यह अरुंधती के असर को कम करने की साज़िश है
♦ अनिल
हिंदी लेखकीय समाज में अपने वर्तमान को अचूक तौर पर समझने और उसमें हस्तक्षेप करने का जुझारू साहस अवसान की ओर दिखता है। और अगर है भी, तो वह कितना वास्तविक है, यह जानने के लिए कई समाजशास्त्रीय शोधों की ज़रूरत होगी। बहरहाल, हम यहां बस इतना कहेंगे कि हिंदी समाज के ‘बुद्धिजीवी’ राजसत्ता के विचारों के साथ क़दमताल करने में नहीं चूकते हैं। (यहां महान हिंदी कवि मुक्तिबोध की कौंध बहुत लाज़िम है।) इसके एक नायाब उदाहरण ‘भूतपूर्व नौकरशाह’ ‘कवि’ और हिंदी विश्वविद्यालय के पहले ‘कुलपति’ अशोक वाजपेयी हैं, जिन्होंने छत्तीसगढ़ के डीजीपी और ‘कवि’ विश्वरंजन द्वारा संरक्षित और पोषित ‘प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान’ की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में हिंदी लेखकों की शिरकत को इस आधार पर जायज़ ठहराया कि छत्तीसगढ़ सरकार ‘नक्सलियों का जनसंहार’ कर रही है न कि आदिवासियों का। अब अगर अशोक वाजपेयी जी इस तर्क को सार्वजनिक तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं तो आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ऐसे कार्यक्रमों के ‘सरकारी उद्देश्य’ क्या होते है?
ये मामले राजसत्ता के सांस्थानिक ढांचे से बाहर आकर किस तरह के संकीर्ण और सनकी आकार ग्रहण करते हैं, इसका हालिया उदाहरण नई दुनिया के संपादक पत्रकार आलोक मेहता का है, जिन्होंने हंस की वार्षिक संगोष्ठी में अरूंधती रॉय के वक्तव्य पर प्रायोजित टुटपुंजिया टिप्पणी की है।
हंस की वार्षिक संगोष्ठी में हिंदी के लगभग सभी बड़े-बुज़ुर्ग, प्रतिनिधि रचनाकारों के बीच प्रख्यात लेखिका अरुंधती रॉय ने जो कुछ कहा, वह अगर आप चाहें, तो आंख खोल देने वाली स्थिति थी। यह संभवतः पहली बार है कि हिंदी के इतने बड़े मंच से देश के भीतर राजसत्ता द्वारा अपनी जनता पर छेडे़ गये आंतरिक युद्ध के बारे में, अरुंधती की मार्फ़त, इतनी पुख़्ता और विश्वसनीय जानकारियां मिली हैं। अन्यथा, हिंदी शिक्षित समाज में जो हालात हैं, उनमें इन मुद्दों को लेकर सामान्यतः कोई व्यापक चिंता, बेचैनी और प्रतिरोध के स्वर नहीं मिलते। ऐसे में आलोक मेहता ने अरुंधती के बारे में जो गरिमाहीन और कुत्सित बातें की हैं उनका जवाब देने की दरकार इसलिए नहीं है क्योंकि ऐसे ’आलोक मेहता’ राज्य द्वारा पोषित एवं संरक्षित प्रोपेगैंडा, ’सूचना उत्पादों’ को ही अपना नीति निदेशक तत्त्व मानते हैं। और इसका स्पष्ट उद्देश्य यह है कि हिंदी समाज के बीच अरूंधती ने जो असर छोड़ा, उसे कम से कम किया जाए। जाहिर तौर पर, इसीलिए, वर्तमान सन्नाटे को चीरने वाली आवाज़ों से उनका स्वाभाविक विरोध होता है। हम यहां पर इस बात को समझने की कोशिश करेंगे कि आलोक मेहता द्वारा अरूंधती के ख़िलाफ़ हिंदी के बड़े मंच से ही कही गयी उनकी बातों के जवाब में राग सलवा जुडुम अभियान को छेड़ने के क्या मायने हैं? हिंदी के अन्य बुद्धिजीवी हर बार की तरह इस बार भी ऐसे मसले पर मौन क्यों हैं?
देश के भीतर जो स्थितियां हैं, उस आधार पर भविष्य के संकेत साफ़ हैं कि हमारा देश एक संपूर्ण ‘गृह युद्ध’ की दिशा में तेज़ी से बढ़ रहा है। ऐसे में राजसत्ता को संचालित करने वाली कॉर्पोरेट नियंत्रित ‘लोकतांत्रिक सरकार’ (अरूंधती रॉय के शब्दों में, ‘बनाना रिपब्लिकन’, हिंदी में इसका कोई सटीक अनुवाद मुझे नहीं सूझ रहा है।) की एजेंसियों के लिए यह ज़रूरी होगा कि जनता पर अपने दमनकारी युद्ध अभियान की ‘वैधानिकता’ के लिए वे बुद्धिजीवियों के एक हिस्से को अपने मुखौटे के लिए इस्तेमाल करें। लोकतांत्रिक होने के बजाय, ‘लोकतांत्रिक’ दिखने के लिए बुद्धिजीवियों, लेखकों, संस्कृतिकर्मियों के बीच उदार चेहरा बनाये रखने की कोशिश करें। इनके फ़ॉर्मूले बहुत स्पष्ट हैं; साम्राज्यवादी वैश्वीकरण के प्रोजेक्ट्स के तहत जनता के संसाधनों को लूटने के लिए कॉरपोरेट घरानों को खुला संरक्षण देना, ‘विकास’ की मनमाना और बेशर्म परिभाषाएं गढ़ कर हर तरह की असहमतियों और प्रतिरोधों को कुचलने के लिए युद्धोन्माद का वातावरण बनाना, और इस पूरी योजना की कार्यरूप में परिणति के लिए ऐसे तत्त्वों को अलग-थलग या हतोत्साहित करना, जो इसके दांव पेंचों को उजागर करते हैं।
प्रख्यात पत्रकार जॉन पिल्गर ने लिखा है कि ‘युद्ध में ‘सच’ सबसे पहले घायल होता है।’ लेकिन युद्ध जब मनोवैज्ञानिक तौर पर लड़ा जाता है और देश की जनता के ऊपर आक्रमण को तेज़ करने के रिहर्सल किये जाते हैं तो वहां विश्वसनीय सच पर भी ज़बर्दस्त हमले होते हैं। डॉ बिनायक सेन को प्रताड़ित किये जाने का उदाहरण इसकी सर्वाधिक चर्चित मिसाल है। अरूंधती अपने लेखन में, बयानों में, वक्तव्यों में कई बार यह कह चुकी हैं कि देश के भीतर क़ानूनी तौर पर जो स्थितियां हैं, उसमें सत्ता से हर असहमत आदमी या औरत को कभी भी ‘देशद्रोही’, ‘आतंकवादी’, ‘नक्सली’ या ‘माओवादी’ कह कर ‘निपटा’ जा सकता है। देश के वंचित, मेहनतकश नागरिक तबक़ों से उनके नागरिक अधिकार योजनाबद्ध ढंग छीन लिये गये हैं और उन पर अगर दावा किया जाता है तो उसे ‘अपराध’ की श्रेणी में डाल दिया जाएगा।
अख़बार तथा जनसंचार के अन्य माध्यम इन मसलों पर सिद्धांततः सत्ता के सुर में ही सुर मिलाते हैं। छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश के ऐसे किसी हिस्से के अख़बारों के चरित्र और स्थानीय पत्रकारों की सामान्य दिशा इससे अलग कभी नहीं रही है। पत्रकारिता तथा पत्रकारिता से जुड़े लोगों की विश्वसनीयता आज लगातार संदेह के घेरे में है। ग्रामीण भारत ही नहीं शहरी और महानगरीय भारत में भी पत्रकारिता की भूमिका पर कुछ गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इन आलोचनाओं का तर्कसंगत जवाब पत्रकारिता की दुनिया से नहीं मिल सका है। स्थितियां तो निस्संदेह ख़राब हैं। ऐसे में, संघर्षरत समाज की स्थितियों और दिशाओं के बारे में अरूंधती के सटीक विश्लेषण उनकी रचनाधर्मिता द्वारा सार्थक हस्तक्षेप की एक मुकम्मल तैयारी होते हैं, जिसमें हर तरह के पुख़्ता प्रमाण मौजूद होते हैं। ऐसा वे कई तरह के ख़तरे उठाकर लिखती और बोलती हैं। मुक्तिबोध जैसा कि आह्वान करते हैं: ‘उठाने ही होंगे/अभिव्यक्ति के ख़तरे।’ हिंदी के लेखक जिस दिन ऐसा कर पाने में सक्षम होंगे, हिंदी समाज का संपूर्ण रूपांतरण अवश्यंभावी है।
और हिंदी समाज के लेखक, रचनाकार अगर राजसत्ता की विचारधारा और उसकी कार्यप्रणालियों से मोहासक्त हैं तो इसके कारणों की पड़ताल की जानी चाहिए।
(लेखक हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में मीडिया के शोधार्थी हैं।)









माहे तलत जी, माफ कीजिएगा आपकी स्थिति उस सूअर के समान है, जो गंदगी को ही अपना सबसे प्रिय भोज्य पदार्थ समझता है। तभी तो चाटुकारिता-भडैं़ती और प्रतिबद्धता-जनसरोकार में आपको कोई फर्क नहीं दिख रहा है। इस तरह तो आपने देश-दुनिया के सभी प्रतिबद्ध आदमकद छवियों को ही अपने बौनेपन से छोटा करने की निहायत घटिया कोशिश की है। दूसरी बात यह कि मैंने आसमान में एक नहीं कई पत्थर उछाले हैं और मेरा सिर नहीं फूटा है। जेब में एक कौड़ी भी नहीं है। फिर भी तीन साल से एक ऐसी भाषा में पत्रिका और अखबार निकाल रहा हूं जो राष्ट्रीय नहीं है। बिना किसी सेठिए, उद्योगपति, दलाल नौकरशाह और भ्रष्ट राजनेताओं की चापलूसी या पूंजी के।
आदिवासी-दलित भाषा में निकलने वाली नागपुरी भाषा की पत्रिका ‘जोहार सहिया’ पांच हजार छपती हैं और झारखंड की दस आदिवासी-क्षेत्रीय भाषाओं में समाचार देने वाले पाक्षिक अखबार ‘जोहार दिसुम खबर’ की दस हजार प्रतियां। शायद इस विशाल देश में कुछ और लोग भी इस तरह के काम कर रहे हों, जिनका कपार नहीं फूटा होगा। यह भी जान लीजिए कि हमारा यह पूरा प्रकाशन उपक्रम प्रोफेशनल है, किसी दानी-दाता के फंडिंग की इनायत नहीं है।
जैसे सृष्टि में दो तरह के जीव होते हैं, उसी तरह इंसानी समाज में भी दो तरह के लोग होते हैं। एक वो, जो खुद्दारी के साथ अपनी नागरिकता का निर्वाह करते हैं और दूसरे वे, जो चाटुकारिता को जिंदगी का लक्ष्य मानते हैं। दुनिया के सभी हिस्सों में इंसान इन्हीं दो सोच के बीच अपनी जिंदगी खर्च करता रहता है। हमारे देश के भी लोग, जो विभिन्न आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में सक्रिय हैं, इस सोच से बाहर नहीं हैं। राजनीतिक शब्दावली में कहा जाय तो ये दोनों सोच जनपक्षीय और जनविरोधी विचार को प्रतिंिबबित करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जनपक्षीय इंसान अंग्रेजी का है हिन्दी का है या किसी और भाषा का। हिन्दी को महज इसलिए नहीं बख्शा जा सकता है कि वह देश की ‘पवित्र’ राष्ट्रीय भाषा है। अभिव्यक्ति चाहे जिस भाषा में भी हो उसका सम्मान होना चाहिए। हिन्दी की अंधवकालत करने वाले दरअसल जाने-अनजाने में उसी संघी सुरंग में घुस जाते हैं जहां ‘हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्तान’ का नस्लीय उन्मादी हथियार भरा पड़ा है। यह भारत की बहुभाषायी सांस्कृतिक विविधता और विभिन्न संस्कृतियों की अवमानना ही नहीं है, बल्कि उन्हें खत्म कर देने का षड्यंत्र भी है।
सबसे पहला सवाल तो यही है कि अरुंधती ने ऐसा क्या कह दिया जो उस पर बवाल किया जाए। झारखंड में हमारे जैसे लोग हिन्दी पत्रकारिता की असलियत को बखूबी जानते हैं। भारत के आदिवासी क्षेत्रों में जो भी अखबार-चैनल इन दिनों कुकुरमुत्ते की तरह दिख रहे हैं, वे कहीं से भी अभिव्यक्ति, लोकतंत्र या आम जन के लिए नहीं शुरू हुए हैं। सभी के अपने आर्थिक हित हैं जिन्हें बचाने के लिए ही उन्होंने मीडिया का रूप धरा है। मेरी खुली चुनौती है, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल से निकलने वाले किसी भी अखबार-चैनल के एक महीने की फाईल उठा लीजिए और उनके शब्दों को गिन लीजिए, समाचारों की प्रकृति देख लीजिए सच्चाई नंग-धड़ंग आपके सामने होगी। चाहे वह आंदोलन का दंभ भरनेवाला कोई सबसे लोकप्रिय अखबार ही क्यों न हो। ऐसे ही हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ बीस कृतियां घोंट जाइए आपको पता चल जाएगा अरुंधती क्या और क्यों कह रही हैं। भारत की आदिवासी और उत्पीड़ित जनता अरुंधती की शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने दमन-संघर्ष के सवाल को राष्ट्रीय विमर्श में ला दिया। वरना पिछले सौ सालों से हिंदी साहित्य, मीडिया तो उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं व दमित जनता को सुनने को ही तैयार नहीं है।
मजेदार बात यह भी है कि सवा अरब के मर्दवादी समाज में महाश्वेता, अरुंधती, रोज केरकेट्टा, तुलसी मुंडा और दयामनी बारला जैसी महिलाएं ही राजकीय दमन के खिलाफ नये समाज की रचना करती हुई दिखाई दे रही हैं। भारतीय संसद भी जिन्हें अधिकार देने से ‘नपुंसक’ बना हुआ है। आपको और आपके प्रियजनों को नाली में रहना है तो शौक से रहिए, गंदगी को तो सर्वश्रष्ठ भोज्य पदार्थ मत घोषित कीजिए।
(यह अनिल से सहमत होते हुए माहे तलत के गलत को संबोधित है)
”मुक्तिबोध जैसा कि आह्वान करते हैं: ‘उठाने ही होंगे/अभिव्यक्ति के ख़तरे।’ हिंदी के लेखक जिस दिन ऐसा कर पाने में सक्षम होंगे, हिंदी समाज का संपूर्ण रूपांतरण अवश्यंभावी है।
और हिंदी समाज के लेखक, रचनाकार अगर राजसत्ता की विचारधारा और उसकी कार्यप्रणालियों से मोहासक्त हैं तो इसके कारणों की पड़ताल की जानी चाहिए।”
बहुत सही! ….और …..
“हिंदी लेखकीय समाज में अपने वर्तमान को अचूक तौर पर समझने और उसमें हस्तक्षेप करने का जुझारू साहस अवसान की ओर दिखता है। और अगर है भी, तो वह कितना वास्तविक है, यह जानने के लिए कई समाजशास्त्रीय शोधों की ज़रूरत होगी। बहरहाल, हम यहां बस इतना कहेंगे कि हिंदी समाज के ‘बुद्धिजीवी’ राजसत्ता के विचारों के साथ क़दमताल करने में नहीं चूकते हैं।”
डबल सही मेरे भाई! हिंदी में सारे लेखक सत्ता के दलाल, चापलूस और कायर नंबर एक, नटवर लाल नंबर दो हैं….(और भैया जी, आप कहां हैं? क्या हैं? कौन हैं? ) सलवा जुडुम, कार्पोरेट तंत्र, नक्सलवाद, माओवाद ….अलाना…फलाना ….पटाखा-नगाड़ा बजाने के बजाए अपने वर्धा के आका वी.सी. साहेब के बारे में सच सच बोलिए तो ! पिछले दरवाजे से नहीं (शरद जोशी के शब्दों में) सत्ता के ‘नाबदान के रास्ते’ से इन दिनों जो धड़ा-धड़ नियुक्तियां हुईं हैं, उनके बारे में कुछ ‘मुक्तिबोध’ वाली हिम्मत और नैतिकता दिखाइये !
ये पंकज राग जी हिंदी के कौन से कवि हैं, जिन्हें अरुंधती राय के उसूलों पर चलने वाले भारत भारद्वाज और ममता कालिया ने आपके वर्धा की पत्रिका में १८५७ की क्रांति के महान काव्य के बतौर छापा है!
जै हो! जै हो ! बजाते रहो ….एफ़.एम. २००९ !
हिंदी भाषा का रिवोल्यूशनरी रेडियो मिर्ची …!
इन दिनों आपके पन्नों पर काफी गर्म बहसें हो रही हैं, इस प्रसंग में यही कहना है कि यदि हिन्दी समाज में ,खासकर बुद्धिजीवियों में सहिष्णुता पैदा नहीं हुई तो संवाद की परिस्थितियां और भी खराब होती चली जाएंगी। हमें गंभीरता के साथ सोचना चाहिए कि हम कैसा समाज बना रहे हैं ? मेरी आलोक मेहता से कोई दोस्ती नहीं है। एक बुद्धिजीवी पत्रकार के नाते न सही एक सामान्य संपादक संपादक के नाते हमें उनकी बात को सुनकर उनके हाल पर छोड देना चाहिए। हिन्दी की बहुत सारी ऊर्जा इसी में खर्च हो जाती है, हिन्दी में जितने वाणी के शेर हैं उतने यदि कर्मशील व्यक्तित्व भी होते तो हिन्दी समाज का भला होता। दूसरी बात यह कि प्रत्येक असहमति का जबाव नहीं दिया जाता। आखिरी बात जो ज्यादा महत्वपूर्ण है ,अरून्धती राय बड़ी लेखिका हैं,हमारी आदरणीय हैं, किंतु उनके भारत संबंधी मूल्यांकन से सहमत नहीं हुआ जा सकता। भारत को वे कर्मशील भारतीय की आंखों से नहीं दर्शक या पर्यटक की आंखों से देखती हैं। उनकी भाषा चमकीली ह है , चमकीला भाषा टीवी की भाषा से मिलती है भारत के मिजाज से नहीं। अरून्धती की चेतना और भारत की बौद्धिक चेतना में यथार्थ और व्यवहार दोनों ही धरातल पर अंतर है,वे सीमित आंदोलन की भाषा बोलती हैं,यह ऐसा आन्दोलन है जो जायज है । किंतु इसके अनेक अग्रणी लोग लोकतंत्र को अस्वीकार करते हैं। भारत संबंधी कोई भी विमर्श लोकतंत्र को खारिज करके संभव नहीं है।अरून्धती को बाकी बुर्जुआ विचारकों की तरह खंड सत्य से प्यार है, भारत के समग्र सत्य को वे नहीं देख पाती हैं,यही वजह है कि वे भारत को ‘बनाना रिपब्लिक’ तक कहती हैं,उनसे पहले भी बहुत सारे लोग थे जो भारत के लोकतंत्र को झूठी आजादी कहते थे और रहते थे,ध्यान रहे हमारे पास जो कुछ भी उपलब्धियां हैं वे लोकतंत्र के कारण ही हैं।
‘बनाना रिपब्लिक’ कहने का एक ही अर्थ है कि अभी तक अरून्धती ने भारत के लोकतंत्र को सही परिप्रेक्ष्य में नहीं समझा है। लोकतंत्र के ही कारण हमें एक-दूसरे के बयानों और विचारों पर सदभाव के साथ विचार करना चाहिए। यही वह बिंदु है जहां से हम आलोकजी से भी अपने संबंध परिभाषित कर सकते हैं। हमें लेखक,पत्रकार ,नागरिक आदि के साथ अपने संबंधों को लोकतंत्र के पैमाने पर परिभाषित करना चाहिए न कि व्यक्तिगत भावनाओं और विचारों के आधारों पर।
अश्विनी पंकज के कमेन्ट को पोस्ट के रूप में आना चाहिए . उनके मजबूत पक्ष को को बहस में लाना जरुरी है.
जगदीश्वर जी के शास्वत विचारो को भी जगह दी जानी चाहिए. उसपे भी बहस जरुरी है.
हमें गंभीरता के साथ सोचना चाहिए कि हम कैसा समाज बना रहे हैं ?
जगदीश्वर जी के इस कताहन के आलोक में एक बहस हो जाये तो बेहतर.
फिलहाल j अग्दीशेअर जी से यही कहूँगा की मोहल्ले में बहस करने में जो लेखक सर्वाधिक सक्रीय है उनमे से अपवाद ही ऐसे हिंगे जिनके पास छपने का संकट होगा. बहुत कम ही ऐसे है जो खलिहल है या जो टाइमपास के लिए बहस में बने हुए है.
श्रेष्टता ग्रंथि से मुक्त हो के बहस कीजिये. गूढ़-ज्ञान और गुरु-गंभीर तरीके से किसी शाश्वत मुद्दे पर बहस करनी है तो करिए,
सब का भला होगा…..
आलोक मेहता मध्यप्रदेश की धरती के प्रतिनिधि पत्रकार हैं। भोपाल में अर्जुन सिंह ने मुख्यमंत्री रहने के दौरान जो पत्रकारिता स्कूल खोला था, वहां से ऐसे ही रत्न पैदा हो सकते हैं। चिंता की बात ये है कि भोपाल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म अब नेशनल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म बनता जा रहा है।
फिलहाल j अग्दीशेअर जी से यही कहूँगा की मोहल्ले में बहस करने में जो लेखक सर्वाधिक सक्रीय है उनमे से अपवाद ही ऐसे हिंगे जिनके पास छपने का संकट होगा. बहुत कम ही ऐसे है जो खलिहल है या जो टाइमपास के लिए बहस में बने हुए है.
श्रेष्टता ग्रंथि से मुक्त हो के बहस कीजिये. …. रंगनाथ भाई के इस विचार से पूर्णतः सहमत हूं। बल्कि मैं तो ये कहता हूं कि जो कोई भी इंटरनेट की दुनिया में लिख रहा है उसके लिए अलग से छपने जैसे शब्द का प्रयोग करने की कोई जरुरत भी नहीं है। अब कोई जरुरी नहीं है कि हर लिखे पर संपादक की कैंची चले ही चले,संपादक की ताकत सीमित हुई है इसे मानना होगा और उन्हें अखबारी औऱ पत्रिका की शर्तों को थोपने के दुराग्रह से बचना होगा। यहां लोग अपने तरीके से पहचान बना रहे हैं और लोग उन्हें पढ़ रहे हैं,जिस तरह टेलीविजन देखने और अखबार पढ़ने वाला हर नागरिक बुद्धिजीवी नहीं होता,उसी तरह इंटरनेट पर हर कोई लिखनेवाला आदमी बुद्धिजीवी हो ऐसा मानना सरासर गलत होगा। जिस तरह हम कहते आए हैं कि आम पाठक होता है उसी तरह हमें स्वीकार करना चाहिए कि अब आम लेखक भी है और उसकी जो भी समझ बनी है उसे लिखने देना चाहिए,उसके लिखे को प्रोत्साहित करना चाहिए। अपनी ओर से उन पर बौद्धिकता लादने की कोई जरुरत नहीं है। देखिएगा,धीरे-धीरे अपने आप मैच्योरिटी आती चली जाएगी।
कुछ दोस्तों ने मेरी टिप्पणी को गलत स्प्रिट में ले लिया। उनका जोश और गुस्सा जायज है और उसे व्यक्त करने का उनका लोकतांत्रिक अधिकार भी है। मैंने लिखने के संकट वाली बात नहीं उठायी थी, मेरी पोस्ट देख सकते हैं,समस्या यह नहीं है कि आप या हम अथवा अन्य कोई कितना ज्ञानी है। ‘मोहल्ला’ लेखक अच्छा काम कर रहे हैं। समस्या यह भी नहीं है कि श्रेष्ठता ग्रंथि कहां है और कौन इसका शिकार है,इंटरनेट पर ज्ञान, अहंकार, श्रेष्ठता,पद ,विचारक,सामाजिक कार्यकर्त्ता,क्रांतिकारी,प्रतिक्रांतिकारी आदि सब गायब हो जाते हैं। अब सिर्फ यूजर होता है। सिर्फ लेखन होता है और कुछ नहीं। इंटरनेट के लेखन के संदर्भ में हमें पश्चिम के विचारकों से कुछ सीखना चाहिए। इंटरनेट में कुछ भी शाश्वत नहीं होता,सब कुछ बासी होता है,ताजा तो सिर्फ यूजर होता है।शाश्वत और और टिकाऊ की मौत ही इंटरनेट की देन है।
जग्दीश्वर चतुर्वेदी की बात से सहमति।.
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