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	<title>Comments on: गांधी “कहते” क्‍यों हैं और मार्क्‍स “कहता” क्‍यों है?</title>
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		<title>By: Vinayak Sharma</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/08/12/traditional-grammer-of-hindi/comment-page-1/#comment-846</link>
		<dc:creator>Vinayak Sharma</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Aug 2009 05:53:31 +0000</pubDate>
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		<description>विभा जी का यह लेख, लेख न होकर एक क्रांतिकारी विचार अधिक लगते हैं . हिंदी भाषा या सामाजिक शिष्टाचार की दृष्टी से देखें तो मैं विभा जी से पूर्ण रूप से सहमत हूँ क्यूंकि अपने से प्रत्येक बढे व्यक्ति को &quot;आप, उनके, कहते हैं या आए थे&quot; आदि कह कर ही संबोधन करना चाहिए. यदि लखनवी अंदाज या फिर सभ्रांत समाज की बात करें तो वे लोग तो बच्चों आदि को भी &quot;आप&quot; कह कर संबोधित करते हैं. जहाँ तक हिंदी भाषा की व्याकरण का प्रश्न है उसमें इस तरह के किसी भी भेद-भाव की बात कहीं लिखी गई है ऐसा मैंने कहीं नहीं पढ़ा. भाषा में क्षेत्रीय-परिचलित-शिष्टाचार व लेखकों का पूर्वाग्रह अवश्य ही अपनी छाप छोढ़ता है. लगभग ४-५ वर्ष पूर्व बंगाल के सत्ताधारी दल के एक नेता एक पार्टी विशेष के नेता के विषय में बोलते समय &quot;आप&quot; का संबोधन कर रहे थे वहीँ दूसरी तरफ एक अन्य दल के नेता के विषय में बोलते समय &quot;वोह कहता है&quot; , &quot;उसको पता होना चाहिए&quot; आदि शब्दों का प्रयोग बार-बार कर रहे थे. इसमें न तो भाषा की या व्याकरण की कमी या त्रुटी है. हाँ, यदि लेखक जानबूझकर ऐसा लिखते हैं तो इसे अवश्य ही पूर्वाग्रह या शिष्टाचार की कमी समझाना चाहिए. 
    बचपन में हमारे संस्कृत व हिंदी भाषा के अध्यापक बताया करते थे की जिनको हम अपने   बहुत ही निकट मानते हैं उनके लिए भी हम &quot;तू&quot; शब्द का प्रयोग करते हैं. जैसे: &quot;माँ तू कितनी........ या &quot;भगवान तूने मेरे साथ ही......&quot;.  विभा जी.. दूसरों के महापुरुषों के लिए &quot;कहता है&quot;  शब्दों  का प्रयोग करने वाले शायद उन्हें &quot;माँ&quot;  या &quot;भगवान&quot; सरीखे समझते हों, ऐसा भी तो हो सकता है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>विभा जी का यह लेख, लेख न होकर एक क्रांतिकारी विचार अधिक लगते हैं . हिंदी भाषा या सामाजिक शिष्टाचार की दृष्टी से देखें तो मैं विभा जी से पूर्ण रूप से सहमत हूँ क्यूंकि अपने से प्रत्येक बढे व्यक्ति को &#8220;आप, उनके, कहते हैं या आए थे&#8221; आदि कह कर ही संबोधन करना चाहिए. यदि लखनवी अंदाज या फिर सभ्रांत समाज की बात करें तो वे लोग तो बच्चों आदि को भी &#8220;आप&#8221; कह कर संबोधित करते हैं. जहाँ तक हिंदी भाषा की व्याकरण का प्रश्न है उसमें इस तरह के किसी भी भेद-भाव की बात कहीं लिखी गई है ऐसा मैंने कहीं नहीं पढ़ा. भाषा में क्षेत्रीय-परिचलित-शिष्टाचार व लेखकों का पूर्वाग्रह अवश्य ही अपनी छाप छोढ़ता है. लगभग ४-५ वर्ष पूर्व बंगाल के सत्ताधारी दल के एक नेता एक पार्टी विशेष के नेता के विषय में बोलते समय &#8220;आप&#8221; का संबोधन कर रहे थे वहीँ दूसरी तरफ एक अन्य दल के नेता के विषय में बोलते समय &#8220;वोह कहता है&#8221; , &#8220;उसको पता होना चाहिए&#8221; आदि शब्दों का प्रयोग बार-बार कर रहे थे. इसमें न तो भाषा की या व्याकरण की कमी या त्रुटी है. हाँ, यदि लेखक जानबूझकर ऐसा लिखते हैं तो इसे अवश्य ही पूर्वाग्रह या शिष्टाचार की कमी समझाना चाहिए.<br />
    बचपन में हमारे संस्कृत व हिंदी भाषा के अध्यापक बताया करते थे की जिनको हम अपने   बहुत ही निकट मानते हैं उनके लिए भी हम &#8220;तू&#8221; शब्द का प्रयोग करते हैं. जैसे: &#8220;माँ तू कितनी&#8230;&#8230;.. या &#8220;भगवान तूने मेरे साथ ही&#8230;&#8230;&#8221;.  विभा जी.. दूसरों के महापुरुषों के लिए &#8220;कहता है&#8221;  शब्दों  का प्रयोग करने वाले शायद उन्हें &#8220;माँ&#8221;  या &#8220;भगवान&#8221; सरीखे समझते हों, ऐसा भी तो हो सकता है .</p>
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		<title>By: जगदीश्‍वर चतुर्वेदी</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/08/12/traditional-grammer-of-hindi/comment-page-1/#comment-805</link>
		<dc:creator>जगदीश्‍वर चतुर्वेदी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Aug 2009 14:12:19 +0000</pubDate>
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		<description>वि‍भा जी, बोलने में व्‍याकरण बीच में नहीं आता,हमेशा व्‍याकरण के हि‍साब से वे ही बोलते हैं जो सब समय यांत्रि‍क भव से व्‍याकरण में ही रहते हैं, भाषा बोलचाल की भाषा में बहती है व्‍याकरण में नहीं। हम चाहें या न चाहें हमारी भाषा पर बोचाल का लहजा और पद्धति‍ हावी रहती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वि‍भा जी, बोलने में व्‍याकरण बीच में नहीं आता,हमेशा व्‍याकरण के हि‍साब से वे ही बोलते हैं जो सब समय यांत्रि‍क भव से व्‍याकरण में ही रहते हैं, भाषा बोलचाल की भाषा में बहती है व्‍याकरण में नहीं। हम चाहें या न चाहें हमारी भाषा पर बोचाल का लहजा और पद्धति‍ हावी रहती है।</p>
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		<title>By: Sanjay Grover</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/08/12/traditional-grammer-of-hindi/comment-page-1/#comment-803</link>
		<dc:creator>Sanjay Grover</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Aug 2009 14:04:56 +0000</pubDate>
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		<description>बिलकुल सही सवाल उठाया है। बहुत से ऐसे विरोधाभास हैं हमारे यहां। जैसे हमारा यहां कहा जाता है कि (उम्र में) बड़ों की इज़्ज़त करो। मगर बूढ़े रिक्शा वाले या मजदूर से तू-तड़ाक करते ज़रा नहीं शर्माते।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिलकुल सही सवाल उठाया है। बहुत से ऐसे विरोधाभास हैं हमारे यहां। जैसे हमारा यहां कहा जाता है कि (उम्र में) बड़ों की इज़्ज़त करो। मगर बूढ़े रिक्शा वाले या मजदूर से तू-तड़ाक करते ज़रा नहीं शर्माते।</p>
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		<title>By: ashok</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/08/12/traditional-grammer-of-hindi/comment-page-1/#comment-802</link>
		<dc:creator>ashok</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 12 Aug 2009 12:58:41 +0000</pubDate>
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		<description>वाह इधर किसी का ध्यान ही नहीं गया।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाह इधर किसी का ध्यान ही नहीं गया।</p>
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