नई दुनिया के बाहर भी एक दुनिया है आलोक जी!
♦ शिरीष खरे
इसमें कोई संदेह नहीं लगता कि आलोक मेहता के नये चाल-चरित्र की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। वरना जब तक ‘आउटलुक’ में रहे तब तक ‘आउटलुक’ की जुबान बोलने वाले ‘नई दुनिया’ के ‘प्रधान संपादक’ अपना सुर यूं ही क्यों बदल लेते? अगर पटकथा के केंद्र में शतरंज है तो खानों की पहली पंक्ति में बहुत से प्यादों के साथ आलोक मेहता (एक प्यादा) भी बैठे हैं, खेल को शुरू करने के लिए किसी एक प्यादे को तो चलना ही था, आलोक मेहता को चलाया गया। इस खेल में खिलाड़ी सत्ता की ऐसी ताक़तें हैं, जो अब तक विकास की तानाशाही परिभाषाएं चला कर अपना हित साधती आ रही थीं। लेकिन अब जबकि लंबे समय और संघर्ष के बाद भाषा जैसी तमाम परतों को मिटा कर कई व्यक्ति, नये-नये माध्यम और मोर्चे से सत्ता के पीछे की ‘कथनी’ और ‘करनी’ के बीच के भेद और अर्थों को बताने लगे तो ऐसे में देश के बाकी लोग नर्मदा घाटी वालों के दर्द को महसूस करने लगे, नंदीग्राम वालों के सच को जानने लगे, पहली बार सोचने पर मजबूर हुए कि लालगढ़ में जो सत्ता कह रही है वह कहीं ग़लत तो नहीं, जनता की उत्सुकता छतीसगढ़ के जंगलों की तरफ भी बढ़ी और कश्मीर या मणिपुर की वादियों की तरफ भी। अब तक सत्ता बंदूक की नली से तो आदिवासियों को मारती, उजड़ती और दबाती रही है, लेकिन अब विचार के नये-नये महारथियों और उनके तार्किक हथियारों का मुकाबला करना मुश्किल हो गया। यहां तक कि जो उसने सोचा भी नहीं वो भी हो गया, आखिरकार विनायक सेन के केस में उसने धूल चाट ही ली। मतलब आज की तारीख में जब वह समुदाय के एक हिस्से को नासमझ, भटका और देशद्रोही बताती तो कई सारे सवालों से घिर जाती है। जब वह हिंसा को केंद्र में रखती है तो उससे हिंसा के कारणों के बारे में भी पूछा जाता है। कुल मिलाकर उसे अब वैचारिक स्तर पर लड़ना ही था। और लगता है कि विनायक सेन और लालगढ़ के किस्से गर्म होने के बहुत पहले ही पटकथा का पहला ड्राफ्ट बनकर तैयार हो चुका था। अब इसमें केवल चरित्रों को ही भरना था। ऐसे में आलोक मेहता के रूप में पहली चाल चलने का अर्थ ही है कि बाकी प्यादों की पूर्ति कर ली गयी है। जाहिर है सरकार द्वारा प्रायोजित (तथाकथित) विचारों की जंग शुरू हो चुकी है। इसलिए आने वाले वक़्त में कुछ और चेहरे अगर नयी-नयी भूमिकाओं में कैद नज़र आएं तो हैरानी की बात नहीं। असल में तो इतिहास को सत्ता की चापलूसी करने वाले ऐसे चरित्रों ने ही बनाया है। उम्मीद है कि इस बार भी सत्ता को इन्हें खोजने में कोई बहुत ज्यादा मुश्किल नहीं आयी होगी।
उन्होंने पहले ही हमले में अरुंधती राय को निशाना बनाया। वह भी एक मज़बूत कहे जाने वाले दावेदार की तरफ से। ताकि मानव अधिकारों के लिए काम करने वाले हज़ारों कार्यकर्ताओं की बुलंद आवाज़ यूं ही कमज़ोर बना डाली जाए। ऐसी हवा बनायी गयी कि यह पत्रकार, लेखक, कलाकार और एक्टिविस्ट वगैरह भी कम नहीं होते। क्योंकि हमला पहला ही था इसलिए इस बार सीधे-सीधे न कहकर संकेत दिया गया कि यह भी कुछ-कुछ देशद्रोही, नासमझ और भटके हुए से ही हैं।
लेकिन एक जगह आकर सारा गुड़-गोबर हो गया। जिस आलोक मेहता से यह कहलवाना था कि अरुंधती को ज़मीनी वास्तविकता मालूम नहीं, दरअसल उसी आलोक मेहता की छवि ज़मीनी पत्रकार की कभी नहीं रही। मतलब भरोसेमंद दावेदार न होने से तीर चले तो लेकिन भरोसेमंद निशाने तक पहुंचने से बहुत पहले ही नीचे गिर गये। उधर, आलोक मेहता से भी पीछे के रास्ते सांसद बनने की छटपटाहट छिपायी नहीं गयी। और इधर दूसरी तरफ का मोर्चा संभालने वालों को पूरा खेल समझने में देर न लगी।
“हर एक बात पर कहते हो कि तू क्या है, तुम्हीं कहो कि ये अंदाज-ए-गुफ्तुगू क्या है” – आलोक मेहता ने ‘संडे नई दुनिया’ के महत्वपूर्ण स्तंभ में अरुंधती की तुलना ऋतंभरा और अरुण शौरी से करते हुए इस चलताऊ बना दिये गये शेर का इस्तेमाल भले ही न किया हो, लेकिन रंग-ढंग ऐसा ही अपनाया। वह अपनी भाषा और तर्क से संपादक कम, मैनेजर ज़्यादा नज़र आये। यानी साज़िश को अंजाम तक नहीं पहुंचाने में उनकी प्रतिभा का भी बड़ा हाथ रहा। लोगो को लगा कि अपनी व्यक्तिगत अपेक्षा और हताशा के चक्कर में देश के अहम मामलों को एक तरफ रखते हुए आलोक मेहता ने अरुंधती राय को अरुण शौरी की ही तरह ज़मीनी वास्विकता से अनजान बतलाया है, जरूर कोई आपस का मामला रहा होगा।
आलोक जी, आप लंबे समय से स्तंभ लिखने का ही काम करते रहे हैं इसलिए जो बात आपने अरुण शौरी के खिलाफ लिखी वो बात खुद आप पर भी लागू होती है कि – “(अरुण शौरी) सामान्य पत्रकारों को कीड़ा-मकोड़ा समझ कर दुत्कार सकते हैं, क्योंकि वह ज़मीनी पत्रकार कभी नहीं रहे।” इस संपादकीय के छपने के अगले दिन और आलोक मेहता के राज्यसभा सांसद बनने की अटकलों के बाद, आलोक मेहता का तर्क आलोक मेहता पर ही फिट नहीं करना चाहेंगे कि “यह सम्पादकीय उन्होंने क्यों लिखा, यह सच कभी पोलीग्राफ मशीन लगाकर उगलवाने पर दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।” अरुंधती राय की ज़मीनी वास्तविकता जानने से पहले आप अपने वातानुकूलित कमरे के आईने में अपनी चाल, अपने चरित्र को तो देख लेते। आपको अपना ही चाल-चरित्र अरुण शौरी से मेल खाता नज़र आता। बीजेपी के कंधों का सहारा लेकर अरुण शौरी सत्ता तक पहुंचे हैं, निस्संदेह अब तो आपका मन भी कांग्रेस के सामने लोटकर सत्ता के उसी रास्ते में दाखिल होने का करता है।
आलोक जी आपने कहा कि “लगता है जब अरुंधती छतीसगढ़ जाती हैं, तो सिरफिरे एकपक्षीय लोग ही उनकी पालकी ढोते हैं।” आपको ऐसे सुंदर शब्दों का प्रयोग तब करना पड़ा, जब अरुंधती राय ने पत्रकारिता और विज्ञापन के रिश्तों के बारे में अपना मत रखा। लेकिन अरुंधती के अलावा एक बहुत बड़ा तबक़ा यह मानता है कि आजकल के बहुत सारे अख़बार और पत्रकार विज्ञापन जुगाड़ने का काम करने लगे हैं, इसके लिए छतीसगढ़ जाने की ज़रूरत भी नहीं, दिल्ली के हेड ऑफिस ही काफी हैं। आप नहीं जानते कि जिसे आप संपादकीय मान बैठे हैं उसे कई लोग विज्ञापन की ही एक और किस्म का नाम दे रहे हैं। कहने वाले कह रहे हैं कि भुगतान के रूप में आजकल टिकेट-विकेट का चलन बढ़ रहा है। खैर हो सकता है कि इस तरह की वास्तविकता से आप अनजान हों। लेकिन आप नई दुनिया के दफ्तर से बाहर निकल कर नर्मदा या कश्मीर की घाटियों या फिर छतीसगढ़ की दुर्गम वादियों में कब घूमने वाले हैं, मुझ नादान को नहीं मालूम कि आप वहां कभी गये या नहीं, लेकिन अगर फिर से जाना चाहते हैं तो टाई में यह गठान बांधते हुए जाए कि “वहां के रास्तों की दिशाएं राज्यसभा से उलटी हैं।”









आप नहीं जानते कि जिसे आप संपादकीय मान बैठे हैं उसे कई लोग विज्ञापन की ही एक और किस्म का नाम दे रहे हैं।….हमारे एडपीआर के सरजी डॉ सूद ऐसे वाक्यों का उदाहरण एडवीटोरियल की परिभाषा समझाने के दौरान किया करते थे। ये एडवीटोरियल को समझने-समझाने के लिए आदर्श वाक्य हो सकता है,मैं तो अभी से ही नोट किए ले रहा हूं।
शिरीष जी का आंकलन विचारणीय है। राहुल बारपूते जी के बाद नई दुनिया की विश्वसनीयता और सरोकारों का अत्यधिक ह्रास हुआ। नई दुनिया ने एक तरह से दुकान का रुप ले लिया है। हमें इसमें ज्यादा आपत्ति नहीं है। लेकिन आपत्ति इस बात पर है कि आप अपने आप को चौथा स्तंभ न कहें।
अरुधती रॉय की चिंता आम आदमी की चिंता है। उनके विचारों में सत्यता है। लेकिन दुर्भाग्य से मीडिया में यह चिंता प्रदर्शित नहीं हो रही है। हालांकि इसके लिए केवल नई दुनिया को दोषी नहीं है। लेकिन आलोक मेहता ने यह दिखाने की कोशिश की कि नई दुनिया और स्थानीय मीडिया एक दूसरे के पूरक है। यह दंभ गले नहीं उतरता।
शिरीष जी का आंकलन विचारणीय है।
शिरीष की चिंता वाजिब है. एक आलोक मेहता ही नहीं कई सत्ता लोभी लोग पत्रकार से तथाकथित चिन्तक बन गए हैं और विकास तथा आदिवासियों की चिंता का ढोंग कर राजनीती और सत्ता का सुख भोगने के लिए लालायित हैं. इन्हें हम बगुला भगत भी कह सकते हैं, लेकिन सफ़ेद हाथी की कलई एक न एक दिन ज़रूर उतरती है.
देखिए मुझे लगता है कि परम आदरणीय आलोक मेहता जी का आकलन करने में आप लोग थोड़ी ग़लती कर रहे हैं. दरअसल बात यह है कि आलोक जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) उर्फ़ कांग्रेस के सच्चे सिपाही है. निष्ठावान कार्यकर्ता हैं(यह बात अलग है कि उनके पास सदस्यता की रसीद न हो.). वे पूरी निष्ठा, लगन और ईमानदारी से कांग्रेस पार्टी की सेवा करते है. मैं उनको बहुत दिनों से तो नहीं जानता या पढ़ता रहा हूँ लेकिन जब वे दैनिक हिंदुस्तान में थे तबसे मैं उनको देख-सुन रहा हूं. हिंदुस्तान से वे भास्कर चले गए. वहां से आउटलुक के प्रधान संपादक बनकर गए और फिर नई दुनिया में लौट आए हैं. इतनी कूद-फांद करने के बाद भी उन्होंने पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा में रत्ती भर भी कमी नहीं होने दी (याद करिए पिछले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान निकले आउटलुक के अंक). अब ऐसे निष्ठावान कार्यकर्ता को कांग्रेस पार्टी चाहे तो राज्यसभा भेजे या किसी राज्य का राज्यपाल बना दे, ऐसे में किसी को भी आपत्ती या तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए. आप लोग बेवजह चिल्ल-पों मचा रहे हैं. जाइए अपना-अपना काम करिए.
सत्ता के नाम पर जो लूट मची हुई है. उसकी जड़े विश्व बैंक से है. क्योंक विश्व बैंक का इनदिनों विरोध बढ गया है इसलिए सत्ता की ताकतों ने अमेरिका में बैठे अपने आकाओं से अनुदान के तौर पर ज्ञान की मदद मांगी है. बदले में उसे जो मदद मिली है, लगता है आलोक मेहता का लेख उसी नतीजे का छोटा सा हिस्सा है. आलोक तोमर जैसे कई लोग अब अपनी जुबान बदल रहे है, मतलब असली मामलों से ध्यान हटाने के लिए एक प्यादे की भूमिका ही निभा रहे हैं. और इस तरह देश के संसाधनों को लूटने की छोट को वाजिब ठहराया जाये.
यह जो शतरंज का खेल चल रहा है वह विश्व बैंक के इशारे पर ही चल रहा है. सत्ता के पास बन्दूक, गोला बारूद और उसको चलाने वाले तो हैं. नहीं हैं तो दिलों मैं इंसानी जस्बा.
अकल के अकाल में भी उसे उदारीकरण के नाम पर कंपनीराज के एजेंडे को आगे बढाना ही था. इसके लिए विकास के नाम पर विनास को छिपाते हुए उसे आमली जामा पहनाकर उसको सही साबित करने के लिए आलोक मेहता जैसे लोगो की कमी नहीं है. वह “सत्ता के, सत्ता के लिए, सत्ता द्वारा” पोषित शब्द विश्व बैंक से अनुदान के तौर पर ले लेते है”. ऐसे शतरंज के पियादों, जो अपने और सिर्फ अपने फायदे के लिए अपने आकाओं के इशारे पर चाल बदल लेते हैं वे शब्दों के बेहतरीन प्रयोग कर अपने चाहने वालों को खुश कर सकते है लेकिन देश की बुनियादी मसलों में जकडे देशवासियों के आंसू की कदर कैसे कर पाएंगे?
हिन्दी पत्रकारिता के लोकप्रिय हस्ती अलोक मेहता को पद्म सम्मान से सम्मानित किया गया है। आलोक जी संबंधो की मर्यादा को जिस हद तक निवाते हैं वह एक मिशल है। उनको चाहनेवाले सिर्फ़ पत्रकारिता में ही नही हैं बल्कि शिक्षा जगत, विश्वविद्यालय , नौकरशाही, राजनेताओ और आम पाठको में भी बड़ी संख्या में लोग उन्हें सम्मान के साथ देखते हैं। आलोक जी का रहन सहन अभी भी एक आम आदमी जैसा है। उनके घर पर जाने वाले बताते हैं लगता ही नही है कि किसी बड़े पत्रकार के घर में हम बैठे हुए हैं। यह खुसबू आज कि दुनिया में दुर्लभ है। वे क्लास्सिकल समाजवादी कि तरह रहते हैं। इस जीवन पद्धति ने उन्हें और भी लोकप्रिय बना दिया है।
मुद्दा यह है कि अखबार और पत्रकार जनता के मुद्धो से काफी दूर यह सिर्फ विज्ञापन और कंपनियों के नजदीक है ऐसे मै जनता की हकीकत को समझने वाले पत्रकारों – अरुंधती जैसी को उखार फेकना चाहते है पर अलोक मेहता जैसे गिरे हुए ख़रीदे हुए पत्रकार को ये समझना चाहिए की जनता की आवाज़ की ताकत अरुन्दाती के पास है और जनता अपनी आवाज़ pahchanti है अलोक मेहता जनता की आवाज़ नहीं है ऐसे लोग का विसलेसन हमारे kissi काम का ही नहीं.
अमूल्य निधि
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