गांधी “कहते” क्यों हैं और मार्क्स “कहता” क्यों है?
♦ विभा रानी
हम यह देख कर बहुत खुश हैं कि हम अपनी संस्कृति, अपने महापुरुषों के प्रति बहुत श्रद्धावान और आस्थावान हैं। हमारे महापुरुष हमेशा से बड़े हैं, बड़े रहे हैं, बल्कि वे पैदा ही बड़े रूप में होते हैं। तभी तो राम के जन्म के समय कौशल्या को कहना पड़ा -
माता पुनि बोली, सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा,
कीजे सिसु लीला, अति प्रियसीला, यह सुख परम अनूपा।
ये सब बड़े लोग हैं और अपनी संस्कृति के बड़े लोग हैं, इसलिए हमारे संबोधन भी बड़े हो जाते हैं, जैसे, कभी भी आप देखेंगे तो पाएंगे कि हमारे महापुरुष हमेशा “कहते” हैं। राम “कहते” हैं, कृष्ण “कहते” हैं, बुद्ध “कहते” हैं, महावीर “कहते” हैं, नेता जी “कहते” हैं, गांधी जी “कहते” हैं, टैगोर “कहते” हैं, बंकिम “कहते” हैं, शरत “कहते” हैं, प्रेमचंद “कहते” हैं, देवराहा बाबा “कहते” हैं, रामदेव बाबा “कहते” हैं, रजनीश “कहते” हैं, यूसुफ साब और देव साब “कहते” हैं, अमर्त्य सेन “कहते” हैं, सत्यजित राय “कहते” हैं, आज के विक्रम सेठ और सलमान रुश्दी “कहते” हैं, अमितावा कुमार “कहते” हैं, शाहरुख़ से लेकर रणबीर कपूर तक सभी “कहते” हैं, और तो और हमारे आज के छुटभैये नेता तक भी “कहते” हैं। कभी भी कोई “कहता” नहीं है। अगर वह “कहता” है तो यह हमारा, हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारे महापुरुषों का अपमान है। और चाहे हमारी जान क्यों न चली जाए, हम कभी भी अपने महापुरुषों का अपमान क़तई नहीं सह सकते। यह हमारी चेतना का प्रश्न है।
हमारी चेतना में यह प्रश्न कभी नहीं आता कि सिर्फ हमारे ही महापुरुष क्यों कहते हैं? दूसरे देशों में भी तो एक से एक महापुरुष हो गये हैं। लेकिन उनमें से कोई भी कभी भी कुछ “कहते” नहीं हैं। वे सब केवल “कहता” है। बचपन से हम नाना किताबें पढ़ते आये हैं और इन सब किताबों में इन महापुरुषों के बारे में पढ़ते आये हैं। मगर हर जगह यही देखा कि ये सब “कहता” की श्रेणी में आते हैं। अब यक़ीन न हो देख लीजिए कि प्लेटो “कहता” है, अरस्तू “कहता” है, कंफ्यूसियस “कहता” है, मार्क्स “कहता” है, नीत्शे “कहता” है, सार्त्र “कहता” है, लू शुन “कहता” है, शेक्सपियर “कहता” है, मिल्टन “कहता” है, शेली “कहता” है, कीट्स “कहता” है, ओबामा “कहता” है।
यह हिंदीवालों की मति के क्या कहने और हम भी हिंदी ही पढ़ कर बड़े हुए हैं तो और कोई दूसरी भाषा समझ में ही नहीं आती। यह हिंदीवालों का व्याकरण इतना कठिन करने की ज़रूरत ही क्या थी? सीधे-सीधे अंग्रेजी के व्याकरण की तरह रख देते – “only He, only You, न He के लिए ‘वह’ और ‘वे’ के झंझट और न ‘You’ के लिए आप या तुम का झगड़ा। बस जी, He, You कहो और निकल लो। मगर ये हिंदीवाले जो ना करें।
मगर क्यों कोस रहे हैं हम हिंदीवालों को। यह तो हमारी सांस्कृतिक पहचान है, जो हमें विरासत में मिली है। हमारा काम है कि हम इस विरासत को पूरी ज़िम्मेदारी से आगे और आगे ले कर चलें और अपने वारिसों को यह विरासत सौंपें, ताकि वे भी हमारे अनुकरण में अपने महापुरुषों को पूरा-पूरा मान-समान देते रहें और “कहते” व “कहता” की परंपरा निरंतर ज़ारी रहे। दूसरों के महापुरुष तो दूसरों के हैं। उन्हें उतना आदर या तवज़्ज़ो देने की ज़रूरत?
(लेखिका हिंदी-मैथिली की सुप्रसिद्ध कथाकार-कवयित्री और रंगकर्मी हैं)









वाह इधर किसी का ध्यान ही नहीं गया।
बिलकुल सही सवाल उठाया है। बहुत से ऐसे विरोधाभास हैं हमारे यहां। जैसे हमारा यहां कहा जाता है कि (उम्र में) बड़ों की इज़्ज़त करो। मगर बूढ़े रिक्शा वाले या मजदूर से तू-तड़ाक करते ज़रा नहीं शर्माते।
विभा जी, बोलने में व्याकरण बीच में नहीं आता,हमेशा व्याकरण के हिसाब से वे ही बोलते हैं जो सब समय यांत्रिक भव से व्याकरण में ही रहते हैं, भाषा बोलचाल की भाषा में बहती है व्याकरण में नहीं। हम चाहें या न चाहें हमारी भाषा पर बोचाल का लहजा और पद्धति हावी रहती है।
विभा जी का यह लेख, लेख न होकर एक क्रांतिकारी विचार अधिक लगते हैं . हिंदी भाषा या सामाजिक शिष्टाचार की दृष्टी से देखें तो मैं विभा जी से पूर्ण रूप से सहमत हूँ क्यूंकि अपने से प्रत्येक बढे व्यक्ति को “आप, उनके, कहते हैं या आए थे” आदि कह कर ही संबोधन करना चाहिए. यदि लखनवी अंदाज या फिर सभ्रांत समाज की बात करें तो वे लोग तो बच्चों आदि को भी “आप” कह कर संबोधित करते हैं. जहाँ तक हिंदी भाषा की व्याकरण का प्रश्न है उसमें इस तरह के किसी भी भेद-भाव की बात कहीं लिखी गई है ऐसा मैंने कहीं नहीं पढ़ा. भाषा में क्षेत्रीय-परिचलित-शिष्टाचार व लेखकों का पूर्वाग्रह अवश्य ही अपनी छाप छोढ़ता है. लगभग ४-५ वर्ष पूर्व बंगाल के सत्ताधारी दल के एक नेता एक पार्टी विशेष के नेता के विषय में बोलते समय “आप” का संबोधन कर रहे थे वहीँ दूसरी तरफ एक अन्य दल के नेता के विषय में बोलते समय “वोह कहता है” , “उसको पता होना चाहिए” आदि शब्दों का प्रयोग बार-बार कर रहे थे. इसमें न तो भाषा की या व्याकरण की कमी या त्रुटी है. हाँ, यदि लेखक जानबूझकर ऐसा लिखते हैं तो इसे अवश्य ही पूर्वाग्रह या शिष्टाचार की कमी समझाना चाहिए.
बचपन में हमारे संस्कृत व हिंदी भाषा के अध्यापक बताया करते थे की जिनको हम अपने बहुत ही निकट मानते हैं उनके लिए भी हम “तू” शब्द का प्रयोग करते हैं. जैसे: “माँ तू कितनी…….. या “भगवान तूने मेरे साथ ही……”. विभा जी.. दूसरों के महापुरुषों के लिए “कहता है” शब्दों का प्रयोग करने वाले शायद उन्हें “माँ” या “भगवान” सरीखे समझते हों, ऐसा भी तो हो सकता है .
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