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जनता को चूतिया मत बनाइए आलोक जी!

12 August 2009 13 Comments

♦ सुशांत झा

english-hindiअरुंधती को मेगसायसाय अवार्ड? मेरे समान्य ज्ञान में वृद्धि हुई। सिर्फ अंग्रेज़ी अखबार या मीडिया ही पश्चिमी पूंजीवाद से विज्ञापन पाता है? नई दुनिया – ऐसा लगता है सिर्फ स्वदेशी जागरण मंच या लाल पार्टी के ही विज्ञापन से चलता है। क्या आलोक मेहता को पता है कि लक्स साबुन कौन सी कंपनी बनाती है? अरुंधती ने व्यापक बात कही कि आजकल पत्रकारों को विज्ञापन जुटाने का काम भी करना पड़ता है। इस बात से आलोक मेहता को बुखार क्यों लगता है कि छत्तीसगढ़ में कम ख़बरें आदिवासियों के बारे में छपती हैं। क्या कोई अखबार वहां ये जोखिम लेने का माद्दा रखता है कि सरकारी विज्ञापन से मुंह मोड़ सके? जाहिर है वो आदिवासी की खबरें नहीं छापता है और सरकार से मेलजोल करने की कोशिश में लगा रहता है। ये सच्चाई है। दूसरी बात की कुछेक रिपोर्टों का हवाला देकर आलोक मेहता लोगों की आंखों में धूल क्यों झोंकना चाहते हैं कि उनके अख़बार में फलानी-ढिमकानी ख़बर छपी है। अख़बार में तो वैसे भी काफी जगह होती है – दिन में 100 ख़बरें छप सकती हैं, ऐसे में महीना में 5 ख़बरें आपने आदिवासियों के ‘दर्द’ पर छाप ही दी तो कौन-सा एहसान कर दिया?

आलोकजी कहते हैं कि हिंदी अख़बारों के पास साधनों की कमी होती है। देश में हर पखवाड़े 36वां और 38वां संस्करण निकालते वक्त तो ये कमी हमें नहीं दिखती। सालाना पार्टी जब पंचतारा होटलों में होती है तो ये कमी कहीं से नहीं झलकती। जब आलोकजी जैसे संपादकों की तनख्वाह करोड़ के आसपास होने की अफवाह फैलती है तो ये कमी हमें नहीं दिखती। हां, ट्रेनी और निचले तबकों के कर्मचारियों को भले ही 8-10 हजार में निपटा दिया जाए – तब लगता है कि हमारे हिंदी के अखबार वाकई गरीब और असहाय हैं।

दूसरी बात ये कि बड़े ही शातिराना अंदाज़ में इस पूरी बहस को अंग्रेजी बनाम हिंदी बनाम भारतीय (बनाम राष्ट्रवादी और संघी बनाते-बनाते सहम गये आलोक मेहता) बनाने की कोशिश की गयी है। मुख्य मुद्दा से भटकाने के लिए और अपने लचर तर्कों को धार देने के लिए मेहता ने तमाम अंग्रेज़ी पत्रकारों को लगभग दोयम या घटिया करार करने की कोशिश की है। भाषाई विमर्श अपनी जगह है और उसकी दीगर वजहें हैं लेकिन किसी ‘काउज’ को उठाने के लिए ये कहां की आवश्यकता है आलोक मेहताजी कि उसे उसी जुबान में उठायी जाए जिसमें आप अपनी बीवी से बात करते हैं?

आपने हिंदी के तमाम बड़े स्वनामधन्य संपादकों के नाम गिनाये, लगे हाथों अंग्रेजी के भी कुछ संपादकों के नाम गिना देते। शायद आप उन महान संपादकों की श्रेणी में अपना नाम भी देना चाहते थे – लेकिन शिष्टतावश अटक गये। एक बात बताइए कि छत्तीसगढ़ या कहीं और भी विज्ञापन लानेवाली बात से आप इतने तिलमिला गये – लेकिन मैंने आजतक आपको पैकेज लेकर और रिचार्ज करवाकर ख़बर छापने का विरोध करते नहीं देखा। हाल ही में जब लोकसभा चुनाव के दौरान ये ख़बर फैली थी तो इसकी मशाल प्रभाषजी ने उठायी थी – आप तो साथ देने भी नहीं आये।

आप राज्यसभा जा रहे हैं, इस अफवाह पर भी आप शुभकामना के पात्र हैं। आखिर आपको पहले भी बहुत सारे पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके बाद तो राज्यसभा ज़रूरी भी था।

लेकिन आलोकजी, माफ कीजिएगा, जनता को चूतिया मत बनाइए और अपने पाठकों को वोट देने वाली जनता की तरह बेवकूफ मत समझिए कि जो आप लिख देंगे वो सब स्वीकार कर लिया जाएगा। दरअसल बहुत तेजी से हम ऐसे जमाने की तरफ जा रहे हैं जहां हर छपा हुआ काला अक्षर विश्वसनीय नहीं रह जाएगा।

13 Comments »

  • विनीत कुमार said:

    ए सुशांत भाई,आदर्श-वादर्श के चक्कर में तो मैं कभी पड़ा नहीं लेकिन बुरा मत मानना इस तरह जनता के आगे चुतिया मत बनाइए जैसे शब्द का प्रयोग न किया करो। जिस जनता के लिए चाहे उसके समर्थन में ही इस शब्द का प्रयोग कर रहे हो वो दिनभर की थकी-हारी सो रही है,इस बात से अंजान कि कोई भाई उसके लिए चुतिया न बनाए जाने की लड़ाई आलोक मेहता जैसे पर+सिद्ध पत्रकार से लड़ रहा है,उसी में से एक जनता देर रात आपकी पोस्ट पढ़कर प्रतिक्रिया जाहिर कर रहा है। मेरी मां कहती है कि कसाई के सरापने से कभी गाय मरती है,यही बात आप भी कह रहे हैं कि आलोक मेहता हों चाहे देश का कोई और भी पत्रकार,उन्हें ये गलतफहमी दिल से निकाल देनी चाहिए कि वो सिर्फ और सिर्फ उनके पढ़-लिखे के आधार पर राय बनाती है। इतना तो एक आम आदमी बखूबी समझता है लेकिन इ चुतिया-उतिया जैसे शब्दों का प्रयोग न ही करें तो बेहतर होगा। हम इंटरनेट के जरिए जो कुछ भी लिख रहे हैं,एक तरह का सोशल डॉक्यूमेंटेशन कर रहे हैं। ये सच है कि घर जाते ही जुबान से स्साला शब्द तक नहीं निकलता लेकिन दिल्ली में दिनभर में जब तक कम से कम दस बार मां की,बहन की न कर लें,अपने रचनात्मक और मुश्किलों में भी जीने का जज्बा रखनेवाले इंसान होने का एहसास ही नहीं होता। लेकिन क्या कीजिएगा,कहते हैं न नजर का शरम भी एक चीज है। बाथरुम में नहाते वक्त अपना शरीर उपर से नीचे तक निहारा नहीं जाता,शरमा जाते हैं हम। उसी तरह कान-मुंह के शरम का भी निर्वाह कर लें तो वेबसाइट के भविष्य के लिए अच्छा ही रहेगा।
    ये बात मैं कोई ज्ञान देने की मुद्रा में नहीं कह रहा हूं बल्कि बहुत ही जीवंत अनुभव के आधार पर कह रहा हूं। एक बार आपही की तरह उबाल में आकर मैंने एक दैनिक समाचारपत्र के लिए कमीना शब्द का इस्तेमाल कर दिया। अब तो ये शब्द परसों के बाद देखिएगा,कैसे क्या लेडिस क्या जेंट्स सबकी जुबान पर होगा,कुछ लोग प्रोमो देखकर अभी से ही ओटेने(बार-बार दुहराने) लग गए हैं। उस पोस्ट में मैंने बहुत ही तार्किक तरीके से रखा। लेकिन जब उस अखबार ने मेरे विभाग के एचओडी औऱ गाइड से शिकायत की तो यही कहा कि मैंने उनके लिए अपशब्द और गाली का इस्तेमाल किया,बाकी बात डकार गए। इस तरह के शब्दों का प्रयोग करने में जो सबसे बड़ा नुकसान होता है वो ये कि हमारे सारे तर्क हवा कर दिए जाते हैं और एक शब्द को पकड़कर लोग बैठ जाते हैं।
    पोस्ट के तौर पर जब भी मैं मीडिया के मसले पर लिखता हूं,उससे असहमति जताते हुए कुछ अपनी बात करने की कोशिश करता हूं,हमें बार-बार एहसास होता है कि हमें हर हाल में मेनस्ट्रीम की मीडिया से कुछ अलग, बेहतर औऱ सार्थक करना है लेकिन इस एक-दो शब्द की वजह से मेनस्ट्रीम की मीडिया हमारी आलोचना करनी शुरु कर दें,हमारी बातों को तर्क होने के वाबजूद सीरियसली न ले तो हमारे सारे एफर्ट पानी में चला जाएगा। इसलिए हम कोशिश यही करें कि हमारे तर्क इतने मजबूत और मारक हों जैसा कि इस पोस्ट में है भी कि सामनेवाला उठकर पानी न पीने सके,फिर देखिएगा असली खेला। मुझे लगता है कि भाषा के स्तर पर हमें विशेष रुप से सतर्क रहना होगा।
    अविनाश जितने हाइपर डेमोक्रेटिक हैं उतने ही अपने लेखकों की भावनाओं का सम्मान करनेवाले इसलिए वो हमारे लिखे पर ज्यादा कैंची नहीं चलाते। हमारी कोशिश हो कि हम कभी ऐसी नौबत आने भी न दें।
    वैसे पोस्ट आपने जोरदार लिखी है,मजा आया पढ़कर। आलोक मेहता ने अगर पढ़ा होगा या पढ़ेगे तो एक बार ये मुहावरा जरुर याद करेंगे- कउआ से ज्यादा कउआ के बचवा तेज।.

  • विनीत कुमार said:

    …..और वैसे भी मोहल्लालाइव को कभी भड़ास की तरह उगलदान तो होना है नहीं कि साफ करने की जिम्मेदारी लिए बिना ही मार पीक,थूक,खखार,मवाद पच-पच फेकते जाना है। इसको मोहल्ला की तरह साफ-सुथरा रखना है,बिना कोई शुचितावादी आग्रह लिए हुए ही सही। उसी में बोली-बात सभ आदमी जैसन कर लिया जाए त देखिए फिर की इ वेबसाइटी पंचायत के मुखिया कौन होता है आखिर में जाकर।
    दोनों कमेंट जोड़कर,एके एमेंट मानकर पढ़िएगा।..

  • रंगनाथ सिंह said:

    विनीत भाई ने जो कहना चाहा है उसे समझिये ….. तीखा लिखिए , लेकिन लाल मिर्च के बजाय हरी मिर्च का प्रयोग कीजिये.

  • सुशांत झा said:

    आमीन…!

  • निखिल said:

    विनीत जी,
    आपका लिखा पढना अच्छा अनुभव होता है…..मगर, ये सब क्या सिर्फ वेबसाइटी पंचायत का मुखिया बनने की होड़ है क्या….ये बात कुछ हजम नहीं हुई….बाकी, सुशांत जी को तो आपने सही उपदेश दे ही दिया है….छोटी-छोटी मगर मोटी बातें….सुशांत जी, बोलिए सॉरी शक्तिमान…

  • सुशांत झा said:

    मैं इस बात को मानता हूं कि कई बार चूतिए जैसे शब्द से गंभीर लोग बिदक जाते हैं और लाख अच्छे कंटेन्ट के बावजूद आपके लेखन का वो प्रभाव नहीं बन पाता जो अपेक्षित है या यूं कहें कि आपका उद्येश्य ही मारा जाता है। लेकिन कई दूसरी बाते भी अहम हैं। हमने जाने अनजाने लिखते समय एक दायरा बना लिया है कि फलाने शब्द लिखना है फलाना नहीं। जैसे फिल्मवाले मादरजाद का प्रयोग करते हैं सेंसर से बचने के लिए। अब, चूतिया जिस मूल शब्द से बना है उस पर कई लोगों को भारी एतराज हो सकता है-कई नारियां,नारीवादियां-वादियों, और संभ्रात किस्म के पुरुषों को भी। ये बात अलग है कि दैनिक बोलचाल में सैकड़ों बार पान के पीक की तरह ये शब्द हमारी जुबान से छलकता है। जब हिंदी के बारे में कहा गया है कि ये ऐसी भाषा है जो जैसी लिखी जाती है वैसी बोली भी जाती है-तो फिर ये पाखंड क्यों। अब पलटकर ये नहीं पूछिएगा कि क्या आप ऐसी भाषा अपने घर में भी बोलते हैं।

    दूसरी बात, जिस संदर्भ में ये बात कही गई है वो सिर्फ लेख के टीआरपी या रीडरशिप के लिए नहीं है बल्कि पूरे लेख के सार को बेहतरीन रुप से प्रदर्शित करने के लिए शब्दों का चुनाव वाकई कई बार लाख संयम के बावदूज हमें फिसला देता है। पवित्र या संयमित शब्द कई बार मुझे पुरोहितों और मौलवियों जैसे लगते हैं जिनकी कोमल और मिठास भरी आवाज में सदियों की साजिशें छुपी होती हैं। आक्रोश और विरोध को व्यक्त करने के लिए कई बार असंसदीय किस्म की भाषा जनता की भाषा जैसी लगती है।

    मेरा मकसद किसी क्रान्ति का वीजारोपण नहीं है न ही बड़े लेखकों की नकल करना है जिन्होने धड़ल्ले से ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है। वैसे विनीत, मैं आपकी बात से सहमत हूं कि लोग असली मुद्दे को गोल कर देंगे और चूतिए को पकड़कर बैठ जाएंगे।

  • Indscribe said:

    Chutiya is no longer an objectionable word. In English four letter words are used frequently but we squirm at this mere word. Chutia even exists in Oxford dictionary now.

  • akhilesh dixit said:

    I have two observations on the editorial in question.
    1. Somewhere i have read about Narcissistic personality disorder which has an effect on one’s occupational and social behavior and the person suffers from a sense of grandiose self importance preoccupation with fantasies of…………………who knows ! House of Lords.

    2. There is a complication termed as ‘ Social attention consumption deficit anxiety disorder or syndrome’. The drug prescribed – Haridol.

    Sushant ji your reasoning regarding the word is ok but as a journalist and more so a word smith we can always try to find a better, powerful and assertive term which does’t deviate the readers and ‘others’ from the focal point of an article.

    Thank you for sparing your time.

    Akhilesh dixit
    Deptt. of Mass Media and Communication,
    Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi University,
    Wardha, Maharashtra

  • पंचरवाला said:

    Mr. Dixit,
    Sorry, I find your presumptions ridiculous and fake. You are just a Brahmin, who wants to retain casteism forever,
    Important : ‘’ ‘ Social attention consumption deficit anxiety disorder or syndrome’. The drug prescribed – Haridol.
    Why don’t you try this drug man? You are sick. And when dalits and tribes would start asserting, you’d be GONE.
    I FEEL SO SORRY TO TELL THE TRUTH.
    Be happy.
    A Chamaar., a bhangi, a non Brahmin, No savarna, Non Hindu.
    Hell with you….!
    Hell with your ‘left’ and ‘right’…

  • Vinayak Sharma said:

    एक समय था जब “लेख” एक लेखक की आत्मा से निकली बे-आवाज अभिव्यक्ति, अदृस्य भावनायों का मूर्त स्वरुप व सुप्त समाज को झझकोर कर जागृत करने का लिखित प्रयास माना जाता था. परन्तु समय बदलने के साथ-साथ लेखन व प्रकाशन का पूर्व भी बदलने लगा. जैसे : पत्रकारिता अब चाटुकारिता, प्रकाशन अब व्यावसाय, लेख(लेखकों का कठिन प्रयास) अब भडास, भाषा( सीमा में रहकर सुंदर और शिष्ट शब्दों का चयन) अब अशिष्ट और कलिष्ट भाषा के प्रयोग की होड़ .
    विभा जी अब तो आपको मेरे विचारों से सहमत होना ही पड़ेगा . लेख द्वारा प्रकट किये गए विचार व प्रयोग की गई भाषा अवश्य ही लेखक की विचारधारा, मन: स्तिथि, संस्कार, पूर्वाग्रह व उसकी कुंठाओं का द्योतक होता है. जिसको शिष्ट भाषा में “भड़ास” ही कहा जा सकता है.
    माननीय श्री सुशांत झा के लेख से लेकर अन्य दिए गए उपरोक्त कमेंट्स का यदि हम गहन अध्यन करें तो मेरा कथन स्वतः ही स्पस्ट हो जाता है.

    अनुरोध : While expressing views, we must follow the Code of Conduct .

  • akhilesh dixit said:

    श्री पंचरवाला जी
    आप ने तो पूरा प्लेट्फार्म ही बदल के रख दिया। मेरे कमेंट की कोई इस तरह भी व्याख्या कर सकता है मैने सपने में भी नहीं सोचा था। इस पूरे प्रकरण में जाति कहां से आ गयी। आपने तो बस वही किया जो यहां कहा नहीं जा सकता। थोड़ा और सोच कर फिर कुछ कहते तो अच्छा लगता। चलिये ख़ैर………….

  • akhilesh dixit said:

    श्री पंचरवाला जी
    आप ने तो पूरा प्लेट्फार्म ही बदल के रख दिया। मेरे कमेंट की कोई इस तरह भी व्याख्या कर सकता है मैने सपने में भी नहीं सोचा था। इस पूरे प्रकरण में जाति कहां से आ गयी? आपने तो बस वही किया जो यहां कहा नहीं जा सकता। थोड़ा और सोच कर फिर कुछ कहते तो अच्छा लगता। चलिये ख़ैर………….

  • चलिए अब भाषा पर “दो-दो हाथ” हो जाए : Janatantra.com said:

    [...] आलोक तोमर पर छिड़ी बहस के दौरान जब मोहल्ला लाइव पर एक खास शब्द का इस्तेमा… तो काफी लोग बमक गए थे। इस बार उन्होंने [...]

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