कभी इस मायने में चर्चा का विषय नहीं रहे कि यार देखो संपादक हो तो ऐसा। या कि पत्रकार हो तो ऐसा। ये भी कि भई, इस आदमी की कलम में जादू है। निहायत ही औसत किस्‍म की राइटिंग के बावजूद वे बड़े बनते चले गये। लोकतंत्र के उन हिमायती लोगों ने उनका लगातार साथ दिया, जो सांप्रदायिकता और ग़ैरबराबरी को सभ्‍यता के लिए एक मुश्किल चीज़ मानते रहे। हम भी मानते रहे हैं‍ कि आलोक मेहता पत्रकार चाहे जैसे हों, वे फासीवादी ताक़तों की ज़बान नहीं बोलते। उनके हाथों में नहीं खेलते। एनडीए की हुकूमत के वक्‍त भी उन पर सेकुलर रंग जमा रहा – कम से कम उनके संपादन में निकलने वाली पत्रिका आउटलुक हिंदी से तो ऐसा ही आभास होता रहा है।

हमारे देखे उनके अपने पत्रका‍रीय ‘उत्तरार्द्ध’ में उन्‍होंने ऐसा कुछ नहीं लिखा, जिससे खुशी हो – लेकिन दुखी भी नहीं किया। कल पहली बार आलोक मेहता के शब्‍दों ने ये बेहतर तरीक़े से साफ किया कि वे निहायत औसत ही नहीं, ठस, मूल्‍यविहीन और सामंती समझ वाले पत्रकार है और अपने शब्‍दों के जरिये जुगाड़ की भ्रष्‍ट गुफा के मुहाने से पत्‍थर हटाने का काम भी करते हैं। हंस की गोष्‍ठी में अरूंधती ने यही कहा था कि छत्तीसगढ़ के संघर्षशील आदिवासियों की आवाज़ें ग़ुम हो रही है। अख़बार स्‍टेट की ज़्यादा सुनते हैं। उनके पत्रकार ख़बर से अधिक विज्ञापन को महत्‍व देते हैं। ऐसे में लेखकों का काम है उनकी आवाज़ बनना। इस वक्‍तव्‍य में ऐसा क्‍या था कि आलोक मेहता को संपादकीय लिख कर अरूंधती की भर्त्‍सना करनी पड़ी? हां, था इस वक्‍तव्‍य में ऐसा, जि‍सकी भर्त्‍सना करके आलोक मेहता ने अपनी राजनीतिक महत्‍वाकांक्षा की पूंछ सहलायी और राज्‍यसभा में अगले पांच साल के लिए अपनी सीट के‍ लिए कांग्रेस के सामने दावेदारी परोस दी। लोग कहते हैं कि उनकी सीट बुक है, बस औपचारिक घोषणा होना बाक़ी है – लेकिन खुद आलोक मेहता ने घोषणा से पहले संशय के थोड़े से ही सही, बादल हटाने के लिए अपनी तरफ से एक धक्‍का तो दे ही दिया।

छत्तीसगढ़ में संघर्षरत आदिवासियों के खिलाफ राज्‍य प्रायोजित नरसंहार के लिए छेड़ा गया सलवा जुडूम अभियान एक कांग्रेसी मस्तिष्‍क की उपज था और विपक्ष में खड़े आदिवासियों की हिमायत करने वाली अरुंधती के खिलाफ़ कलम की स्‍याही ख़र्च करके आलोक मेहता ने कांग्रेस को क्‍या संदेश देना चाहा है – ये साफ़ है। ये सिर्फ एक खोखले बुद्धिजीवी का भ्रष्‍ट पत्रकारीय आचरण ही नहीं – बल्कि मानवाधिकारों के पक्ष में उठने वाली आवाज़ों को खामोश और हतोत्‍साहित करने लिए राज्‍य की ओर से जारी किये गये शब्‍द-संकेत हैं।

naiduniaइनके पत्रकारीय विज़न की बानगी यही है कि जिस हंस की गोष्‍ठी में अरुंधती बोलीं, नामवर बोले, अशोक वाजपेयी बोले और हिंदी की युवा रचनाशीलता पर बोले – उस हंस की गोष्‍ठी में अपने अख़बार के लिए जो दृश्‍य उन्‍होंने देखे – वह था मैत्रेयी पुष्‍पा का पुरस्‍कार ग्रहण। वह भी भागलपुर के एक गुंडा व्‍यवसायी की बहू की स्‍मृति में दिया गया पुरस्‍कार। इतना ही नहीं, इस तस्‍वीर को नई दुनिया ने पहले पेज पर सबसे ऊपर चार कॉलम में जगह दी, मानो उस दिन दुनिया की सबसे बड़ी घटना वही हुई हो। सबूत के लिए बगल की तस्‍वीर देखें।

कहने का कुल मतलब ये कि ये दलाल पत्रकार हैं और इनकी दलाली के ख़‍िलाफ़ हमें मुखर होना होगा। अरुंधती जैसों के ख़‍िलाफ़ इनके राग सलवा जुडूम का लाउड स्‍पीकर नोंच कर फेंकना ही होगा।

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