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	<title>Comments on: यह अरुंधती के असर को कम करने की साज़‍िश है</title>
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		<title>By: विनीत कुमार</title>
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		<dc:creator>विनीत कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2009 05:58:54 +0000</pubDate>
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		<description>जग्दीश्वर चतुर्वेदी की बात से सहमति।.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जग्दीश्वर चतुर्वेदी की बात से सहमति।.</p>
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		<title>By: जगदीश्‍वर चतुर्वेदी</title>
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		<dc:creator>जगदीश्‍वर चतुर्वेदी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 15 Aug 2009 04:44:32 +0000</pubDate>
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		<description>कुछ दोस्‍तों ने मेरी टि‍प्‍पणी को गलत स्‍प्रि‍ट में ले लि‍या। उनका जोश और गुस्‍सा जायज है और उसे व्‍यक्‍त करने का उनका लोकतांत्रि‍क अधि‍कार भी है। मैंने लि‍खने के संकट वाली बात नहीं उठायी थी, मेरी पोस्‍ट देख सकते हैं,समस्‍या यह नहीं है कि‍ आप या हम अथवा अन्‍य कोई कि‍तना ज्ञानी है। &#039;मोहल्‍ला&#039; लेखक अच्‍छा काम कर रहे हैं। समस्‍या यह भी नहीं है कि‍ श्रेष्‍ठता ग्रंथि‍ कहां है और कौन इसका शि‍कार है,इंटरनेट पर ज्ञान, अहंकार,  श्रेष्‍ठता,पद ,वि‍चारक,सामाजि‍क कार्यकर्त्‍ता,क्रांति‍कारी,प्रति‍क्रांति‍कारी आदि‍ सब गायब हो जाते हैं। अब सि‍र्फ यूजर होता है।  सि‍र्फ लेखन होता है और कुछ नहीं। इंटरनेट के लेखन के संदर्भ में हमें पश्‍चि‍म के वि‍चारकों से कुछ सीखना चाहि‍ए।  इंटरनेट में कुछ भी शाश्‍वत नहीं होता,सब कुछ बासी होता है,ताजा तो सि‍र्फ यूजर होता है।शाश्‍वत और और टि‍काऊ की मौत ही इंटरनेट की देन है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कुछ दोस्‍तों ने मेरी टि‍प्‍पणी को गलत स्‍प्रि‍ट में ले लि‍या। उनका जोश और गुस्‍सा जायज है और उसे व्‍यक्‍त करने का उनका लोकतांत्रि‍क अधि‍कार भी है। मैंने लि‍खने के संकट वाली बात नहीं उठायी थी, मेरी पोस्‍ट देख सकते हैं,समस्‍या यह नहीं है कि‍ आप या हम अथवा अन्‍य कोई कि‍तना ज्ञानी है। &#8216;मोहल्‍ला&#8217; लेखक अच्‍छा काम कर रहे हैं। समस्‍या यह भी नहीं है कि‍ श्रेष्‍ठता ग्रंथि‍ कहां है और कौन इसका शि‍कार है,इंटरनेट पर ज्ञान, अहंकार,  श्रेष्‍ठता,पद ,वि‍चारक,सामाजि‍क कार्यकर्त्‍ता,क्रांति‍कारी,प्रति‍क्रांति‍कारी आदि‍ सब गायब हो जाते हैं। अब सि‍र्फ यूजर होता है।  सि‍र्फ लेखन होता है और कुछ नहीं। इंटरनेट के लेखन के संदर्भ में हमें पश्‍चि‍म के वि‍चारकों से कुछ सीखना चाहि‍ए।  इंटरनेट में कुछ भी शाश्‍वत नहीं होता,सब कुछ बासी होता है,ताजा तो सि‍र्फ यूजर होता है।शाश्‍वत और और टि‍काऊ की मौत ही इंटरनेट की देन है।</p>
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		<title>By: विनीत कुमार</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/08/14/alok-mehta-editorial-is-conspiracy-against-effect-of-arundhati-roy/comment-page-1/#comment-868</link>
		<dc:creator>विनीत कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Aug 2009 18:00:12 +0000</pubDate>
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		<description>फिलहाल j अग्दीशेअर जी से यही कहूँगा की मोहल्ले में बहस करने में जो लेखक सर्वाधिक सक्रीय है उनमे से अपवाद ही ऐसे हिंगे जिनके पास छपने का संकट होगा. बहुत कम ही ऐसे है जो खलिहल है या जो टाइमपास के लिए बहस में बने हुए है.
श्रेष्टता ग्रंथि से मुक्त हो के बहस कीजिये. .... रंगनाथ भाई के इस विचार से पूर्णतः सहमत हूं। बल्कि मैं तो ये कहता हूं कि जो कोई भी इंटरनेट की दुनिया में लिख रहा है उसके लिए अलग से छपने जैसे शब्द का प्रयोग करने की कोई जरुरत भी नहीं है। अब कोई जरुरी नहीं है कि हर लिखे पर संपादक की कैंची चले ही चले,संपादक की ताकत सीमित हुई है इसे मानना होगा और उन्हें अखबारी औऱ पत्रिका की शर्तों को थोपने के दुराग्रह से बचना होगा। यहां लोग अपने तरीके से पहचान बना रहे हैं और लोग उन्हें पढ़ रहे हैं,जिस तरह टेलीविजन देखने और अखबार पढ़ने वाला हर नागरिक बुद्धिजीवी नहीं होता,उसी तरह इंटरनेट पर हर कोई लिखनेवाला आदमी बुद्धिजीवी हो ऐसा मानना सरासर गलत होगा। जिस तरह हम कहते आए हैं कि आम पाठक होता है उसी तरह हमें स्वीकार करना चाहिए कि अब आम लेखक भी है और उसकी जो भी समझ बनी है उसे लिखने देना चाहिए,उसके लिखे को प्रोत्साहित करना चाहिए। अपनी ओर से उन पर बौद्धिकता लादने की कोई जरुरत नहीं है। देखिएगा,धीरे-धीरे अपने आप मैच्योरिटी आती चली जाएगी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>फिलहाल j अग्दीशेअर जी से यही कहूँगा की मोहल्ले में बहस करने में जो लेखक सर्वाधिक सक्रीय है उनमे से अपवाद ही ऐसे हिंगे जिनके पास छपने का संकट होगा. बहुत कम ही ऐसे है जो खलिहल है या जो टाइमपास के लिए बहस में बने हुए है.<br />
श्रेष्टता ग्रंथि से मुक्त हो के बहस कीजिये. &#8230;. रंगनाथ भाई के इस विचार से पूर्णतः सहमत हूं। बल्कि मैं तो ये कहता हूं कि जो कोई भी इंटरनेट की दुनिया में लिख रहा है उसके लिए अलग से छपने जैसे शब्द का प्रयोग करने की कोई जरुरत भी नहीं है। अब कोई जरुरी नहीं है कि हर लिखे पर संपादक की कैंची चले ही चले,संपादक की ताकत सीमित हुई है इसे मानना होगा और उन्हें अखबारी औऱ पत्रिका की शर्तों को थोपने के दुराग्रह से बचना होगा। यहां लोग अपने तरीके से पहचान बना रहे हैं और लोग उन्हें पढ़ रहे हैं,जिस तरह टेलीविजन देखने और अखबार पढ़ने वाला हर नागरिक बुद्धिजीवी नहीं होता,उसी तरह इंटरनेट पर हर कोई लिखनेवाला आदमी बुद्धिजीवी हो ऐसा मानना सरासर गलत होगा। जिस तरह हम कहते आए हैं कि आम पाठक होता है उसी तरह हमें स्वीकार करना चाहिए कि अब आम लेखक भी है और उसकी जो भी समझ बनी है उसे लिखने देना चाहिए,उसके लिखे को प्रोत्साहित करना चाहिए। अपनी ओर से उन पर बौद्धिकता लादने की कोई जरुरत नहीं है। देखिएगा,धीरे-धीरे अपने आप मैच्योरिटी आती चली जाएगी।</p>
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		<title>By: चारवाक सत्य</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/08/14/alok-mehta-editorial-is-conspiracy-against-effect-of-arundhati-roy/comment-page-1/#comment-867</link>
		<dc:creator>चारवाक सत्य</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Aug 2009 17:37:11 +0000</pubDate>
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		<description>आलोक मेहता मध्यप्रदेश की धरती के प्रतिनिधि पत्रकार हैं। भोपाल में अर्जुन सिंह ने मुख्यमंत्री रहने के दौरान जो पत्रकारिता स्कूल खोला था, वहां से ऐसे ही रत्न पैदा हो सकते हैं। चिंता की बात ये है कि भोपाल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म अब नेशनल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म बनता जा रहा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आलोक मेहता मध्यप्रदेश की धरती के प्रतिनिधि पत्रकार हैं। भोपाल में अर्जुन सिंह ने मुख्यमंत्री रहने के दौरान जो पत्रकारिता स्कूल खोला था, वहां से ऐसे ही रत्न पैदा हो सकते हैं। चिंता की बात ये है कि भोपाल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म अब नेशनल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म बनता जा रहा है।</p>
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		<title>By: rangnathsingh</title>
		<link>http://mohallalive.com/2009/08/14/alok-mehta-editorial-is-conspiracy-against-effect-of-arundhati-roy/comment-page-1/#comment-864</link>
		<dc:creator>rangnathsingh</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Aug 2009 15:04:54 +0000</pubDate>
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		<description>अश्विनी पंकज के कमेन्ट को पोस्ट के रूप में आना चाहिए . उनके मजबूत पक्ष को को बहस में लाना जरुरी है. 

जगदीश्वर जी के शास्वत विचारो को भी जगह दी जानी चाहिए. उसपे  भी बहस जरुरी है. 

हमें गंभीरता के साथ सोचना चाहि‍ए कि‍ हम कैसा समाज बना रहे हैं ?

जगदीश्वर जी के इस कताहन के आलोक में एक बहस हो जाये तो बेहतर. 

फिलहाल j अग्दीशेअर जी से यही कहूँगा की मोहल्ले में बहस करने में जो लेखक सर्वाधिक सक्रीय है उनमे से अपवाद ही ऐसे हिंगे जिनके पास छपने का संकट होगा. बहुत कम ही ऐसे है जो खलिहल है या जो टाइमपास के लिए बहस में बने हुए है.

श्रेष्टता ग्रंथि से मुक्त हो के बहस कीजिये. गूढ़-ज्ञान और गुरु-गंभीर तरीके से किसी शाश्वत मुद्दे पर बहस करनी है तो करिए,

सब का भला होगा.....</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अश्विनी पंकज के कमेन्ट को पोस्ट के रूप में आना चाहिए . उनके मजबूत पक्ष को को बहस में लाना जरुरी है. </p>
<p>जगदीश्वर जी के शास्वत विचारो को भी जगह दी जानी चाहिए. उसपे  भी बहस जरुरी है. </p>
<p>हमें गंभीरता के साथ सोचना चाहि‍ए कि‍ हम कैसा समाज बना रहे हैं ?</p>
<p>जगदीश्वर जी के इस कताहन के आलोक में एक बहस हो जाये तो बेहतर. </p>
<p>फिलहाल j अग्दीशेअर जी से यही कहूँगा की मोहल्ले में बहस करने में जो लेखक सर्वाधिक सक्रीय है उनमे से अपवाद ही ऐसे हिंगे जिनके पास छपने का संकट होगा. बहुत कम ही ऐसे है जो खलिहल है या जो टाइमपास के लिए बहस में बने हुए है.</p>
<p>श्रेष्टता ग्रंथि से मुक्त हो के बहस कीजिये. गूढ़-ज्ञान और गुरु-गंभीर तरीके से किसी शाश्वत मुद्दे पर बहस करनी है तो करिए,</p>
<p>सब का भला होगा&#8230;..</p>
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