नैतिकता भी हो गयी है प्रायोजित
♦ मज़्कूर आलम
बात अजीत जी के इस कोट से…
कितने लाचार या मजबूर होते हैं वे संपादक, जो मंच पर कहते हैं कि मैं व्यक्तिगत रूप से असहमति जाहिर कर रहा हूं, फिर भी उनके चैनल पर वह चीज़ चलायी जाती है।
जहां तक मैं जानता हूं, अजीत अंजुम को, लोगों से जो सुन रखा है, खासकर अवधेश प्रीत से – उस लडक़े में बहुत आग है, कभी न हारने का जज्बा। बहुत ही अच्छी स्टोरियां की उसने, पटना में, जनपक्षधर।
शायद यही वजह है कि वे आज यहां तक पहुंचे, जो किसी एक पत्रकार का सपना होता है। और आज वही आदमी एक हताश बयान दे रहा है।
लेकिन चलो यार एक बात तो है – इस बयान से पता चलता है कि वह आग बरकरार है। सच जिंदा है। वह बेचैनी जो किसी आदमी का नैतिक पतन नहीं होने देती, उसे बेहतर करने के लिए मजबूर करती रहती है, वह बाकी है।
लेकिन उनका यह कनफेशन – आप जो चीज़ चलाते हैं, क्या वह आप अपनी मर्जी से चलाते हैं? क्या उसके पीछे कोई व्यवस्था होती है? – बहुत ख़तरनाक है, जो यह बताती है कि बाज़ार कैसे आदमी को कठपुतली में बदल रहा है। उसे मजबूर कर रहा है कि तुम वही करो जो बाज़ार कर रहा है। जबकि पत्रकारिता का मेन इथिक्स ही यह है कि वह उन चीज़ों का विरोध करे, जिसे वह सही नहीं मानता है और उन चीज़ों के पक्ष में मज़बूती से खड़ा हो, जो उसकी नज़र में सही है। लेकिन एक संपादक ही इतना लाचार और मजबूर होकर बयान देगा तो आम आदमी कहां जाएगा, किसके पास जाएगा अपना विरोध लेकर। जबकि आज भी ऐसे कई पत्रकारों को मैं जानता हूं, जिन्होंने समझौता करने से बेहतर नौकरी छोड़ना समझा। इतना ही नहीं, इसके बदले में उन्हें उल्टे-सीधे आरोप भी सहने पड़े। वैसे यहां मैं यह भी बता दूं कि इस्तीफा देना तो सबसे आसान काम है, पलायनवादी नज़रिया। इसलिए इस क़दम को मैं न जायज़ ठहरा रहा हूं और न जायज़ समझता हूं। लेकिन बाज़ार का यह रवैया (आप मैनेजमेंट भी समझ सकते हैं) सिर्फ इसलिए है कि अगर मेरी कमीज धवल नहीं तो तुम्हारी कमीज भी साफ नहीं रहने दी जाएगी। यानी हर चीज इतनी धुंधली हो जाए कि कुछ भी (कोई भी) उजला न दिखाई दे।
खैर, इन तमाम बातों के बाद भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि इस बाज़ार ने धीरे-धीरे चीज़ों को इतना अनुकूलित कर दिया है कि अजीत अंजुम जैसे लोग भी कहते हैं कि अभी तो ब्लू फिल्मों का प्रसारण नहीं हो रहा, जिस दिन होगा उस दिन हम इस्तीफा दे देंगे। लेकिन क्या इस बात की कोई गारंटी दे सकता है कि जैसे वैसी अस्वीकार्य चीजों को जिसके बारे में सोचना भी गुनाह था, बाज़ार ने अनुकूलित कर स्वीकार्य बना लिया है, वैसे ही क्या जब बाज़ार को जरूरत महसूस होगी तो वह ब्लू फिल्मों को भी स्वीकार नहीं करवा लेगा? और मूल्य जब एक बार टूटता है, तो टूटता ही चला जाता है। ये तो कुछ वैसी ही बात हो गयी कि जैसे नैतिकता भी प्रायोजित हो। यहां तक की नैतिकता फलां कंपनी ने स्पांसर कर रखी है, इसलिए यह जायज है। इसके आगे कि नैतिकता प्रतिद्वंद्वी कंपनी की है।
हां, मैं भी यह बात मानता हूं कि टीआरपी एक सच है। और मार्केट को वही गवर्न करता है और विज्ञापन का आधार भी वही टीआरपी है। लेकिन यह कैसी टीआरपी है कि देश की राजनीतिक दिशा और अपनी श्रम व मेधा से देश के विकास में लगे राज्यों का योगदान न्यूनतम है। आखिर ऐसा क्यों है? इस पर कभी कहीं न किसी टीवी चैनल ने और न नीति नियंताओं ने ध्यान दिया। जिन राज्यों में साल में नौ महीने अकाल, बाढ़, गरीबी और भुखमरी छायी रहती है, उनका कोई योगदान नहीं। सिर्फ इसलिए न कि उनके पॉकेट में पैसे नहीं हैं। इसलिए वे टीवी देखें या न देखें, अखबार पढ़ें या न पढ़ें… हमारी बला से। बाज़ार की सेहत पर उससे क्या फर्क पड़ता है।
एक बात और, क्या बिजनेस का कोई कायदा-कानून नहीं होता। कोई इथिक्स नहीं होता। अगर ऐसा है, तो नारकोटिक्स के धंधे में जो है, उन्हें भी हमें ग़लत कहने का कोई हक नहीं। लड़कियों की दलाली करने वाले को भी ग़लत कहने का हमें हक नहीं बनता। फिर क्यों सेल्फ रेगुलेटिंग एक्ट की भी बात की जाए। चलने दो, जैसे चल रहा है। क्योंकि सब तो बिजनेस ही कर रहे हैं, न। और ऐसा होता तो ब्लू फिल्म के मसले पर अजीत जी इतना उद्वेलित नहीं होते। ये तो मैं ही नहीं, कोई भी मानेगा कि पत्रकारिता एक बिजनेस है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वह बिजनेस के साथ और कुछ भी है। मैं 50-60 साल पहले के कुछ पत्रकारों का उदाहरण देकर इसे इसलिए नहीं समझाना चाहता कि ये सच है कि आज की पत्रकारिता बदली है, लेकिन आदर्श और मूल्य तो वही हैं। ख़बरों के कंटेंट में, प्रस्तुतीकरण में बदलाव हो सकते हैं, लेकिन यह तो नहीं हो सकता कि ख़बर वस्तुओं के हित के लिए हो जाए। ख़बर हमेशा से आम आदमी के हित के लिए थी और उसी के हित की होनी चाहिए। कुछ खास लोगों के लिए नहीं। जब मुलायम सिंह संसद में खुलकर अनिल अंबानी के पक्ष में बोलने लगते हैं, सरकार कुछ खास लोगों के लिए कानून में संशोधन करने लगती है, तो क्या उस वक्त भी मीडिया को चुप रह जाना चाहिए, क्योंकि टीआरपी बटोरना है, उस कंपनी और सरकार से विज्ञापन लेना है।
हो सकता है कि मीडिया जिस दिन इन चीजों के विरोध का साहस लेकर कमर कस कर उसी बाज़ार में उतरे, लेकिन बाज़ार की हिमायत के लिए नहीं तो खुद-ब-खुद टीआरपी का काला सच भी बदल जाए और जनता उसे हाथों हाथ ले ले। लेकिन जब मीडिया ही सत्ता पक्ष की राजनीति करने लगे और संसद में जाने का उसे टूल बना ले, तब तो कहने को यही बचता है – नैतिकता भी प्रायोजित हो गयी है।
मैं अपनी बात फैज की इस शेर से खत्म करता हूं,
दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है
इसलिए हमें तो मीडिया से भी और अजीत अंजुम के इस आलेख से भी बहुत उम्मीद बंधती दिखाई देती है, क्योंकि उनके आलेख से फैज एक बार फिर मौजूं हो जाते हैं,
बोल की लब आजाद हैं तेरे
बोल जबां अब तक तेरी है
बोल कि सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है









बहुत खूब मजकूर भाई. काम करने का माहौल कुछ यूँ बदल गया है मीडिया में की आज से १० साल पहले, कोई भी ऍमबीए टाइप सेल्स और advartisment से लोग अगर एडिटर से बात भी करते थे तो नज़र झुका के और मार्केट क्या चाहता है ये कोई नहीं बोलने की हिम्मत करता था. आज जुम्मा जुम्मा २-३ साल के अनुभव वाले ऍमबीए टाइप TRP की घुड़की दे जाता है एडिटर को और एडिटर भाई साब सुन लेते हैं. अब बाज़ार को अपनाया है तो भोगेगा कौन? बैठे रहिये गोष्ठियों में और अपने आप को फ्री मीडिया कह के पीठ थपथपाते रहिये.
और कभी थोडी शर्म हो तो पाकिस्तान और बांग्लादेश का न्यूज़ चैनल देख लीजियेगा. आपका फ्री मीडिया चुल्लू भर पानी मांगेगा डूबने के लिए. मेरे से ले लीजियेगा. मैं रोज़ डूबता हूँ.
बहुत ही अच्छा लेख है. आप ऐसे ही लिखते रहिये और हम पढ़ते रहेंगे. well done keep it up .
मजकूर भाई छा गये. इसी तरह लगे रहिए.
भाई मज्कूर, काम करते – करते बीच बीच में आपके इस आलेख को पढ़ रहा था. आपके इस कथन में थोड़ी संशोधन की जरुरत महसूस कर रहा हूं- हम धीरे-धीरे बाजार के अनुकूल हो रहे हैं – के बजाय यह कि – हम तेजी से बाजार के अनुकूल हो रहे हैं, और जहां बाजार का प्रभाव होता है, वहां नैतिकता, वैचारिकता, ईमानदारी, कर्तव्य जैसे भारी भरकम शब्द और उनके अर्थ अप्रसांगिक हो जाते हैं. ऐसे में मीडिया के बदले मिजाज किसी को झंकझोरने में समर्थ नहीं दिख रहे. इससे सिर्फ मीडिया ही नहीं बल्कि हर आदमी पूर्णता के साथ बाजारवाद का ध्वजवाहक बनता जा रहा है- न्याय व अन्याय, सच और झूठ की परिभाषा के पचड़े में पड़े बिना. इस लिए अब लोग उन चीजों का विरोध करने का माध्यम भी मीडिया को नहीं बना रहे, जिनका विरोध होना चाहिए. किसी भी गलत चीज का विरोध तभी होता है, जब हम यह माने कि वह गलत है और बाजार की रंगीनी ने हमारे विचारों को चकाचौंध में उलझा कर रख दिया है ऐसे में हमारे विचारों की दृष्टि सही और गलत का मूल्यांकन करने की सक्षमता खो रही है. हम ऐसे संक्रमण काल से गुजर रहे हैं जहां लोगों की सोच को भोथरा बनाया जा रहा है वह भी बड़ी खुबसूरती के साथ. बाजारवाद की चपेट में सबसे अधिक मीडिया है टीआरपी बढ़ाने और विज्ञापनों को हथियाने के लिए जो काले-सफेद सच गढ़े जाते हैं उस पर से पर्दा हटाये बगैर हम विचारवान, आंदोलित व उद्वेलित मीडिया को नहीं देख सकते. जब मीडिया ही सत्ता का दलाल बन जाये और अनैतिक तरीके के नैतिकता की व्याख्या करने लगे तो हमारे और आप जैसे लोग सिर्फ कसमसा सकते हैं और कुछ नहीं, खुल कर विरोध भी नहीं. कारण बहुते हैं, आप भी जानते हैं……..
mazkur bhai,
achha laga apki tippani padh ke.bahut jaruri hai hstakshep karna.ummid hai aak apni ye bhumika banaye rakhenge.
भाई जान बहुत खूब. अभी आप में भी आग बरकारार है. इसे बनाये रखिये अच्छा लिखा आप ने.
ajit अंजुम में aag है,सायद awdesh preet ko यहें नहीं मालूम हैं की आग है un aadmi मगर स्वार्थ जिसकी अपनी कोई sidhant नहीं है बल्कि उसने सिर्फ आगें badhney के लिए सामने wale ka footprint ko follow kiya hain वो एक
Thank you for your interesting hub but I think this is well above me.
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