कथित क्रांतिकारिता के विरुद्ध

♦ आलोक मेहता

alok mehta editorialअरुंधती रॉय और अरुण शौरी नामी हस्तियां हैं। उनके चाहने वालों की संख्‍या अच्‍छी-खासी है, खासकर अंग्रेज़ी पढ़ने-लिखने वाले जवानों-बूढ़ों का एक वर्ग उनका मुरीद है। यों दोनों के विचारों में ज़मीन-आसमान का अंतर है। एक घोर प्रगतिशील हैं और दूसरे घोर पूंजीवादी विचारों से सराबोर। शौरी विश्‍व बैंक में छोटी मोटी नौकरी से पत्रकारिता के रास्‍ते भाजपा के कंधों पर चढ़ कर सत्ता का आनंद लेते रहे हैं। मंत्री रहने से पहले भी अपने लेखन पर अहंकार होने के कारण असहमति बर्दाश्‍त नहीं करते थे। अरुंधती रॉय अंग्रेजी में अच्‍छा लिखती हैं। शौरी की तरह उन्‍हें भी मैगसायसाय अवार्ड मिला है लेकिन दोनों ज़मीनी वास्‍तविकताओं से अनजान हैं। अरुंधती रॉय ने दिल्‍ली में प्रेमचंद जयंती पर आयोजित एक संगोष्‍ठी में अपनी ‘क्रांतिकारिता’ दिखाते हुए इराक पर अमेरिकी आक्रमण की भर्त्‍सना के साथ छत्तीसगढ़ में मूलभूत अधिकारों के लिए बंदूक के रास्‍ते को सही ठहरा दिया। अरुंधती ने अब तक हुए चुनावों को निरर्थक करार दिया। आंकड़ों की दृष्टि से उनका दावा सही हो सकता है कि एक अरब के देश में 10-15 प्रतिशत लोगों के बल पर सरकार बन जाती है लेकिन 40 से 50 करोड़ लोगों के वोटों को एक झटके में बेकार कह देना निहायत गैरजिम्‍मेदाराना और लोकतंत्र में आस्‍था रखने वालों का अपमान है। लोकतंत्र में वोट ही एकमात्र रास्‍ता है, जिससे जनता अपने अधिकारों, सुख-सुविधाओं को अर्जित कर सकती है। बंदूक कोई रास्‍ता नहीं है। अमेरिकी साम्राज्‍यवाद की तरह ही चीन की बंदूकों और गोला-बारूद से निकलने वाले धुएं और बर्बादी में कोई अंतर नहीं होता। नक्‍सली हिंसा में मरने वाले साधारण सिपाहियों के खून का रंग और ग़रीब परिवारों का दु:ख भी अपार होता है।

अरुंधती रॉय को मिलने वाले अंतर्राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार या अंग्रेज़ी में लिखे जाने वाले लेखों का पारिश्रमिक देने वाले प्रकाशनों को ब्रिटिश-अमेरिकी कंपनियों के विज्ञापन से ही धन मिलता है। साध्‍वी ऋतंभरा की तरह अरुंधती रॉय अपने अंग्रेज़ी लेखन और वाक्-चातुर्य से कुछ युवाओं को चमत्‍कृत कर लेती हैं लेकिन हिंदी-उर्दू में उनसे अधिक अच्‍छा लिखने वाले तथा जमीनी वास्‍तविकताओं को समझने और जीने वाले लेखक कम नहीं हैं। राजेंद्र यादव, ज्ञानरंजन, मुद्राराक्षस, रवींद्र कालिया तो स्‍थापित नाम हैं, उनके बाद की पीढ़ी में भी पचीसों ईमानदार प्रगतिशील लेखक-पत्रकार हैं। इसी तरह मलयालम, कन्‍नड़, तमिल तेलुगु, मराठी, गुजराती भाषाओं में भी क्रांतिकारी विचारों वाले लेखक-पत्रकार हैं। अरुंधती ने दिल्‍ली की संगोष्‍ठी में छत्तीसगढ़ की हिंदी पत्रकारिता को कचरे की तरह झाड़ू से बुहारते हुए कह दिया कि ‘वहां किसी अखबार में आदिवास‍ियों की असली समस्‍याओं, दु:ख-दर्द के बारे में कुछ नहीं छपता। यहां तक कि हर पत्रकार के नियुक्ति पत्र में विज्ञापन लाने की शर्त जुड़ी होती है।’ लगता है कि अरुंधती जब कभी छत्तीसगढ़ जाती हैं तो सिरफिरे एकपक्षीय लोग ही उनकी पालकी ढोते हैं। वह स्‍वयं हिंदी नहीं पढ़ सकती हों तो अपने ‘प्रशंसकों’ से पढ़वा कर देख सकती हैं कि छत्तीसगढ़ के अख़बारों में आदिवासियों के जीवन संघर्ष पर बहुत कुछ लिखा-छापा जा रहा है। हमारे अपने ‘नई दुनिया’ अखबार में पिछले कुछ अर्से में ‘अबूझमाड़ की महिला बीमा से वंचित’, ‘पाषाण युग में जी रहा भेजरीपडर’, ‘सात रहनी बुझाती है प्‍यास’, ‘शराब पीकर जा रहे हजारों बच्‍चे स्‍कूल’, ‘दो महीने में 41 आदिवासियों की आत्‍महत्‍या’ जैसी अनेक रिपोर्टें प्रकाशित हुई हैं। इसी तरह छत्तीसगढ़ के अन्‍य अख़बारों में भी आदिवासियों की समस्‍याओं पर निरंतर समाचार-विचार छपते हैं।

अरुंधती की यह धारणा भी बेमानी है कि छत्तीसगढ़ या अन्‍य क्षेत्रों के हिंदीभाषी हर पत्रकार को विज्ञापन जुटाना होता है। कुछ अख़बारों में ऐसे अंशकालिक प्रतिनिधि होते हैं, जो खबरें और विज्ञापन भी जुटाते हैं। वह कभी रायपुर प्रवास में ‘नई दुनिया’ अथवा अन्‍य प्रमुख अखबार में जाकर पत्रकारों के नियुक्ति पत्र भी पढ़ कर या पढ़वा कर देख लें, ऐसी कोई शर्त नहीं होती। यदि कुछ अखबार या पत्रकार ऐसा करते हों, तो उसका ‘जनरलाइजेशन’ (सामान्‍यीकरण) ठीक नहीं है। पत्रकारिता में कमियां हैं, कमज़ोरियां हैं और उनके विरुद्ध प्रयास जारी रहने चाहिए। हिंदी अखबारों के पास आर्थिक साधनों की कमी होती है लेकिन अरुंधती को जिन पत्र-पत्रिकाओं से मोटा पारिश्रमिक मिलता है, उनके संपादकों की भी कभी असलियत का पता लगाने की कोशिश करें। वे छत्तीसगढ़ के पत्रकारों से भी अधिक विज्ञापन परिशिष्‍ट की व्‍यवस्‍था के लिए बड़े पूंजीपतियों, मंत्रियों, बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों से ‘अनुनय-विनय’ करते रहते हैं। कम से कम मैंने स्‍वयं यह सब देखा-सुना है। कोई अच्‍छी पत्र-पत्रिका बंदूक की नोंक से वसूले गये धन से नहीं चल सकती।

अरुण शौरी सामान्‍य पत्रकारों को कीड़ा-मकोड़ा समझ कर दुत्‍कार सकते हैं क्‍योंकि वह ज़मीनी पत्रकार कभी नहीं रहे। जिन सनसनीखेज़ ख़बरों के लिए वे चर्चित रहे, उनके ड्राफ्ट किसने-कैसे लिख कर दिये, यह सच कभी पॉलीग्राफ मशीन लगा कर उगलवाया जाए तो हजारों लोगों की गलतफहमियां दूर हो जाएंगी। अरुंधती तो ज़मीन वालों से बात करने की कोशिश करती हैं, कभी छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्‍यप्रदेश के बहुत कम वेतन पाने वाले ईमानदार और निर्भीक पत्रकारों से बात करके असलियत जानने-समझने की कोशिश करें। इस संदर्भ में कथित क्रांतिकारी लेखकों-पत्रकारों या उनसे प्रभावित पाठकों को इस बात की ओर ध्‍यान दिलाने की ज़रूरत है कि हिंदी में पिछले कुछ दशकों में श्रेष्‍ठ संपादकों की परंपरा रही है। गणेश शंकर विद्यार्थी और बाबूराव विष्णुराव पराड़करजी के युग के बाद भी राहुल बारपुते, राजेंद्र मा‍थुर, अज्ञेय, मनोहर श्‍याम जोशी, कमलेश्‍वर, रघुवीर सहाय जैसे कई संपादक हुए हैं। इनसे प्रेरणा लेकर काम करने वाले सैकड़ों पत्रकार हैं। उनकी दी हुई सूचनाओं, खबरों के बल पर दिल्‍ली, मुंबई में बैठे अंग्रेजीदां लेखक, पत्रकार, अधिकारी या नेता तमगे-पुरस्‍कार अर्जित करते रहते हैं। अंग्रेजी में श्रेष्‍ठ लेखन भी होता रहा है लेकिन केवल भाषा के कारण गुलामी की मानसिकता वाले लोग भ्रमजाल में फंस जाते हैं। अंग्रेजी में खोजी पत्रकारिता या सत्ता का विरोध करने का दावा करने वाले संस्‍थानों के मालिकों-संपादकों के निहित स्‍वार्थ रहे हैं इसलिए उन्‍हें ‘आदर्श मॉडल’ के रूप में पेश करना भी करोड़ों लोगों के साथ धोखा है। जिस तरह धर्म के नाम पर अंधविश्‍वास और पाखंड के विरुद्ध आवाज़ उठनी चाहिए, उसी तरह ‘प्रगतिशील’ या आदर्शों के नाम पर होने वाले क्रांतिकारिता के पाखंड की भर्त्‍सना भी क्‍यों नहीं होनी चाहिए? भाषा या बंदूक का आतंक समाज को सही दिशा नहीं दे सकता। विदेशी भाषा के चश्‍मे से न भारतीय समाज को समझा जा सकता है और न ही उसकी समस्‍याओं का समाधान किया जा सकता है।

(संडे नई दुनिया, 9 अगस्‍त 2009 से साभार)

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